'स्वदेस' की कहानी कितने ही कामयाब एनआरआई लोगों को अपनी लगती होगी. ऐसे लोग जोअपने सपने लेकर 'land of opportunity' कहलाने वाले अमरीका गए और वहां कामयाब होकरअपने देस के लिए कुछ करने के लिए लौटे. 'स्वदेस' में शाहरुख का नाम होता है मोहनभार्गव. इसे बस 'मोहन' की जगह 'मनोज' भार्गव होना था, कहानी सच के थोड़ा करीब होजाती. काहे कि मनोज भार्गव भी मोहन की ही तरह एक सफल एनआरआई हैं जो अपने दिन फिरनेके बाद अब अपने देस के लिए कुछ करने का इरादा रखते हैं.मनोज अरबपती हैं. डॉलर वाले अरबपति. उन्होंने ऐलान कर दिया है कि वो अपनी दौलत का99% फीसदी ज़रूरतमंदों के लिए दान कर देंगे. लेकिन इनकी तारीफ इनके दान के लिए नहींहोती, दान करने के तरीके के लिए होती है. क्योंकि दान का उनका तरीका क्लीशे नहींहै. लल्लनटॉप है. वो अपना पैसा बांट देने में यकीन नहीं करते. उनका मानना है किबेहतर ये होगा कि इस पैसे से ऐसे आविष्कार किए जाएं जिनसे ज़रूरतमंदों की ज़िंदगीबेहतर हो. हमें ये बात मस्त लगी. इन दिनों मनोज दिल्ली आए हुए हैं, तो हम पहुंच गएउनसे मिलने. हमारी उनकी क्या बात हुई, आपको बता रहे हैं-लल्लनटॉप - हिंदुस्तान से अमरीका जाने और वहां कामयाब रहने तक की आपकी जर्नी केबारे में बताइए. मनोज - पर्सनल जर्नी उतनी ज़रूरी नहीं है. साधारण ही है. यहां सेबहुत से हिंदुस्तानी यूएस गए. हमारे पिताजी भी गए. हम वहां पर पढ़े. धीरे-धीरे मेरीदिलचस्पी आध्यात्म में हुई. तो बहुत साल उसी सब में लगा रहा. फिर हमें लगा कि लोगोंकी भलाई के लिए कुछ करें. उसके लिए धन चाहिए. तो हमने बिज़नस शुरू किया. कुछ सालदिक्कतें रहीं फिर एक चीज़ सफल हो गई. (मनोज 5 Hour Energy के मालिक हैं. 2015 मेंअमरीकी एनर्जी ड्रिंक मार्केट में इसकी हिस्सेदारी 90% तक थी.)मनोज की बनाई 5 Hour Energy Drink अमरीका में बड़ी सफल रही.सफल होने के बाद मुझे लगा कि ऐसी चीज़ करें जिसका लोगों को फायदा हो. ऐसे लोगों केपास, जिनके पास कम है. मैं उन्हें गरीब नहीं कहता. क्योंकि जब मैं उनके पास गया तोमुझे लगा नहीं कि वो गरीब हैं. वो मुझे दिल से अमीर लगे. लल्लनटॉप - ऐसा क्या हुआकि आपने तय किया कि मैं कमाऊंगा ज़रूर लेकिन खर्च ऐसे (ज़रूरतमंदों के लिए) करूंगा?मनोज - कोई म्यूज़िशियन होता है, वो आच्छा म्यूज़िक बनाता है. ऐसे ही और लोगों मेंहुनर होता है. लेकिन मुझ में कोई खास हुनर नहीं था. एक धंधा था, जिसमें ऐसा लगता थाकि कुछ हो सकता है. मेरा टैलेंट धंधे में ही था. मेरा शौक मेरा काम है. और काम करनेमें खर्च नही होता है. इसलिए मेरे पास सवाल था कि अपना पैसा लगाऊं कहां. मेरे साथकाम करने वाले लोग भी यही मान कर चलते हैं कि सिर्फ अपने लिए जीने में कोई मतलबनहीं. हमने मिल कर कुछ चीज़े बना ली हैं. अब समय आ गया है कि इन आविषकारों को सबजगह पहुंचाया जाए. मैं भारतीय हूं तो पहली प्राथमिकता मैंने भारत को दी.मनोज की बनाई फ्री इलेक्ट्रिक बाइक से कसरत करते हुए बिजली बनाई जा सकती है.लल्लनटॉप - दुनिया बदलने वालों में बड़ी तादाद कॉलेज ड्रॉपआउट्स की है. आपने भीप्रिंस्टन (यूनिवर्सिटी) एक साल पढ़ाई कर के छोड़ दी. क्या वजह रही? मनोज- मैं येनहीं कहता कि प्रिंस्टन बुरी जगह है. लेकिन मैंने ये देख लिया था कि जितना एक सालमें सीख लिया, उतना बहुत था. चार साल लायक नहीं था. जिन्हें नौकरी चाहिए होती है,उन्हें कॉलेज के ठप्पे की ज़रूरत पड़ती है. लेकिन मुझे नौकरी करनी नहीं थी. लोगपूछते हैं कि एक साल ही क्यों तो मैंने सोचा कि चार ही साल क्यों, पांच क्यों नहीं.मैं बिल गेट्स जैसे ड्रॉपआउट्स से मिला हूं. इन्हें काम करने का शौक था.पढ़ा-पढ़ाया करने में रुचि नहीं थी. वो कुछ बने ही इसलिए कि उन्होंने कॉलेज छोड़दिया.मनोज ने एक साल पढ़ाई कर के प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी छोड़ दी थी.लल्लनटॉप - अब हम उन तीन फील्ड्स की बात करेंगे, जिनमें आपने आविष्कार किए हैं.मनोज - सबसे पहले हम बिजली (सबके लिए, सस्ती) पर ध्यान दे रहे हैं. पुराने समय मेंजब टेलिफोन लाइन होती थीं और फिक्स्ड टेलिफोन होते थे, तो बहुत कम लोगों के पास फोनहोते थे. जब मोबाइल आया तो सब जगह फैल गया. उसी तरह हमने बिजली को मोबाइल कर दियाहै. हर घर के पास उनकी अपनी बिजली होगी. उतनी जिसमें लाइट, मोबाइल फोन और पंखा चलजाए. इसके लिए हमने 'हंस पावरपैक' बनाया है. इस से छोटा टीवी और कंप्यूटर भी चलसकता है.उत्तराखंड सरकार ने इसकी एक लाख यूनिट का ऑडर भी दे दिया है. ये सोलर पावर से चार्जहो सकता है. तो ये सारी बिजली मुफ्त रहेगी. हम इसपर 12 साल की वॉरंटी देंगे.लल्लनटॉप - 12 साल में लोगों की ज़रूरतें बढ़ेंगी ही. हंस पावर पैक खरीदने वालोंमें कई लोगों के यहां समय के साथ ऐसी चीज़ें आएंगी जो इस पावर पैक से चल नहींपाएंगी. तो क्या इतने लंबे समय में पावरपैक की उपयोगिता कम नहीं हो जाएगी? मनोज -पावरपैक आपकी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा कर सकता है. ज़्यादा इस्तेमाल के लिए आपइसे सोलर ब्रीफकेस से चार्ज कर सकते हैं. इतने में ज़्यादातर लोगों की ज़रूरतेंपूरी हो जाएंगी. मैंने अमीर लोगों के लिए ये चीज़ नहीं बनाई है.मनोज के बनाए सोलर ब्रीफकेस से पावरपैक ज़्यादा तेज़ी से चार्ज हो जाता हैलल्लनटॉप - आप खारे पानी को साफ करने की मशीन बना रहे हैं. उसके पीछे क्या सोच हैऔर ये कैसे होने वाला है? मनोज - शुरू में हमने सोचा कि समुद्र का पानी मीठा कियाजाए. लेकिन इसके लिए काफी भारी और महंगी मशीनरी की ज़रूरत पड़ती है. और ऐसी मशीनसिर्फ समुद्र के आसपास ही इस्तेमाल की जा सकती है. तो हमने सोचा कि क्यों न उस खारेपानी को पीने लायक बनाने के बारे में सोचा जाए जो हर ज़मीन में हर जगह मौजूद है. तोहमने पानी साफ करने की एक ऐसी मशीन बनाई जो सिर्फ दो किलोवॉट बिजली से चल जाती हैऔर 24 घंटे में 60 हज़ार लीटर पानी साफ कर देती है. इससे हिंदुस्तान में साफ पानीकी किल्लत काफी हद तक कम हो जाएगी.मनोज का दावा है कि ये मशीन 24 घंटे में 60 हज़ार लीटर पानी साफ कर देती हैलल्लनटॉप - इस मशीन की कीमत क्या होने वाली है? मनोज - अभी हमने ये तय नहीं किया हैलेकिन इसकी कीमत दो से तीन लाख के बीच रहेगी. लल्लनटॉप - अब आते हैं उस आविषकार परजो आपने खेती के लिए किया है. आपने कहा कि आपके ईजाद किए शवांश फर्टिलाइज़र मेंभूसा, गोबर और गीली पत्तियां पड़ती हैं. ये खाद हमारे यहां खेतों में पड़ने वालीपारंपरिक खाद से कैसे अलग है? मनोज - हमारे खाद बनाने के तरीके में 18 दिनों मेंखाद तैयार हो जाती है. इतनी जल्दी कहीं खाद नहीं बनती, न इतनी अच्छी बनती है. इसखाद से ज़मीन की उपज बढ़ेगी, पानी और फर्टिलाइज़र कम लगेगा. यहां खास बात ये है किहमारे तरीके से पहली बार में ही नतीजे मिलेंगे. जिस फसल से पहले खाद तैयार कीजाएगी, उसी फसल में आप उसका असर देख पाएंगे. हमने ये तरीका इंटरनेट पर डाल रखा हैऔर कोई भी मुफ्त में इस तरीके को अपना सकता है.मनोज ने शिवांश फर्टिलाइज़र बनाने की तकनीक सभी के लिए मुफ्त रखी हैलल्लटॉप - इस खाद को भारत के खेतों में परखा गया है? मनोज - हमने 50 खेतों में इसखाद के इस्तेमाल से शुरुआत की थी. वहां से बढ़ कर ये 40 हज़ार खेतों में पहुंच गएहैं. कई किसानों को इस तरीके से इतना फायदा हुआ है कि उन्होंने घर बना लिए हैं.मनोज भार्गव कहते रहे कि प्रधानमंत्री में सही काम करने की दिल और इरादा है, लेकिनजब-जब उनसे सवाल किया जाता कि क्या वो अपने आविष्कारों को हिंदुस्तान में बनाने केलिए फैक्ट्री लगाएंगे, तो वो यही कहते कि मैंने दुनियाभर में बिज़नेस करके देखा है.हिंदुस्तान में काम करना बहुत मुश्किल है. इसलिए फैक्ट्री यहां लगने में कुछ वक्तलगेगा. अपने मिशन को लेकर भी वो काफी प्रैक्टिकल लगे. कहा कि लोगों के भले के लिएभी ऐसी कोई चीज़ नहीं बनाएंगे जो हमें सड़क पर ले आए. एक सफल उद्योगपति के बाद वोएक सफल समाजसेवक कैसे बनेंगे, समय ही बताएगा.--------------------------------------------------------------------------------और पढ़ेंःवो साइंटिस्ट जिसकी कटी हुई उंगली रोम की तरफ इशारा करती हैजान लेओ 'ग्रेविटेशनल वेव' है किस चिड़िया का नाम!ग्राहम बेल के टेलीफोन पेटेंट का सबसे अजब किस्सासंस्कृत के लिए इस जर्मन को हिंदुस्तान में जितनी इज्जत मिली, उतना ही छीछालेदरकिया गयाआपके बरामदे में जलता बल्ब समंदर के एक कछुए की जान ले सकता है