The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Mahamahim : How Indira Gandhi made Zakir Hussain the first Muslim President of India

महामहिम: पहले मुस्लिम राष्ट्रपति के लिए इंदिरा ने क्या चाल चली

इंदिरा ने इसे नाक का सवाल बना लिया. इंदिरा और कामराज के बीच इस बात को लेकर तनातनी हो गई कि राष्ट्रपति पद उम्मीदवार चुनने का अधिकार किसके पास है.

Advertisement
pic
10 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 13 जुलाई 2017, 04:43 PM IST)
Img The Lallantop
डॉ. राधाकृष्णन से भारत रत्न लेते हुए जाकिर हुसैन
Quick AI Highlights
Click here to view more

1967 के राष्ट्रपति चुनाव का किस्सा सुनाने से पहले हम आपको एक कहानी सुनाना चाहते हैं. कहानी का नाम है अबू खां की बकरी.


एक समय अल्मोड़ा में एक मियां रहते थे. उनके पास एक बकरी हुआ करती थी, चांदनी. वो उसे बड़े प्यार से रखते. चांदनी को आजादी पसंद थी. एक दिन वो अबू खां के सुनहरे पिंजरे से भाग गई और पहाड़ पर पहुंच गई.

पूरे दिन की धमाचौकड़ी के बाद जब शाम ढली तो उसे खयाल आया कि घर लौट चलें. लेकिन फिर उसे खूंटा याद आ गया. वो जंगल में ही टिकी रही. रात को एक भेड़िया आया.

इधर अबू खां बेबस. तराई में बने अपने घर से लगातार सीटी और बिगुल बजा रहे थे. उन्हें पता था कि चोटी पर जल्द ही चांदनी भेड़िए के हमले का शिकार हो जाएगी, लेकिन बात उनके हाथ से निकल चुकी थी.

आधी रात के करीब भेड़िए ने चांदनी पर हमला बोल दिया. चांदनी पूरी रात भेड़िए से लड़ती रही. पौ फटने के वक्त चांदनी ने पूरी ताकत के साथ भेड़िए पर आखिरी वार किया और वहीं निढाल हो गई.

पेड़ पर बैठी सारी चिड़िया इस लड़ाई को देख रही थीं. सब ने कहा कि भेड़िया जीता. एक बूढी चिड़िया बोली, “नहीं लड़ाई चांदनी जीती.”

बच्चों के लिए यह कहानी डॉ. ज़ाकिर हुसैन ने लिखी थी. आप सोच रहे होंगे कि इस कहानी को आपको सुनाने का मतलब क्या है. दरअसल 1967 का राष्ट्रपति चुनाव भी चांदनी और भेड़िए की लड़ाई जैसा ही था. फर्क यह था कि ज़ाकिर हुसैन चांदनी नहीं, अबू खां की भूमिका में थे. चांदनी की तरह लड़ रही थीं नई नवेली प्रधानमंत्री, इंदिरा गांधी. इस लड़ाई का नतीजा कहानी के नतीजे से थोड़ा अलग था.

महामहिम सीरीज़ की आठवीं किस्त में देखें किस्सा ज़ाकिर हुसैन के राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने काः

1967 का लोकसभा चुनाव आजादी के बाद कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा झटका था. इस चुनाव में कांग्रेस 283 सीट पर सिमट गई. 1962 के मुकाबले इस चुनाव में कांग्रेस को 78 सीटों का नुकसान झेलना पड़ा. यह आंकड़ा बहुमत के आंकड़े से महज़ 12 सीट ज़्यादा था. 11 राज्यों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. इस चुनाव के बाद इंदिरा को पार्टी के भीतर तख्तापलट का डर सताने लगा. अपने को मजबूत करने का फितूर उन पर सवार हो गया.

यह चुनाव उस कहानी की शुरुआत थी जिसके नतीजे में कांग्रेस ने आजादी के बाद सबसे बड़े बिखराव को देखा था.

जिसने इंदिरा के राह के कांटे चुने, अब भाले बो रहा था.

दरअसल 11 जनवरी 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की असामयिक मौत के बाद कांग्रेस में नेतृत्व के लिए खींचतान शुरू हो गई. मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी जता रहे थे. इस बीच नेहरू के भरोसेमंद सिपहसलारों में से एक के. कामराज इस बात की जद्दोजहद में थे कि बिना किसी संकट के इंदिरा गद्दी तक पहुंच जाएं.

कामराज को भरोसा था कि मोरारजी समझाइश से मान जाएंगे. ऐसा हुआ नहीं. मोरारजी भाई वोटिंग पर अड़ गए. कामराज ने उस समय मुस्कुरा कर कहा, "चलिए वोटिंग ही सही." कहते हैं कि कामराज ने उस समय एक पुर्जे पर कुछ अंक लिखे और उसे तिजोरी में रख दिया.


कामराज और इंदिरा
कामराज और इंदिरा

अगले दिन वोट पड़े. तिजोरी से पर्चा निकला गया. उस पर लिखा हुआ था, 353. यह आंकड़ा इंदिरा को मिले कुल वोटों से महज दो अंक कम था. मोरारजी महज 159 वोट हासिल करने में कामयाब हो पाए. इस चुनाव के बाद इंदिरा गांधी भले ही सत्ता में पहुंच गई लेकिन यह दरअसल कामराज की जीत थी.

प्रधानमंत्री बनने के साथ ही इंदिरा को समझ में आ गया कि अगर वो कांग्रेस सिंडीकेंट की पकड़ से बाहर न निकली तो वो महज इसकी कठपुतली बन कर रह जाएंगी. धीरे-धीरे उन्होंने अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाना शुरू किया. इंदिरा के प्रधानमंत्री बनने के एक साल बाद ही देश का तीसरा राष्ट्रपति चुना जाना था.

दो बागड़ बिल्लों की लड़ाई और बंदर का मौका

कामराज, जिन्हें कभी नेहरू कांग्रेस को मजबूत बनाने के लिए मद्रास से लाए थे, इस चुनाव के बाद इंदिरा के खिलाफ हो गए. 1964 में संगठन की सफाई के नाम पर बने कामराज प्लान के जरिए नेहरू इंदिरा के सभी संभावित प्रतिद्वंदियों को किनारे लगा दिया गया था. उस समय नेहरू की उंगली पकड़ कर कामराज कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए थे. नेहरू की मदद से मिला कांग्रेस अध्यक्ष का यह पद कामराज के लिए वो मोर्चा बना, जहां से वो इंदिरा को टक्कर दे सकें.

राष्ट्रपति चुनाव में कामराज चाहते थे कि राष्ट्रपति राधाकृष्णन और उपराष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन को दूसरा कार्यकाल दिया जाए. इंदिरा को इस बारे में जानकारी मिल गई. उन्होंने इस चुनाव को अपनी ताकत का एहसास कराने के मौके के तौर पर लिया.

इधर ज़ाकिर हुसैन एक सम्मानजनक विदाई चाहते थे. वो देश के उपराष्ट्रपति थे. उनका मन नहीं था कि वो इस पद पर एक और कार्यकाल जारी रखें. यहां तक कि उन्होंने अपने आधिकारिक आवास 6 मौलाना आज़ाद रोड से अपना सामान जामिया नगर के अपने निजी घर भेजना शुरू कर दिया था.


कामराज जानते थे कि लोकसभा चुनाव के बाद ज़ाकिर हुसैन पर दांव लगाना खतरे से खाली नहीं था. ऐसे में कांग्रेस के सामने राधाकृष्णन से बेहतर कोई विकल्प नहीं था. इंदिरा ने इसे नाक का सवाल बना लिया. इंदिरा और कामराज के बीच इस बात को लेकर तनातनी हो गई कि राष्ट्रपति पद उम्मीदवार चुनने का अधिकार किसके पास है. बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा इस पर अपना दावा जता रही थीं और कामराज का कहना था कि पार्टी अध्यक्ष होने की वजह से यह हक़ उनका था.

इंदिरा ने मामले को सुलझाने के लिए 8 अप्रैल 1967 सर्वदलीय बैठक बुलाई. वो ज़ाकिर हुसैन के नाम पर सहमति चाहती थीं. विपक्ष को कामराज और इंदिरा के बीच पैदा हो रही खाई के बारे जानकारी थी. विपक्षी नेता यह कह कर मीटिंग से रुखसत हुए कि सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष की गैर मौजूदगी में इस मीटिंग का कोई मतलब नहीं रह जाता. अंत में यह मीटिंग एक दिन के लिए मुल्तवी कर दी गई.

विपक्ष ने कांग्रेस में मची इस भसड़ को बंदर के मौके की तरह देखा. उसने अगले दिन की मीटिंग में जाने की बजाय सुप्रीम कोर्ट के 9वें चीफ जस्टिस के. सुब्बाराव को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया. बदले घटनाक्रम के बाद कामराज के पास इंदिरा का प्रस्ताव मानने के अलावा कोई चारा नहीं रहा. सत्ताधारी पार्टी के लिए राष्ट्रपति चुनाव हारने से बड़ी जलालत नहीं हो सकती थी.

इंदिरा इस खतरे को समझती थीं. वो विपक्ष के पास एक समझौते का प्रस्ताव लेकर गईं. इस समझौते के तहत विपक्ष को उप राष्ट्रपति का पद दिया जाना था. विपक्ष के नेताओं की नज़र में राष्ट्रपति चुनाव वो मौका था जिससे वो इंदिरा के पतन की इबारत लिख सकते हैं. उन्होंने इंदिरा के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया. मजबूरी में कांग्रेस को उपराष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार उतारना पड़ा. ये उम्मीदवार थे वी.वी. गिरी.




पिछली कड़ियां 

महामहिम: दो प्रधानमंत्रियों की मौत और दो युद्ध का गवाह रहा राष्ट्रपति

महामहिम: तानाशाह के गाल थपथपा देने वाला राष्ट्रपति

महामहिम: हरियाणा का चौधरी, जिसने राष्ट्रपति चुनाव में गजब का रिकॉर्ड बनाया

महामहिम: राजेंद्र प्रसाद के दूसरी बार चुनाव लड़ने पर राधाकृष्णन ने क्या धमकी दी?

महामहिम: हत्या से ठीक पहले गांधी ने सरदार पटेल को क्या कसम दी?

महामहिमः राजेंद्र प्रसाद और नेहरू का हिंदू कोड बिल पर झगड़ा किस बात को लेकर था

महामहिम : जब नेहरू को अपने एक झूठ की वजह से शर्मिंदा होना पड़ा

Advertisement

Advertisement

()