उज्जैन में एक गांव पड़ता है लूणियाखेड़ी. मालवा में लूण कहते हैं नमक को और खेड़ीमतलब गांव. यहां एक लड़का था. घर से बेहद गरीब. पढ़ाई-लिखाई के लिए इंदौर चला गया.अपने नाना के घर. पूरी पढ़ाई वहीं की. मन था कि बड़ा होकर डॉक्टर बनेगा. 12 की पढ़ाईकी. इसके बाद बीएससी (बायो) में एडमिशन ले लिया. सोचा कि बीएससी के साथ-साथ तैयारीभी करते रहेंगे. इस बीच शिक्षा विभाग में टीचर की नौकरी मिल गई. दलित समुदाय से आनेवाले इस नौजवान के लिए अवसर बेहद सिमित थे. लिहाजा जो मिला स्वीकार कर लिया. बीएससीके पहले साल ही नौकरी लग गई. आगे की पढ़ाई की नहीं. पोस्टिंग मिली उज्जैन केकाठबड़ोदा गांव की मिडिल स्कूल में. उज्जैन और देवास जिले की सीमा का गांव. स्कूल केबगल में ही एक गांव पड़ता था, गोरखेड़ी. किसी दौर में कुमार गंधर्व इस गांव में रहेथे ताकि लोक पम्परा के कबीर को समझ सकें. इसी गांव में एक जागरण था. नौजवान टीचर कोभी न्यौता मिला. वो जागरण में गया. मीरा और कबीर के भजन सुने. भजन से ज्यादा एक साजने नौजवान टीचर का मन मोह लिया. वहां के कलाकारों से पूछा तो पता लगा कि एक साज केकई नाम हैं, कोई बीणों कहता है, कोई शारदा और कोई तंबूर. तंबूर दिखने में काफी बड़ाहोता है लेकिन वजन में बेहद हल्का. टीचर ने दम लगाकर तंबूर को उठाया और खुद परहंसने लगा. टीचर ने तंबूर सीखने की इच्छा जताई. कलाकारों ने कहा कि बजाने केसाथ-साथ गाओ भी, जल्द सीखोगे. मालवी का एक भजन लिखकर दिया. बोल थे-"खेती करूं तो थाने समझ बताऊं रे, बळद्या ने दुख मत दीजे. औसर खेत बीज मत बोजे, घरेही बैठो रीजे. मन तूं ऐसी खेती कीजे...."इससे पहले नौजवान के लिए कबीर का मतलब 10 नंबर तक सीमित था. परीक्षा में कबीर काकोई पद सप्रसंग व्याख्या के लिए जरूर आया करता था. लिहाजा नौजवान इसे याद कर लियाकरता था. अब तंबूर सीखने के लिए कबीर का भजन गा रहा था. इसी भजन में एक लाइन है-"रोड़ा को फूल थाने लागे सुहावणों सिर साट मत लीजे. मन तूं ऐसी खेती कीजै."मालवा में सेमल को रोड़ा कहा जाता है. गांव में नौजवान टीचर एक बार दिशा-मैदान केलिए गया. सामने सेमल का पेड़ था. टीचर ने देखा कि एक पक्षी उड़ता हुआ वहां आया. उसनेसेमल के फूल में जैसे ही चोंच मारी फूल टूटकर नीचे गिर गया. टीचर को तुरंत भजन कीयाद आ गई. पहली बार यह लगा कि भजन में कही गई बातों में सच्चाई है. यहां से कबीर केप्रति रुझान पैदा हुआ. धीरे-धीरे हाथ से कलम छूट गई. तंबूरा हाथ में आ गया. जगह-जगहजाकर गाने लगे. कबीर के पंथ से भी जुड़ाव हो गया. देखते ही देखते नौजवान पूरे इलाकेमें मशहूर हो गया. नौजवान का नाम है, प्रह्लाद टिपानिया. पद्म श्री से सम्मानितटिपानिया आज भी लोक परम्परा के कबीर को जानने का सबसे विश्वसनीय सूत्र हैं. उनका यहभजन सुनिए-देवास से उम्मीदवारी क्यों देवास की सीट 2007 के परिसीमन के बाद बनी है. दलितसमुदाय के लिए सुरक्षित इस सीट से 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सज्जनवर्मा चुनाव जीत चुके हैं. 2014 में यहां से बीजेपी के मनोहर उतवाल को जीत हासिलहुई थी. इस सीट पर दलित समाज के वोट निर्णायक भूमिका में हैं. प्रह्लाद टिपानियाइसी समुदाय से आते हैं. देवास लोकसभा में कुल आठ विधानसभा सीटें हैं. आठों विधानसभासीटों में कबीर पंथ के अच्छे-खासे अनुयायी हैं. प्रह्लाद टिपानिया अपने गांवलूणियाखेड़ी में बने कबीर आश्रम के महंथ हैं. पूरे इलाके में उनकी लोकप्रियतारॉकस्टार जैसी है. वो देवास में कांग्रेस की टिकट के सबसे मजबूत दावेदार थे.--------------------------------------------------------------------------------वीडियो- सीतामढ़ी के एनडीए के इस उम्मीदवार ने नीतीश कुमार को अपना टिकट लौटा दियाहै