आप बिना साइंस पढ़े जिन्नातों से अपना इलाज करा सकते हैं. हवा को कैद कर सकते हैं.बिजली बना सकते हैं मगर कैसे. ये ही बताया है परवेज हूदभाई ने. उनके लेख का तर्जुमाहम आपको पढ़वा रहे हैं. परवेज लाहौर और इस्लामाबाद में फिजिक्स पढ़ाते हैं.--------------------------------------------------------------------------------कोमसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी इस्लामाबाद, पाकिस्तान की बड़ीयूनिवर्सिटियों में से एक है. कैंपस में 'जिन्नात और काला जादू' के नाम से एकवर्कशॉप हुई. मेहमान स्पीकर राजा जिया उल हक़ थे. जिनके बारे में बताया गया मियांरूहानी (आत्माओं) कार्डियोलॉजिस्ट, काली बलाओं (मुसीबत) और दूसरे तंतर मंतर केमाहिर हैं. उनका तंतर मंतर इतना मशहूर है कि हॉल स्टूडेंट्स से खचाखच भरा हुआ था.राजा जिया उल हक़ ने जिन्नात और काले जादू के फेवर में एक बेहद दिलचस्प दलील दी. जिसचीज को देखा नहीं उसको राजा साब ने तीन कैटेगरी में बांट दिया. एक जो उड़ती हैं.दूसरी जो हालात के मुताबिक अपनी शक्ल-ओ-सूरत को तब्दील करती हैं और तीसरी वो जोगंदी जगहों मतलब कूड़े वगैरहा में रहती हैं. उन्होंने कहा कि अगर इनका वजूद नहीं हैतो फिर बॉलीवुड इतनी बड़ी संख्या में डरावनी फ़िल्में क्यों तैयार कर रहा है. जराठहरिए! क्या आप को ये दलील सोचने को मजबूर नहीं करती कि हॉलीवुड की मशहूर चुड़ैले,आत्माएं, और डरावने जानवर ख्याली होने के बजाए हकीकत में वजूद रखते हैं. यक़ीनन इसतरह के बचकाने दावे को कोई भी आसानी से चैलेंज कर सकता है, लेकिन ऐसे मौके परइंतजामिया की कोशिश होती है कि तीन घंटे की तक़रीर में कोई खलल न पड़े. और वो अपनीबात बगैर कोई हंगामा हुए पूरी कर सके. अब आगे क्या होना चाहिए. शायद कोमसेट्सइंस्टिट्यूट जिन्नात के जरिए टेलीकम्युनिकेशन नेटवर्क तैयार कर सकती है. या फिर ऐसेजिन्नाती मिसाइल तैयार कर सकती है, जो राडार में नजर आए. और देश की सुरक्षा कड़ी होजाए. जिन्नात पर आधारित केमिस्ट्री के जरिए बहुत से काम किए जा सकते हैं. जनरल जियाके दौर में तो जिन्नात से बिजली पैदा करने का मशवरा भी दिया गया था. ये मशवरापाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमीशन के सीनियर डायरेक्टर ने दिया था कि जिन्नात की मददसे एटमी और कूड़ा करकट से ईंधन तैयार किया जा सकता है. इस तरह की वर्कशॉप का होनाकोई नई बात नहीं है. स्कूलों, कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में इस तरह के रूहानीस्पीकर बुलाये जाते हैं, जो मौजूदा साइंसी इल्म से अलग ही इल्म बयान करते हैं.मिसाल के तौर पर इंस्टिट्यूट ऑफ़ बिजनेस मैनेजमेंट, कराची की एक मीटिंग का मौजू था'आदमी के आखिरी लम्हात.' इसके पोस्टर में दिखाया गया कि अधेड़ उम्र का शख्स पुरानीकश्ती में कब्रिस्तान से गुजर रहा है. और हर बार की तरह हॉल स्टूडेंट्स से खचाखचभरा हुआ था. (जैसा कि मुझे बताया गया) इस लेक्चर में मरने के बाद की जिंदगी को कुछखाकों के मदद से समझाया गया था. मरने के बाद की जानकारी देने वाले वो खुफिया एसएमएसथे, जो शायद स्पीकर को कब्र के अंदर से किसी मुर्दे ने भेजे होंगे. कोई ये सोच सकताहै कि पाकिस्तान की महंगी यूनिवर्सिटी ऐसी खुराफात से पाक होगी. लाहौर यूनिवर्सिटीऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेस, मुल्क की महंगी यूनिवर्सिटी है. उसका स्कूल ऑफ़ साइंस नदइंजीनियरिंग अमेरिकी डॉलर की मदद से तैयार किया गया है. जिसका मतलब है कि यहां कोईसंजीदा काम होगा, लेकिन वहां के कई प्रोफेसर साइंस का मजाक उड़ाते हैं. इत्तेफाक सेइस साल के शुरू में मुझे यहां ह्यूमनिटीज़ के एक प्रोफेसर का लेक्चर सुनने का मौकामिला. एस लेक्चर कि खास बात साइंस पर लानत मलामत (बुरा बताना) करना था. उन्होंने येतस्लीम किया कि वो फिजिक्स नहीं जानते हैं. और साइंस को ऐसे निशाना बनाना शुरू करदिया जैसे वो बहुत बड़े जानकार हैं. और फिर ये भी दावा कर डाला कि 1923 में फिजिक्सका नोबल प्राइज जो रॉबर्ट एंड्रयूज मिलिकन को दिया गया था. वो उसका हकदार नहीं था.अभी मैं हैरान परेशान ये लेक्चर सुन ही रहा था कि प्रोफेसर साहब ने आइंस्टीन केमशहूर सिद्धांत E=mc2 को ही नकार डाला. ये सुनके मेरी पलकें झपकना बंद हो गईं औरऐसा लगा कि शायद दिल की धड़कन रुक गई है. एटम बम फटेगा या न्यूक्लियर रिएक्टर कितनीबिजली पैदा करेगा तो क्या होगा. यक़ीनन ये काम जिन्नात का होगा. लेकिन वो ऐसा दावाकरने वाले अकेले नहीं हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेस के बायोलॉजीडिपार्टमेंट ने तमाम फैकल्टी को एक ईमेल भेजा, जिसमें उन्होंने दावा किया कि कुरानीआयत की तिलावत करने या सुनने से 'जींस और मेटाबोलाइट' को कंट्रोल किया जा सकता है.ऑडियो विजुअल कमरे बनाए जाएं ताकि उस मर्ज़ के मरीजों का इलाज किया जा सके. साइंस सेतवज्जो हटाने के लिए पिछले माह यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेस ने पाकिस्तान केएक आला और काबिल मैथमेटिकल फिजिस्ट को नौकरी से निकाल दिया. खुशकिस्मती से उसका कोईनुकसान नहीं हुआ. क्योंकि उसे जल्द ही हार्वर्ड, प्रस्टीन या फिर एमआईटी, जहां उसनेपीएचडी की थी, वहां जॉब मिलने वाली है. हमारे तालीमी इदारों में बगैर दलील और साइंसमुखालिफ रवैयों की भरमार है. हो सकता है आपके लिए ये समझना मुश्किल हो... नहींबिल्कुल नहीं. एक लम्हे के लिए सोचिए. साइंस को गलत साबित करना बहुत आसान है. साइंसको रद्द करने के मतलब है कि आप बहुत बड़ी जहनी मशक्कत और मुश्किल काम से बच जातेहैं. ऐसे समझिए फिजिक्स और मैथ से पीछा छूट जाता है. साइंस को समझने के मुकाबले उसेबुरा भला कहना आसान है. इसके बहुत से फायदे हैं. बिना दिमाग लगाए न्यूरो सर्जन याक्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट के बगैर आप जिन्नात की मदद से उस का इलाज कर सकते हैं. एकमकामी पीर भी ये इलाज कर सकता है. आप साइंस को पढ़ने के बजाए जिन्नात के जरिए हवा कोकंट्रोल कर सकते हैं. और हां, साइंस पढ़के जलजलों की तहकीक करने की तो जरा भी जरूरतनहीं है. क्योंकि ये तो हमारे गलत कर्मों का नतीजा होते हैं. जहां तक आम से खिलौनेया औजार जैसे कंप्यूटर और सेलफोन का मामला है तो ये हम अपने सऊदी भाइयों की तरहहमेशा एप्पल, सैमसंग और नोकिया के खरीदेंगे. कोई पैसे की भूकी जिंग जैंग जोंग कंपनीसेलफोन चलाने के लिए पाकिस्तान में अपना नेटवर्क कायम कर लेगी. टेक्नोलॉजी या कोईचीज ईजाद करने जैसा गंदा काम हमने चीनियों, अमेरिकियों और यूरोपियन के लिए छोड़ रखाहै. उनके जिन्नात को मालूम है कि अपना काम कैसे करना है. पाकिस्तान के तालीमीइदारों को रोशन ख्याल होना चाहिए. खुले जहन के साथ नई सोच को जगह देनी चाहिए. नहींतो जानवरों का बाड़ा बनके रह जाएगा. जहनी तौर पर सुस्त और नालायक प्रोफेसर की फ़ौज कोऐसे स्टूडेंट की जरूरत होती है जो उनकी हर बात पर सवाल उठाने या चैलेंज करने केबजाए उसपर अपना सिर झुकाए. क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि ऐसे 20 से 25 साल केनौजवानों को मौत का खौफ दिखाकर डराया जा सकता है.