The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Loksabha election 1971: 'Garibi Hatao' was the magic wand of Indira Gandhi

इंदिरा ने गरीबी हटाने के नाम पर देश को आपातकाल में झोंक दिया था

प्रधानमंत्री गरीबी हटाने की बात कह रहे हैं और हमें इंदिरा गांधी याद आ रही हैं. 1971 का 'गरीबी हटाओ' बाद में 'चुनावी जुमला' साबित हुआ था.

Advertisement
pic
11 अक्तूबर 2017 (अपडेटेड: 11 अक्तूबर 2017, 10:58 AM IST)
Img The Lallantop
चुनावी सभा को संबोधित करते हुए इंदिरा
Quick AI Highlights
Click here to view more
11 अक्टूबर को जनसंघ के संस्थापक सदस्य नानाजी देशमुख का जन्मदिन होता है और लोकनायक जयप्रकाश का भी. इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी 2022 तक देश को गरीबी मुक्त करने का दावा कर रहे हैं. गरीबी इस देश में मज़ेदार बहस है. पी. साईनाथ के शब्दों में कहूं तो सरकारें गरीबी पर तब तक नई समितियां बनाती रहती हैं, जब तक उन्हें अपने मतलब के आंकड़े नहीं मिल जाते. हम समितियों और उनकी उलझाऊ रिपोर्टों को छोड़ देते हैं. प्रधानमंत्री के भाषण से इंदिरा गांधी की याद आना स्वाभाविक है. 1971 का चुनाव उन्होंने "गरीबी हटाओ" के नारे के बलबूते जीता था. इसकी अंतिम परिणिति 1975 में आपातकाल के रूप में हुई थी. पेश-ए-खिदमत है 1971 के आम चुनावों का किस्सा. किस तरह इंदिरा गांधी एक खंडित पार्टी के साथ सिर्फ एक नारे के दम पर पूर्ण बहुमत हासिल कर पाई.
1969 का साल भारतीय राजनीति में सबसे नाटकीय साल में से है. यह साल उस पूरे सनसनीखेज़ घटनाक्रम का गवाह रहा जिसने आजादी के आंदोलन की अगवानी करने वाली कांग्रेस के चरित्र को पूरी तरह से बदलकर रख दिया.

कामराज का एक दांव जो उल्टा पड़ा

10 जुलाई 1969. राष्ट्रपति पद के लिए अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित करने के लिए बंगलुरु में कांग्रेस के संसदीय बोर्ड की मीटिंग बुलाई गई. "सिंडिकेट" राष्ट्रपति पद पर अपना उम्मीदवार चाहता था. सिंडिकेट या ओल्ड गार्ड माने कांग्रेस के पुराने नेता. इनके अगुवा हुआ करते थे के कामराज. इसके अलावा मोरारजी देसाई, अतुल्य घोष, निजलिंगप्पा और नीलम संजीव रेड्डी इस गोलबंदी के सक्रिय सदस्य थे. सिंडिकेट संगठन अपनी पकड़ के जरिए इंदिरा को काबू करने की कोशिश में लगा हुआ था. इस बार कामराज पूरी तैयारी के साथ आए थे. जाकिर हुसैन की उम्मीदवारी के वक्त हुई गलती को वो दोहराना नहीं चाहते थे. उन्होंने नीलम संजीव रेड्डी के नाम का प्रस्ताव रखा. इंदिरा चाहती थीं कि जगजीवन राम को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाए. 1969 महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी का साल था. हरिजन की बात करने वाले गांधी को ये कांग्रेस की तरफ से श्रद्धांजिल होती. साथ ही एक दलित नेता को राष्ट्रपति बनाकर कांग्रेस दलित वोटों पर अपनी पकड़ भी मजबूत करना चाहती थी.
के कामराज और इंदिरा
के कामराज और इंदिरा

संसदीय बोर्ड में उनका प्रस्ताव चार के मुकाबले दो वोट से गिर गया लेकिन कामराज इससे पहले एक बड़ी भूल कर चुके थे, जो उनके नज़रिए में मास्टर स्ट्रोक था. उन्होंने इंदिरा को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने की पेशकश की. इंदिरा समझ गईं कि सिंडिकेट उनका पत्ता काटने में लगा हुआ है. बंगलुरु से लौटते ही इंदिरा ने दो कदम उठाए. पहला सिंडिकेट के अहम सदस्य मोरारजी देसाई को वित्तमंत्री पद से हटाना और दूसरा कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ कार्यवाहक राष्ट्रपति वी.वी. गिरी को राष्ट्रपति चुनाव में उतारना.
वी.वी. गिरी से भारत रत्न लेती इंदिरा
वी.वी. गिरी और इंदिरा

1969 के राष्ट्रपति चुनाव कांग्रेस का भविष्य तय करने वाले चुनाव साबित हुए. इंदिरा ने चुनाव से पहले कांग्रेस के विधायकों और सांसदों को अंतरआत्मा की आवाज सुनकर वोट करने के लिए कहा था. 20 अगस्त 1969 को वोटों की गिनती शुरू हुई. पहली वरीयता के वोटों में किसी को 50 फीसदी का जरूरी बहुमत नहीं मिला. ऐसे में दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती शुरू हुई. वी.वी. गिरी 4,05,427 के मुकाबले 4,20,077 वोट लेकर नए राष्ट्रपति चुने गए. लेकिन, ये इस कहानी का अंत नहीं था. कहानी का अंत दो महीने बाद लिखा जाना था.

इस फूट ने कांग्रेस को हमेशा के लिए बदल दिया

एक नवंबर 1969, कांग्रेस की वर्किंग कमिटी की मीटिंग बुलाई गई. कमाल ये था कि मीटिंग एक नहीं, दो जगह चल रही थी. पहली मीटिंग 7, जंतर-मंतर रोड पर कांग्रेस के नेशनल हेडक्वॉर्टर पर और दूसरी 1, सफदरजंग रोड माने प्रधानमंत्री आवास पर. 21 सदस्यों वाली वर्किंग कमिटी में उपस्थित रहने वाले सदस्यों की संख्या दोनों जगह एक ही थी. ये कमाल घटित हुआ केरल के केसी अब्राहम की वजह से. वो दोनों मीटिंग में गए और बराबर समय रुके. अब्राहम के निष्पक्षता दिखाने का ये प्रयास भी कांग्रेस की फूट को टाल नहीं पाया.
मोरारजी देसाई, इंदिरा गांधी और के. कामराज
मोरारजी देसाई, इंदिरा गांधी और के. कामराज

इस मीटिंग के कुछ दिनों बाद ही निजलिंगप्पा ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त कर दिया. इसके अगले दिन इंदिरा गांधी ने पार्टी के दोनों सदनों के सदस्यों की मीटिंग बुलवाई. कुल 429 सदस्यों में से 310 सदस्य इस मीटिंग में थे. इसमें से 229 सदस्य लोकसभा के थे. ये आंकड़ा बहुमत के लिए काफी नहीं था. इंदिरा को कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन हासिल था. इसके अलावा कई क्षेत्रीय पार्टियां भी इंदिरा के समर्थन में खड़ी थीं. इंदिरा को लोकसभा में बहुमत की चिंता नहीं थी.
22 जुलाई 1969 को ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी की रेक्वेज़िशन मीटिंग बुलाई गई. सिंडिकेट ने इस मीटिंग के बहिष्कार का ऐलान किया. कुल 705 में से 446 मेंबर इंदिरा के समर्थन में इस मीटिंग में पहुंचे. संसदीय दल और AICC में अपना बहुमत साबित करने के बाद इंदिरा ने इसी मीटिंग के आधार पर अपनी नई पार्टी बनाई- कांग्रेस (रेक्वज़िशन ). लोकप्रिय भाषा में इसे कांग्रेस (रूलिंग) बुलाया जाने लगा.

इंदिरा को नहीं मिला चुनाव चिन्ह

1952 के पहले चुनाव के समय कांग्रेस ने अपना चुनाव चिन्ह चुना था, ‘बैलों का जोड़ा.’ 1969 में कांग्रेस में फूट के बाद चुनाव आयोग ने इंदिरा को ये चुनाव चिन्ह देने से मना कर दिया. लोगों को भरोसा था कि बैलों के जोड़े के बिना इंदिरा का प्रभाव समाप्त हो जाएगा. इंदिरा के पास नया चुनाव चिन्ह लेने की मजबूरी थी. उन्होंने चुनाव चिन्ह चुना ‘बछड़े को दूध पिलाती गाय”.

इंदिरा हटाओ बनाम गरीबी हटाओ

1971 के  लोकसभा चुनाव की एक पुराणी वीडियो फुटेज अक्सर हमारे सामने आ जाती है. हल्की गुलाबी साड़ी पहने हुए इंदिरा सामने बैठी जनता से कहती हैं-
"वो कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ."
1971 में कांग्रेस (आई) का चुनाव चिन्ह
1971 में कांग्रेस (आई) का चुनाव चिन्ह

1971 का चुनाव इंदिरा के लिए बड़ी चुनौती था. कांग्रेस में बड़े पैमाने पर टूट हुई थी. उनके पास वो चुनाव चिन्ह नहीं था, जिस पर उनके पिता लगातार तीन चुनाव जीतकर देश के प्रधानमंत्री बने थे. विपक्षी नए चुनाव चिन्ह का मज़ाक बनाते हुए कह रहे थे कि गाय इंदिरा और बछड़ा संजय गांधी हैं. उन्होंने सभी चुनौतियों को स्वीकार किया. अपने चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने लगभग 58 हजार किलोमीटर का दौरा किया. 300 सभाओं को सम्बोधित किया. "गरीबी हटाओं" की जादुई छड़ी लेकर इंदिरा पूरे देश में घूमीं. उन्हें नतीजे भी जादुई मिले. इंदिरा की कांग्रेस 43 फीसदी मतों के साथ 352 सीट जीतने में कामयाब रही. कामराज के नेतृत्व वाली कांग्रेस (ओ) को महज 10 फीसदी वोट और 16 सीटें हासिल हुई. ये धमाकेदार जीत थी, जिसमें तानाशाही की आहट छिपी हुई थी.

गरीबी हटाओ जब बना गरीब हटाओ

गरीबी हटाओ का नारा भी जुमला ही साबित हुआ. 1973 में मंहगाई के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन शुरू हो गए. इसी दौरान 1974 से 1979 तक चलने वाले पांचवे पंचवर्षीय प्लान की घोषणा हुई. इसमें गरीबी उन्मूलन की के तीन मुख्य प्रोग्राम रखे गए. आर्थिक विकास के लिए जारी कुल फंड का महज चार फीसदी गरीबी उन्मूलन के खाते में गया.
पटना के गांधी मैदान से संपूर्ण क्रांति का आह्वान करते जयप्रकाश नारायण
पटना के गांधी मैदान से संपूर्ण क्रांति का आह्वान करते जयप्रकाश नारायण

1975 में आपातकाल लगने के बाद इंदिरा सरकार की तरफ से गरीबी खत्म करने के लिए '20 सूत्री' कार्यक्रम रखा गया. हालांकि इससे गरीबी का प्रतिशत कुछ कम जरूर हुआ लेकिन यह नाकाफी था. 1971 में गरीबी की दर 57 प्रतिशत थी. इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा देकर कई योजनाएं शुरू कीं. 1973 में 'श्रीमान कृषक', 'खेतिहर मजदूर एजेन्सी' और 'लघु कृषक विकास एजेन्सी' जैसी योजना शुरू की गई. 1977 में जब इंदिरा सरकार से बाहर हुई तब तक गरीबी दर 57 से घटकर 52 प्रतिशत पर पहुंच चुकी थी.
जेपी आंदोलन के दौरान विपक्ष के नेता इंदिरा गांधी के खिलाफ अक्सर एक जुमले का इस्तेमाल करते थे. "इंदिरा गांधी गरीबी हटाने की बात कहती थी और गरीबों को हटा रही हैं.'' उस दौर में मुंबई के मजदूर इलाकों में काम करने वाली सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की टोली "आह्वान नाट्यमंच" अपने गानों में इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को इस तरह दर्ज करती है-
"कांग्रेस की सरकार यहां पर 37 साल से सत्ता में बराबर गरीबी हटाओ का नारा लगा कर गरीब को लूटा है बराबर एशियार्ड में रुपए गंवाया और जनता पर टैक्स बढ़ाया बढ़ी अमीरी, बढ़ी गरीबी टाटा, बिड़ला खूब कमाया 20 सूत्री का मीठा फल तो इनके चमचों ने ही खाया पंजा के निशान पर इसने गधे को भी चुन कर लाया आरा रारा रारा रारा रा.... शैतानों को मिली आजादी हमें किया बर्बाद रे भाई....."
सुनें गाना 

यह भी पढ़ें:

वो किस्सा, जिसने अनुपम खेर की ज़िंदगी बदल दी

नरेंद्र मोदी दिल्ली में गांववालों के लिए बोले हैं, पढ़ लो क्या बोले हैं

मां बनने वाली 10 साल की बच्ची के साथ एक नहीं, दो मामा करते थे रेप

Advertisement

Advertisement

()