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जयंत नार्लीकरः एक ऐसे साइंटिस्ट जो साइंस के साथ फिक्शन भी प्रूफ करते चले

पहली कहानी घोस्ट राइटर की तरह लिखी

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जयंत नार्लीकर भारत के अकेले बड़े साइंटिस्ट हैं जिन्होंने बेहतरीन साइंस फिक्शन लिखे. उन्हें इस बार मराठी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता दी गई है.
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अमित
29 जनवरी 2021 (Updated: 29 जनवरी 2021, 04:55 PM IST)
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साइंस का नाम आते ही भारत में स्टूडेंट्स के अलावा उनके घरवाले भी गंभीरता का लबादा ओढ़ लेते हैं. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया में सबसे ज्यादा चाव से पढ़ी जाने वाली किताबें साइंस फिक्शन हैं. दुनिया भर में साइंस फिक्शन पर बनी किताबें करोड़ों डॉलर कमाती हैं. इंडिपेंडेंस डे, मार्शियन, मैन इन ब्लैक, स्टार वार्स औऱ न जाने कितनीं. आपको एक बात जरूर अखरती होगी कि भारत उन देशों में से है जहां साइंस फिक्शन पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है. जबकि भारत में जयंत नार्लीकर ( Jayant Narlikar) जैसे मशहूर साइंटिस्ट और साइंस फिक्शन राइटर मौजूद हैं. जयंत नार्लीकर उन साइंसिट्स में से हैं जिन्होंने लोगों की साइंस से दोस्ती कराने के लिए साइंस फिक्शन लिखना शुरू किया. आज क्यों नार्लीकर की बात जयंत नार्लीकर की शख्सियत ऐसी है कि उनकी बात करने के लिए किसी दिन की जरूरत तो नहीं है लेकिन आज मौका खास है. उन्हें महाराष्ट्र के बड़े साहित्यिक कार्यक्रम की अध्यक्षता की जिम्मेदारी दी गई है. इस साल मार्च में होने वाले अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता वही करेंगे. ऐसा कम ही होता है कि किसी साहित्यिक कार्यक्रम की अध्यक्षता एक साइंटिस्ट करे.जयन्त विष्णु नार्लीकर का जन्म 19 जुलाई 1938 को कोल्हापुर (महाराष्ट्र) में हुआ था. बीएचयू से ग्रेजुएशन करने के बाद वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए. उन्होंने कैम्ब्रिज से गणित में डिग्री लेने के बाद एस्ट्रो फिजिक्स और एस्ट्रोलजी में दक्षता प्राप्त की. इंग्लैंड जाकर जयंत नार्लीकर ने मशहूर साइंटिस्ट फ्रेड हॉयल के गुरुत्वाकर्षण के नियम पर काम किया. इसके साथ ही उन्होंने आइंस्टीन के आपेक्षिकता सिद्धान्त और माक सिद्धान्त को मिलाते हुए हॉयल-नार्लीकर सिद्धान्त गढ़ा. 1970 के दशक में नार्लीकर भारत वापस लौट आये और टाटा फंडामेंटल रिसर्च इंस्टिट्यूट में कार्य करने लगे. वह 2003 में रिटायर हो गए. उन्हें स्मिथ पुरस्कार (1962), पद्म भूषण (1965), एडम्स पुरस्कार (1967), शांतिस्वरूप पुरस्कार (1979), इन्दिरा गांधी पुरस्कार (1990), कलिंग पुरस्कार (1996) और पद्म विभूषण (2004) और महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार (2010) से नवाजा गया.
जयंत नार्लीकर को भले ही साइंस के क्षेत्र में इतने प्रतिष्ठा मिली लेकिन उनकी शख्सियत में साइंटिस्ट और साहित्यकार हाथ पकड़ कर साथ-साथ चलते हैं. उन्होंने जिस प्रोफेशनल तरीके से रिसर्च पेपर लिखे, उतने ही चुटीले ढंग से साइंस फिक्शन भी गढ़े. वह अगर गुरुत्वाकर्षण पर विश्व प्रसिद्ध रिसर्च का हिस्सा बने तो साथ ही उन्होंने टाइममशीन पर एक ऐसी किताब लिखी जिसमें लोग समय को मात देते नजर आते हैं.
घोस्ट राइटर बन लिखी पहली कहानी एक इंटरव्यू में जयंत नार्लीकर ने अपने पहले साइंस फिक्शन लिखने की कहानी को कुछ ऐसे बयां किया
मुझे अपने मेंटॉर और सुपरवाइजर साइंटिस्ट फ्रेड हॉयल की तर्ज पर साइंस फिक्शन लिखने का मन था. वह ब्लैक क्लाउड और ए फॉर एंड्रॉमेडा जैसी बेहतरीन साइंस फिक्शन लिख चुके थे. मैं लिखना तो बहुत दिन से चाह रहा था लेकिन पता नहीं था कि लिख भी पाऊंगा या नहीं. ऐसे में एक दिन मैंने देखा कि मराठी विज्ञान परिषद ने 2000 शब्दों में साइंस फिक्शन लिखने का कॉम्पिटिशन रखा है. लिखने के लिए मेरा मन मचलने लगा. चूंकि तब तक मुझे साइंस की फील्ड में काफी लोग जानने लगे थे और मुझे पुरस्कार भी काफी मिल चुके थे, ऐसे में मेरी कहानी को लेकर पक्षपात की आशंका थी. मैंने दूसरे नाम से लिखने का मन बना लिया....

...मैंने अपना पेन नाम रखा नारायण विनायक जगताप. इस नाम को रखने का भी एक कारण था. इन नामों को उल्टे क्रम में पढ़ने पर मेरे असल नाम के पहले अक्षर जयंत विष्णु नार्लीकर (JVN) नजर आते हैं. मैंने कहानी सोच ली, लेकिन एक मुश्किल और थी. मुझे आशंका थी कि कहानी को जज करने वाली कमेटी में कोई मेरे साथ का साइंटिस्ट न हो जो मेरी हैंडराइटिंग पहचान ले. ऐसे में मैंने कहानी अपनी पत्नी से लिखवाई. इससे हैंडराइटिंग के जरिए पकड़े जाने का खतरा खत्म हो गया. मैंने अपनी एंट्री भेज दी. जब रिजल्ट आया तो पता चला कि मेरी कहानी को ही पहला पुरस्कार मिला है. इससे मेरा हौसला बढ़ गया और साथ ही साइंस फिक्शन लिखने का कॉन्फिडेंस भी आ गया.
नार्लीकर की इन किताबों को जरूर पढे़ंद रिटर्न ऑफ वामन (The Return of Vaman) मूल रूप से मराठी में यह नॉवल 'वामन परत न आला' के नाम से आया था. यह कहानी एक तीन लोगों के इर्दगिर्द घूमती है. एक भौतिक शास्त्री(फिजिसिस्ट) दूसरा कंप्यूटर वैज्ञानिक और तीसरा पुरातत्ववेत्ता. एक प्रयोग करने के लिए फिजिसिस्ट जमीन में गड्ढा खोदता है और उसे एक खास तरह का क्यूब मिलता है. क्यूब को बड़ी मुश्किल से खोलने पर तीनों दोस्त कामयाब होते हैं और पता चलता है कि इसमें एक सुपर कंप्यूटर बनाने के राज छुपे हैं. फिर शुरू होता है एक खतरनाक साइंस थ्रिलर. भारत में शायद ही ऐसा कोई साइंस फिक्शन लिखा गया हो. कहां से मिलेगी - अमेजन पर तकरीबन 1500 रुपए में उपलब्ध है

Vaman Jayant Nalkarni
जयंत नालकर्नी की साइंस फिक्शन में रिटर्न ऑफ वामन अपने आप में दुनिया की बेहतरीन साइंस कथा है.

वायरस (Virus) एक कंप्यूटर वायरस किस तरह से दुनिया भर की सरकारों का सिरदर्द बन जाता है वह इस नॉवल में बेहतरीन ढंग से दिखाया गया है. वायरस वाकई वह रहस्यमय सॉफ्टवेयर है, जिससे एकाएक दुनिया के ज्यादातर कंप्यूटर गड़बड़ाने लगते हैं. वैज्ञानिक मिलजुल कर इसका कारण और निदान खोजने की कोशिश करते हैं. बाद में पता लगता है कि आकाश के तारों पर नजर रखने के लिए भारत में जो महादूरबीन स्थापित की गई है. उसी के जरिए वह अज्ञात वायरल हमारी सभ्यता को तहस-नहस करने की कोशिश कर रहा है. इंसान से बस यही गलती हो गई कि उसने एलियन सभ्यता को दोस्ती के लिए जो मेसेज भेजे थे वही उसकी उसके लिए मुश्किल का सबब बन गए हैं. कहां मिलेगी - अमेजन पर 129 रुपए में

चार नगरों की मेरी दुनिया (A Tale of Four Cities) यह किताब भले ही उनकी साइंस कथा नहीं है लेकिन यह नार्लीकर के जीवन से जुड़ी किताब है. इस किताब के जरिए एक साइंसदान से लेकर फिक्शन राइटर तक के सफर को बखूबी समझा जा सकता है. जयंत विष्णु नार्लीकर ने अपने जीवन के 19 साल बनारस में, 15 साल केंब्रिज विश्वविद्यालय में, 18 साल मुंबई शहर में और 20 साल महाराष्ट्र के पुणे शहर मे गुजारे हैं. वे अभी अपने परिवार के साथ पुणे शहर में रहते हैं. शहरों के जरिए एक साइंटिस्ट की रोचक कहानी जानने के लिए यह एक बेहतरीन किताब है. इस किताब को 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया. कहां मिलेगी - अमेजन पर 750 रुपए में

जयन्त विष्णु नार्लीकर के लिखे साइंस फिक्शन में लास्ट विकल्प, दाईं सूंड के गणेशजी, टाइम मशीन का करिश्मा, पुत्रवती भव, अहंकार, ट्राय का घोड़ा, छिपा हुआ तारा, विस्फोट एवं यक्षों की देन भी पढ़ी जा सकती हैं.

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