The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Lal Krishna Advani get emotional on the day india nuclear test 1998

भारत ने परमाणु परीक्षण किया, तो उस दिन लालकृष्ण आडवाणी क्यों रो रहे थे?

ये अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की उस दोस्ती में आई 'दरार’ की कहानी है, जिसे भारतीय राजनीति की सबसे सफल और अटूट सियासी जुगलबंदियों में से एक माना जाता था.

Advertisement
pic
7 फ़रवरी 2026 (अपडेटेड: 9 फ़रवरी 2026, 05:50 PM IST)
Lalkrishna advani, pokhran, india nuclear test
न्यूक्लियर टेस्ट वाले दिन रो पड़े थे लाल कृष्ण आडवाणी. (ITG)
Quick AI Highlights
Click here to view more

भारत ने जिस दिन पोखरण में परमाणु परीक्षण कर पूरी दुनिया को चौंका दिया था, उस दिन लालकृष्ण आडवाणी उतने खुश नहीं थे, जितना ऐसा करने वाली सरकार का गृहमंत्री होने के नाते उन्हें होना चाहिए था. वह अपने दफ्तर में अकेले बैठे थे. भावुक थे और शायद रो रहे थे. रेगिस्तान की तपती रेत के बीच एक धमाके ने पूरी दुनिया को तो हिला ही दिया था लेकिन उसी धमाके की गूंज ने नई दिल्ली में सत्ता के गलियारों में दो दोस्तों के बीच खामोशी से एक ‘दीवार’ भी खड़ी कर दी थी, जिसे उस समय कोई नहीं देख पा रहा था. 

ये तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की उस ‘दोस्ती में आई दरार’ की कहानी है, जिसे भारतीय राजनीति की सबसे सफल और अटूट सियासी जुगलबंदियों में से एक माना जाता था और ये कहानी वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने ‘दी लल्लनटॉप’ को दिए अपने खास इंटरव्यू में सुनाई है.

भारत का परमाणु परीक्षण 

वो 11 मई 1998 की दोपहर थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐलान किया कि भारत ने परमाणु परीक्षण कर लिया है. पूरी दुनिया सन्न थी. अमेरिका से लेकर चीन तक हड़कंप मच गया, लेकिन इस सबसे बड़ी खबर के पीछे एक और 'अदृश्य' घटना घटी, जिसके बारे में कम ही लोग जान पाए. 

n
परमाणु परीक्षण के बाद वैज्ञानिकों के साथ प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी

नीरजा चौधरी बताती हैं कि उस दिन जब सारा देश जश्न में डूबा था, तब सत्ता के दूसरे सबसे ताकतवर नेता केंद्रीय गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के दफ्तर (नॉर्थ ब्लॉक) में खामोशी पसरी थी. आडवाणी अपने दफ्तर में अकेले थे और काफी भावुक भी थे. नीरजा चौधरी ने कहा, 

मुझे याद है कि हम वहां अटल बिहारी वाजपेयी को सुनने गए थे. लेकिन उन्होंने बस परमाणु परीक्षण का अनाउंसमेंट किया और फिर अंदर चले गए. कुछ और नहीं बोला. इसके बाद हम सोच रहे थे कि अब कहां जाया जाए? स्टोरी कहां से मिलेगी? तो हमने सोचा कि नॉर्थ ब्लॉक में लालकृष्ण आडवाणी के यहां चलते हैं. हो सकता है हमें कुछ और पता चले. 

उन्होंने आगे बताया,

मैं नॉर्थ ब्लॉक गई और हैरान रह गई. मैंने सोचा था कि वहां सैकड़ों लोग होंगे. क्योंकि पार्टी के लिए इतना बड़ा दिन है. इतने सालों से पार्टी की यही इच्छा रही है लेकिन मैंने गृहमंत्री के दफ्तर में आडवाणी को एकदम अकेला पाया. उनके पास कोई नहीं था. वह हमसे ‘ऑफ द रिकॉर्ड मिलने’ के लिए तैयार हो गए.

नीरजा चौधरी बताती हैं कि उस दिन आडवाणी की आंखों में बार-बार आंसू आ जाते थे. वो लगातार बीते दिनों की बातें कर रहे थे कि कैसे हम सब (अटल-आडवाणी) साथ थे. हम लोग जब चुनाव हारते थे तो कैसे बंगाली मार्केट जाकर चाट खाते थे. या कोई फिल्म देखने चले जाते थे. उस दिन ऐसा लगा कि कहीं न कहीं आडवाणी इस बात से बहुत आहत थे कि उन्हें नंबर दो सहयोगी या सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी होने के बावजूद परमाणु परीक्षण को लेकर पूरी तरह से विश्वास में नहीं लिया गया. वहीं बृजेश मिश्रा जो एक ब्यूरोक्रेट थे, लेकिन वाजपेयी के बेहद करीबी हो गए थे, उन्हें सब कुछ पहले से पता था.

ो
अटल-आडवाणी की जुगलबंदी मशहूर थी (india today)

किसको-किसको पता थी ये बात?

वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण की बात को जितनी ज्यादा गोपनीयता दी जा सकती थी दे रखी थी. नीरजा चौधरी के मुताबिक, वैज्ञानिकों को तो इस बारे में पता था ही. इसके अलावा भारतीय सेना के प्रमुखों को पहले बुलाकर परीक्षण के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई थी. तत्कालीन वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा को भी अलग से बुलाकर ब्रीफ किया गया था लेकिन आडवाणी को इसकी जानकारी तब मिली, जब और बहुत से नेताओं को इस बारे में बताया गया. जॉर्ज फर्नांडिस उस समय देश के रक्षामंत्री थे. कहते हैं कि उन्हें भी परीक्षण के बारे में पहले से नहीं पता था. हालांकि, ब्रजेश मिश्रा को सब पता था, जो उस समय वाजपेयी के बहुत खास और उनके प्रमुख सचिव थे. 

नीरजा चौधरी के अनुसार, वाजपेयी ने परमाणु परीक्षणों के बाद पैदा हुए अंतरराष्ट्रीय नतीजों को बहुत कुशलता से संभाला. अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन बहुत नाराज हुए थे लेकिन इसके दो साल बाद बिल क्लिंटन भारत आए तो संसद में जो दृश्य था, वह देखने लायक था. तकरीबन 300 सांसद उन तक पहुंचने के लिए एक-दूसरे पर गिरे जा रहे थे. तब किसी ने मजाक में कहा था कि अब ये लोग दो दिन तक हाथ नहीं धोएंगे. 

नीरजा ने आगे कहा कि उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भारत आना एक बड़ा मील का पत्थर था. परमाणु परीक्षण का दुनिया पर जो असर पड़ा, उसे तो वाजपेयी ने संभाल लिया लेकिन पार्टी के भीतर जो हुआ, उसे वो नहीं संभाल पाए. लालकृष्ण आडवाणी के साथ उनका रिश्ता फिर कभी वैसा नहीं रहा, जैसा पहले था.

वीडियो: गेस्ट इन द न्यूजरूम: अटल बिहारी वाजपेयी क्यों बनाना चाहते थे अलग पार्टी? पत्रकार नीरजा चौधरी ने सब बताया

Advertisement

Advertisement

()