The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Shashi Tharoor Misses VD Satheesan Swearing-in as Kerala CM: Decoding the New Power Shift in Kerala Congress and Future of South Politics

सतीशन का शपथग्रहण और अमेरिका में शशि थरूर, क्या केरल में कांग्रेस का 'नया सूबेदार' तय हो गया है?

जब केरल में कांग्रेस अपनी इस ऐतिहासिक जीत का सेहरा सतीशन के सिर बांध रही थी, तब शशि थरूर वहां से हजारों मील दूर अमेरिका के बॉस्टन शहर में टफ्ट्स यूनिवर्सिटी (Tufts University) के एक कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे.

Advertisement
pic
18 मई 2026 (पब्लिश्ड: 05:45 PM IST)
Shashi Tharoor
क्या केरल कांग्रेस में खत्म हो गया थरूर युग (फोटो-PTI)
Quick AI Highlights
Click here to view more

केरल की राजनीति में 18 मई 2026 की यह तारीख इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुकी है. तिरुवनंतपुरम के सेंट्रल स्टेडियम में भारी हुजूम के बीच वी.डी. सतीशन ने केरल के नए मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ले ली है. इसके साथ ही केरल में पिछले एक दशक से चल रहे पिनाराई विजयन के लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी एलडीएफ (LDF) के राज का आधिकारिक रूप से अंत हो गया है.

कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी यूडीएफ (UDF) के कार्यकर्ताओं के लिए यह जश्न का माहौल है, ढोल-नगाड़े बज रहे हैं और हवा में कांग्रेस के झंडे लहरा रहे हैं. लेकिन इस महा-उत्सव के बीच तिरुवनंतपुरम के सियासी गलियारों में एक सन्नाटा भी तैर रहा है. हर कोई मंच की तरफ देख रहा है और एक चेहरे को ढूंढ रहा है. वो चेहरा जो केरल में कांग्रेस का सबसे बड़ा ग्लोबल ब्रैंड है, जिसकी अंग्रेजी के मुहावरे ऑक्सफोर्ड से लेकर सोशल मीडिया तक ट्रेंड करते हैं. जी हां, हम बात कर रहे हैं तिरुवनंतपुरम के सांसद डॉ. शशि थरूर की.

दिलचस्प बात यह है कि जब केरल में कांग्रेस अपनी इस ऐतिहासिक जीत का सेहरा सतीशन के सिर बांध रही थी, तब शशि थरूर वहां से हजारों मील दूर अमेरिका के बॉस्टन शहर में टफ्ट्स यूनिवर्सिटी (Tufts University) के एक कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे. इंडिया टुडे की 15 मई 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, थरूर ने पहले ही साफ कर दिया था कि अपने पुराने कमिटमेंट्स के कारण वो इस शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हो पाएंगे.

लेकिन राजनीति में जो दिखता है, सिर्फ उतना ही सच नहीं होता. पब्लिक लाइफ में टाइमिंग ही सब कुछ होती है. जब सूबे में पार्टी की किस्मत बदल रही हो, तब पार्टी के सबसे कद्दावर नेता का सात समंदर पार होना सिर्फ एक 'प्रायर कमिटमेंट' है या इसके पीछे केरल कांग्रेस की अंदरूनी बिसात और 2027 की राष्ट्रीय राजनीति का कोई गहरा कनेक्शन है. इसी कूटनीतिक और सियासी पहेली को आज हम इस मेगा एक्सप्लेनर में बेहद आसान भाषा में डिकोड करेंगे.

राजनीति के शौकीनों के लिए यह खबर सिर्फ एक मुख्यमंत्री के शपथ लेने और एक सांसद के विदेश जाने तक सीमित नहीं है. यह कहानी है उस बदलाव की जो दक्षिण भारत से उठकर दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक पहुंचने वाला है. इस लेख में हम समझेंगे कि वी.डी. सतीशन का उभार केरल में किस नए युग की शुरुआत है, शशि थरूर की इस दूरी के मायने क्या हैं, और कैसे यह पूरी घटना मिडल क्लास, युवाओं और भारत की भावी राजनीति को प्रभावित करने वाली है. आपको इस पूरे मामले को समझने के लिए किसी और वेबसाइट पर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि हम इतिहास, वर्तमान और भविष्य के सारे डॉट्स को एक साथ जोड़ने वाले हैं.

सतीशन का राजतिलक और विजयन के 'कैप्टन' युग का अंत

केरल की राजनीति का एक पुराना नियम रहा है जिसे हर पांच साल में सत्ता बदलने का रिवाज कहा जाता था. लेकिन साल 2021 में पिनाराई विजयन ने उस रिवाज को तोड़कर लगातार दूसरी बार एलडीएफ की सरकार बनाई थी. तब उन्हें केरल की राजनीति का 'कैप्टन' कहा जाने लगा था.

लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में वी.डी. सतीशन के नेतृत्व में कांग्रेस ने न सिर्फ एलडीएफ को पटखनी दी, बल्कि लेफ्ट के उस किले को भी ढहा दिया जिसे अजेय माना जा रहा था. वी.डी. सतीशन पिछले पांच सालों से केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में थे. उन्होंने जमीन पर रहकर सरकार विरोधी लहर को हवा दी. चाहे वह सोने की तस्करी का मामला हो या फिर राज्य की खस्ताहाल आर्थिक स्थिति, सतीशन ने विजयन सरकार को हर मोर्चे पर घेरा.

सतीशन की छवि एक बेहद संजीदा, पढ़े-लिखे और जमीनी संगठनकर्ता की है. वो केरल के एर्नाकुलम जिले की परवूर सीट से लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं. मिडल क्लास और युवाओं के बीच उनकी स्वीकार्यता बहुत तेजी से बढ़ी है क्योंकि वो हवा-हवाई दावों की जगह आंकड़ों और तथ्यों के साथ बात करते हैं. केरल जैसे अत्यधिक साक्षर राज्य में जहां की जनता अखबारों की सुर्खियों और टीवी बहसों को बहुत गंभीरता से लेती है, वहां सतीशन का यह अंदाज सीधे लोगों के दिलों में उतर गया.

विजयन सरकार के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी को वोटों में तब्दील करने का पूरा श्रेय कांग्रेस आलाकमान ने सतीशन को दिया है, और यही वजह है कि के. करुणाकरण और ओमन चांडी जैसे दिग्गजों की विरासत वाली केरल कांग्रेस की कमान अब पूरी तरह सतीशन के हाथों में आ गई है.

थरूर की बॉस्टन यात्रा: सिर्फ व्यस्तता या सियासी दूरी

अब आते हैं कहानी के दूसरे और सबसे दिलचस्प किरदार पर, यानी शशि थरूर. थरूर केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से लगातार लोकसभा चुनाव जीतते आ रहे हैं. केरल की जनता, खासकर शहरी और पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग उन्हें बेहद पसंद करता है.

जब केरल में कांग्रेस के नए मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर चर्चाएं चल रही थीं, तब जमीन पर थरूर के समर्थकों का एक बड़ा वर्ग चाहता था कि थरूर को राज्य की राजनीति में लाया जाए. खुद थरूर ने भी कई बार केरल के स्थानीय दौरों को बढ़ाकर यह संकेत दिए थे कि वो राज्य की सेवा करने के लिए तैयार हैं. लेकिन केरल कांग्रेस का जो पारंपरिक ढांचा है, जिसे ए-ग्रुप और आई-ग्रुप के नाम से जाना जाता रहा है, वो हमेशा से थरूर को एक 'आउटसाइडर' या दिल्ली का नेता मानता आया है.

शशि थरूर का इस ऐतिहासिक मौके पर बॉस्टन में होना भले ही एक अकादमिक कार्यक्रम का हिस्सा हो, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे एक सोची-समझी दूरी के रूप में भी देख रहे हैं. जब राज्य में वी.डी. सतीशन का कद पूरी तरह स्थापित हो रहा हो, तब थरूर का वहां न होना इस बात की पुष्टि करता है कि केरल कांग्रेस के भीतर अब पावर सेंटर बदल चुका है.

थरूर जानते हैं कि सतीशन को राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का पूरा समर्थन हासिल है. ऐसे में राज्य की राजनीति में सीधे टकराव मोल लेने की जगह थरूर ने खुद को अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पटल पर ही केंद्रित रखना बेहतर समझा. यह एक तरह से केरल के नए सूबेदार के रूप में सतीशन को वॉकओवर देने जैसा भी है, ताकि सरकार की शुरुआत में किसी तरह का कोई आंतरिक विवाद सामने न आए.

क्या दक्षिण में मिल गया कांग्रेस को नया 'संकटमोचक'

कर्नाटक में डी.के. शिवकुमार और सिद्धारमैया की जोड़ी के बाद अब केरल में वी.डी. सतीशन के रूप में कांग्रेस को दक्षिण भारत में एक नया और मजबूत क्षत्रप मिल गया है. कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति के लिए यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है. जब उत्तर भारत के राज्यों में कांग्रेस को कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है, तब दक्षिण भारत उसके लिए एक मजबूत रीढ़ की हड्डी बनकर उभरा है.

सतीशन सिर्फ केरल के मुख्यमंत्री नहीं बने हैं, बल्कि वो दक्षिण भारत में कांग्रेस के एक नए रणनीतिकार के रूप में भी उभर रहे हैं. उनकी सांगठनिक क्षमता और सभी गुटों को साथ लेकर चलने की कला ने दिल्ली में बैठे आलाकमान को बहुत प्रभावित किया है.

साउथ की राजनीति में कांग्रेस अब एक नए नैरेटिव के साथ आगे बढ़ रही है. एक तरफ जहां वो स्थानीय अस्मिता और वेलफेयर इकॉनमी की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ वो एक ऐसी लीडरशिप को प्रमोट कर रही है जो टेक्नोक्रेटिक भी हो और जमीन से जुड़ी भी हो. सतीशन इस पैमाने पर पूरी तरह फिट बैठते हैं.

आने वाले समय में जब 2027 और उसके बाद के राष्ट्रीय चुनावों की रणनीति बनेगी, तब दक्षिण भारत से फंड रेजिंग से लेकर गठबंधन के प्रबंधन तक में सतीशन की भूमिका बहुत बड़ी होने वाली है. उन्हें एक तरह से दक्षिण भारत में कांग्रेस का नया सूबेदार माना जा सकता है जो क्षेत्रीय दलों जैसे डीएमके (DMK) और वामपंथियों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर डील करते समय कांग्रेस के हितों की रक्षा मजबूती से कर सकेगा.

क्या कहते हैं राजनीति के जानकार

केरल की इस नई सियासी करवट पर देश के जाने-माने राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कांग्रेस के भीतर एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है. राजनीतिक मामलों के वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक संजीव कौशिक का कहना है,

केरल में वी.डी. सतीशन का मुख्यमंत्री बनना यह दिखाता है कि कांग्रेस अब उन नेताओं पर दांव लगा रही है जो पांच साल तक जमीन पर संघर्ष करने का माद्दा रखते हैं. विजयन जैसी कद्दावर शख्सियत को हराना आसान नहीं था. सतीशन ने यह साबित किया है कि वो सिर्फ विधानसभा के भीतर अच्छे वक्ता नहीं हैं, बल्कि उनके पास चुनाव जीतने वाली मशीनरी को री-एक्टिवेट करने की क्षमता भी है.

वहीं शशि थरूर के बारे में बात करते हुए संजीव कहते हैं,

जहां तक शशि थरूर की बात है, वो एक ग्लोबल ब्रैंड हैं. कांग्रेस उनका इस्तेमाल राष्ट्रीय स्तर पर और संसद के भीतर सरकार को घेरने के लिए करती रहेगी. केरल की कमान अब पूरी तरह लोकल लीडरशिप के पास सुरक्षित है.

वहीं, केरल की राजनीति को करीब से देखने वाले स्थानीय संपादक के.आर. गोपीनाथन का नजरिया थोड़ा अलग है. वो कहते हैं,

शशि थरूर का शपथ ग्रहण में न होना केरल के मिडल क्लास को थोड़ा खटक सकता है, क्योंकि एक बड़ा तबका थरूर को केरल के आधुनिकीकरण के चेहरे के रूप में देखता था. लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने बहुत व्यावहारिक फैसला लिया है. सतीशन के पास पार्टी के भीतर कैडर्स की मजबूत पकड़ है जो सरकार चलाने के लिए बहुत जरूरी है. थरूर की कूटनीतिक समझ का उपयोग पार्टी केंद्र में करेगी.

गोपीनाथन का मानना है कि सतीशन के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी क्योंकि केरल पर इस समय भारी कर्ज है और राज्य की अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाना उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी.

केरल की आर्थिक सेहत और मिडल क्लास पर इसका सीधा असर

केरल में सत्ता परिवर्तन तो हो गया लेकिन नए मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती मुंह बाए खड़ी है, वो है राज्य की खस्ताहाल आर्थिक स्थिति. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की राज्य वित्त पर आने वाली रिपोर्ट्स लगातार केरल के बढ़ते कर्ज को लेकर चेतावनी देती रही हैं. केरल इस समय देश के उन राज्यों में शामिल है जिन पर उनकी जीडीपी के अनुपात में सबसे ज्यादा कर्ज है.

पिनाराई विजयन की सरकार ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन और वेलफेयर स्कीमों के जरिए जनता को लुभाने की कोशिश तो की, लेकिन इसके लिए लिया गया भारी कर्ज अब राज्य के गले की हड्डी बन चुका है.

इस आर्थिक संकट का सीधा असर केरल के बड़े मिडल क्लास पर पड़ रहा है. केरल की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक रेमिटेंस यानी खाड़ी देशों (Gulf Countries) से आने वाले पैसे पर टिकी हुई है. लेकिन घरेलू स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग और आईटी सेक्टर का वैसा विकास नहीं हो पाया जैसा पड़ोसी राज्यों कर्नाटक या तमिलनाडु में हुआ.

मिडल क्लास के युवा रोजगार की तलाश में राज्य से बाहर जाने को मजबूर हैं. सतीशन सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वो बिना वेलफेयर स्कीमों को बंद किए, राज्य में निवेश को कैसे बढ़ावा देती है. अगर वो इसमें नाकाम रहे तो जो मिडल क्लास आज उनके साथ खड़ा है, वो बहुत जल्द उनसे छिटक भी सकता है.

सरकार, नीतियां और इंडस्ट्री का नजरिया: क्या बदलेगा अब

केरल को पारंपरिक रूप से एक 'इंडस्ट्री-फ्रेंडली' राज्य नहीं माना जाता रहा है. लेफ्ट के शासनकाल में श्रमिक यूनियनों के दबदबे के कारण बड़े कॉर्पोरेट घराने केरल में निवेश करने से कतराते थे. नीति आयोग के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDG) इंडेक्स में केरल स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले में तो हमेशा टॉप पर रहता है, लेकिन जब बात 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' की आती है, तो इसकी रैंकिंग बहुत पीछे चली जाती है. इंडस्ट्री और बिजनेस कम्युनिटी को अब वी.डी. सतीशन से बहुत सारी उम्मीदें हैं.

सतीशन ने अपने चुनावी घोषणापत्र में भी वादा किया था कि वो केरल को एक 'नॉलेज इकॉनमी' के रूप में विकसित करेंगे. इसका मतलब है कि आईटी, बायोटेक, और टूरिज्म जैसे सेक्टर्स को बढ़ावा दिया जाएगा जहां कम जमीन और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना ज्यादा रोजगार पैदा किए जा सकें. केरल स्टार्टअप मिशन को और अधिक फंड मिलने की उम्मीद है. अगर सतीशन सरकार नई इंडस्ट्रियल पॉलिसी लेकर आती है और सिंगल-विंडो क्लीयरेंस को सच में लागू करती है, तो केरल के भीतर ही युवाओं को नौकरियां मिल सकेंगी, जिससे राज्य का 'ब्रेन ड्रेन' रुकेगा.

बदलाव की छटपटाहट

केरल का समाज बेहद जागरूक और राजनीतिक रूप से सक्रिय है. यहां का युवा अब सिर्फ पारंपरिक सरकारी नौकरियों या खाड़ी देशों के भरोसे नहीं बैठना चाहता. वो चाहता है कि कोच्चि और तिरुवनंतपुरम जैसे शहर भी बेंगलुरु और हैदराबाद की तरह ग्लोबल टेक हब बनें. पिछले कुछ सालों में केरल के युवाओं के भीतर वामपंथी विचारधारा के प्रति जो एक पारंपरिक आकर्षण था, उसमें कमी आई है. युवा अब विचारधारा से ज्यादा विकास, ट्रांसपेरेंसी और करियर ग्रोथ को तवज्जो दे रहे हैं.

विजयन सरकार के आखिरी दिनों में सामने आए बैकडोर अपॉइंटमेंट्स (pichhe के दरवाजे से नौकरियां देना) के आरोपों ने युवाओं को बहुत नाराज किया था. सतीशन की जीत के पीछे युवाओं का यह गुस्सा भी एक बड़ा फैक्टर था. युवाओं की सायकॉलजी को समझते हुए नई सरकार को तुरंत पीएससी (Public Service Commission) की परीक्षाओं को पारदर्शी बनाना होगा और पेंडिंग भर्तियों को पूरा करना होगा. समाज में इस समय एक नई उम्मीद है, और सतीशन को इस उम्मीद पर खरा उतरना ही होगा, नहीं तो केरल की जनता बदलाव करने में ज्यादा वक्त नहीं लगाती.

2027 और थरूर की राष्ट्रीय भूमिका

अब बात करते हैं उस भविष्य की जो इस पूरी घटना के गर्भ में छिपा हुआ है. वी.डी. सतीशन के मुख्यमंत्री बनने के बाद केरल कांग्रेस के भीतर का शक्ति संतुलन पूरी तरह साफ हो गया है. अब राज्य की कमान सतीशन और उनके सहयोगियों के पास रहेगी. इसका सीधा मतलब यह है कि डॉ. शशि थरूर के लिए राज्य की राजनीति के दरवाजे फिलहाल के लिए बंद हो गए हैं. लेकिन क्या यह थरूर के राजनीतिक करियर का अंत है. बिल्कुल नहीं. बल्कि यह उनके लिए एक नए और बड़े रस्ते की शुरुआत हो सकती है.

साल 2027 में देश में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव होने वाले हैं. संसद के भीतर विपक्ष को एक ऐसे चेहरे की जरूरत हमेशा रहेगी जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पक्ष रख सके और राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार को तार्किक रूप से घेर सके. थरूर को पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े कूटनीतिक चेहरे या लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में प्रोजेक्ट कर सकती है. उनके पास जो वैश्विक अनुभव है, उसका फायदा कांग्रेस देश के शहरी वोटर्स और युवाओं को रिझाने के लिए करेगी. इस तरह केरल में सतीशन और दिल्ली में थरूर की यह जुगलबंदी कांग्रेस को एक नई मजबूती दे सकती है.

सतीशन सरकार के लिए रोडमैप

केरल को इस संकट से उबारने और जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए नई सरकार को कुछ बहुत ही कड़े और व्यावहारिक कदम उठाने होंगे. सबसे पहले राज्य के खजाने को संभालना होगा जिसके लिए गैर-जरूरी सरकारी खर्चों में कटौती करनी होगी. दूसरा बड़ा कदम होगा टूरिज्म सेक्टर का पुनरुद्धार. केरल को 'गॉड्स ओन कंट्री' कहा जाता है, लेकिन अब उसे सिर्फ पारंपरिक टूरिज्म से आगे बढ़कर मेडिकल टूरिज्म और डिजिटल नोमैड्स (Digital Nomads) के लिए एक हब के रूप में प्रमोट करना होगा.

इसके अलावा, नेशनल हेल्थ अकाउंट्स के आंकड़ों के मुताबिक केरल के लोग अपनी जेब से स्वास्थ्य पर काफी खर्च करते हैं, भले ही वहां सरकारी अस्पताल अच्छे हों. नई सरकार को हेल्थ इंश्योरेंस स्कीमों को और अधिक सुदृढ़ करना होगा ताकि मिडल क्लास पर इलाज का खर्च बोझ न बने.

शिक्षा के क्षेत्र में केरल के विश्वविद्यालयों के सिलेबस को आधुनिक बनाना होगा ताकि यहां के पास-आउट छात्रों को सीधे इंडस्ट्री में नौकरियां मिल सकें. ये वो ग्राउंड लेवल के बदलाव हैं जो सतीशन सरकार को अगले पांच सालों में करके दिखाने होंगे.

ये भी पढ़ें: अमेरिका में खाने के लाले और रेंट का टेंशन! कंगाल हो रहा है दुनिया का सबसे अमीर देश?

नए सूबेदार की परीक्षा और थरूर का नया सफर

केरल में वी.डी. सतीशन का शपथ ग्रहण और शशि थरूर का बॉस्टन में होना, भारतीय राजनीति के उस व्यावहारिक पहलू को दिखाता है जहां हर नेता की अपनी एक तय भूमिका होती है. कांग्रेस ने केरल में एक शुद्ध जमीनी और सांगठनिक चेहरे को कमान सौंपकर यह साफ कर दिया है कि राज्यों में अब वो किसी भी तरह के गुटीय कशमकश को बर्दाश्त नहीं करेगी. सतीशन अब केरल के नए सूबेदार हैं और उनके कंधों पर न सिर्फ अपनी सरकार को चलाने की जिम्मेदारी है, बल्कि लेफ्ट के दोबारा उभरने के रास्तों को भी बंद करने की चुनौती है.

दूसरी तरफ, शशि थरूर की दूरियां यह बताती हैं कि वो राज्य की क्षत्रप राजनीति से ऊपर उठकर खुद को एक बड़े नेशनल और इंटरनेशनल रोल के लिए तैयार कर रहे हैं. यह बदलाव केरल और कांग्रेस दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, बशर्ते दोनों नेता अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करें. केरल की जनता ने बदलाव के लिए वोट दिया है, और अब समय आ गया है कि बातों की जगह काम करके दिखाया जाए. सतीशन का यह राजतिलक उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा की शुरुआत भी है.

वीडियो: पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम लेकर शशि थरूर ने कांग्रेस आलाकमान से क्या कह दिया?

सामान्य प्रश्न

वी.डी. सतीशन कौन हैं और वो केरल के मुख्यमंत्री कैसे बने?

वी.डी. सतीशन केरल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता हैं जो एर्नाकुलम की परवूर सीट से विधायक हैं. पिछले पांच सालों से वो केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे. उनके नेतृत्व में कांग्रेस के गठबंधन यूडीएफ (UDF) ने 2026 के विधानसभा चुनाव में बंपर जीत हासिल की, जिसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री चुना गया.

शशि थरूर केरल के नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल क्यों नहीं हुए?

शशि थरूर अपने पहले से तय कार्यक्रमों के सिलसिले में अमेरिका के बॉस्टन शहर में थे, जहां उन्हें टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के एक प्रोग्राम में हिस्सा लेना था. उन्होंने इसकी जानकारी पार्टी नेतृत्व को पहले ही दे दी थी.

केरल में इस सत्ता परिवर्तन का राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?

इस जीत से दक्षिण भारत में कांग्रेस की स्थिति बेहद मजबूत हो गई है. कर्नाटक के बाद केरल भी अब कांग्रेस के पास है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन के भीतर कांग्रेस का मोलभाव करने का कद काफी बढ़ जाएगा.

नई केरल सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

सबसे बड़ी चुनौती राज्य का भारी कर्ज और आर्थिक संकट है. इसके अलावा युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करना और राज्य में नए निवेश को आकर्षित करना भी एक बड़ी परीक्षा होगी.

Advertisement

Advertisement

()