एक अमरनाथ यात्री का आंखों देखा हाल
आइए, आपको कुछ कश्मीरियों से मिलवाते हैं.

जिस समय मैं ये यात्रा कर रहा था, उस समय मेरे दिमाग में ये ख्याल दूर-दूर तक नहीं था कि मैं कभी इस यात्रा का संस्मरण लिखूंगा. पिछले छह साल में यादें दिमाग के भंगार में कहीं खो गईं. कल टीवी पर गोली की तड़तड़ाहट सुनाई दे रही थी. पीतल के छर्रे किसी की देह से पार निकल गए थे. इसके बाद मैंने जंग लगी यादों को बाहर निकालकर रेगमाल रगड़ना शुरू किया. ये यादें स्टील जैसी चमकदार तो नहीं है, लेकिन उतनी बुरी भी नहीं कि आपको दिमागी टिटनेस हो जाए. आपके सामने पेश कर रहा हूं.
साल 2010 का अप्रैल महीना था. कश्मीर से खबर आई कि कुपवाड़ा के मछिल सेक्टर में 4 राजपूताना रायफल्स के जवानों ने घुसपैठ कर रहे आतंकियों को मार गिराया. कुपवाड़ा से 920 किलोमीटर दूर बैठे दिल्ली के पत्रकार ने 'सेना को बड़ी कामयाबी' शीर्षक की खबर चला दी होगी. करीब एक महीने बाद पता चला कि मारे गए तीन नौजवान शेज़ाद अहमद, रियाज़ मोहम्मद और सफी बारामूला के नदिहाल गांव के रहने वाले थे. उन्हें नौकरी का लालच देकर माचिल बुलाया गया और फिर फर्जी एनकाउंटर में मार दिया गया.
इस बात को लेकर घाटी में प्रदर्शन शुरू हुआ. 11 जून 2010 को श्रीनगर के डाउन टाउन इलाके में इसी सिलसिले में प्रदर्शन चल रहे थे. डाउन टाउन श्रीनगर का वो इलाका है, जिसे विद्रोहियों का गढ़ माना जाता है. यहां चल रहे प्रदर्शन को काबू करने के लिए सुरक्षा बल के जवान आंसूगैस के गोले दाग रहे थे. इस बीच एक गोला लगा पास के ही गनी मेमोरियल मैदान में क्रिकेट खेल रहे 17 साल के तुफैल अहमद मट्टू को. तुफैल की मौत के बाद प्रदर्शन पूरी घाटी में फ़ैल गया. लोग प्रदर्शन करने आते, पुलिस बल का प्रदर्शन करती, कुछ और लोग मारे जाते. मई से सितंबर के बीच कुल जमा 110 आदमियों को जान गंवानी पड़ी.

तुफैल की तस्वीर के साथ उसके पिता
इसके एक साल बाद मैं श्रीनगर में था. हालांकि, तब तक आंदोलन पिछली गर्मियों जितना तेज नहीं था. लाल चौक से गुजरते हुए मैंने उसके चहरे पर शांति की एक खंरोच देखी थी.
हमारा घर अल्लाह चलाता है
श्रीनगर से जब हम पहलगांव की तरह रवाना हुए, तो घर के खाने की याद सताने लगी थी. घर से निकले हुए सात दिन हो चुके थे. तो तय हुआ कि खाना खुद पकाकर खाया जाए. पहलगांव से करीब 30 किलोमीटर बाद हमने रोड के किनारे एक गांव के पास गाड़ी रोक दी.
हमारे पास खाना बनाने का पूरा सामान था. मैं तेल और मसाले लेने थोड़ी दूर मौजूद दुकान की तरफ बढ़ गया. इधर आटा लगाया जाना शुरू हो चुका था. मैं दुकान पर पहुंचा. मसाले लेने के बहाने मैं दुकानदार से बातें करने लगा. बात-बात में बात मिलिटेंसी पर पहुंच गई. उधर लोग तेल और मसाले के लिए मेरा इंतजार कर रहे थे. उस दुकानदार ने मुझे बताया कि जिस जगह मैं खड़ा हूं, कुछ साल पहले यहां पर रात को मिलिटेंट बैठे रहा करते थे.
इसके बाद हम दोनों बातचीत के उस मोड़ पर पहुंच गए, जहां सियासत को गाली देकर अमन की बात कही जाती है. इस दौरान मैंने एक गलती कर दी. अपनी एक लाइन पर तमाम अहसान लादकर मैंने उसकी तरफ उछाल दी. इस वक़्त मेरा हाथ पर्स से 100 रुपए के तीन नोट निकालने में लगा हुआ था. लाइन उस तक पहुंची और पीछे-पीछे नोट. "यहां के लोगों को भी सोचना चाहिए, आखिर टूरिस्ट की वजह से ही तो उनकी रोजी-रोटी चल रही है."
उसने 70 रुपए फुटकर थमाते हुए कहा, "बंदे को लगता है कि वो सब कुछ कर रहा है, सबका घर अल्लाह चलाता है. मेरा भी वही चला रहा है और आपका भी."
मैंने 70 रुपए लिए और गाड़ी के पास लौटने लगा. आगे जाकर देखता हूं, तो करीब 30 महिलाएं और बच्चे हमारी गाड़ी को घेरकर खड़े थे. मेरे माथे पर पसीना आने लगा. तरह-तरह के ख्याल आने लगे. कहीं गलत जगह गाड़ी तो नहीं रोक ली, कहीं किसी लोकल के साथ झगड़ा तो नहीं हो गया. जैसे ही पहुंचा, तो एक महिला अपने हाथ में पानी की बोतल लिए खड़ी थी. दरअसल हमारे पास आटा लगाने लायक पानी नहीं था. पास ही एक घर से एक महिला ने हमें पानी दिया. फिर भी इस भीड़ का सबब नहीं समझ में आया. बाद में पता लगा कि औरतों की ये भीड़ इसलिए जुटी है, ताकि वो तवे पर रोटी बनते देख सकें. रोटी वहां की थाली का हिस्सा नहीं है. कश्मीर में चावल खाए जाते हैं.
हम रोटी बनाते रहे और गांव की औरतें बड़े ताज्जुब से इसे देखती रहीं. जब खाना पक कर तैयार हुआ, तो हमने कुछ रोटी और सब्जी उन्हें भी चखने के लिए दीं. उनमें से कुछ ने इन्हें खाया. वो खातीं और चहक पड़तीं. श्रीनगर में जिन कश्मीरियों से मिला था, उनके लिए हमसे बात करना उनके काम का हिस्सा था. यहां पर मैं सही मायने में पहली बार किसी कश्मीरी से मिल रहा था और ये कश्मीरियत से भी मेरा पहला साबका था.
उस झील में शेषनाग का फन नहीं दिखाई देता
पहलगांव में हम दो टुकड़ों में बंट गए. हमारे ग्रुप में से तीन लोगों को बालटाल के रास्ते अमरनाथ पहुंचना था. बाकी बचे हम चार लोगों को चंदनबाड़ी के रास्ते पैदल अमरनाथ पहुंचना था. एक रात पहलगांव रुकने के बाद हम चंदनबाड़ी पहुंचे. यहां से अमरनाथ की यात्रा शुरू होती है. लगभग तीन घंटे की चढ़ाई के बाद हम पिस्सू टॉप पहुंचे. यह खड़ी चढ़ाई थी.

शेषनाग झील
पिस्सूटॉप के बाद रास्ता उतना खड़ा नहीं था. जब मैं जोजीबल पहुंचा, तो वहां मुझे चंदनबाड़ी में की गई मेरी मूर्खता पर गुस्सा आने लगा. हुआ ये था कि जब मैं ऊपर चढ़ने के लिए रवाना हुआ, तो पहाड़ के मुहाने पर मुझे लकड़ी बेचने वाला मिला. ये लकड़ियां लोग इसलिए खरीद लेते हैं, ताकि चढ़ते समय उन्हें टेके के तौर पर इस्तेमाल कर सकें.
लकड़ी बेचने वाले के लाख कहने के बावजूद मैंने लकड़ी के गठ्ठे से सबसे मजबूत और भारी लकड़ी निकल ली. उस समय मेरे दिमाग में था कि जरूरत पड़ने पर इसे हथियार के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सके. जोजिबल पहुंचते-पहुंचते इस लकड़ी का भार भी असहनीय हो गया था.
इस यात्रा के शुरुआत में ही समझ में आ गया था कि यहां 'भोले' शब्द ने अपने कई मायने ले लिए हैं. मसलन आपके पीछे से पालकी वाला गुजर रहा है. साइड मांगने के लिए वो कहेगा 'भोले.' कैंप में खाने के स्टाल के सामने जाकर आप कहेंगे 'भोले' और वो आपकी प्लेट में दाल डाल देगा.
बहरहाल, जैसे-तैसे शेषनाग पहुंचा. यहां पहाड़ से निकली पानी की धारा एक बड़ी झील का रूप ले लेती है. श्रुतियां ये हैं कि शेषनाग ने यहां वायु नाम के राक्षस को मारा था और दिन के वक़्त इस झील के भीतर शेषनाग का फन दिखाई देता है. कैंप में जाने के लिए हमें तेज बहती नदी को पार करना था. इसके लिए एक पतला सा लकड़ी का अस्थाई पुल बनाया गया था.
एक-एक करके लोग पुल के जरिए उस पार उतर रहे थे. मैं लाइन में लगा हुआ था. मुझसे करीब छ: आदमी आगे एक नौजवान था. वो बार-बार अपनी ऊनी टोपी उतार-पहन रहा था. जब वो इस धारा को पार करने के लिए पुल पर चढ़ा, तो अचानक लड़खड़ाकर पानी में गिर गया. पलक झपकते ही तीन कश्मीरी नौजवान पानी में थे. इनमें से कम से कम एक सामान ढोने का करता था. मेरे इस दावे का कारण है मेरे एक सहयात्री का बयान, जो मुझे अगले दिन चाय की दुकान पर मिला. उसने बताया कि उस लड़के को बचाने के लिए सामान ढोने वाला वो आदमी सामान फेंककर पानी में कूद गया. इस बीच उसका एक बैग भी लुढ़ककर पानी में चला गया. बहरहाल उस युवक को पानी से सही-सलामत निकाल लिया गया. पुल पार करते हुए न चाहते हुए भी मेरी टांगें कांप रही थीं.
पंचतरनी में
पहलगांव से दो टुकड़ों में बंटा हमारा समूह पंचतरनी में फिर से मिला. ये यात्रा का आखिरी पड़ाव है. यहां पहाड़ से निकली पांच पानी की धारा मिलकर एक झील बनाती हैं. दूसरा समूह हमसे पहले वहां पहुंच चुका था. दरअसल उन लोगों ने अपनी यात्रा पालकी के जरिए पूरी की थी. बालटाल का रास्ता चंदनबाड़ी के रास्ते से ज्यादा खतरनाक माना जाता है. ये संकरा है और यहां भूस्खलन की संभावना बनी रहती है.
खच्चर के अलावा पालकी स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का दूसरा बड़ा जरिया है. एक पालकी को छह लोग अपने कंधों पर ढोते हैं. हमारे सहयात्रियों ने बाद में मुझे बताया कि पालकी वाले बहुत भले लोग थे. रास्ते में उन्होंने कोई तकलीफ नहीं होने दी. एक जगह एक सहयात्री की तबीयत थोड़ी बिगड़ गई थी. तब पालकी वाले थे, जिन्होंने तेजी से उन्हें कैंप पहुंचाया, जहां उनका इलाज हो सके. संकरे रास्ते पर वो लगातार इस बात का भरोसा दिलाते कि वो अपनी जान दे देंगे, लेकिन सवार को कुछ नहीं होने देंगे.

अलगे दिन मेरे सहयात्रियों को गुफा में दर्शन करने जाना था. धीरे-धीरे चर्चा सफ़र की तरफ मुड़ गई और फिर कश्मीर के हालात पर. अचानक से यात्री ने कहा, "अगर CRPF के जवान न हों, तो ये यात्रा हो ही न पाए." इस बात को स्वीकार करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है कि सुरक्षाबलों ने हर यात्री का अच्छे से ख्याल रखा. लेकिन क्या ये सिर्फ उनकी वजह से हो पाई?
मुझे अचानक कई लोग याद आ गए. मुझे याद आया पहलगांव के होटल का कर्मचारी, जो मेरे लिए आधी रात को तीन किलोमीटर दूर से चाय ले आया था. याद आए वो तीन नौजवान, जिन्होंने बर्फ के मानिंद झील में छलांग लगाने से पहले एक बार भी नहीं सोचा. मुझे याद आए वो पालकीवाले, जो सवारी की जान की हिफाजत करते हुए अपनी जान भी गंवा सकते हैं. मुझे याद आए कैंप लगाने वाले कश्मीरी नौजवान, जिन्होंने सर्द रातों में ठंड से अकड़ जाने से बचाया. सबसे अंत में गांव की वो औरतें, जिन्हें ये नहीं पता था कि तवे पर रोटी कैसे बनाई जाती है, लेकिन ये पता है कि किसी टूरिस्ट का अहसान उनके घर की रोटी नहीं देता.

