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उस देश की कहानी, जहां वॉट्सऐप पर टैक्स लगा

लेबनन का अंतहीन संकट कहां जाकर खत्म होगा?

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24 जून 2020 (अपडेटेड: 24 जून 2020, 01:30 PM IST)
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लेबनन के प्रदर्शनकारी सरकार के खिलाफ महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं. (फोटो: एपी)
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आज हम आपको ले जाएंगे एक पांच हज़ार साल पुराने देश. बला का हसीन मुल्क. बर्फ़ से ढके पहाड़. हरी-भरी घाटियां. समंदर का किनारा. भरे-पूरे जंगल. यहां आप पहाड़ पर स्कीइंग भी कर सकते हैं. और समंदर में तैर भी सकते हैं. वो भी बस 24 घंटे के भीतर. सुंदरता तो है ही, कच्चे तेल और गैस का भंडार भी है. इतना ज़ायकेदार खाना कि लार टपक जाए. एक-से-एक कहानियां हैं यहां की. मसलन, जैतून के वो 16 पेड़, जिनकी उम्र लोग छह हज़ार साल बताते हैं. कहते हैं, इन पेड़ों का रिश्ता बाइबिल के नोआ से है. नोआ ने ज़मीन की तलाश में अपने कबूतर को उड़ाया. फिर एक दिन चोंच में छोटी सी टहनी दबाए वो कबूतर नोआ के पास लौटा. टहनी, माने पेड़. पेड़, माने ज़मीन. लोककथाएं मानती हैं कि इन्हीं में से किसी पेड़ की टहनी थी वो.
ये किस देश की बात कर रहे हैं हम? ये वहां की बात है, जहां से अमेरिका को मिडिल-ईस्ट में टांग अड़ाने का चस्का लगा. ये बात है, 15 जुलाई 1958 की. दोपहर के करीब तीन बजे थे. मेडिटरेनियन के तट पर बसे एक शहर में समंदर किनारे कुछ जहाज़ आकर लगे. इन जहाज़ों पर टंगा था अमेरिकी झंडा. इन जहाज़ों से उतरे करीब 1,700 अमेरिकी मरीन्स. क्यों आए थे ये मरीन्स यहां? ये आए थे मिडिल-ईस्ट में अमेरिका के पहले सैन्य ऑपरेशन के वास्ते. ये ऑपरेशन उस देश में चल रहे एक संकट से जुड़ा था. संकट, जिसका लिंक था वहां रहने वाले दो धार्मिक समुदायों के बीच पसरे टेंशन से. एक तरफ ईसाई. दूसरी तरफ मुसलमान. मगर इस संकट में अमेरिका का क्या काम था?
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लेबनन में आते अमेरिकी सैनिक (फोटो: एएफपी)

कौन-कौन से हित थे अमेरिका के? अमेरिका का काम जुड़ा था अमेरिकी हितों से. दो तरह के थे ये हित. पहला, कोल्ड वॉर की रेस में सोवियत से जीतना. दूसरा, मिडिल-ईस्ट के तेल भंडारों तक अबाध और सस्ते में पहुंच. इन फ़ायदों की सोचकर मिडिल-ईस्ट में अपनी गोटियां सेट करने लगा अमेरिका. गोटियां, जैसे ईरान में मनपसंद सरकार बिठाना. सऊदी के साथ दोस्ताना ताल्लुकात. वहां अपना एयरबेस बनाना. इराक में किंग फ़ैज़ल द्वितीय को साथ मिलाना. जिस दिन ये 1,700 अमेरिकी मरीन्स इस देश पहुंचे, उसके एक दिन पहले अमेरिका को मिडिल-ईस्ट में बड़ा झटका लगा था.
क्या हुआ था? इराक में प्रो-अमेरिकन किंग फ़ैजल की हत्या हो गई थी. जॉर्डन के प्रो-अमेरिकी राजा हुसैन बिन तलाल को भी मारने की कोशिशें हो रही थीं. अमेरिका को लगा, उसके पत्ते बिखर रहे हैं. इन्हीं बिखरते पत्तों को बचाने का डेस्परेशन अमेरिकी मरीन्स को इस देश में लाया था. इराक और जॉर्डन की तरह यहां भी सत्ता से उसकी दोस्ती थी. गृह युद्ध के कारण राष्ट्रपति कमील शमून पर ख़तरा मंडरा रहा था. इन्हीं कमील शमून की मदद के नाम पर अमेरिका इस सिविल वॉर में कूदा. और टांग अड़ाकर उसने स्थितियां और बिगाड़ दीं. तब से जो हालात बिगड़े, वो कमोबेश बिगड़े ही हुए हैं.
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राष्ट्रपति कमील शमून (फोटो: एएफपी)

ये कहानी है... लेबनन की. अमेरिकी उच्चारण में कई लोग इसको लेबनान भी कहते हैं. लेबनन शब्द बना है हिब्रू भाषा के एक शब्द- लिब्न से. इसका मतलब होता है, सफ़ेद. मानते हैं कि उजले बर्फ़ से ढके पहाड़ों के कारण लेबनन को ये नाम मिला है. ये देश बसा है पश्चिमी एशिया में. लोकेशन देखें, तो दुनिया की सबसे अशांत जगहों में से एक. उत्तर और पूरब में सीरिया. दक्षिण में इज़रायल. पश्चिम में साइप्रस. इसी पश्चिमी दिशा में लगभग 225 किलोमीटर की इसकी बाउंड्री जुड़ी है मेडिटरेनियन सी, यानी भूमध्यसागर से. एक जमाने में यहां देवदार के घने जंगल हुआ करते थे. अंधाधुंध कटाई के कारण अब वो जंगल तो नहीं बचे. हां, देवदार के वो पेड़ अब भी लेबनन का राष्ट्रीय चिह्न हैं. ये चिह्न आपको उसके झंडे पर भी दिख जाएगा.
कब बना लेबनन आज़ाद मुल्क? लेबनन की राजधानी है बेरूत. कहते हैं, ये शहर सात बार राख हुआ और हर बार वापस खड़ा हो गया. करीब 10 हज़ार ईसा पूर्व से ही यहां इंसानों की लगातार बसाहट रही. रोमन साम्राज्य के असर में यहां पहुंचा ईसाई धर्म. फिर अरब ने यहां पहुंचाया इस्लाम. इस देश ने ईसाई और मुस्लिमों के बीच का क्रूसेड भी देखा. तब ये ग्रेटर सीरिया का हिस्सा हुआ करता था. 1918 में ऑटोमन साम्राज्य के पतन के बाद ये आ गया फ्रांस के संरक्षण में. फ्रांस था कैथलिक देश. उसने लेबनन को सीरिया से अलग कर दिया. लेबनन के मुसलमान आज़ाद होना चाहते थे. आज़ादी का ये संघर्ष कई सालों तक चला. और फिर काफी मशक्कत के बाद 1 जनवरी, 1944 को लेबनन बन गया एक आज़ाद देश.
शुरुआती दौर में लेबनन का झुकाव था अरब की तरफ. वो भी, इज़रायल विरोधी गुट की ओर. मगर फिर 1952 में जब ईसाई धर्म के कमील शमून यहां राष्ट्रपति बने, तो वो पश्चिमी देशों की तरफ टिल्ट होने लगा. राष्ट्रपति शमून की इस प्रो-वेस्ट पॉलिसी ने लेबनन में अशांति बनाई. वहां ईसाई और मुस्लिम आमने-सामने आ गए. शमून के खिलाफ पहले से ही असंतोष था. इसमें घी डाला अमेरिका से उनके लिए आई मदद ने. बग़ावत छिड़ गई. जिन शमून की सरकार बचाने आई थी अमेरिकी सेना, उनके हाथ से सत्ता निकल गई.
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लाल घेरे में लेबनन (फोटो स्क्रीनशॉट: गूगल मैप्स)

क्या हालात सामान्य हुए? लेबनन का ये संकट तो रुक तो गया. मगर हालात सामान्य नहीं रहे. 1967 में अरब-इज़रायल के बीच सिक्स-डे वॉर हुआ. इसमें इज़रायल की जीत हुई. इज़रायल की जीत ने मिडिल-ईस्ट का नक्शा बदल दिया. गाज़ा स्ट्रिप, वेस्ट बैंक, सिनाई पेनिसुला, पूर्वी जेरुसलेम और गोलन हाइट्स, ये सारे हिस्से इज़रायल के पास चले गए. अरब देशों में बहुत नाराज़गी थी. चूंकि इज़रायल से सटा हुआ था लेबनन, तो ये जगह भी इज़रायल विरोधी गतिविधियों का गढ़ बन गई. इज़रायल को मिटाने पर तुले फिलिस्तीनी लड़ाके लेबनन में रहकर ऐक्टिविटी करते. इससे इज़रायल को ऐतराज़ था. वो चाहता था, लेबनन सरकार इसे कंट्रोल करे. मगर ऐसा हुआ नहीं. ऐसे में इज़रायल ने अपने हाथ में ली चीजें. उसने लेबनन के फिलिस्तीनी गढ़ वाले इलाकों को निशाना बनाया. इससे दबाव में आई लेबनन सरकार ने भी फिलिस्तीनी कमांडोज़ पर सख़्ती लगाने की कोशिश की. और इस कोशिश में ये दोनों भी लड़ पड़े. ये उठापटक आने वाले दिनों में और बड़ा कलह पैदा करने वाली थी.
क्या था ये कलह? इसका बैकग्राउंड था कम्यूनल टेंशन. लेबनन में कई धर्मों के लोग थे. ईसाई भी. मुस्लिम भी. मुस्लिमों के बीच शिया भी और सुन्नी भी. इन सबमें करार हुआ. तय हुआ कि राष्ट्रपति होगा ईसाई. प्रधानमंत्री होगा सुन्नी. संसद का स्पीकर होगा शिया मुसलमान. मगर इस सिस्टम में ईसाइयों के पास बढ़त थी. मुसलमान इससे नाखुश थे. सबसे ज़्यादा नाख़ुश थे शिया. क्योंकि उनको लगता था कि वो बचा-खुचा हिस्सा पा रहे हैं.
...और फिर शुरू हुआ सिविल वॉर इसी पोलराइज़ेशन के माहौल में शुरू हुआ सिविल वॉर. तारीख़- 13 अप्रैल, 1975. स्थितियां और बदतर हुई मार्च 1978 में. तब, जब इज़रायल ने लेबनन पर अटैक कर दिया. इज़रायल के निशाने पर था फिलिस्तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन. शॉर्ट में, PLO.
Palestine Liberation Organization
फिलिस्तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन के लड़ाके (फोटो: एएफपी)

ईरान ने क्या एक्सपोर्ट किया? इस मार-धाड़ के बीच दुर्गति तब और बढ़ी, जब यहां शिया-सुन्नी का झगड़ा घुस गया. कौन था इस झगड़े का आर्किटेक्ट? ये आर्किटेक्ट था ईरान. वो ईरान, जिसने एक सफल क्रांति के रास्ते साल 1979 में ख़ुद को एक इस्लामिक देश बना लिया था. ईरान कहता था, वो शिया मुसलमानों का रहनुमा है. ईरान के शिया कट्टरपंथी बस ईरान पाकर संतुष्ट नहीं थे. उन्हें अपना रेवॉल्यूशन अरब के बाकी हिस्सों में निर्यात करना था. इसके लिए उन्हें सिविल-वॉर में उलझे लेबनन के अंदर दिखी उपजाऊ ज़मीन. वहां शिया मुसलमानों के शोषण को हथियार बनाकर उन्होंने खड़ा किया हिज़बुल्लाह. वो आतंकी संगठन, जिसे ईरान का सबसे कामयाब एक्सपोर्ट बताते हैं.
पोस्ट सिविल वॉर 1975 में शुरू हुआ ये गृह युद्ध 15 साल चला. एक लाख से ज़्यादा लोगों की मौत के बाद ये ख़त्म हुआ नवंबर 1990 में. तब, जब शिया संगठनों ने लड़ाई ख़त्म करने के समझौते पर दस्तख़त किए. लेकिन क्या सिविल-वॉर ख़त्म होने के बाद लेबनन में शांति आई? जवाब है, नहीं. इस अशांति की कुछ बड़ी वजहें जान लीजिए-
1. हिज़बुल्लाह और इज़रायल का झगड़ा 2. सीरिया जैसी विदेशी ताकतों की दखलंदाज़ी 3. राजनैतिक अस्थिरता
इज़रायल को पीछे हटना पड़ा हिज़बुल्लाह और इज़रायल, दोनों एक-दूसरे को ख़त्म करना चाहते थे. इसके अलावा हिज़बुल्लाह की एक बड़ी कोशिश थी कि इज़रायल अपनी सेना लेबनन से हटा ले. इस मामले में बड़ा पॉइंट आया 1999 में. क्या हुआ इस बरस? इस साल इज़रायल के प्रधानमंत्री एहुद बराक ने किया ऐलान. कहा, एक साल के भीतर हम अपनी आर्मी को लेबनन से निकाल लाएंगे. ऐलान के मुताबिक ही मई 2000 तक लेबनन से इज़रायल की रुखसती भी हो गई. ये हिज़बुल्लाह और उसके पीछे खड़े ईरान की बड़ी जीत थी.
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हिज़बुल्लाह का मकसद था कि इज़रायल अपनी सेना लेबनन से हटाए. (फोटो: एएफपी)

अब आते हैं सीरिया पर सीरिया ने भी अपनी सेना बिठा रखी थी यहां. वो लगातार लेबनन की पॉलिटिक्स में दखलंदाज़ी कर रहा था. इसकी वजह से लेबनन में राजनैतिक अस्थिरता बनी हुई थी. सीरिया का सपोर्टर था हिज़बुल्लाह. इन दोनों ने मिलकर फरवरी 2005 में पूर्व प्रधानमंत्री और सीरिया-विरोधी गुट के नेता रफ़ीक हरीरी की हत्या करवा दी. जिस कार बॉम्बिंग में हरीरी की हत्या हुई, उसमें 21 और लोग भी मारे गए. सीरिया ने हत्या करवाई, ताकि विरोधी गुट का सबसे बड़ा चेहरा रास्ते से निकल जाए. मगर इस हत्या ने लेबनन में ऐंटी-सीरिया सेंटिमेंट सुलगा दिया. मई 2005 में संसदीय चुनाव हुए और ऐंटी-सीरिया गठबंधन सत्ता में आ गया.
एक प्रॉब्लम थोड़े न है यहां... मगर ये लेबनन की राजनैतिक अस्थिरता का अंत नहीं था. सरकारें बदलती रहीं. कलह चलता रहा. कभी कहीं धमाका. कभी कहीं कार विस्फ़ोट. सांप्रदायिक हिंसा. सीरियन सिविल वॉर का असर. असद-विरोधी गुट की हेज़बुल्लाह से लड़ाई. सीरियन युद्ध से जान बचाकर लेबनन भाग आए लाखों शरणार्थी. सऊदी और ईरान का प्रॉक्सी वॉर. मिलिशिया ग्रुप्स. आतंकवाद. चरमपंथ. लेबनन के माथे आई आफ़तों की लिस्ट बहुत लंबी है.
ये सारी बातें हम आज क्यों बता रहे हैं? इसलिए बता रहे हैं कि लेबनन में पिछले कुछ महीनों से जनता विरोध में उतरी हुई है. ये विरोध कमोबेश रोज़ ही सुर्खियां बना रहा है. क्या है इस विरोध का बैकग्राउंड? इसका कारण है, ख़राब इकॉनमी. जो कि अभी लेबनन का सबसे बड़ा संकट है. सोचिए, आपके घर में लगा नल पानी नहीं देता. घंटों-घंटों बिजली नहीं आती. 50 पर्सेंट से ज़्यादा युवा आबादी बेरोज़गार है. मुद्रा की वैल्यू लुढ़कती ही जा रही है. समझिए कि अगर आपको वहां की मुद्रा में 10 लाख महीने का वेतन मिल रहा है, तो उसकी कीमत होगी बमुश्किल 15 हज़ार रुपये. महंगाई इतनी ज़्यादा है कि मुट्ठीभर मछली खरीदने के लिए आपको 5,000 लेबनीज़ पाउंड ख़र्च करने होंगे.
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लेबनन के लोग सरकार के खिलाफ जमकर प्रदर्शन कर रहे हैं. (फोटो: एपी)

नौ महीने... लोगों के फ्ऱिज खाली हैं. जेबें खाली हैं. बच्चों के लिए दूध तक खरीदना मुश्किल है. देश पर कुल कर्ज़ टोटल GDP से 150 पर्सेंट ज़्यादा हो गया है. सबसे कमज़ोर अर्थव्यवस्था वाले देशों में आख़िरी, यानी वेनेजुएला से बस एक पायदान ऊपर हैं आपका देश. नेता-मिनिस्टर मज़े में है. अय्याशी करते हैं. और आपको इतनी नागरिक सुविधाएं भी नहीं मिलतीं कि कोई कूड़े वाली गाड़ी आपके मुहल्ले से कचरा बटोरकर ले जाए. पॉलिटिकल सिस्टम फेल. इकॉनमी फेल. ऐसे में जनता क्या करेगी? वो सड़कों पर उतर आएगी. यही हो रहा है लेबनन में. पिछले नौ महीने से लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं.
क्यों शुरू हुआ प्रोटेस्ट? ये प्रोटेस्ट शुरू हुआ 17 अक्टूबर, 2019 से. विरोध का तात्कालिक कारण बना एक टैक्स. हुआ ये कि सरकार ने वॉट्सऐप इस्तेमाल पर टैक्स लगा दिया. इस टैक्स ने बरसों से दबे गुस्से में तीली लगा दी. जैसे, मवाद से भरा घाव होता है. जो एक दिन पकते-पकते इतना पक जाता है कि ख़ुद फूटकर बहने लगता है. वैसा ही हुआ लेबनन की पब्लिक के साथ. शुरुआत हुई राजधानी बेरूत से. यहां दर्ज़नों लोग सड़क पर उतर गए. दिलचस्प बात ये थी कि इस भीड़ का कोई सांप्रदायिक चरित्र नहीं था. इसमें कई धर्मों और संप्रदायों के लोग थे. बेरूत से शुरू हुआ प्रोटेस्ट लेबनन के अलग-अलग हिस्सों में फैल गया. यहां तक कि हिज़बुल्लाह के गढ़ वाले जो इलाके हैं, जहां जनता हमेशा डरी-सहमी रहती है, वहां भी लोग बाहर निकल आए. प्रोटेस्ट शुरू होने के 12 दिन बाद, 29 अक्टूबर को प्रधानमंत्री साद हरीरी को इस्तीफ़ा देना पड़ा. जनवरी में हिज़बुल्लाह के समर्थन से नई सरकार आई. नए प्रधानमंत्री बने हसन दिआब.
सरकार बदलने से हालात बदले क्या? जवाब है, नहीं. इस राजनैतिक बदलाव से भी लोग संतुष्ट नहीं हुए. उनका आरोप है कि नई सरकार भी इकॉनमी सुधारने में बेअसर रही है. लेबनन में पिछले नौ महीनों के भीतर करंसी वैल्यू में करीब 70% गिरावट आई है. वो ज़रूरी चीजों के लिए आयात पर निर्भर है. करंसी की वैल्यू गिरी, तो आयात प्रभावित हुआ. ज़रूरी सामान की कमी हो गई और जो सामान मिल रहा था, वो भी बहुत महंगा. इकॉनमी इतनी पस्त हो गई कि मार्च 2020 में विदेशी कर्ज़ की किस्त तक नहीं भर सका लेबनन. आंकड़ों के मुताबिक, अभी जो हालत है उसके हिसाब से लेबनन की करीब 70 फीसद आबादी गरीबी रेखा के नीचे चली जाएगी. ऐसे में केवल राजनैतिक बदलाव लोगों के गुस्से को ख़त्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है. उन्होंने पहले भी कई सरकारों को आते-जाते देखा है.
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प्रधानमंत्री हसन दिआब (फोटो: एपी)

हम भूखे हैं, हम भूखे हैं... यही वजह है कि लोग अब भी प्रोटेस्ट कर रहे हैं. रात होते ही जैसे लेबनन के शहर युद्ध के मैदान में तब्दील हो जाते हैं. गरीब इलाकों में सबसे ज़्यादा तेज़ हैं विरोध प्रदर्शन. प्रोटेस्टर्स कह रहे हैं कि ये आम लोगों के सर्वाइवल की जंग है. वो सुरक्षाबलों से भिड़ रहे हैं. ज़ोर-आज़माइश के विरोध दबाने की सरकारी कोशिश लोगों को और नाराज़ कर रही है. प्रदर्शनकारी 'मालिक, तुम चोर हो' और 'हम भूखे हैं, हम भूखे हैं' जैसे नारे लगा रहे हैं.
बैंकों पर क्यों उतर रहा है लोगों का गुस्सा? लोगों के गुस्से का सबसे ज़्यादा शिकार हो रहे हैं बैंक. भीड़ पेट्रोल बम फेंककर बैंकों में आग लगा रही है. इसलिए कि ये बैंक उनकी पस्त इकॉनमी के सबसे चुभने वाले प्रतीक हैं. आर्थिक संकट के कारण लोग बैंकों में जमा अपना पैसा नहीं निकाल पा रहे हैं. मगर बैंकों से नाराज़गी की ये इकलौती वजह नहीं है. जनता इन बैंकों को आर्थिक संकट का एक बड़ा कारण मानती है. बरसों से लोग बैंकों में पैसा जमा करते थे. ये बैंक ब्याज़ की ऊंची दरों पर सरकार को लोन देते थे. सरकार साबित हुई बैड इन्वेस्टमेंट. करप्शन और अव्यवहारिक योजनाओं के कारण बैंकों का पैसा डूब गया. बैंकों का पैसा डूबा, माने लोगों के जमा किए पैसे भी निकल गए.
लेबनन की जनता का ये कलेक्टिव गुस्सा बस बैंकों या इकॉनमी तक सीमित नहीं है. लोग समूचे बदलाव की मांग कर रहे हैं. भ्रष्टाचार ख़त्म हो. सिविल सोसायटी बने. झगड़ा-कलह बंद हो. सरोकार वाली सरकार आए. राजनैतिक स्थिरता आए. अगर आप दशकों से अराजकता और हिंसा झेल रहे नागरिकों के गुस्से की सोचें. आंख बंद करके ख़ुद को उनकी जगह रखकर देखें. तो आपको समझ आएगा कि लेबनन की जनता किस कदर फ्रस्ट्रेट है.


विडियो: नॉर्थ कोरिया और साउथ कोरिया में इतनी तगड़ी दुश्मनी क्यों है?

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