अरुण तिवारीअरुण तिवारी, पर्यावरण संबंधी कार्यों से जुड़े हुए हैं. उन्होंने राष्ट्रीय जलबिरादरी एवं गंगा जल बिरादरी में लंबे समय तक संयोजन के उत्तरदायित्व को निभाया था.उन्होंने जल साक्षरता, जल नीति, जल निजीकरण, नदी जोड़, नदी नीति, मतदाता जागरुकता,पंचपरमेश्वर जागृति तथा गंगा-यमुना-गोमती-हिंडन-मंदाकिनी व सई नदी संबंधी कईमहत्वपूर्ण अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. ‘गंगा प्रहरी सम्मान’ (1996),‘गंगा सम्मान’ (2009) एवं ‘तरुण भारत पर्यावरण रक्षण सम्मान’ (2013) आदि सेपुरुस्कृत हो चुके अरुण वर्तमान में ‘इंडिया वाटर पोर्टल (हिंदी)’ में सलाहकार और‘पानी पोस्ट’ नामक वेब पत्रिका के संपादक हैं. पर्यावरण सरोकारों को लेकर ‘प्रकृतिके समय लेख’ उनकी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक है. आज गांधी जी की पुण्य तिथि के अवसर परप्रस्तुत है उनका लेख – कितना व्यावहारिक गांधी मार्ग?--------------------------------------------------------------------------------कितना व्यावहारिक गांधी मार्ग?कहने को 21वीं सदी, नई तकनीकी की युवा सदी है; एक ऐसी सदी, जब सारी दुनिया डिजीटलघोड़ों पर सवारी करने को उत्सुक है. सारी तरक्की, ई-मानदण्डों की ओर निहारती ओर नजरआ रही है. ई-शिक्षा, ई-चिकित्सा, ई-व्यापार, ई-निगरानी, ई-सुरक्षा और यहां तक किविचार, प्रचार और संवाद भी ‘ई’ ही! - यह एक चित्र है.दूसरा चित्र - तपती धरती और नतीजे में मिटती प्रजातियों और बढ़ते बीमारों की एक बेबससदी का है. 21वीं सदी को आप अलगाव, आतंक, औजार के अलावा हमारे आचार-विचार पर आर्थिकहोड़ के दुष्प्रभाव की एक ऐसी सदी भी कह सकते हैं, जिसमें हमें यह देखने तक कीफुर्सत तक नहीं है कि इस सदी का सवार बनकर हमने खोया क्या और पाया क्या? इस 21वींसदी की भारतीय चुनौतियां विविध हैं: घटती समरसता, घटती सहिष्णुता, बढ़ता भोग, बढ़तालोभ, बढ़ते तनाव, बढ़ती राजतांत्रिक मानसिकता, बढ़ता आतंकवाद-नक्सलवाद और आर्थिकउदारवाद का नकाब पहनकर घुसपैठ कर चुका नव-साम्राज्यवाद!!पूज्य बापू की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि. Remembering Bapu on his PunyaTithi.— Narendra Modi (@narendramodi) January 30, 2018विकास और विनाश के बीच की धूमिल होती अंतर रेखा; अमीर और गरीब... दोनों की संख्यामें बढोतरी का भारतीय विरोधाभास; कमजोर पड़ती लोकनीति; हावी होती राजनीति, चेतावनीदेती जलवायु तथा पानी, पर्यावरण, परिवेश, समय, संस्कार. सब पर हावी होता अर्थतंत्र.इतनी सारी चुनौतियों के बीच 2020 तक भारत को दुनिया की महाशक्ति के रूप में देखनेका एक पुराना दावा 21वीं सदी के इस दूसरे दशक का सबसे बड़ा झूठ सिद्ध होता दिखाई देरहा है; खासकर यदि अस्मिता के भारतीय निशानों को बचाये रखते हुए इस दावे को पूराकरना हो.Nation remembers #MahatmaGandhion his 70th death anniversary#ITVideoMore videos: https://t.co/NounxnP7mgpic.twitter.com/2CR4ChvIMc— India Today (@IndiaToday) January 30, 2018जो अपने पास है, उसी में जीवन-यापन की स्वावलंबी जीवन शैली, जड़ी-बूटी, ध्यान,व्यायाम आधारित स्वावलंबी चिकित्सा पद्धति, प्राणी मात्र के कल्याण को धर्म माननेवाला भारतीय अध्यात्म, 'वसुधैव कुटुंबकम' का भारतीय समाजशास़्त्र, समग्र विकास कीभारतीय अवधारणा और सदियों के अनुभवों पर जांचा-परखा भारतीय ज्ञानतंत्र - जब-जब भारतसमग्र समृद्धि का प्रतीक राष्ट्र बनकर उभरा, इसकी नींव में मूल धाराएं यही थीं.इन्हीं ने मिलकर भारतीय अस्मिता के निशानों का निर्माण किया. क्या ये धाराएं आजकमजोर नहीं हुई हैं? गंगा-जमुनी तहजीब और गंगा जैसे भारतीय अस्मिता के कई प्रखरनिशानों को क्या हमने आज खुद दांव पर नहीं लगा दिया है? गुरु-शिष्य, नारी-पुरुष,पिता-पुत्र, समाज-परिवार, प्रकृति और मानव... निजी तरक्की, भोग और लालच की दौड़ मेंक्या आज खुद हमने इन सभी रिश्तों को पिछवाड़े की खरपतवार नहीं समझ लिया है? यदि मैंयह कहूं कि हम में से कितने तो इन रिश्तों को विकास में बाधक तत्व की तरह देखतेहैं, तो अचंभा नहीं होना चाहिए. क्या नए तरह के आर्थिक विकास ने समग्र विकास के लिएजरूरी आधार-भूत संसाधनों की लूट के रवैये को नहीं अपना लिया? ये सभी विचारणीयप्रश्न हैं; विचारिए.On #MartyrsDaywe remember #MahatmaGandhi's message of #ahimsawhich has the power to bring about meaningful change. pic.twitter.com/GhnK8VBFhx— Congress (@INCIndia) January 30, 2018आज हम खुद अपनी शिक्षा प्रणाली से संतुष्ट नहीं हैं. बुनियादी शिक्षा से अनभिज्ञबढ़ती डिग्रियां एक ओर रोजगार के बुनियादी क्षेत्रों में मानव-शक्ति की कमी का कारणबन रही हैं, तो अन्य क्षेत्रों में कोचिंग की दुकान और बेरोजगारी... दोनों को बढ़ावादेने वाली साबित हो रही हैं. एक पीढ़ी-दूसरी पीढ़ी की संस्कारहीनता को कोस रही है.बूढे मां-बाप अपने ही बनाये घर से बाहर आशियाने की तलाश कर रहे हैं! विदेशी पूंजीकी तरफदारी में देश का शासन, शीर्षासन करता दिखाई दे रहा है. एक ओर, लोग पानी,प्रदूषण कुपोषण और भूख के कारण बीमार होकर मर रहे हैं, तो दूसरी ओर राष्ट्र,हथियारों के जखीरे के लिए बजट बढाने को विवश है. व्यवस्था व इसके संचालकों पर हमेंयकीन नहीं रहा. व्यवस्था परिवर्तन के लिए हम आंदोलनों की मांग कर रहे हैं. आचरण मेंगिरावट व्यापक है. भ्रष्टाचार से निजात का कोई उपचार सुझाए नहीं सूझ रहा. गांधी जीके नाम पर जी रही संस्थाओं में ही गांधी चिंतन के आत्मप्रयोग को प्रतिष्ठित करने कीलालसा नहीं रही; ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या गांधी मार्ग 21वीं सदीका मार्ग नहीं है? बुनियादी शिक्षा, कुटीर उद्योग, स्वावलंबी जीवन, बापू केरचनात्मक कार्यक्रम, ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम का सद्भाव संदेश, ग्राम-स्वराज,हिंद-स्वराज की अवधारणा, बापू के सपने का भारत, सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह और शांतिके बल पर दुनिया की सुरक्षा... क्या ये सभी विचार पुंज 21वीं सदी की चुनौतियों कासमाधान नहीं हैं? मेरा मानना है कि समाधान ये ही हैं.यदि ऐसा न होता, तो दुनिया की सर्वोच्च संस्था 'संयुक्त-राष्ट्र महासभा' भारत जैसेराष्ट्र के राष्ट्रपिता के जन्म दिवस को 'अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस' के रूप मेंप्रतिवर्ष मनाने का फैसला न लेती. गांधी मार्ग पर चलने वाले नेल्सन मंडेला, आर्मबिशप डेसमंड टुटु और आंग सां सू की जैसे लोगों को आधुनिक विश्व के सवोच्च सम्मानोंसे सम्मानित न किया जाता. गांधी टोपी वाले अन्ना के आंदोलन के ज्वार में आधुनिकयुवा एक नहीं होता.कोई कैसे नकार सकता है कि दलितों को अधिकार दिलाने के लिए बाबा साहेब अंबेडकर कासत्याग्रह, विनोबा का भूदान, जेपी की संपूर्ण क्रांति, महाराष्ट्र के महाद शहर कापानी सत्याग्रह, नासिक का धर्म सत्याग्रह, चिपको आंदोलन, टिहरी विरोध में सुंदरलालबहुगुणा का हिमालय बचाओ, मेधा का नर्मदा बचाओ, राजेन्द्र सिंह का यमुना सत्याग्रह,प्रो जी डी अग्रवाल और स्वामी निगमानंद के गंगा अनशन... गांधी मार्ग पर चलकर हीचेतना और चुनौती का पर्याय बन सके. भ्रूण हत्या को अपराध मानने जैसे कानून, पुलिसजैसे विभाग में मानवाधिकार आयोग के अधिकार, सूचना का अधिकार, मनरेगा, पेयजलसुरक्षा... जैसे तमाम कायदे-कानूनों के आधार गांधी मार्ग से भिन्न नहीं हैं.Remembering Father of the Nation on his 70th death anniversary #MahatmaGandhipic.twitter.com/A5BsREnAY2— Suresh Prabhu (@sureshpprabhu) January 30, 2018‘मेरी समझ में राजनीतिक सत्ता अपने आप में साध्य नहीं है. वह जीवन के प्रत्येकविभाग में लोगों के लिए अपनी हालत सुधारने का साधन है. राष्ट्रीय प्रतिनिधि यदिआत्मनियमन कर लें, तो फिर किसी प्रतिनिधित्व की आवश्यकता नहीं रह जाती. उस समयज्ञानपूर्ण अराजकता की स्थिति हो जाती है. ऐसी स्थिति में प्रत्येक अपने में राजाहोता है. वह ऐसे ढंग से अपने पर शासन करता है कि अपने पड़ौसियों के लिए कभी बाधकनहीं बनता. इसलिए आदर्श व्यवस्था में कोई राजनीतिक सत्ता नहीं होती, क्योंकि कोईराज्य नहीं होता. परंतु जीवन में आदर्श की पूरी सिद्धि कभी नहीं बनती; इसीलिए थोरोने कहा है कि जो सबसे कम शासन करे, वही सबसे उत्तम सरकार है.’ यहां 'सबसे कम' कातात्पर्य, सबसे कम समय न होकर, सरकार में जनता को शासित करने की मंशा का सबसे न्यूनहोना है. क्या गांधी के इस कथन में आपको जातिवादी राजनीति, बढ़ती मसल पावर. मनी-पावरजैसी सबसे चिंतित करने वाली चुनौतियों को उत्तर देने की ताकत स्पष्ट दिखाई नहींदेती? मैं साफ देख रहा हूं कि गांधी के बुनियादी चिंतन को व्यवहार में उतारने मात्रसे बलात्कार की उग्र होती प्रवृति से मुक्ति से लेकर वैश्विक नवसाम्राज्यवाद केपुराने चक्रव्यूह में फंस चुके भारत की आर्थिक आजादी तक स्वयंमेव सुरक्षित होजाएगी.राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।pic.twitter.com/mpSHvmkZCR— Yogi Adityanath (@myogiadityanath) January 30, 2018गांधी जी ने देश का बंटवारा होते हुए भी राष्ट्रीय कांग्रेस के जुटाए साधनों केजरिए हिंदुस्तान की आजादी मिलने के कारण कांग्रेस की उपयोगिता को खत्म मानते हुएकहा था - ‘शहरों, कस्बों से भिन्न सात लाख गांवों वाली आबादी की दृष्टि सेहिंदुस्तान को सामाजिक, नैतिक और आर्थिक आजादी हासिल करना अभी बाकी है.’ इस आजादीको हासिल करने में कांग्रेस की भूमिका को परिभाषित करते हुए उन्होने तीन बातें कहीथी - ‘लोकशाही के ध्येय की तरफ हिंदुस्तान की प्रगति के दरमियान फौजी सत्ता परमुख्य सत्त को प्रधानता देने की लड़ाई की अनिवार्यता; कांग्रेस को राजनैतिकपार्टियों और सांप्रदायिक संस्थाओं के साथ गंदी होड़ से बचना तथा कांग्रेस केतत्कालीन स्वरूप को तोड़ कर सुझाए नए नियमों के मुताबिक लोक सेवक संघ के रूप मेंप्रकट होना.’लोक सेवक संघ के लिए सुझाए नियमों को गौर से पढें, तो स्पष्ट हो जाएगा कि व्यवस्थापरिवर्तन उपाय नहीं है. समस्याओं के समाधानों को व्यवस्था या राजनीति नहीं,पंचायतों तथा मोहल्ला समितियों के रूप में गठित बुनियादी लोक इकाई से लेकर हमारेनिजी चरित्र में आई गिरावट में खोजने की जरूरत है. चरित्र निर्माण गांधी मार्ग काभी मूलाधार है और विवेकानंद द्वारा युवाशक्ति के आहृान् का भी. लोकतंत्र से बेहतरकोई तंत्र नहीं होता. सदाचारी होने पर यही नेता, अफसर और जनता... यही व्यवस्थासर्वश्रेष्ठ में तब्दील हो जाएंगे. माता-पिता और शिक्षक.. मूलतः इन तीन पर चरित्रनिर्माण का दायित्व है. इन तीनों की उपेक्षा और दायित्वहीनता का ही परिणाम है किदुनिया को गांधी मार्ग बताने वाले भारत को आज खुद गांधी मार्ग को याद करने की जरूरतआन पड़ी है. जो व्यवहार खुद के साथ अच्छा लगे, वही दूसरे के साथ करें. यही है गांधीमार्ग. आइये, इसका आत्मप्रयोग शुरु करें. हो सके, तो बापू की इस पुण्य तिथि से ही.हे राम!!--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:वरुण ने अमीर सांसदों से जो छोड़ने को कही है वो सैलरी आखिर है कितनी?एमआरआई से एक आदमी की मौत के बावज़ूद आपको डरने की जरूरत क्यों नहीं है?ड्रिंक-ड्राइव को मिक्स नहीं करते तो इंश्योरेंस-इन्वेस्टमेंट को क्यों मिक्स करतेहो यार?ये जो अजीब से नंबर आते हैं न टीवी स्क्रीन में, वो ऐंवेई नहीं हैंइन 5 कुतर्कों के चलते आपसे लगातार हर बहस जीतते आ रहे हैं लोगगे सेक्स को अप्राकृतिक कहने वालों को इन बंदरों के बारे में पढ़ लेना चाहिएकैट में 20 लोगों के कैसे आ गए 100 पर्सेंटाइल, जबकि यह नामुमकिन है?--------------------------------------------------------------------------------VIDEO देखें:क्या आपने लड़कों और लड़कियों की शर्ट में ये अंतर नोटिस किया है?