आपने कालिदास, तुलसीदास, सूरदास और रविदास जैसे कवियों के बारे में सुना होगा, परलालदास का नाम शायद ही आपके कानों से गुजरा हो. आइए आपको बताते हैं इस जबर कवि केबारे में. अभी बिहार के मधुबनी में महाकवि पंडित लालदास का 161वां बर्थडे सेलिब्रेटकिया जा रहा है, जो 15 दिनों तक चलेगा. कवि लालदास ने चार भाषओं में कविताएं लिखीहैं. फारसी, संस्कृत, मैथिलि और हिंदी में. वो उर्दू और अंग्रेजी के भी अच्छेजानकार थे. मिथिला चित्रकारी भी आती थी. ये मधुबनी में ही पैदा हुए थे. इनके दादाजल्पादत्त दास राज दरभंगा में दीवान थे और पिता बचकन दास विचारक थे.आइए जानते हैं इनकी जिंदगी के कुछ रोचक किस्से...'इसी बच्चे के हाथ से पिंड लेना है, इसे कैसे अंग्रेजी पढ़वाऊं'अपनी नॉलेज की वजह से लालदास कम समय में ही अपने इलाके में फेमस हो गए थे.पहले इनका नाम चूड़ामणि लाल दास था, जो बाद में लालदास हो गया. किस्मत अच्छी थी किभैयादास पढ़ा रहे थे, जिससे सात की उमर में ही हिंदी और मैथिलि की नॉलेज हो गई थी.संस्कृत के श्लोक तो झड़ापड़ सुुनाते थे. हालांकि, एक कारण ये भी था कि इनके पिताकी महफिल बड़े वाले विद्वानों के साथ जमती थी. थोड़ी-बहुत पढ़ाई हो गई, तो पिता नेलालदास को फारसी की तालीम दिलाने का फैसला किया. उन दिनों फारसी हायर एजुकेशन भाषाथी. ये समझ लीजिए कि जैसे आज इंग्लिश है, वैसे ही तब फारसी थी. तो एक मौलवी साहब तयहुए, जिन्होंने चार साल में लालदास ने फारसी में महारत हासिल की. वो फारसी लिटरेचरऔर पोएट्री में भी पक्के हो गए. फिरदौसी, रुदकी और खय्याम... सब पढ़ गए.लाल दास की लिखी फारसी कवितामौलवी साहब भी लालदास के जहीन को देखकर गिल्ल थे एकदम, तो उनके पिता से कहा,"बाबूजी, इस बच्चे को अगर आप अंग्रेजी की तालीम दिलवा दें, तो बेशक ये कमाल करदिखलाता." पिता ने जवाब दिया, "मौलवी साहब, ये मेरा बड़ा लड़का है. इसी के हाथ सेमुझे जल-पिंड लेना है. इसे अंग्रेजी पढ़वाऊंगा, तो निसंदेह ये अपने कुल का धर्म-कर्मछोड़ देगा. इसी वजह से मैं इसे सिर्फ संस्कृत ही पढ़वाऊंगा." इसके बाद लालदाससंस्कृत की तरफ कूच कर गए.यहां से आया था सीता पर रामायण लिखने का आइडियालालदास को संस्कृत पढ़ाई थी बच्चा झा ने. ये भी अपने सेगमेंट के बाबा थे. लालदास भीसंस्कृत के लिए मुहाए हुए थे. वाल्मीकि रामायण और दुर्गा शप्तसती जैसी तमाम चीजेंपढ़ीं. संस्कृत के विद्वानों से भी मुखातिब होते थे. इसी बीच जनकपुर में उनकीमुलाकात कुछ ऐसे साधुओं से हुई, जिनके साथ उनकी सीता पर बहस हुई. बहस ऐसी थी किलालदास को सीता पर आधारित रामायण लिखने का आइडिया आया. आइडिया मिलते ही लालदासरिसर्च में लग गए. सीता के बारे में खोज-खोजकर जानकारी निकाली. जनकपुर के साधुओं केसाथ भारत-भ्रमण किया.और इस तरह चूड़ामणि बन गए लालदाससालभर घूमने के बाद लालदास घर लौट आए. वापस आकर इनके लक्षण ऐसे हो गए थे कि घरवालोंको लगा कि ये ब्रह्मचारी हो जाएंगे. उन्होंने 14 साल की उम्र में लालदास की शादीकरा दी. पत्नी सुकन्या आई, तो उनकी जिम्मेदारी बढ़ गई. घर चलाने के लिए दरभंगामहाराज के यहां मुहाफीज दफ्तर में नौकरी कर ली. दरबार वालों को उनकी प्रतिभा काअंदाजा हीं था, लेकिन थोड़े ही दिनों में लालदास का हुनर पूरे राज दरबार में दिखनेलगा. लोग उनके बारे में बातें करते थे. दरभंगा महाराज रामेश्वर सिंह ने खुद उन्हेंदरबार में बुलाकर उनसे वेदों और ग्रंथों पर बात की. सवाल पूछे. लालदास ने राजा कोजवाब दिए. लालदास से खुश दरभंगा महाराज ने उन्हें एक इज्जतदार पेशकार का पद दिया.यही घटना थी, जिसने उन्हें 'लालदास' नाम दिया. इससे पहले तक वो चूड़ामणि थे. महाराजकी लालदस से इसलिए भी ज्यादा बनती थी, क्योंकि दोनों की उम्र लगभग बराबर थी.फारसी जानने वाला संस्कृत का कवि, जो तांत्रिक भी थाजब महराज रामेश्वर सिंह भागलपुर में मैजिस्ट्रेट बने, तो लालदास को भी साथ ले आए.भागलपुर आने तक लालदास को मौलवी साहब की अंग्रेजी पढ़ने वाली बातें याद थीं. वहांवे एक अंग्रेज अधिकारी से अंग्रेजी सीखी भी. जब महाराज मैजिस्ट्रेट पद से इस्तीफादेकर राजनगर के अपने महल में रहने लगे, तो लालदास भी उनके साथ लौट गए.लाल दास द्वारा लिखे गए रामायण का एक पन्नाराजनगर में महाराज कवि-सम्मेलन भी कराते थे. ये आयोजन देखकर लालदास फिर कविता लिखनेलगे. अपनी पहली रचना "मिथिला महात्म्य" लिखते समय उनकी उम्र 22 साल थी. हिंदी की येरचना सीता की शक्ति पर लिखी गई है. इसके बाद लालदास ने मैथिली में "रामेश्वर चरितमिथिला रामायण" लिखी. संस्कृत में "चंडीचरित" लिखी और फारसी में काव्य "तश्दीद"लिखी. "तश्दीद" में वेदों और तंत्रों का जिक्र है."तश्दीद" का एक पन्नालालदास के लिखने का सिलसिला ताउम्र चलता रहा. राजनगर में रहने के दौरान ही उन्हेंमहाराज के साथ कामख्या और बंगाल की यात्रा की. कामख्या में उन्होंने तंत्र-विद्याके बारे में जाना. लालदास खुद जाने-माने तांत्रिक थे. उनकी किताबों के कवर औरपांडुलिपि के पन्नों के बीच मिथिला चित्रकारी (मिथिला पेंटिंग या मधुबनी पेंटिंग,जो मिथिलांचल के घरों की दीवारों पर देखने को मिलती है) मिलती है.लाल दास के द्वारा बनाया गया चित्रकारीपिता का शव रखा था और पैर की उंगली डोलने लगीतंत्र विद्या में एक्सपर्ट होने के बाद ज्यादातर पूजा में लगे रहते थे. लालदास जब32 के थे, तो पिता की तबीयत ज्यादा खराब हो गई. लालदास बड़े बेटे थे, तो पिताउन्हीं को याद करते थे. जब उन्हें लगा कि जाने का वक्त आ गया, ततो वो'बच्चा-बच्चा..' पुकारने लगे. आधी रात में लालदास को इसकी खबर देने के लिए एक आदमीभेजा गया.खबर मिलते ही लालदास गांव के लिए निकले. रात दो बजे तक पहुंचे, लेकिन इससे पहले हीपिता जा चुके थे. गांव के कुछ लोगों को लगा कि लालदास कहीं घूमने गए होंगे, इसलिएउन्होंने अंतिम-संस्कार की तैयारी शुरू कर दी. लालदास की गैर-मौजूदगी में सबसे छोटेबेटे गौरीशंकर दास (जो बाद में मुख्तार साहब के नाम से मशहूर हुए) से मुखाग्नि कीतैयारी होने लगी. तब गौरीशंकर सिर्फ छह साल के थे. पर श्मसान ले जाते समय उनके पिताके पैर की उंगली डोलने लगी.लोग डरे. असमंजस में पड़ गए. आखिरकार शव चिता पर नहीं रखा गया. दाह-संस्कार रोकदिया गया. घंटेभर तक सब बैठे रहे. इसकी जानकारी भी लालदास को रास्ते में ही मिल गयाथा. वो सीधे श्मशानपहुंचे. पिता के पैर छूकर प्रणाम किया और फिर पिता के पैर कीउंगली डोलना बंद हो गया. दाह-संस्कार लालदास ने ही किया. मिथिलांचल में ये किस्साबहुत मशहूर है.पंडित और महाकवि की उपाधि लाल दास बोलने की शैली, परम ज्ञान और सौम्यता देखकर दरभंगा महाराज सर रामेश्वर सिंहने उन्हें सम्मानित किया. और "पंडित" की उपाधि दी. अब वो दरभंगा महाराज के दरबारमें पंडित लाल दास के नाम से लोग उन्हें जानने लगे. इसके बाद से उनका मान-सम्मानबढ़ता ही गया. राजकवि, महाकवि जैसे सम्मान मिलता गया. अपने आखिरी समय तक वो राजदरभंगा में कवि और पंडित के रूप में काम करते रहे.लाल दास को मिले 'पंडित' की उपाधि के दस्तावेजशिक्षा और खास कर नारी शिक्षा में योगदानउस समय शिक्षा प्राप्त करना हर किसी के बस की बात नहीं थी. अगर कोई परिवार संपन्नहोता भी था. तो अपने बच्चों में से किसी एक को पढ़ाते थे. वो भी बेटे को. बेटियों कीशिक्षा नदारद ही थी. लाल दास के साथ भी यही था. उनके पिताजी ने उन्हेंपढ़ाया-लिखाया. और छोटे भाइयों को लाल दास ने पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया. इसी कानतीजा था कि उनके छोटे भाईयों में बुन्नी लाल दस संस्कृत के, नन्नू लाल दास हिंदीके, सुंदर लाल दास फारसी के, बच्चे लाल दास उर्दू के और गौरी शंकर दास अंग्रेजी केविद्वान थे. लाल दास ने गांव के सभी लड़कों और लड़कियों की शिक्षा के लिए उन्होंनेगांव एक गुरुकुल की स्थापना की. लाल दास के नहीं होने पर इस गुरुकुल की देख-रेखइनके भाई करते थे. इसी का नतीजा था कि उस पूरे ख़ित्ते में ज्ञान की गंगा बहने लगी.महा कवि पंडित लाल दासलाल दास ने नारी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए "स्त्री धर्म शिक्षा" के नाम से एककविता संग्रह भी लिखी. ताकि लोगों को नारी शिक्षा की अहमियत का पता चल सके. इसकाव्य में उन्होंने कहा है कि शिक्षा ही स्त्री का धर्म है. लाल दास एक ऐसे कविहैं, जिनकी कविताएं तीन भाषाओं के पाठ्यक्रम में हैं (फारसी, मैथिली और संस्कृत).-------------------------------------------------------------------------------- ये स्टोरी आदित्य प्रकाश ने की है -------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़ें :एक कविता रोज: पुष्प की अभिलाषा