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  • Life imprisonment for BSP leader and criminal Anupam Dubey in 1996 murder case

फर्रुखाबाद के इंस्पेक्टर के मर्डर केस की पूरी कहानी, फैसला आने में 27 साल कैसे लग गए?

फर्रुखाबाद के बसपा नेता अनुपम दुबे ने रामनिवास यादव की गोली मारकर हत्या की थी. 27 साल बाद अब जाकर उन्हें उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई है.

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8 दिसंबर 2023 (अपडेटेड: 8 दिसंबर 2023, 07:23 PM IST)
Anupam Dubey found guilty in Policeman murder case of 1996
ये अनुपम दुबे हैं. फर्रुखाबाद के बसपा नेता और माफिया. हत्या के दोषी पाए गए हैं. उम्रक़ैद हुई है. (फाइल फोटो)
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“14 मई 1996 की बात है. मैं फतेहगढ़ से कानपुर जाने के लिए पैसेंजर ट्रेन में बैठा था. ट्रेन दोपहर 3 बजे चली थी. मैं 3 नंबर डिब्बे में था. पूरा खचाखच भरा डिब्बा. मैं खिड़की की तरफ वाली सीट पर बैठा था. शाम को 6 बजे ट्रेन कानपुर में रावतपुर स्टेशन पर रुकी. ज़्यादातर सवारियां उतर गईं. डिब्बे में 4-5 लोग बचे थे. यहां से 3 लोग ट्रेन में चढ़े और मेरी बगल वाली सीट पर बैठे एक आदमी पर तड़ातड़ गोलियां चलानी शुरू कर दीं. एक ने तो उस आदमी की कनपटी पर सटाकर गोली मारी. ट्रेन चल दी लेकिन रफ़्तार ज़्यादा नहीं थी तो तीनों हमलावर चलती ट्रेन से उतरकर भाग गए. वो खूंखार अपराधी थे इसलिए मैं उनको चेहरे से पहचान गया. अनुपम दुबे, कौशल दुबे और बिलैया.”

फर्रुखाबाद में तैनात इंस्पेक्टर रामनिवास यादव की 14 मई 1996 को कानपुर के पास ट्रेन में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस मामले में अब 27 साल बाद फ़ैसला आया. बसपा नेता और हिस्ट्रीशीटर अनुपम दुबे को कानपुर की ADJ कोर्ट ने 7 दिसंबर को दोषी करार दिया और आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है. ऊपर जिस बयान से हमने ख़बर की शुरुआत की है, वो इसी केस में एक गवाह का दिया बयान है.

इस फ़ैसले को, इस केस को और इसके पूरे बैकग्राउंड को विस्तार से बताते हैं.

महेश दुबे मर्डर केस

बात 95 की है. फर्रुखाबाद में उस समय वकील महेश दुबे की कतई रंगबाजी हुआ करती थी. उनके 2 बेटे थे. अनुपम और अनुराग. अब तक अनुपम और अनुराग की दबंगई कन्नौज, फर्रुखाबाद तक चलने लगी थी. अनुपम पर पहला केस 1987 में दर्ज हो चुका था. मारपीट का केस. 1991 और 94 में हत्या के भी 2 केस दर्ज हो गए. हालांकि अभी तक वो किसी में दोषी साबित नहीं हुआ था.

एक मई 1995 की बात है. महेश दुबे और अनुपम अपनी जीप से गुरसहायगंज के पास समधन नाम के कस्बे से होकर कहीं जा रहे थे. रास्ते में जीप से एक महिला को टक्कर लग गई. आस-पास के लोगों ने आकर जीप को घेर लिया. दोनों पक्षों में गर्मा-गर्मी हुई. महेश दुबे ने कथित तौर पर हवाई फायरिंग कर दी. भीड़ बिदक गई. मारपीट हो गई. अनुपम घायल हुए. महेश दुबे को गंभीर चोटें आईं और उनकी मौत हो गई. 

अनुपम की नज़र में रामनिवास दोषी

अनुपम दुबे के ख़िलाफ़ कानपुर की ADJ कोर्ट में जो चार्जशीट रखी गई. उसमें गवाहों ने बताया है कि अनुपम दुबे ने पिता की मौत के लिए गांव के तमाम लोगों के साथ-साथ उस वक्त थाना गुरसहायगंज के इंस्पेक्टर रामनिवास यादव को भी ज़िम्मेदार मान लिया. अनुपम को लगता था कि रामनिवास यादव ने भीड़ को रोकने के लिए ज़रूरी कदम नहीं उठाए और भीड़ को महेश दुबे पर हमला करने दिया.

“मई 1996 की बात है. मैं फतेहगढ़ की अदालत में आया हुआ था. इंस्पेक्टर रामनिवास यादव थाना गुरसहायगंज और कन्नौज में तैनात थे, इसलिए उनका भी यहां आना होता था और मजिस्ट्रेट साब से भी मिलना-जुलना था. एक रोज़ रामनिवास कोर्ट में ही थे, तभी अनुपम दुबे वहां आए. बोले- मजिस्ट्रेट साहब से मिलने आए हैं. रामनिवास वहां से जाने लगे. जब तक रामनिवास नज़रों से ओझिल नहीं हो गए, अनुपम उसे घूरते रहे. कुछ दिन बाद अख़बार में पढ़ा कि कानपुर के पास एक ट्रेन में रामनिवास की गोली मारकर हत्या कर दी गई.” – चार्जशीट में एक अन्य गवाह का बयान

14 मई 1996 को क्या हुआ?

उस दिन रामनिवास एक केस में गवाही देने के लिए कानपुर आए हुए थे. अनुपम दुबे को पहले से इसकी जानकारी थी. उसने अपने 2 साथियों के साथ मिलकर रामनिवास को ट्रेन में गोली मारकर हत्या कर दी. अनुपम के ये 2 साथी थे- कौशल किशोर और नेम कुमार बिलैया. अभी इन दोनों के बारे में भी बताएंगे. पहले बताते हैं कि रामनिवास की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्या आया.

# बाईं कनपटी पर फायर आर्म का घाव था. दाएं कान के ऊपर exit wound था, मतलब यानी बाईं कनपटी से सटाकर गोली मारी गई होगी, जो दाईं तरफ से बाहर निकली. इसके अलावा भी कई गोलियां मारी गई थीं. काफी पास से गोली मारे जाने के कारण दिमाग की झिल्ली फट गई थी. काफी खून बह जाने के कारण रामनिवास यादव की मौत हो गई. 

तीनों की क्राइम कुंडली

फर्रुखाबाद में इंडिया टुडे के रिपोर्टर फ़िरोज खान बताते हैं कि कौशल किशोर तो थे अनुपम के चाचा. खुद भी अपराधी. 2003 में एक गैंगवॉर में मारे गए. अब बात नेम कुमार बिलैया की. खूंखार अपराधी. एक समय पूरे प्रदेश में इसका खौफ बढ़ता जा रहा था. 1994 में फर्रुखाबाद के ज़िला पत्रकार परिषद अध्यक्ष कर्ण सिंह की कानपुर में गोली मारकर हत्या कर दी थी. ये उस समय का बड़ा चर्चित हत्याकांड था. कर्ण सिंह को जब बिलैया ने गोली मारी, तब भी उसके साथ महेश दुबे और अनुपम दुबे थे. कहा जाता है कि कर्ण सिंह और महेश दुबे की दुश्मनी चलती थी. इसी दुश्मनी में महेश दुबे ने बिलैया से कहकर कर्ण सिंह की हत्या करवा दी.

कानपुर के कुछ पुराने पत्रकार बिलैया के बारे में एक और किस्सा बताते हैं.

1997 में BJP के कद्दावर नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या कर दी गई. वो फर्रुखाबाद से विधायक थे, लेकिन धमक पूरे सूबे में थी. गेस्ट हाउस कांड के वक्त मायावती ने जिन लोगों को मदद के लिए फोन किया था, उनमें से एक ब्रह्मदत्त द्विवेदी भी थे. उन्होंने मायावती की मदद की भी थी. ब्राह्मणों के बीच उनकी तगड़ी पकड़ थी. 1997 में ब्रह्मदत्त का मर्डर कर दिया गया. पॉलिटिकल मर्डर था. इसका बदला लेने के लिए बिलैया ने एक और बहुत बड़ा पॉलिटिकल मर्डर प्लान किया था. हालांकि सफल नहीं हो सका. 2000 में बिलैया एक पुलिस एनकाउंटर में मारा गया.

अब अनुपम दुबे की बात. आदमी पढ़ा-लिखा है. BA-LLB किया है. लेकिन फ़ितरत से अपराधी. अलग-अलग थानों में 60 से ज़्यादा केस दर्ज हैं. हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, फिरौती, ज़मीन पर कब्जा जैसे केस. अनुपम की करोड़ों रुपये की प्रॉपर्टी कुर्क की जा चुकी है. अभी अक्टूबर में ही अनुपम दुबे की 10 करोड़ रुपये से ज़्यादा की प्रॉपर्टी कुर्क की गई है. अनुपम दुबे ने 2 बार विधानसभा चुनाव भी लड़ा. 2012 में फर्रुखाबाद से निर्दलीय, 2017 में हरदोई से बसपा के टिकट पर. दोनों बार हारा.

रामनिवास मर्डर में 27 साल बाद फ़ैसला

रामनिवास मर्डर केस पर वापस चलते हैं. केस 1996 का था. फ़ैसला अब 7 दिसंबर 2023 को आया है. 27 साल बाद. क्यों? इसका जवाब जानने के लिए लल्लनटॉप ने बात की IPS मुश्ताक से. वे 2020 में आगरा GRP में SP बनकर आए थे. मुश्ताक बताते हैं, 

“96 में मर्डर करने के बाद अनुपम दुबे किसी सुनवाई में कोर्ट तक नहीं जाता था. 2003 में कोर्ट का नोटिस भी आया, तब भी नहीं गया. पिता वकील थे, ये ख़ुद वकील था तो इसकी अच्छी-ख़ासी धमक थी. मैं 2020 में एसपी, जीआरपी बनकर आगरा पहुंचा. आगरा जीआरपी के क्षेत्राधिकार में फर्रुखाबाद और कानपुर तक के कई क्षेत्र आते हैं. चूंकि मर्डर ट्रेन में हुआ था तो केस जीआरपी के पास ही था. मैंने इसकी दबी हुई फाइल फिर निकलवाई. 2003 के स्टैंडिंग ऑर्डर के आधार पर केस ने रफ्तार पकड़ी और जो केस 20 साल से ज्यादा समय से अटका था, उसमें अगले 3 साल में फ़ैसला आपके सामने है.”

फिलहाल IPS मुश्ताक ललितपुर में एसपी हैं. 

अदालत ने अनुपम दुबे को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है. एक लाख रुपये का आर्थिक दंड भी लगाया है. पैसा नहीं भरा तो 6 महीने की सज़ा बढ़ जाएगी. अनुपम दुबे ने कौशल और बिलैया के साथ मिलकर अपराध का बड़ा नेक्सस बनाया और कई अपराध किए. इन तीनों के गैंग को D-47 नाम दिया गया था, जिसका 90 के दशक से लेकर कुछ बरस पहले तक काफी ख़ौफ रहा. अनुपम दुबे के वकीलों का कहना है कि उम्रकैद की सज़ा के ख़िलाफ़ ऊपरी अदालत में जाएंगे.

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