एक मुसलमान कवि, जिसे राम नाम की कविताई ने फतवे दिला दिए
राम से लेकर सरस्वती वंदना तक लिखने वाले इस कवि का जन्मदिन है आज.

वो हैं के वफ़ाओं में खता ढूंढ रहे हैं, हम हैं के खताओं में वफ़ा ढूंढ रहे हैं।
हम हैं खुदा परस्त दुआ ढूंढ रहे हैं, वो इश्क के बीमार दवा ढूंढ रहे हैं।
तुमने बड़े ही प्यार से जो हमको दिया है, उस ज़हर में अमृत का मज़ा ढूंढ रहे हैं।
मां-बाप अगर हैं तो ये समझो के स्वर्ग है, कितने यतीम इनकी दुआ ढूंढ रहे हैं।
उस दौर में सुनते हैं के घर-घर में बसी थी, इस दौर में हम शर्मो-हया ढूंढ रहे हैं।
वैसे तो पाक दामनी सबको पसंद है, फिर आप क्यों औरत में अदा ढूंढ रहे हैं।
हां ! ‘क़म्बरी’ ने सच के सिवा कुछ नहीं कहा, कुछ लोग हैं जो सच की सज़ा ढूंढ रहे हैं। ******************
वो तपोवन हो के राजा का महल, प्यास की सीमा कोई होती नहीं,
हो गये लाचार विश्वामित्र भी, मेनका मधुमास लेकर आ गयी।
तृप्ति तो केवल क्षणिक आभास है, और फिर संत्रास ही संत्रास है,
शब्द-बेधी बाण, दशरथ की व्यथा, कैकेयी के मोह का इतिहास है,
इक ज़रा सी भूल यूं शापित हुई, राम का वनवास लेकर आ गयी।
प्यास कोई चीज़ मामूली नहीं, प्राण ले लेती है पर सूली नहीं,
यातनायें जो मिली हैं प्यास से, आज तक दुनिया उसे भूली नहीं,
फिर लबों पर कर्बला की दास्तां, प्यास का इतिहास लेकर आ गयी।
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