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ममता बनर्जी ने बांग्लादेशियों को शरण देने की बात कहकर भारत की नीति का उल्लंघन किया है?

किसी दूसरे देश के नागरिक को भारत की नागरिकता देने का अधिकार केंद्र सरकार का है तो क्या ममता ने अपनी सीमाओं का उल्लंघन किया है, जैसा बीजेपी आरोप भी लगा रही है.

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24 जुलाई 2024 (पब्लिश्ड: 11:19 PM IST)
Mamata Banerjee
ममता बनर्जी ने बांग्लादेशियों को शरण देने की बात कही थी. (फाइल फोटो- इंडिया टुडे)
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बांग्लादेश में बीते दिनों आरक्षण के मुद्दे पर भयानक हिंसा देखी गई. हजारों की संख्या में प्रवासी भारतीय और छात्रों को वापस आना पड़ा. वहां के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हालात थोड़े सामान्य होते नज़र आ रहे हैं. इस बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का बयान चर्चा का विषय बन गया. ममता ने बांग्लादेश में हिंसा ग्रसित इलाकों में पीड़ित लोगों को अपने राज्य में शरण देने की बात कही. इस पर बांग्लादेश की तरफ से ऐतराज भी जताया गया.

ममता के शब्दों और बांग्लादेश से क्या प्रतिक्रिया आई इस पर विस्तार से बात करेंगे, पहले ये समझते हैं कि भारत की शरणार्थियों को लेकर क्या नीति है. किसी दूसरे देश के नागरिक को भारत की नागरिकता देने का अधिकार केंद्र सरकार का है तो क्या ममता ने अपनी सीमाओं का उल्लंघन किया है, जैसा बीजेपी आरोप भी लगा रही है.

पहले कुछ आंकड़ों पर नज़र डालते हैं.

- UN हाई कमीशन फॉर रिफ्यूजीज़ (UNHCR) के मुताबिक भारत में फिलहाल म्यांमार से आए 79 हजार शरणार्थी रह रहे हैं.

- द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडु के एक रिफ्यूजी कैंप में 58,457 शरणार्थी रह रहे हैं. और इन कैंप्स के बाहर 33,375 शरणार्थी. ये आंकड़ा 31 मार्च, 2023 का है.

- भारत की वजह से ही 1971 में बांग्लादेश अस्तित्व में आया. युद्ध के दौरान करीब 97 लाख बांग्लादेशियों ने भारत में शरण ली थी.

यानी यह बात स्पष्ट है कि भारत पड़ोसी मुल्कों के संघर्ष के दिनों में वहां के लोगों को शरण देता रहा है. एक उदाहरण ये भी है कि साल 2019 में केंद्र सरकार ने सिटिज़नशिप अमेंडमेंट एक्ट, 2019 (CAA) बनाया. जिसका नोटिफिकेशन इस साल 11 मार्च को आया. इस कानून के तहत पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले 6 अल्पसंख्यक समुदाय (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) के लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी.

यह भी पढ़ें: बांग्लादेश में SC ने आरक्षण खत्म किया, एक क्लिक में जानिए पड़ोसी मुल्क में मचे बवाल की पूरी कहानी!

इस कानून में भी बांग्लादेश का जिक्र है. तो फिर जब ममता बनर्जी ने बांग्लादेश के शरणार्थियों को अपने राज्य में जगह देने की बात कही तो क्या उन्होंने भारत की नीति का उल्लंघन किया?

इस विषय पर हमने रिटायर्ड IFS अधिकारी दिलीप सिन्हा से बात की. वो UN में भारत के प्रतिनिधि के तौर पर काम कर चुके हैं और UN ह्यूमन राइट्स काउंसिल के वाइस प्रेसिडेंट भी रहे हैं. सिन्हा कहते हैं,

“इस विषय पर भारत की कोई नीति ही नहीं है. हमने कोई ऐसा कानून पास नहीं किया जिसमें दूसरे देशों के शरणार्थियों का स्वागत किया जाए. लेकिन इस बात में दो राय नहीं है कि भारत पड़ोसी मुल्कों से आए लाखों लोगों को शरण देता रहा है. बांग्लादेश हो या श्रीलंका, जो भी हमारे दरवाज़े पर आया है हमने उसे शरण जरूर दी है.”

UN के 1951 के रिफ्यूजी कन्वेंशन में 146 सदस्य हैं, लेकिन भारत इसमें शामिल नहीं है. कन्वेंशन ऑफ माइग्रेंट वर्कर्स, 1990 में भी 59 देश शामिल हैं, लेकिन भारत इसमें भी नहीं है. 1951 का कन्वेंशन नॉन-फाउलमेंट के सिद्धांत पर आधारित है. जो इस बात पर जोर देता है कि शरणार्थियों को ऐसे देश में वापस नहीं भेजा जाना चाहिए जहां उनके जीवन या स्वतंत्रता को गंभीर खतरा हो. इसे प्रथागत अंतरराष्ट्रीय कानून माना जाता है.

भारत इस कन्वेंशन का हिस्सा तो नहीं है, मगर नॉन-फाउलमेंट के सिद्धांत का पालन जरूर करता रहा है. कोई निर्धारित नीति नहीं होने के बावजूद भारत पड़ोस के किसी देश के शरणार्थी को लौटाता नहीं है. मोटे तौर पर देखा जाए तो भारत न बुलाता है और न ही भगाता है.

नागरिकता भले ही राज्य सूची में नहीं आती, लेकिन जब भी दूसरे देश से शरणार्थी आए राज्य सरकारों ने ही अपने यहां जगह दी. सिन्हा कहते हैं कि म्यांमार से आने वाले लोगों को मणिपुर, नागालैंड जैसे राज्यों ने अपने यहां जगह दी. तमिलनाडु में भी जब श्रीलंका से लोगों का हुजूम आया तो राज्य ने ही उनकी व्यवस्था की.

ममता बनर्जी के बयान पर आपत्ति क्यों?

बांग्लादेश को लेकर ममता बनर्जी का बयान 21 जुलाई को आया. वो TMC के 'शहीदी दिवस' पर लोगों को संबोधित कर रही थीं. इसी दौरान उन्होंने कहा,

“मुझे बांग्लादेश के मामलों पर नहीं बोलना चाहिए, क्योंकि यह एक संप्रभु राष्ट्र है. और इस मुद्दे पर टिप्पणी करना केंद्र का विषय है. लेकिन मैं यह कहना चाहूंगी कि अगर असहाय लोग हमारे दरवाजे खटखटाते हैं तो हम निश्चित रूप से उन्हें आश्रय देंगे.”

बयान से तो यही लगता है कि ममता ने बात पूरे एहतियात के साथ की, लेकिन संदेश वैसा गया नहीं. बांग्लादेश ने इस बयान को मैत्रीपूर्ण नहीं समझा. बांग्लादेशी विदेश मंत्री हसन महमूद ने ममता के बयान पर प्रतिक्रिया दी. कहा,

“पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के प्रति सम्मान के साथ, हम ये स्पष्ट करना चाहते हैं कि उनकी टिप्पणियों में भ्रम की बहुत गुंजाइश है. इसलिए हमने भारत सरकार को एक नोट दिया है.”

हालांकि, ममता के बयान का जितना विरोध बांग्लादेश ने जताया उससे कहीं ज्यादा विरोध उन्हें अपने देश में झेलना पड़ा. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने इसे ‘संवैधानिक उल्लंघन’ बताया. वहीं बीजेपी सांसद रवि शंकर प्रसाद ने कहा कि नागरिकता केंद्र सरकार के दायरे में आती है, राज्य के नहीं.

वीडियो: दुनियादारी: बांग्लादेश में हिंसा से भारत को कैसा ख़तरा है?

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