2 सितंबर 1922 को बंगाली मैगज़ीन 'गनबानी' में एक आर्टिकल छपा. आर्टिकल का टाइटल था‘हिंदू मुसलमान’. लिखने वाले ने लिखा था, “मैं हिंदुओं और मुसलमानों को बर्दाश्त करसकता हूं, लेकिन चोटी वालों और दाढ़ी वालों को नहीं. चोटी हिंदुत्व नहीं है. दाढ़ीइस्लाम नहीं है. चोटी पंडित की निशानी है. दाढ़ी मुल्ला की पहचान है. ये जो एक दूसरेके बाल नोचे जा रहे हैं, ये उन कुछ बालों की मेहरबानी है, जो इन चोटियों और दाढ़ियोंमें लगे हैं. ये जो लड़ाई है वो पंडित और मुल्ला के बीच की है. हिंदू और मुसलमान केबीच की नहीं. किसी पैगंबर ने नहीं कहा कि मैं सिर्फ मुसलमान के लिए आया हूं, याहिंदू के लिए या ईसाई के लिए आया हूं. उन्होंने कहा, “मैं सारी मानवता के लिए आयाहूं, उजाले की तरह.” लेकिन कृष्ण के भक्त कहते हैं, कृष्ण हिंदुओं के हैं. मुहम्मदके अनुयायी बताते हैं, मुहम्मद सिर्फ मुसलमानों के लिए हैं. इसी तरह ईसा मसीह परईसाई हक़ जमाते हैं. कृष्ण-मुहम्मद-ईसा मसीह को राष्ट्रीय संपत्ति बना दिया है. यहीसब समस्याओं की जड़ है. लोग उजाले के लिए नहीं शोर मचा रहे, बल्कि मालिकाना हक़ पर लड़रहे हैं.” धार्मिक कट्टरता को धता बताने वाला ये आदमी था मशहूर कवि, लेखक, संगीतकारक़ाज़ी नज़रुल इस्लाम. विद्रोही कवि के नाम से मशहूर क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम को भारत औरबांग्लादेश में बेहद सम्मान हासिल है.दुक्खू मियां नाम क्यों पड़ा छुटपन मेंकाज़ी नज़रुल इस्लाम की पैदाइश 24 मई 1899 को पश्चिम बंगाल के आसनसोल के पास चुरुलियागांव में हुई. एक मुस्लिम तालुकदार घराने में. घर का माहौल पूरी तरह मज़हबी था.उनके पिता काज़ी फकीर अहमद इमाम थे. एक मस्जिद की देखभाल करते थे. नज़रुल बचपन मेंकाफी खोए-खोए रहते थे. इसके चलते रिश्तेदार इन्हें ‘दुक्खू मियां’ पुकारने लगे. नज़रुल की शुरुआती तालीम मस्जिद द्वारा संचालित मदरसे में हुई. जहां उन्होंने कुरआन,हदीस और इस्लामी फलसफे को पढ़ा. जब वो सिर्फ 10 साल के थे, उनके पिता की मौत हो गई.परिवार को सपोर्ट करने के लिए नजरूल पिता की जगह काम करने लगे. मस्जिद में. बतौरकेयरटेकर. अज़ान देने का काम भी उनके जिम्मे था. इस काम को करने वाले को मुअज़्ज़िनकहते हैं. इसके अलावा वो मदरसे के मास्टरों के काम भी करते. अपनी तालीम भी इस दौरानउन्होंने जारी रखी.पुराणों का चस्का लगा तो शुरू हुए नाटकईमान की तालीम के बाद बारी आई म्यूजिक और लिटरेचर की. नजरूल ने चाचा फ़ज़ले करीम कीसंगीत मंडली जॉइन कर ली. ये मंडली पूरे बंगाल में घूमती और शो करती. नजरूल ने मंडलीके लिए गाने लिखे. इस दौरान बांग्ला भाषा को लिखना सीखा. संस्कृत भी सीखी. और उसकेबाद कभी बांग्ला, तो कभी संस्कृत में पुराण पढ़ने लगे. इसका असर उनके लिखे पर नजरआने लगा. उन्होंने कई प्ले लिखे जो हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित थे. मसलन, ‘शकुनीका वध’, ‘युधिष्ठिर का गीत’, ‘दाता कर्ण’.मुअज्जिन फौजी बन कराची पहुंचा1917 में नजरूल ने ब्रिटिश आर्मी जॉइन कर ली. 49वीं बंगाल रेजिमेंट में भर्ती हुई.कराची तैनाती मिली. नाटक छोड़ वह फौज में क्यों गए? इस सवाल का जवाब उन्होंने हीलिखा. एक, रोमांच की तलाश और दूसरी, उस वक्त की पॉलिटिक्स में दिलचस्पी. कराची कैंटमें नज़रूल के पास ज्यादा काम नहीं था. अपनी बैरक में बैठ वह खूब पढ़ते. लेख औरकविताएं लिखते. शुरुआत मादरी जबान बंगाली से हुई. रबिन्द्रनाथ टैगोर से लेकरशरतचंद्र चट्टोपाध्याय तक को पढ़ गए. फिर कराची की हवा लगी. जहां उर्दू का जलवा था.जो फारसी और अरबी से पैदा हुई. तो नजरूल ने रेजिमेंट के मौलवी से फारसी सीखी. फिरइस जबान के महान साहित्यकारों, रूमी और उमर खय्याम को पढ़ा. दो साल पढ़ने के बादनजरूल ने अपना लिखा छपाने की सोची. साल 1919 में उनकी पहली किताब आई. गद्यकी. टाइटल था, ‘एक आवारा की ज़िंदगी’. कुछ ही महीनों के बाद उनकी पहली कविता‘मुक्ति’ भी छपी.नर्गिस से शादी क्यों नहीं की1920 में जब बंगाल रेजिमेंट भंग कर दी गई, वह कलकत्ता आ बसे. जल्द ही उनकी नर्गिसनाम की एक लड़की से सगाई हो गई. वह उस जमाने के मशहूर प्रकाशक अली अकबर ख़ान की भतीजीथीं. 18 जून 1921 को शादी होना तय हुआ. शादी वाले दिन नज़रुल पर ख़ान ने दबाव डाला किवह एक कॉन्ट्रैक्ट साइन करें. इसमें लिखा था, शादी करने के बाद नजरूल हमेशा दौलतपुरमें ही रहेंगे. नज़रुल को कोई शर्त मंज़ूर नहीं थी, लिहाजा उन्होंने निकाह से इनकारकर दिया.विद्रोही कवि नाम कैसे पड़ा1922 में काजी की एक कविता ने उन्हें पॉपुलर कर दिया. इतना कि उनका नाम भी बदल गया.कविता का शीर्षक था, ‘विद्रोही’. ‘बिजली’ नाम की मैगज़ीन में ये छपी. इसमें बागीतेवर थे. जल्द ही कविता अंग्रेजी राज का विरोध कर रहे क्रांतिकारियों का प्रेरक गीतबन गई. इसका कई भाषाओं में अनुवाद भी हो गया. नतीजतन वो अंग्रेजों को खटकने लगे औरजनता के बीच 'विद्रोही कवि' के नाम से मशहूर हो गए.https://www.youtube.com/watch?v=FCWj33Ng2Q0नज़रूल ने क्या किया जो टैगोर उनके फैन हो गएकुछ ही दिनों बाद नज़रुल ने ‘धूमकेतु’ नाम से एक मैगज़ीन निकालनी शुरू की. मैगज़ीन केसितंबर 1922 के अंक में उन्होंने एक कविता छापी. ‘आनंद का आगमन’. इसके भी तेवरबर्तानिया हुकूमत को बागी लगे. पुलिस ने मैगजीन के दफ्तर पर रेड की. नज़रूल गिरफ्तारहो गए. उन्हें मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया. माफी मांगने को कहा गया.उन्होंने इनकार कर दिया. फिर उन्हें डेढ़ साल की सजा सुनाई गई. जेल में भी वहसाहित्य ही रचते रहे. क्रांति के प्रति उनका ये समर्पण गुरुदेव रबींद्र नाथ टैगोरको छू गया. उन्होंने अपना नया नाटक 'बसंता' नजरूल को समर्पित किया. नजरूल ने भी जेलसे एक कविता लिख गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता जताई.हिंदू से शादी की तो कट्टर मुल्लाओं ने क्या कहानज़रुल को प्रमिला से प्यार था. नज़रूल मुसलमान. प्रमिला हिंदू. नज़रूल मौलवियों केखानदान से. प्रमिला ब्रह्म समाज से. दोनों ने साथ तय किया, तो कट्टरपंथी परेशान होगए. शादी में हज़ार अड़ंगे लगाए. मगर नज़रूल और प्रमिला शादी करके ही माने. फिर नज़रूलके पास कुछ मुस्लिम धर्मगुरु पहुंचे. एक सलाह लेकर. चेतावनी भरे अंदाज में. किनिकाह तो ठीक है मगर अब प्रमिला को कलमा पढ़ मुसलमान बनना होगा. नज़रूल ने उनकी बातएक बार सुनी और फिर बोले, सब के सब दफा हो जाओ यहां से. जाहिर है कि नज़रूल मुसलमानरहे और प्रमिला हिंदू. और इसके चलते दोनों ही तरफ के कमअकल उन्हें अपनी आंख कीकिरकिरी समझते रहे.कृष्ण भजन भी लिखानज़रुल ने न सिर्फ इस्लामिक मान्यताओं को मूल में रखकर रचनाएं की, बल्कि भजन, कीर्तनऔर श्यामा संगीत भी रचा. दुर्गा मां की भक्ति में गाया जाने वाला श्यामा संगीतसमृद्ध करने में क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम का बड़ा हाथ है. कृष्ण पर लिखे उनके भजन भी बहुतमशहूर हुए. पढ़िए उनके लिखे ऐसे ही एक भजन का हिंदी अनुवाद.अगर तुम राधा होते श्याम मेरी तरह बस आठों पहर तुम रटते श्याम का नाम... वन-फूल कीमाला निराली वन जाति नागन काली कृष्ण प्रेम की भीख मांगने आते लाख जनम तुम, आते इसबृजधाम... चुपके चुपके तुमरे ह्रदय में बसता बंसीवाला और, धीरे धारे उसकी धुन सेबढ़ती मन की ज्वाला पनघट में नैन बिछाए तुम, रहते आस लगाए और, काले के संग प्रीतलगाकर हो जाते बदनाम...आख़िरी दिनों की बीमारी और कफन दफन की बातआज़ादी के बाद के उनके दिन बड़ी तकलीफों में बीते. उनकी तबियत अक्सर खराब रहने लगी.1952 आते-आते तो ऐसे हालात हो गए कि उन्हें मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती कराना पड़ा.उनका एक फैन क्लब हुआ करता था उस वक़्त, जिसने उनके इलाज का बीड़ा उठाया. अगले बीससाल उन्होंने अपनी बीमारियों से जूझते हुए काटे. पत्नी का भी 1962 में देहांत होगया. 1971 की दिसंबर में बांग्लादेश आज़ाद हो गया. 1972 में उन्हें बांग्लादेश नेअपना ‘राष्ट्रकवि’ घोषित किया. भारत सरकार की इजाज़त से वो उन्हें ढाका बसने के लिएले गई. चार साल बाद उनकी ढाका में ही मौत हो गई. ढाका यूनिवर्सिटी के कैम्पस मेंउन्हें दफ़न कर दिया गया. मस्जिद की बगल में. मस्जिद के साए में ही उनका सफ़र शुरूहुआ था. वहीं पे ख़त्म. लेकिन कलमकारों का सफ़र कभी ख़त्म नहीं होता. उनका लिखा उनकेशरीर के मिट्टी होने के बाद भी बना रहता है. और उसी में रचे-बसे वो बने रहते हैं.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें: नाम से नहीं किरदार से जाने जाते हैं ये कलाकार"ज़िंदगी एक महाभयंकर चीज़ है, इसे फांसी दे देनी चाहिए"इन्हीं आंखों से जहन्नुम देखा है, खुदा वो वक़्त फिर कभी न दिखाएं”सत्ता किसी की भी हो इस शख्स़ ने किसी के आगे सरेंडर नहीं कियाउसने ग़ज़ल लिखी तो ग़ालिब को, नज़्म लिखी तो फैज़ को और दोहा लिखा तो कबीर को भुलवादिया