'मेरा हुक्का पानी बंद कर दिया, यह भी ख़ुश लतीफ़ा रहा'
मंटो इंडिया से पाकिस्तान चला तो गया. लेकिन पाकिस्तान में उन पर क्या बीती. यहां जानिए, क्योंकि ये है मंटो वाला महीना.
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फोटो - thelallantop
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अपने मंटो का महीना चल रहा है. आज मंटो जिंदा होता, तो उसकी छठी होती. 104 साल 6 दिन को हो गया अपना मंटो. मई का महीना अपने मंटो का है. इतना तो आप जानते ही हैं. इस पूरे महीने हम आपको मंटो की कहानियां पढ़वा रहे हैं. मंटो की एक किताब है गंजे फरिश्ते. मंटो ने 'गंजे फरिश्ते' किताब में खुद से जुड़े लोगों पर संस्मरण लिखे. इस्मत चुगताई पर भी, अशोक कुमार पर भी. इस 'गंजे फरिश्ते' की शुरुआत में मंटो ने कुछ लिखा. ये रचनाएं हमें उपलब्ध कराई हैं वाणी प्रकाशन ने. इस पब्लिकेशन हाउस से मंटो अब तक शीर्षक के साथ मंटो की सभी कहानियां प्रकाशित हुई हैं. गंजे फरिश्ते नाम रखने की वजह और हिंदुस्तान से पाकिस्तान जाने पर मंटो पर क्या बीती, ये आज हम आपको पढ़वा रहे हैं.
'ठंडा गोश्त' का मुक़दमा क़रीब क़रीब एक साल चला. मातहत अदालत ने मुझे तीन माह कैद ब-मशक़्कत और तीन सौ रुपये जुर्माने की सज़ा दी. सेशन में अपील की तो बरी हो गया. (इस हुक्म के ख़िलाफ सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर रखी है. मुकदमे की समाअत अभी तक नहीं हुई. उस दौरान में मुझ पर जो गुजरी उसका कुछ हाल आपको मेरी किताब 'ठंडा गोश्त' के दीबाचे ब-उन्वान 'जहमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शा' में मिल सकता है.
दिमाग की कुछ अजीब ही कैफियत थी. समझ में नहीं आता था कि क्या करूं. लिखना छोड़ दूं या एहतसाब के कतअन बेपरवाह हो कर क़लम ज़नी करता रहूं. सच पूछिए तो तबियत इस क़दर खट्टी हो गयी थी कि जी चाहता था कोई चीज एलाट हो जाय तो आराम से किसी कोने में बैठ कर चन्द बरस कलम और दवात से दूर रहूं. दिमाग़ में ख़्यालात पैदा हो तो उन्हें फांसी के तख़्ते पर लटका दूं. एलाट्मेंट मुयस्सर न हो तो ब्लैक-मार्केटिंग शुरू कर दूं या नाजायज तौर पर शराब कशीद करने लगूं. आख़िर ज़िल्ककाम मैंने इसलिए न किया कि मुझे इस बात का ख़दशा था कि सारी शराब मैं ख़ुद पी जाया करूंगा. ख़र्च-ही-ख़र्च होगा. आमदन एक पैसे की भी न होगी. ब्लैक मार्केटिंग इसलिए न कर सका कि सरमाया पास न था. एक सिर्फ़ -एलाटमेंट ही थी जो कार आमद साबित हो सकती थी. आपको हैरत होगी, मगर यह वाक्य है कि मैंने उसके लिए कोशिश की. पचास रुपये हुकूमत के ख़जाने में जमा करा के मैंने दरख़्वास्त दी कि मैं अमृतसर का महाजिर हूं. बेकार हूं इसलिए मुझे किसी प्रेस या सिनेमा में कोई हिस्सा एलाट फरमाया जाय.
'ठंडा गोश्त' का मुक़दमा क़रीब क़रीब एक साल चला. मातहत अदालत ने मुझे तीन माह कैद ब-मशक़्कत और तीन सौ रुपये जुर्माने की सज़ा दी. सेशन में अपील की तो बरी हो गया. (इस हुक्म के ख़िलाफ सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर रखी है. मुकदमे की समाअत अभी तक नहीं हुई. उस दौरान में मुझ पर जो गुजरी उसका कुछ हाल आपको मेरी किताब 'ठंडा गोश्त' के दीबाचे ब-उन्वान 'जहमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शा' में मिल सकता है.
दिमाग की कुछ अजीब ही कैफियत थी. समझ में नहीं आता था कि क्या करूं. लिखना छोड़ दूं या एहतसाब के कतअन बेपरवाह हो कर क़लम ज़नी करता रहूं. सच पूछिए तो तबियत इस क़दर खट्टी हो गयी थी कि जी चाहता था कोई चीज एलाट हो जाय तो आराम से किसी कोने में बैठ कर चन्द बरस कलम और दवात से दूर रहूं. दिमाग़ में ख़्यालात पैदा हो तो उन्हें फांसी के तख़्ते पर लटका दूं. एलाट्मेंट मुयस्सर न हो तो ब्लैक-मार्केटिंग शुरू कर दूं या नाजायज तौर पर शराब कशीद करने लगूं. आख़िर ज़िल्ककाम मैंने इसलिए न किया कि मुझे इस बात का ख़दशा था कि सारी शराब मैं ख़ुद पी जाया करूंगा. ख़र्च-ही-ख़र्च होगा. आमदन एक पैसे की भी न होगी. ब्लैक मार्केटिंग इसलिए न कर सका कि सरमाया पास न था. एक सिर्फ़ -एलाटमेंट ही थी जो कार आमद साबित हो सकती थी. आपको हैरत होगी, मगर यह वाक्य है कि मैंने उसके लिए कोशिश की. पचास रुपये हुकूमत के ख़जाने में जमा करा के मैंने दरख़्वास्त दी कि मैं अमृतसर का महाजिर हूं. बेकार हूं इसलिए मुझे किसी प्रेस या सिनेमा में कोई हिस्सा एलाट फरमाया जाय.
दरख़्वास्त के छपे हुए फॉर्म थे. एक अजीब-ओ-ग़रीब क़िस्म का सवालिया था. हर सवाल इस क़िस्म का था जो इस उम्र का तालिब था कि दरख़्वास्त कुन्दह पेट भर के झूठ बोले. अब यह ऐब मुझमें शुरू से रहा है कि झूठ बोलने का सलीक़ा नहीं है. मैंने एलाटमेंट कराने वाले बड़े-बड़े ग्राहकों से मशविरा किया तो उन्होंने कहा कि तुम्हें झूठ बोलना ही पड़ेगा. मैं राज़ी हो गया. लेकिन जब छपे हुए फॉर्म की ख़ाली जगहें भरने लगा तो रुपये में सिर्फ़ दो-या तीन आने झूठ बोल सका और जब इंटरव्यू हुआ तो मैंने साफ-साफ कह दिया कि साहब जो कुछ दरख़्वास्त में है, बिलकुल झूठ है. सच्ची बात यह है कि मैं हिन्दोस्तान में कोई बहुत बड़ी जायदाद छोड़ के नहीं आया. सिर्फ़ एक मकान था और बस. आप से मैं ख़ैरात के तौर पर कुछ नहीं मांगता.मैं बज़ोम -ए-ख़ुद बहुत बड़ा अफ़साना-निगार था. लेकिन अब मुझे महसूस हुआ कि यह काम मेरे बस का रोग नहीं. अल्लाह मियां मियां एम असलम और भारती दूत को सलामत रखे. मैं उनके हक में अपनी अफसाना-निगारी से सुबुक सर होता हूं और सिर्फ़ इतना चाहता हूं कि हुकूमत मुझे कोई ऐसी चीज एलाट कर दे जिसके लिए मुझे काम करना पड़े और उस काम की उजरत के तौर पर मुझे पांच-छह सौ रुपया माहवार मिल जाया करें. हैरत है कि मेरी इस गुफ़्तगू का असर हुआ. करीब था कि मुझे किसी बर्फख़ाने में कोई हिस्सा एलाट हो जाय कि बोर्ड के मेम्बरों से किसी ने कह दिया कि तुम लोग यह क्या गज़ब कर रहे हो. यह शख़्स जिसका नाम सआदत हसन मंटो हो. तरक़्क़ी पसन्द है. चुनांचे यह क़लम मेरी दरख़्वास्त मुसतर द कर दी गयी. इधर यह हुआ, उधर तरक़्क़ी पसन्द मुसन्निफ़ैन ने रजअत पसन्द क़रार देकर मेरा हुक्का पानी बन्द कर दिया. यह भी ख़ुश लतीफ़ा रहा. बहुत देर तक सोचा किया. आख़िर इस नतीजे पर पहुंचा कि "भूले ने चैक को बहनां." चुनांचे क़लम उठाकर फिर लिखना शुरू कर दिया. लेकिन लिखने से पहले मरहला दरपेश रहा कि मौजू क्या हो. फ़ार्म कैसी हो. बहुत सोच-विचार के बाद मैंने यह फ़ैसला किया कि अपनी जान-पहचान के ऐक्टर-एक्ट्रेस पर कुछ लिखूं. इस सिलसिले का पहला मजमून चुनांचे "परी चेहरा नसीम बानो" के उन्वान से हुआ जो राज़ नामा-ए-अफ़ाक में छपा. मैं ख़ुश था कि एक रास्ता निकल आया है जो हुकूमत के एहतसाब से पाक-साफ रहेगा और तहारत पसन्द लोगों के लिए मोजिब इत्मीनान होगा. लेकिन यह मजमून छपते ही तूफ़ान बरपा हो गया. 'आफ़ाक़' के दफ़्तर में बेशुमार ख़तूत आये जिनमें मुझे मलऊन-ओ-मतऊन गर्दाना गया. तीन जुलाई के 'आफ़ाक़' में एक साहब क़ाज़ी मीम बशीर महमूद साहब अदाब फ़ाज़िल का एक ख़त एडीटर के नाम छपा. उसका मलख़्खस मुलाहज़ा फ़रमाइए:
सआदत हसन मंटो का मजमून-बेज़रर सा मज़मून "परी चेहरा नसीम बानो" नज़र से गुज़रा. साथ ही नसीम बानो की मक़खूब अपने भाई के नाम भी पढ़ा. मंटो ने बड़े इत्मिनान और लुत्फ़ ले-ले कर बहन के बतमामहा वस्फ़ मनाक़िब लग़ज़िशे और हिकायतें तौज़ीह और वज़ाहत के साथ रक़्म की हैं. मालूम होता है कि वह बहन की कद्र-ओ-मंज़िलत, साख और व्क़ वकअत और वकार को कुछ हद तक नज़र अन्दाज़ कर चुके हैं. किसी हद तक यह बहन की तौहीन-ओ-तज़लील में शुमार होगा. ऐसा लिखते हुए उन्हें हिजाब और ताम्मुल को ख़ुदा हाफिज़ कहना पड़ा होगा. मुझे उनके अलफ़ाज़ पर एतराज नहीं. हरूफ़-ओ-सकनात पर गिरफ्त नहीं और न ही मजमून पर हर्फ़ गीरी कर रहा हूं. मैं आपसे पूछता हूं. क्या नसीम बानो मंटो साहब की हक़ीकी बहन है? क्या मंटो उसके मा’शके पर रौशनी डालने की कुव्वत और जसारत रखता है?मंटो बड़ा शरीर है. मेरे दिल में उसकी बेइन्तिहा इज़्ज़त है. मैं उसके काफ़ी कारनामे देख चुका हूं. अब एक और “बेजरर किस्म का” कारनामा भी लगे हाथों देख लिया. मैं मंटो दोस्त की “परी चेहरा नसीम बानो” पर सायेजनी या नुक्ताचीनी नहीं कर रहा और न ही करना चाहता हूं. और फिर अपने मंटो पर नुक्ताचीनी कर भी कैसे सकता हूं. उसकी बुलन्द आशियानी तक अभी मेरी पहुंच नहीं.'यह ख़त पढ़कर मुझे बहुत कोफ़्त हुई. उसे दूर करने के लिए मैंने ये चन्द हरूफ़ लिख कर मुहम्मद सुरूर साहब को भेज दिए. इस ख़त पर और ऐसे ही दूसरे ख़तूत पर जो इस मज़मून के मुताल्लिक़ ‘आफ़ाक’ और दूसरे अख़बारों में छपते रहे, मैं कोई तबसरा नहीं करना चाहता. सुरूर साहब ने शुरू-शुरू में इन ख़तूत की कोई परवाह न की और मुझसे कहा-“तुम लिखते रहो, यह सिलसिला काफ़ी दिलचस्प है, जारी रहना चाहिए.” मैंने जारी रखा. लानत मलामत भी जारी रही. श्याम पर मज़मून छपा तो सियालकोट की एक ख़ातून नय्यर बानो साहबा ने एक तवील ख़त लिखा. जिसे पढ़कर यकीन मानिए मुझे बहुत तरस आया. उसके चन्द इक़तबास देखिए:
मैं सिनेमा देखना गुनाह-ए-कबीरा में शुमार नहीं करती. तस्वीरों पर नज़र पड़ते ही आंखों पर पट्टी बांधने नहीं दौड़ी जाती. मगर मेरे पास बच्चे हैं और मेरी आरज़ू है कि वो नेक एख़लाक हों. सिनेमा देख-देख कर एख़लाक बनता नहीं, बिगड़ता है. इसलिए मैंने सिनेमा देखना छोड़ दिया-मैं जाऊंगी तो वो भी जायेंगे. जबरदस्ती रोका तो इस आरजू को दिल में पालते रहेंगे और जब मौक़ा मिलेगा कसर पूरी कर लेंगे. मैं इतनी बड़ी हूं मगर बाज तस्वीरों पर नज़र डालना तबीयत को गवारा नहीं होता. ऐसा नीचपन महसूस होता है कि क्या बताऊं. जैसे किसी की खिलवत में बगैर इजाज़त घुसे जा रहे हैं और यह बात आदाब-ए-शराफत के खिलाफ़ ही तो है. आप कहेंगे ऐसे रिसाले अख़बार, किताबें, बच्चों को न दिखायी जाय. मगर यह कितना मुश्किल काम है कि पढ़ते-पढ़ते अख़बार या रिसाला मेज़ पर लगा देने की बजाय ख़ास एहतमाम से ताले में बन्द करने की फिक्र की जाय.ज़रा “मुरली की धुन” दोबारा पढ़कर बताइए कि यह क्या चीज़ है? कोई शख़्स ख़्वाह कितना भी नेकी से दूर और एखलाक बाख़्ता हो क्या अपने घर में बीवी-बच्चों के दरमियान बैठकर यह पुरलुत्फ़ या घिनवाने तज़रूबात दोहराना पसन्द करता है? -उसने चाहे कितने ही ख़म लुढ़काये हों शराब के तालाब में गोते लगाये हों पीकर मुनजमिद रहता हो या मुग़लज़ात बकता हो, कितनी ही औरतों को दस्तरख़्वाना की चटनी बनाता हो, जब याद किया हो “साली औरत” कहा और न पाकर बिस्तर को आग लगा दी हो. इन चीज़ों को अखबारों के जरिये से फैला कर कौन-सी इंसानियत और एख़लाक की ख़िदमत होती है. दूसरों के भी घर होते हैं. उनके भी बीवी-बच्चे होते हैं. लड़के-लड़कियां होती हैं. उनका ख़याल भी अपने घर और बच्चों की तरह होना चाहिए. कुल दुनिया मर्दों ही की तो नहीं कि ख़ाक फांकते फिरें. गन्दगी उछालें. ख़ुद लुथड़े. मासूमों को भी सताएं. कोई पूछने वाला नहीं. कोई कहां भागे घरों में भी चैन नहीं. अख़बार, रिसाले और अदब जो बीज बो रहे हैं, मां-बाप को चाहिए वो भी उनकी परवरिश और आबयारी शुरू कर दें ताकि बेहतर और मुकम्मल नतीजा सामने आये. बाप बेटे को सिखाए कि इस तरह शराब के तालाब में गोता लगाकर उन सालियों को इस तरह घसीट ले जाना चाहिए और माएं अपनी बेटियों को नये-नये दाम बिछाने के दाम-ए-हर्बे समझा दें. असतग़फिरूल्लाह, कैसी इंसानियत और कैसा मुआशरा होगा-ज़रा तसव्वुर तो कीजिए. सोच-सोच कर मैं कितना जलती हूं. मैंने जब यह ख़त पढ़ा तो बख़ुदा मुझ पर बहुत असर हुआ. मुझे नय्यर बानो की हालत पर बहुत तरस आया. मैंने सोचा कि और कुछ नहीं तो उस ख़ातून पर मैंने वाकई बहुत ज़ुल्म किया है. जिसका कुफ्फ़ारह मुझे ज़रूर अदा करना चाहिए. लेकिन फिर मैंने सोचा अगर मैंने अपनी समझ बूझ के मुताबिक अदा करने की कोशिश की तो वह औरत जो बाज़ तस्वीरों पर नज़र डाल कर नीचपन महसूस करती है और यह समझती है गोया वह किसी की ख़िलवत में इजाज़त के बगैर घुस गयी है. यक़ीनन उसकी ताव न ला करबेहोश हो जायेगी और बहुत मुमकिन है मर भी जाय. मुझे इसका पूरा-पूरा एहसास है कि नय्यर बानो ज़हनी मारिजु मरीज़ों की जिस फेहरिस्त में आती हैं उसके तमाम अफ़राद का काबिल-ए-रहम हैं. उनका एलाज़ जहां तक मैं समझता हूं इसके सिवा और कोई नहीं कि उनके सामने बोतलों के काग उड़ा-उड़ा कर तालाब भरे जायें मुग़लज़ात बकी जायें. यह काम ख़ुद से न हो सके तो किराये पर आदमी लाये जायें जो वाही तबाही बकें-शमा बीसवीं सदी रोमान और इसी क़िस्म के दूसरे पर्चों के तमाम मजामीन इश्तिहारों समेत पढ़कर बार-बार उन्हें सुनाये जायें. अगर यह नुस्ख़ा कारगर साबित न हो तो सआदत हसन मंटो से कहा जाय कि नय्यर बानो का पुराना सैंडल उठाए और अपने सिर पर मार-मार कर उसे गंजा कर दे. मैंने बहुत सोचा था कि इन मज़ामीन के मजमूए का नाम मैंने “गंजे फरिश्ते” क्यों रखा है. अब यह सतर लिखते-लिखते इसकी वजह-तसमियत मालूम हो गयी है. मुझे यक़ीन है कि मेरा बताया हुआ नुस्ख़ा हर्गिज-हर्गिज मुजर्रिब नहीं है और लोग अपनी कमजोरियां दूर करने के लिए जरूर महल्ला पीर गैलानियां के ग़ुलाम मुहम्मद ही की गोलियां ख़रीदेंगे और अंजाम कार सियालकोट के किसी चौराहे में खड़े हो कर मुझे नय्यर बानो के पुराने या नये सैंडल से अपना सिर गंजा करना पड़ेगा. मीराजी वाला मज़मून “तीन गोले” शाया हुआ तो उससे भी लोगों को तकलीफ पहुंची. ‘आफ़ाक़’ के एडीटर को एक साहब ख्वाजा फरखंदह बुनियादी साहब ने यह खत लिखा:
आपने ‘आफ़ाक़’ के अदबी एडीशन में सआदत हसन मंटो का मजमून “तीन गोले” शाया करके मीराजी मरहूम, मंटो साहब और ख़ुद ‘आफ़ाक़’ के साथ बड़ा ज़ुल्म किया है. यह मज़मून एक मख़सूस अदबी हलके के लिए तो शायद मौजू था, लेकिन एक संजीदा अख़बार उसकी अशाअत का कतअन मुतहम्मल नहीं हो सकता था. दुनिया के हर मुहज़्जब मुल्क और हर मुहज़्जब समाज में यह उसूल मुख्वज है कि मरने के बाद ख़्वाह दुश्मन ही क्यों न हो उसे अच्छे अलफ़ाज़ के साथ याद किया जाता है. उसके सिर्फ़ मुहासिन बयान किये जाते हैं और अयूब पर पर्दा डाला जाता है. मीराजी में अगर कुछ कमज़ोरियां थीं तो उनसे उनका सिर्फ़ मख़सूस हलका-ए-अहबाब ही वाकिफ़ था. दुनिया तो उन्हें एक अदीब और शायर की हैसियत से जानती और इज़्जत करती थी. क्या गज़ब कि उनके लंगोटिए यार उनके मरने के बाद उन बुराइयों को अलम नशरह कर रहे हैं.‘इस्मत’ ने दोजखी लिखकर अपने भाई को जिस तरह ख़िराज अदा किया है गालिबन हमारे अदीब अब उसी डगर पर चल रहे हैं-और फिर उस मज़मून के बाज़ हिस्सों की कराहत की हद तक उर्यानी. पनाह बख़दा. न नफ़ासत पसन्द तबाअ इसे बर्दाश्त कर सकती है, न यह मज़मून घर की ख़्वातीन पढ़ सकती हैं, न बच्चे, न लड़कियां. अगर मंटो के बग़ैर आपका अदबी एडीशन मुकम्मल नहीं हो सकता था, तो एडीटर के कलमी एहतसाब को क्या हो गया था? मीराजी मरहूम, मंटो और ‘आफ़ाक़’ के साथ जो ज़ुल्म होना था, वह तो हो गया. इस मजमूए की अशाअत से जो मज़ीद ज़ुल्म होगा उसका मैं गुनाहगार हूं और यह गुनाह बुनियादी साहब के सिर चढ़कर कर रहा हूं. उन्होंने मुझे यकीन दिलाया है कि “दुनिया के हर मुहज़्जब मुल्क और हर मुहज़्जब समाज में यह उसूल मुरव्वज है कि मरने के बाद ख़्वाह दुश्मन ही क्यों न हो उसे अच्छे अल्फ़ाज़ के साथ याद किया जाता है. उसके सिर्फ़ मुहासिन बयान किये जाते हैं और अयूब पर पर्दा डाला जाता है. वैसे मैं ऐसी दुनिया पर ऐसे मुहज़्जब मुल्क पर हज़ार लानत भेजता हूं जहां यह उसूल मुरव्वज हो कि मरने के बाद हर शख़्स का किरदार और तशख़्ख़स लाण्ड्री में भेज दिया जाता है जहां से वह धुल कर आये और रहमत उल्लाह अलैह की खूंटी पर लटका दिया जाय. मेरे इसलाह ख़ाने में कोई शाना नहीं कोई शैम्पू नहीं, कोई घूंघर पैदा करने वाली मशीन नहीं. मैं बनाओ-सिंहार करना नहीं जानता. आगा हश्र की भेंगी आंख मुझसे सीधी नहीं हो सकीं. उसके मुंह से गालियों के बजाय मैं फूल नहीं झड़ा सका. मीराजी की ज़लालत पर मुझसे इस्त्री नहीं हो सकी और न मैं अपने दोस्त श्याम को मजबूर कर सका हूं कि वह बर्खुद ग़लत औरतों को सालियां न कहे-इस किताब में जो फरिश्ता भी आया है उसका मुण्डन हुआ है और यह रस्म मैंने बड़े सलीके से अदा की है. सआदत हसन मंटो लाहौर 11 जनवरी सन् 1952
'मंटो वाला महीना' में आपने कल कहानी पढ़ी: पेशावर से लाहौर तक

