सारे बकैत 'झा जी' नहीं होते, पर अमूमन सारे झा जी बकैत जरूर होते हैं. ये सबमिथिला स्कूल ऑफ बकैती के एलुम्नाई हैं. वैसे मिथिला में बकैती नहीं, गप्पाध्यायहोता है. चार आने का सामान लेने चौक पर जाएंगें और चार घंटे लगाकर आएंगे. गप्प कान्यौता देना हो, तो पर्याप्त भोजन-मिष्ठान्न का जुगाड़ कर लें. अजी इनके शरीर पर नजाएं, ये ब्रह्मांड पचा जाएं और डकार भी न लें.हालांकि, हमारे झा जी डॉक्टर हैं और यूरोप में बसते हैं. पर हैं तो झा जी ही औरगप्प में गोरे-काले का भेद कहां? झा जी कहते हैं, 'गप्प सर्वव्यापी है। मुद्दे बदलजाएं, भाषाएं बदल जाएं, पर गप्प तो ईश्वर-वाणी है. आपने कभी मूक भगवान सुना है?जीसस हों या कृष्ण, सबकी शक्ति उनकी मनमोहक वाणी ही थी. गप्प ब्रह्म है और गप्प हीमोक्ष का मार्ग है.'झा जी के दो ही सपने थे. एक, देश का राष्ट्रपति बनना है और दूसरा, नोबेल जीतना है.पहला सपना उन्होंने रिटायरमेंट-प्लान सोच रखा है और दूसरे सपने के लिए नॉर्वे आ गएकि फेस-टू-फेस डीलिंग हो जाए. नॉवेल कमिटी के बाबुओं में कोई झा जी मिल जाए तो औरबढ़िया. उनका मानना है, आखिर झा जी कहां नहीं होते? जहां न पहुंचें हाजी, वहांपहुंचें... अब इससे ज्यादा क्या ही कहें. आप तो सीधे झा जी की ब्रह्म समान गप्प काआनंद उठाएं और जोर से बोलें... 'हर हर लल्लनटॉप'.--------------------------------------------------------------------------------छुटपन में एक खेल खेलता था 'पिट्टो' या 'सतोलिया'. कुछ ढेलों का गट्ठा तोड़ो औरदौड़ा-दौड़ाकर पीठ पर गेंद दागो. कसम से पीठ छिल जाती है, अगर 'शूटिंग' ठीक की गईहो. धीरे-धीरे ये खेल आपसी रंजिश निपटाने का जरिया हो गया. पहले गांव की पृष्ठभूमिके लड़के एक शहरी को खिलाते और यूं चक्रव्यूह रचते कि उसे जी भर दागा जा सके. फिरदलितों का गैंग बाभनों को दागने लगा और हिंदुओं का गैंग मुसलमानों को. बड़ाअसहिष्णु खेल था 'पिट्टो'.महाराष्ट्र में 'लगोड़ी' नाम से खेला जाता है. केरल में जब कम्युनिस्ट आए, तो खेलमें शायद बदलाव आया. वहां के गेंद बदल दिए गए और नारियल के पत्तों से बनाए जानेलगे. खेल का नाम चुना 'डब्बा कली' और गेंद ऐसे मारी जाती, जैसे फूलगेंदवा फेंक रहेहों. ये साम्यवादी 'पिट्टो' था.जो लोग केरल में नहीं पैदा हुए और 'पिट्टो' खेलते रहे, वो हर पिट्टो के खेल के साथअसहिष्णु बनते गए. आपने न खेला हो, तो कुछ और खेला होगा. अमेरिका में 'पिट्टो' चलताहो या न चलता हो, पर न्यू यॉर्क के क्वींस मोहल्ले में कुछ ऐसा ही खेल खेला जाताथा. एक बच्चे को बहुत दागा जाता था. नाम था 'डॉनल्ड'. पता नहीं आगे जाकर उसका क्याहुआ, पर वो अपनी पीठ पर लगी हर गेंद का बदला कभी न कभी जरूर लेगा.अमेरिकन हिस्ट्री Xएक हॉलीवुड फिल्म है 'अमेरिकन हिस्ट्री X'. फिल्म में मेरे पसंदीदा अभिनेता हैंएडवर्ड नॉर्टन, जिनके अंदर इन्हीं गली के खेलों के साथ अश्वेतों से नफरत पैदा होगई. एक ही गली में रहते, पर अश्वेतों को पीटने में खूब मजा लेते. वो आखिर एक पिटाईकैसे करते हैं, ये नहीं बताऊंगा. बड़ी वीभत्स और 'रेशियल' पिटाई है. हां, कुटाई भीरंगभेदी हो सकती है, एक खास तरीके से. ये इसी फिल्म में दिखाया गया है. खैर, जबउन्हें कारावास होता है, तो किस्मत ऐसी कि सारे कैदी अश्वेत. उन सबको ये भी पता थाकि जनाब किस जुर्म में जेल आए हैं. सोचिए, क्या खूब 'पिट्टो' खेला होगा उन्होंने इसअकेले गोरे के साथ. पर इसी वातावरण में उनके कई अश्वेत मित्र बने और उन्हें यकीनहुआ कि भाई ये भी 'होमोसेपियन' ही हैं.समस्या तब आती है, जब परिवेश बदलता है और आप एडवर्ड नॉर्टन बन जाते हो. दिवाली कीमिठाई खरीदने ओस्लो पहुंचा, तो मिठाई की सारी दुकानें पाकिस्तानियों की. दिवाली ऑफरभी चला रखे हैं. बड़ी कठिनाई से एक सरदार जी की दुकान मिली, पर वहां कलाकंद नहीं.बस जलेबियां. वो भी 'फ्रॉजेन'. पाकिस्तानी दुकानों में कलाकंद भी है और काजू कतलीभी. मन मारकर जलेबी ले आया.मुझे शिकायत है उन भारतीयों से, जो पाकिस्तानियों की काजू कतली खा रहे हैं. इसीकाजू कतली के पैसों से आतंकवादी कैंप चल रहे हैं. देसी जलेबी चाहे ठंडी क्यों न हो,अपने देश की खुशबू है. पर जलेबी फ्रेश तो बना सकते थे? सरदार जी कहते हैं, 'लंदन सेआती है जलेबी'. मतलब लंदन के हलवाई ने महीने पहले बनाई और अब मेरे हाथ आई.https://www.youtube.com/watch?v=hospPF_qvUMमैं तो हलवाई से ताजी छनवाकर लेने वाला आदमी हूं. आधे घंटे पहले छनी जलेबी न खाऊं,महीनेभर पुरानी का तो सवाल ही नहीं उठता. अब बची काजू कतली. वहीं कुछ आपसी समझौताहो, तो दीवाली मन जाए. बताओ, ठंडी जलेबी से दीवाली मनती है क्या? कहो तो काजू कतलीखा लूं और बदले में दे मारूं एक रॉकेट पाकिस्तानी के घर पर. रंजिश की रंजिश औरमिठाई की मिठाई. नहीं, मतलब बस एक बात कह रहा हूं. बताओ, दोनों देश 70 के हो गए औरअब भी 'पिट्टो' खेले जा रहे हैं. और उधर अमेरिका से खबर आई, वो पिट्टो वाला'डॉनल्डवा' भी मिल गया है.झा जी की एक किताब भी छपी है. नाम है 'चमनलाल की डायरी'. एकदम स्वदेशी प्रकाशन है.घर ही में छपा है ताजा-ताजा. चाइनीज माल नहीं. इसके लिए यहां पधारें.--------------------------------------------------------------------------------जर्मनी से हम आपके लिए डाक यूरोप भी मंगाते हैं. पढ़ लीजिए:बेवफाइयों का जश्न मनातीं औरतों का उत्सव देखिएयूरोप में रोज कुछ नया बन रहा है, क्यों न हो भारत की उससे तुलनाभला खंभा भी कोई साफ करता है!एक हज़ार साल पुरानी यंग ‘स्लेव’ लड़की से मुलाक़ातभाई बर्तन उठाकर अपनी रसोई अलग कर ले तो ऐसा लगता हैवो मर गया, जिसके शब्द मानवता का सर झुका देते थेविदेशियों से रिश्ते बनाने में आगे हैं महिलाएं