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क्या है सेरोगेसी बिल जिसे बुधवार को लोकसभा में पास किया गया?

किराए की कोख के लिए कानून बना रही है सरकार.

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20 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 20 दिसंबर 2018, 12:59 PM IST)
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सरोगेसी. यानी लिज़लिज़ी भाषा में कहें तो किराये की कोख. ये तो एक सेकण्ड में समझाने वाली बात हो गई. लेकिन इसे डीटेल में समझना ज़रूरी है. सवाल - क्या है सरोगेसी? जैसा कि पहले बताया, सरोगेसी को किराए की कोख भी कहा जाता है. अब ये किराए की कोख का पूरा मामला क्या होता है? ऐसे कपल्स अलग-अलग वजहों से बच्चे पैदा नहीं कर सकते, सरोगेसी की मदद लेते हैं. इन कपल्स में होमोसेक्शुअल कपल्स शामिल होते हैं या फिर ऐसी महिलाएं होती हैं जो मेडिकल वजहों से बच्चा कैरी नहीं कर सकती हैं. कई मौकों पर ऐसा भी होता है कि कोई महिला बच्चा तो चाहती है लेकिन निजी कारणों से उसे कैरी नहीं करना चाहती है, ऐसे में वो भी सरोगेसी की मदद लेती हैं. सेरोगेसी में तीन लोग शामिल होते हैं. एक महिला जिसका egg इस्तेमाल होगा. एक पुरुष जिसका स्पर्म इस्तेमाल किया जाएगा और तीसरी महिला जो अपनी कोख में बच्चे को पालेगी. इस तीसरी महिला को सरोगेट कहते हैं. अब IVF यानी In Vitro Fertilization तकनीक की मदद से स्पर्म का एग्स से फ्यूज़न करवा कर उससे बने एंब्रियो को सरोगेट की कोख में डाला जाता है. इस केस में बच्चे का DNA स्पर्म और एग्स देने वाले पुरुष और महिला का होता है. लेकिन हम आज इसके बारे में क्यों बात कर रहे हैं? क्योंकि बुधवार को लोकसभा में सरोगेसी रेगुलेशन बिल पास हुआ है. आखिर क्या है ये सेरोगेसी बिल जिसे बुधवार को लोकसभा में पास किया गया? जैसा कि नाम से ही क्लियर है, ये बिल देश में सरोगेसी को रेगुलेट करने के लिए लाया गया है. केन्द्रीय हेल्थ मिनिस्टर जेपी नड्डा ने इस बिल के पास होने को ऐतिहासिक कदम बताते हुए कहा कि इस बिल को देश के लोकाचार को ध्यान में रखते हुए बनाया गया और इससे भारत सरोगेसी का अड्डा बनने से भी बच सकेगा. इस बिल के पास हो जाने के बाद से देश में कमर्शियल सरोगेसी को ग़ैर क़ानूनी घोषित कर दिया जाएगा. यानी बच्चे को कोख में रखने के बदले पैसे लेने वाला काम अब कानूनी नहीं होगा. क्या कहता है ये बिल? सरोगेसी रेगुलेशन बिल के मुताबिक़ सिर्फ़ वो पति-पत्नी जो कि 5 साल या उससे ज़्यादा वक़्त से शादीशुदा हैं, बस वो ही सरोगेसी का लाभ उठा सकते हैं. सरोगेट यानी वो महिला जो बच्चे को अपनी कोख में रखेगी, उसे पति-पत्नी का बेहद करीबी रिश्तेदार होना अनीवार्य है. सरोगेसी के लीगल होने के लिए इन दोनों ही शर्तों का माना जाना बेहद ज़रूरी है. इस बिल के साथ गड़बड़ क्या है? इसका जवाब बिल पर होते हुए डिस्कशन से ही मिल जाएगा. तृणमूल कांग्रेस की डॉक्टर काकोली घोष और NCP की सुप्रिया सुले ने बिल का सपोर्ट करते हुए इसे थोड़ा सा फैलाने को कहा. उनका कहना था कि इसमें सिर्फ़ शादीशुदा पुरुष और स्त्री के जोड़े को ही शामिल किया गया है. इससे मालूम चलता है कि बिल अच्छा तो है लेकिन मॉडर्न नहीं है. काकोली घोष ने कहा कि हाल ही में पास किये गए ट्रांसजेंडर पर्सन्स प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स बिल के साथ अगर हम न्याय करना चाहते हैं तो इसमें सेम-सेक्स कपल्स को भी शामिल किया जाना चाहिए. सुप्रिया सुले ने कहा कि अगर हम सिंगल पेरेंट यानी गैर शादीशुदा पुरुष या महिला को बच्चे गोद लेने की इजाज़त दे सकते हैं तो वो सरोगेसी से लाभ क्यूं नहीं उठा सकते? इन सभी बातों पर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा यही कहते रहे कि बिल को सिर्फ़ शादीशुदा महिला और पुरुष के जोड़े और उसके परिवार तक ही सीमित रखा जाएगा. Untitled design (90) असल में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और सुप्रिया सुले के बीच हुई बहस इस बिल के मौजूदा स्वरुप के बारे में काफ़ी कुछ कहती है. जेपी नड्डा ने सुप्रिया सुले के सवालों का जवाब देते हुए कहा -
देश की तमाम NGO और तमाम संस्थाएं ऐसा चाहती हैं कि देश में कमर्शियल सरोगेसी ख़त्म होनी चाहिए. लेकिन उसी समय पर मैं परिवार को बचाए रखना चाहता हूं.
उन्होंने ये भी कहा कि कानूनन एक मां और परिवार ही सरोगेसी का लाभ उठा सकते हैं और लिव-इन पार्टनर्स या सिंगल पेरेंट्स इसके दायरे में नहीं आ सकते. इसके जवाब में एक बार फिर सुप्रिया सुले ने नड्डा से कहा-
कई ऐसे परिवार भी होते हैं जहां माता या पिता की मौत हो चुकी होती है. इसलिए मैं आपसे विनती करती होती हूं कि आप कम से कम ये तो न ही कहें कि परिवार को पूरा होना चाहिए या फिर उसमें एक पति और पत्नी का होना ही एकमात्र शर्त है.
इसके जवाब में नड्डा ने एडॉप्शन का नाम लेते हुए कहा कि गैर शादीशुदा लोग बच्चे गोद ले सकते हैं. यानी नड्डा जी के हिसाब से सरोगेसी सिर्फ़ और सिर्फ़ शादीशुदा पति-पत्नी ही करवा सकते हैं और उनके अनुसार परिवार की परिभाषा में 5 साल ऊपर शादीशुदा जोड़े ही आते हैं. और उनकी यही बात इस बिल को काफ़ी कमज़ोर बनाता है और कई मायनों में सुप्रीम कोर्ट के होमोसेक्शुएलिटी को क़ानूनी तौर पर मान्यता देने के आदेश की अवमानना करता दिखाई देता है.
वीडियो:सड़कों पर उतरकर अधिकार मांगे, तब आया ट्रांसजेंडर पर्सन प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स बिल  

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