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मिथिला पेंटिंग को दुसाध टोले में बसाने वाले कलाकार

गोदना पेंटिंग वाले रौदी पासवान नहीं रहे. उन्होंने बामन-कायस्थों वाली कला को दक्खिन टोले तक पहुंचाया.

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3 फ़रवरी 2016 (अपडेटेड: 3 फ़रवरी 2016, 09:06 AM IST)
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अपने गांव-घर में रौदी पासवान. इस आर्टिकल की सभी तस्वीरों का क्रेडिटः अरविंद दास
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ये 12 बरस पुरानी एक शाम है. जेएनयू की. हम नए थे. तो स्वर में शोर ज्यादा था और तत्व कम. अलकेमिस्ट का एक किस्सा सुना रहे थे. किसी साथ चलने वाले को. सफर की शुरुआत साबरमती से हुई थी. मुकाम गंगा ढाबा था. उरम थुरम पर ज्ञान तो पेल दिए. मगर किस्सागो का नाम भूल गए.
तब एक आवाज आई. पाअलो कोएलो. जवाब मिला तो शक्ल देखी. सज्जन की. वो मुस्कुराए. पर बेवजह ठहरे नहीं. बाद में पता चला. वह ऐसे ही हैं. और ये भी. कि उनका नाम अरविंद दास है.
author with artist
रौदी पासवान से बीते बरस कमोबेश इसी वक्त मिले थे अरविंद दास (गुलाबी कमीज में). उनके ओसारे में खींची गई थी ये तस्वीर.

अरविंद दास का जिक्र हम जेएनयू हिंदी वालों के बीच कुछ कुछ श्रद्धा और संकोच के साथ किया जाता था. वह जनसत्ता में छपते थे. (जो कि कहना न होगा कि अभी हाल तक बड़ी बात रही है. या शायद अब भी हो) उन्हें हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भी आती थी. और मसला भाषा का नहीं था. उस ग्रंथि का था, जो उनमें कतई नहीं थी. कि कहीं से भी कमतर हैं. ज्ञान के मामले में. उस पर बात करने में. और भाषा तो महज एक जरिया भर है. जब जाना तो ये भी कि विद्या ददाति विनयम वाली मूरत हैं श्रीमान.
बाद में अरविंद जी का लिखा लगातार पढ़ते रहे. उन्होंने जेएनयू पर जनसत्ता के लिए ही एक कमाल का पीस लिखा था. शहरयार का लिखा उधार लिया था हेडिंग वास्ते. ये क्या जगह है दोस्तों.
फिर वह परदेस चले गए. रिसर्च के वास्ते. मनमोहनी दौर का हिंदी अखबारों पर असर. इस पर उम्दा काम है उनका. अब वह फिर मीडिया में हैं. करण थापर के साथ काम करते हैं. लिखते भी रहते हैं. लगातार. लोक पर खासकर. भदेसपन को उन्होंने बुहारा नहीं. बल्कि उसे लगातार मांजकर चलन में बनाए रखा है.
हमने बीते दिनों उनसे मनुहार की. दी लल्लनटॉप के लिए भी कुछ लिखें. और आप मेरे मुस्कुराहट को इन काले काले अक्षरों में खोज लें. क्योंकि वह राजी हो गए हैं. उम्मीद है कि लगातार आपको उनका लिखा बुना गुना पढ़ने को मिलेगा यहां.
इस पहले आर्टिकल में उन्होंने मधुबनी पेंटिंग की गोदना स्टाइल के कलाकार रौदी पासवान की मौत पर लिखा है. उनके बहाने और भी जरूरी बातें कही हैं. अस्तु. - सौरभ द्विवेदी

जाना एक लोक कलाकार का

पिछले दिनों दस्तकार के संस्थापक लैला तैयबजी के फेसबुक पोस्ट से पता चला कि रौदी पासवान नहीं रहे. मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ. मैंने तुरंत गूगल में उनके मौत की ख़बर ढूंढी. निराशा हाथ लगी. वैसे भी मीडिया के बाज़ार में लोक कलाकारों की क्या क़ीमत है!
मैंने रौदी पासवान के मोबाइल पर फोन किया. फोन उनके बेटे ने उठाया और कहा कि नवंबर में छठ पूजा के ‘खरना’ के दिन ही उनका देहांत हो गया.
रौदी पासवान मिथिला पेंटिंग के एक सिद्ध कलाकार थे. उन्होंने अपनी पत्नी चानो देवी के साथ मिल कर मिथिला पेंटिंग के क्षेत्र में, जो अब मधुबनी पेंटिंग के नाम से जाना जाता है, गोदना (tattoo) शैली को स्थापित किया था. उसे विस्तार दिया था. एक नई भंगिमा दी थी.
late chano devi, pioneer of godna tatoo painting
चानो देवी. गोदना शैली की कमाल कलाकार. देहांत हो चुका है. रौदी इनके ही पति थे.

पिछले साल मैं एक शोध के सिलसिले में मधुबनी के नजदीक, जितवारपुर गाँव उनसे मिलने गया था. इस गाँव में कमोबेश हर घर में लोग पेंटिंग बनाते हैं. प्रसंगवश, मिथिला पेंटिंग के चर्चित नाम सीता देवी और जगदंबा देवी इसी गाँव की थीं.
पिछले कुछ वर्षों में मधुबनी जिले के रांटी और जितवारपुर गाँव मिथिला पेंटिंग के गढ़ के रूप में उभरे हैं. और इस वजह से मिथिला पेंटिंग का नाम भौगोलिक इकाई के आधार पर मधुबनी पेंटिंग के रूप में चलन में आ गया. गोकि दरभंगा, मधुबनी ज़िले के अमूमन हर गाँव और नेपाल के तराई इलाके में यह पेंटिंग पीढ़ी दर पीढ़ी स्त्रियों के हाथों से सजती रही है. मिथिला के सामंती समाज में इसने स्त्रियों की आजादी और सामाजिक न्याय के नए रास्ते खोले हैं. साथ ही जातियों में बंटे समाज में इस कला से समरसता भी आई है.
Story of Raja Salhesh depicted on the walls
चानो देवी और रोदी पासवान का घर. मधुबनी. बिहार

70 के दशक से रौदी पासवान समाज के हाशिए के तबके के जीवन और वे जिस दुसाध समुदाय से आते थे उनके नायक, राजा सलहेस के जीवन वृत्त को अपने रंग से रंगते रहे. उन्होंने गोदना कला के मार्फ़त इस कला में वर्षों से रत कायस्थ और ब्राह्मण कलाकारों की मौजूदगी को विस्तार दिया. उन्होंने चानो देवी को पारंपरिक रूप से स्त्रियों के शरीर पर गोदे गए डिजाइन को काग़ज़ पर उतारने के लिए प्रेरित किया.
a lane in madhubani
मधुबनी के एक गांव की गली

गोदना पेंटिंग की शैली कायस्थों की कछनी और ब्राह्मणों की भरनी से इतर है. साथ ही इन शैलियों से प्रेरणा भी लेती रही है. इन पेंटिंग में जीव-जंतुओं, पेड़-पौधे, आस-पड़ोस के जीवन को तीर और सघन वृत्तों के माध्यम से उकेरा जाता है. कई समकालीन कलाकारों में इस शैली की झलक मिल जाती है.
godna painting
गोदना शैली की मिथिला पेंटिंग

गोदना पेंटिंग की रेखाओं में एक अनगढ़पन होता है, जो उसे विशिष्ट बनाता है.
मीडिया में भारतीय कलाकारों के अरबों-खरबों की पेंटिंग की बिक्री का गाहे-बगाहे जिक्र मिलता है. पर इनके ख़रीददार कौन हैं? भारतीय मध्यवर्ग तक इन्हीं लोक कलाकारों की कला पहुँचती है. इनके ड्राइंग रूम की शोभा इन्हीं से बढ़ती है. पर इस वर्ग को इन कलाकारों की कितनी चिंता है?
use of natural colour in mithila godna painting
इन पेंटिंग्स में हमेशा नैचुरल कलर ही इस्तेमाल होता है.

रौदी पासवान और चानो देवी ने एक पूरी पीढ़ी को मिथिला पेंटिंग में प्रशिक्षित किया था. गोदना कला में योगदान के लिए चानो देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया था. वर्ष 2010 में कैंसर से उनकी मौत हो गई थी. उनके परिवार में उनकी पतोहू और बेटे उनकी थाती को संभाले हुए हैं.
गोदना शैली की एक पेंटिंग दिखाते रोदी
गोदना शैली की एक पेंटिंग दिखाते रोदी

परंपरा के साथ समकालीन विषय-वस्तुओं का चित्रण मिथिला पेंटिंग में दिखाई पड़ता है. पर हाल के दिनों में मिथिला पेंटिंग में ‘मास प्रोडक्शन’ भी बढ़ा है, जिसकी झलक दिल्ली हाट जैसी जगहों पर मिल जाती है. बिचौलिए इस कला के बाज़ार में वर्षों पहले सेंध लगा चुके हैं, जिससे कलाकारों तक उनकी कला का मेहनताना नहीं पहुँच पाता.
veiled bride mithila painting
घूंघट में दुलहन. मैथिल कायस्थ की कृति. साल 1920-30. दरभंगा. बिहार

इस पेंटिंग से देश और विदेश में भारतीय लोक कला, जो अपनी महत्ता में समकालीन आधुनिक कला के समकक्ष ठहरती है, को एक नई ऊँचाई दी. मिथिला पेंटिंग के कलाकार गंगा देवी, सीता देवी, जगदंबा देवी, महासुंदरी देवी को भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री से नवाजा था. लेकिन वर्तमान कलाकारों की सुध किसे हैं!
mithila painting 19th century
19वीं सदी की मिथिला पेंटिंग

पिछले दिनों एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हनोवर के मेयर को बौआ देवी की एक पेंटिंग भेंट की थी, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली स्थित क्राफ्टस म्यूजियम में गंगा देवी के मिथिला शैली में बनाए अदभुत और बहुमूल्य ‘कोहबर’ पेंटिंग को पुर्निर्माण के नाम पर मिट्टी में मिला दिया गया.
kohbar ganga devi jyotindra jain
क्राफ्ट्स म्यूजियम दिल्ली में कोहबर बनातीं गंगा देवी. कूढ़मगज सरकारी कद्रदानों ने इसके ऊपर पुताई कर दी.इसलिए अब बस यही है जो है. तस्वीर साभार- ज्योतींद्र जैन

सदियों से लोक कला लोक से जीवनशक्ति पाती रही है. उम्मीद की जानी चाहिए कि लोक-चेतना से संपन्न कलाकार अपनी कूची से इसे पोषित करते रहेंगें. सही मायने में रौदी पासवान के प्रति यही श्रद्धांजलि भी होगी.

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