यूपी के इन चार शहरों की होली ना देखी, तो फिर क्या देखा
होली का ऐसा सेलिब्रेशन की दुनियाभर से लोग यहां खिंचे चले आते हैं

देश के अलग-अलग हिस्सों में होली मनाने के अलग-अलग अंदाज हैं, इनसे जुड़ी कहानियां-किस्से हैं. जूतम-पैजार होती है, कहीं होली में रामलीला होती है, तो कहीं आठ दिन होली खत्म ही नहीं होती. कहीं होली में मस्जिदों को ढक दिया जाता है, तो कहीं दरगाह में होली खेली जाती है.
#कानपुर में आठ दिन तक होली क्यों खेलते हैं?कानपुर में एक जगह है हटिया बाजार. अंग्रेजी हुकूमत के दौर में ये कारोबार का केंद्र होता था. हटिया के गुलाबचंद सेठ उस वक्त के बड़े व्यापारी हुआ करते थे. उन्होंने हर साल की तरह साल 1942 में भी होली पर विशाल आयोजन करवाया. होरियारे होली खेल ही रहे थे कि अंग्रेज आए और होली खेल रहे होरियारों को आयोजन बंद करने को कहा. उन्होंने आयोजन बंद करने से इंकार कर दिया. तो अंग्रेजों ने गुलाबचंद सेठ को गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तारी का विरोध करने पर कुछ और लोग भी अरेस्ट हो गए.

ये बात कानपुर में आग की तरह फैल गई. गिरफ्तारियों को लेकर जन आक्रोश भड़क उठा फिर एक अलबेले आंदोलन ने जन्म लिया. गिरफ्तारी के विरोध में पूरे कानपुर में जमकर होली खेली गई, होली के दिन ही नहीं हफ्ते भर होली खेली गई. हफ्तेभर होली खेलने के चलते न दुकानें खुली ने मिलों में लेबर पहुंचे. रोकने की तमाम कोशिशें हुईं, मगर सब बेकार. चूंकि उस वक्त कानपुर अंग्रेजों के कारोबार का बड़ा केंद्र होता था, तो विरोध के चलते अंग्रेजों को भारी नुकसान हो रहा था. बात इंग्लैंड में बैठे अंग्रेजी हुकूमत की सिरमौर रानी विक्टोरिया तक पहुंची, उन्होंने कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया. आठ दिन बाद अनुराधा नक्षत्र यानी गंगा मेला के दिन सारे कैदियों को रिहा किया गया. तब से ही ये दिन कानपुरियों के लिए त्योहार का दिन हो गया.
#शाहजहांपुर की जूतम पैजार होलीकरीब 70 साल पुरानी इस परंपरा का किस्सा भी अंग्रेजों से जुड़ा है. होली के पांच दिन पहले ही शाहजहांपुर की मस्जिदों को तिरपाल से ढक दिया जाता है. ढकने का कारण लाजमी है, ताकी मस्जिद की दीवारें रंग से खराब न हों. इस दौरान पूरे शाहजहांपुर में जुलूस निकलता है. लाट साहब का. लाट साहब कौन है? अंग्रेजों के सबसे बड़े अफसर के नाम के आगे लॉर्ड लिखा जाता था, देसी भाषा में या फूटही अंग्रेजी में लोग उन्हें लाट साहब कहते थे.

शाहजहांपुर के जुलूस में किसी शख्स को लाट साहब बना कर भैंसा गाड़ी या गधे पर बैठाया जाता है. लाट साहब को जमकर शराब पिलाई जाती है और फिर उसे काले रंग से रंग कर, जूते की माला पहनाई जाती है. प्रतीक के तौर पर जूते और झाड़ू मारते हुए लाट साहब के जुलूस को पूरे शहर में घुमाया जाता है.
#देवा शरीफ दरगाह की होलीहाजी वारिस अली शाह एक बात कहते थे 'जो रब है वो ही राम'. मगर कुछ लोग होली को एक धर्म विशेष का जामा पहना देते हैं. मगर हर जगह ऐसा नहीं है, बाराबंकी स्थित देवा शरीफ की दरगाह पर मनाई जाने वाली होली देख लीजिए. इस दिन यहां देश के हर कोने से ही नहीं बल्कि पाकिस्तान से भी लोग होली मनाने के लिए जुटते हैं. हाजी वारिस अली शाह की दरगाह पर होली गंगा जमुनी तहजीब के साथ आपसी भाई चारे की एक बड़ी मिसाल पेश करती है. करीब पिछले सौ साल से ज्यादा समय से यहां होली के दिन रंग गुलाल खेलने की परंपरा चली आ रही है. संत वारिस अली शाह अपने हिंदू शिष्यों के साथ यहां होली के दिन होली खेल कर सूफी परंपरा का इजहार किया करते थे. तभी से ये परंपरा चली आ रही है.

बरेली में साल 1861 से यानी 162 साल से होली पर रामलीला की परंपरा चली आ रही है. कहानी पर आते हैं. अंग्रेजों से बगावत चल रही थी. मुकाबले के लिए बरेली के लोगों ने श्रीराम सेना बनाई. बाद में बड़ी बमनपुरी इलाके में रामलीला का मंचन शुरू हुआ. अंग्रेजों ने रामलीला को रोकने के कई प्रयास किए मगर सफल नहीं हो पाए. तभी से ये रामलीला वाली परंपरा लगातार चली आ रही है. फाल्गुन पूर्णिमा (छोटी होली) के दिन राम बारात की झांकी निकाली जाती है. इस झांकी में सैकड़ों ट्रालियों में ड्रम रखे जाते हैं और उन ड्रमों में रंग.

इन ट्रालियों पर हजारों हुरियारे होते हैं, जो एक-दूसरे पर पिचकारियों से मघ्घों से रंग उड़ेलते हैं. रंगों की बौछार करते हैं. मुस्लिम समुदाय के लोग भी फूलों से राम बारात का स्वागत करते हैं. बारात में रंग और पानी की व्यवस्था की जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होती है. साल 2008 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) ने इस रामलीला को वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया था.
वीडियो: UP चुनाव: बाराबंकी के देवा शरीफ की होली में ऐसा क्या होता है कि पाकिस्तान से लोग खेलने चले आए?

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