इज़रायल ने वार्निंग देकर ईरान के टॉप वैज्ञानिक को मारा?
ईरान के न्यूक्लियर साइंटिस्ट मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या से एक तीर दो शिकार किया गया है?
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फ़ख़रीज़ादेह, ईरान के मिशन न्यूक्लियर वेपन का सबसे अहम किरदार थे. (एएफपी)
आज की कहानी फ्लैशबैक में शुरू करेंगे. ये बात है 31 जनवरी, 2018 की. जगह थी, तेहरान का एक सीक्रेट वेअरहाउस. आधी रात होने में अभी घंटे-डेढ़ घंटे की देर थी, जब दबे पांव कुछ लोग इस वेअरहाउस में दाखिल हुए. इन्हें एक बहुत मुश्किल और हाई-प्रोफ़ाइल चोरी के लिए भेजा गया था.
थ्रिलर फिल्मों में देखा होगा आपने. ख़ास कॉम्बिनेशन वाली अलमारियां होती हैं, जिन्हें खोलना बहुत मुश्किल होता है. इन चोरों को पहले वेअरहाउस में लगे अलार्म डिसेबल करने थे. फिर वहां के दो दरवाज़े तोड़ने थे. फिर अंदर दाखिल होकर वहां रखीं 32 अलमारियां तोड़नी थीं. वो भी सुबह 5 बजे तक. क्योंकि मॉर्निंग शिफ़्ट वाले गार्ड्स 7 बजे ड्यूटी पर पहुंच जाते. गार्ड्स के पहुंचने तक इन चोरों को काम निपटाकर बॉर्डर लांघ जाना था.
चोर अपने साथ लाए थे लेज़र टॉर्च . इन टॉर्चों से पैदा हुई करीब साढ़े तीन हज़ार डिग्री की गर्मी. इसने दरवाज़ों को गला दिया. अलमारियों का गेट पिघला दिया. ठीक छह घंटे और 29 मिनट के भीतर इन चोरों ने उन 32 अलमारियों में रखा आधा टन सामान इकट्ठा किया और 5 बजे तक वेअरहाउस से निकल गए.
कौन थे ये लोग? क्या चुराया था इन्होंने?
इस सवाल का जवाब मिला 30 अप्रैल, 2018 को. कहां? तेहरान से करीब 1,900 किलोमीटर दूर टेल अविव में. इस रोज़ इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू टीवी कैमरों के आगे आए. उन्होंने कहा कि इज़रायली खुफ़िया एजेंसी मोसाद के एजेंट्स ईरान में घुसकर उसकी जान से प्यारी एक चीज उड़ा लाए हैं. क्या चुराया था मोसाद ने? उन्होंने चुराए थे 5,000 टॉप सीक्रेट डॉक्यूमेंट्स. 183 डिस्क्स, जिनमें विडियोज़ और गुप्त नक्शे थे. ये सारे दस्तावेज़ जुड़े थे- प्रॉजेक्ट अमाद से.
इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू. (एपी)
क्या था ये अमाद? यूं तो 'अमाद' पैगंबर मुहम्मद के कई नामों में से एक है, मगर ईरान ने ये नाम दिया था अपने सीक्रेट न्यूक्लियर प्लान को. उस रोज़ नेतन्याहू ने कैमरों के आगे एक लंबा-चौड़ा भाषण दिया. इस भाषण की 81वीं लाइन में नेतन्याहू ने लिया एक नाम- डॉक्टर मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह. ईरान के 'प्रॉजेक्ट अमाद' के चीफ. ये नाम लेने के बाद अगली पंक्ति में नेतन्याहू ने कहा था-
रिमेम्बर दैट नेम, फ़ख़रीज़ादेह.
हमको नेतन्याहू की कही ये बात क्यों याद आई?
क्योंकि पिछले तीन रोज़ से दुनिया यही नाम ले रही है- फ़ख़रीज़ादेह. इसलिए कि 28 नवंबर को फ़ख़रीज़ादेह की हत्या कर दी गई. ये हत्या बिल्कुल फ़िल्मी स्टाइल में हुई. हुआ ये कि 28 नवंबर को फ़ख़रीज़ादेह अपनी पत्नी के साथ तेहरान से अपनी ससुराल जा रहे थे. उनकी ससुराल अबसार्ड शहर में है. फ़ख़रीज़ादेह की कार के आगे और पीछे सिक्यॉरिटी का काफ़िला था. रास्ते में एक गोलंबर आया. फ़ख़रीज़ादेह के आगे चल रही कार गोलंबर पर मुड़ी. इससे पहले कि फ़ख़रीज़ादेह की कार टर्न लेती, वहां पास में सड़क किनारे खड़ी एक खाली कार में ज़ोर का धमाका हुआ. ब्लास्ट के कारण फ़ख़रीज़ादेह की कार ने इमरजेंसी ब्रेक लिया और सड़क पर रुक गई.
ठीक इसी वक़्त न जाने कहां से एक कार और चार बाइक्स प्रकट हुईं. इनपर करीब 12 हथियारबंद हमलावर थे. इन्होंने फ़ख़रीज़ादेह और उनके पीछे आ रही प्रॉटेक्शन टीम की कार पर फायरिंग शुरू कर दी. फिर हमलावरों ने फ़ख़रीज़ादेह को उनकी कार से निकालकर गोली मारी. इसके बाद वो सभी 12 हमलावर जिस तरह अचानक से प्रकट हुए थे, वैसे ही गायब भी हो गए.
ये हमला सुनियोजित था. हमलावरों को फ़ख़रीज़ादेह का पूरा रूट मालूम था. वो घात लगाकर अपने शिकार का इंतज़ार कर रहे थे. हमला करने से ऐन पहले उस पूरे इलाके की बिजली उड़ा दी गई थी. सड़क किनारे लगे कैमरे ऑफ़ कर दिए गए थे. जब तक एक रेस्क्यू हेलिकॉप्टर फ़ख़रीज़ादेह को अस्पताल ले जाने के लिए वहां पहुंचता, वो मर चुके थे.
वो जगह जहां फ़ख़रीज़ादेह पर हमला किया गया. (एएफपी)
कैसे किया गया ये हमला?
हमले के स्टाइल से जुड़ी कुछ और भी कहानियां तैर रही हैं. मसलन, ईरान की एक न्यूज़ एजेंसी है फार्स. इसका कहना है ये पूरा ऑपरेशन रिमोट कंट्रोल से हुआ. वो भी बस तीन मिनट के भीतर. इस रिपोर्ट के मुताबिक, फ़ख़रीज़ादेह के आगे चल रही सिक्यॉरिटी कार इन्सपेक्शन के लिए थोड़ा आगे बढ़ गई थी. इतने में फ़ख़रीज़ादेह की कार पर गोलियां चलने लगीं.
ये गोलियां कोई इंसान नहीं चला रहा था. ये चल रही थीं, करीब 500 फीट दूर खड़ी एक कार से. जिसके ऊपर रिमोट कंट्रोल से चलने वाली एक मशीन फिट थी. गोलियों की आवाज़ सुनकर फ़ख़रीज़ादेह कन्फ़्यूज़ हो गए. उन्हें कोई गोली चलाता हुआ दिखा नहीं, सो उन्होंने सोचा कि शायद उनकी कार में कुछ ख़राबी आई है. वो कार से बाहर निकले. इसी वक़्त उस रिमोट कंट्रोल्ड मशीनगन ने उन्हें तीन गोलियां मारीं. इसके बाद उस अटैकिंग कार में एक विस्फ़ोट हुआ और उसके चीथड़े उड़ गए. ये कार जिसके नाम पर रजिस्टर्ड थी, वो आदमी 29 अक्टूबर को ही ईरान छोड़कर जा चुका था.
हत्या के स्टाइल, इसकी मोडस ऑपरेंडी के कई संस्करण शेयर हो रहे हैं. ईरान की कुछ लोकल एजेंसिज़ के मुताबिक, 62 लोगों के एक हिट स्क्वैड ने इस हत्या को अंज़ाम दिया. इनमें से 50 लॉजिस्टिकल सपोर्ट दे रहे थे, जबकि ग्राउंड पर इस असेसिनेशन को अंजाम दिया 12 लोगों की एक टीम ने.
अब सवाल है कि फ़ख़रीज़ादेह को मारा क्यों गया?
क्या करते थे वो कि उन्हें इस तरह टारगेट किया गया? फ़ख़रीज़ादेह प्रफ़ेसर थे. वो तेहरान की 'इमाम हुसैन यूनिवर्सिटी' में प्रफ़ेसर थे. इस यूनिवर्सिटी को समझिए, ईरान की न्यूक्लियर महत्वाकांक्षाओं का सेंटर. इसी मिशन न्यूक्लियर वेपन का सबसे अहम किरदार थे फ़ख़रीज़ादेह.
ईरान का आधिकारिक दावा है कि उसने न्यूक्लियर हथियार कभी चाहा ही नहीं. ईरान के मुताबिक, न्यूक्लिर वेपन्स जैसे सामूहिक तबाही के हथियार अनैतिक हैं, उसके आदर्शों के खिलाफ हैं. ईरान का दावा है कि वो केवल न्यूक्लियर एनर्जी का पॉज़िटिव इस्तेमाल करना चाहता है. मगर ईरान के इन दावों पर न तो पश्चिमी देशों को एतबार था, न ही ईरान के कट्टर दुश्मन सऊदी और इज़रायल को. सऊदी और इज़रायल का दावा था कि ईरान सीक्रेटली न्यूक्लियर वेपन्स विकसित करने में लगा है. इसी सीक्रेट वेपन प्रोग्राम का नाम है, अमाद. जिसके बारे में हमने आपको एपिसोड की शुरुआत में बताया था. इसी प्रॉजेक्ट अमाद के चीफ थे फ़ख़रीज़ादेह.
सऊदी अरबिया के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान. (एपी)
इंटरनैशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी का काम न्यूक्लियर एनर्जी के मिलिटरी इस्तेमाल पर रोक लगाना है.
फ़ख़रीज़ादेह की मौत का क्या असर होगा ईरान पर?
ये समझिए कि वो ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम का दिल थे. उन्हें किसी भी और इंसान से ज़्यादा जानकारी थी इसकी. उनकी हत्या ईरान के लिए वैसी ही है, जैसी कुद्स फोर्स के चीफ मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या. इन नुकसानों की भरपाई नहीं हो सकती.
अब सवाल है कि ये न्यूक्लियर प्रोग्राम ईरान के लिए इतना मायने क्यों रखता है? इसका जवाब है- हेगेम्नी. यानी, नायकत्व. सबसे ज़्यादा मज़बूत और ताकतवर होने की इच्छा. मिडिल-ईस्ट को कंट्रोल करने की चाहत. ये ख़्वाहिश रखने वाला मिडिल-ईस्ट का अकेला देश नहीं है ईरान. सऊदी और इज़रायल भी यही चाहते हैं. इसीलिए ईरान जितनी शिद्दत से न्यूक्लियर वेपन बनाना चाहता है, उसी शिद्दत से इज़रायल और सऊदी उसके इस न्यूक्लियर प्रोग्राम को ख़त्म करना चाहते हैं. इन कोशिशों में सबसे आगे है इज़रायल. ईरान का यही ख़तरा है, जिसकी वजह से इज़रायल और सऊदी अपनी दुश्मनी भी भुलाने को तैयार हैं.
फ़ख़रीज़ादेह पहले न्यूक्लियर साइंटिस्ट्स नहीं हैं, जिनकी हत्या हुई हो. पहले भी कई ईरानी वैज्ञानिक मारे गए हैं. हत्याओं की ये श्रृंखला शुरू हुई 2010 में. इस साल पार्टिकल फ़िजिक्स के ईरानी एक्सपर्ट मसूद अली मुहम्मदी की हत्या हुई. इसी बरस माजिद शहरियार नाम के न्यूक्लियर साइंटिस्ट का भी मर्डर हुआ. जिस रोज़ शहरियार का मर्डर हुआ, उसी दिन ईरानी अटॉमिक चीफ अब्बासी दवानी पर भी जानलेवा हमला हुआ. शहरियार और अब्बासी, दोनों ही फ़ख़रीज़ादेह के सहयोगी थे.
फिर 2011 में साइंटिस्ट दरियॉश रेज़ाइनेजाद की हत्या हुई. 2012 में ईरान के नतांज़ यूरेनियम एनरिचमेंट प्रतिष्ठान के डेप्युटी हेड मुस्तफ़ा अहमदी रोशन को भी मार डाला गया. इनके अलावा और भी कई साइंटिस्ट्स मारे गए. कइयों को अगवा भी किया गया.
ईरान के नतांज़ यूरेनियम एनरिचमेंट प्रतिष्ठान के पूर्व डेप्युटी हेड मुस्तफ़ा अहमदी रोशन (एएफपी)
कौन है इन घटनाओं के पीछे?
देखिए, जब भी ऐसी कोई घटना होती है, तब सबसे पहले उंगली उठती है इज़रायल पर. फ़ख़रीज़ादेह की हत्या पर भी ईरान ने इज़रायल का नाम लिया. सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह ख़ामेनेई बोले कि ईरानी अधिकारियों को इस हत्या का बदला लेने की कसम खानी चाहिए. राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा कि समय आने पर ईरान इस हत्या का जवाब देगा. विदेश मंत्री मुहम्मद जवाद ज़रीफ ने इसे 'स्टेट स्पॉन्सर्ड टेररिज़म' बताया.
ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी (एपी)
ईरान के इन आरोपों पर इज़रायल हमेशा की तरह चुप है. उसने न इनकार किया है, न स्वीकार किया है. उसने एहतियातन अपने सभी दूतावासों की सुरक्षा बढ़ा दी है. जर्मनी ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है. उसने जो बाइडन के आमद की याद दिलाकर ईरान को शांत कराने की कोशिश की. मगर जानकारों का कहना है कि शायद बाइडन को ही ध्यान में रखकर फ़ख़रीज़ादेह की हत्या की गई है.
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह ख़ामेनेई (एपी)
कैसे? देखिए, बराक ओबामा के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति थे बाइडन. ओबामा प्रेज़िडेंसी का सबसे बड़ा हासिल थी, 2015 में हुई ईरान न्यूक्लियर डील. ट्रंप ने इस डील से अमेरिका को अलग कर दिया. अब ट्रंप की विदाई हो रही है. अगले राष्ट्रपति होंगे बाइडन. वो ईरान न्यूक्लियर डील को फिर ज़िंदा करना चाहते हैं. संभावना है कि अगर ईरान 2015 की डील में तय हुई शर्तें मानने को राज़ी हो, तो बाइडन उसपर लगे आर्थिक प्रतिबंध भी हटा दें.
अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और नए चुने गए राष्ट्रपति जो बाइडन. (एपी)
इज़रायल जानबूझकर ईरान को उकसा रहा है?
जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय देश भी यही चाहते हैं. जबकि इज़रायल और सऊदी इसके सख़्त विरोधी हैं. बाइडन की जीत के बाद नेतन्याहू ने कहा भी था. कि ईरान न्यूक्लियर डील फिर से ज़िंदा नहीं होना चाहिए. फिर पिछले दिनों ख़बर आई कि नेतन्याहू ने सऊदी जाकर क्राउन प्रिंस MBS से सीक्रेट मीटिंग की. इस मीटिंग में क्या डिस्कस हुआ, ये तो नहीं पता. मगर इसके बाद ही फ़ख़रीज़ादेह को मारा गया है.
तो ऐंगल ये निकल रहा है कि इज़रायल जानबूझकर ईरान को उकसा रहा है. टेंशन बढ़ा रहा है. ताकि ईरान गुस्से में कोई कदम उठाए और बाइडन के लिए तेहरान के साथ डिप्लोमैसी रिवाइव करना मुश्किल हो जाए. 2020 में ईरान पर कई हमले हुए हैं.
साल शुरू हुआ ईरानी मिलिटरी इंटेलिजेंस के चीफ क़ासिम सुलेमानी की हत्या से. फिर ईरान के कई अहम ठिकानों पर मिस्टीरियस हमले हुए. इनकी वजह से ईरानी जनता में बहुत नाराज़गी है. अगर ईरानी लीडरशिप ने कोई जवाबी कदम न उठाया, तो जनता की नज़रों में कमज़ोर दिखने का ख़तरा है. अगर इतने हमलों के बाद भी ईरानी नेतृत्व बाइडन अडमिनिस्ट्रेशन से बात करता है, उनकी शर्तें मानता है, तब भी ईरानी जनता के बीच उनकी न झुकने वाली छवि को नुकसान पहुंचेगा.
ईरान के पूर्व मिलिटरी इंटेलिजेंस के चीफ क़ासिम सुलेमानी (एएफपी)
कुल मिलाकर अगर सच में ही इज़रायल ने फ़ख़रीज़ादेह को मारा है, तो उसने एक तीर से दो वार किए हैं. एक तरफ उसने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को कमज़ोर किया. अपनी सबसे बड़ी असुरक्षा, सबसे बड़े दुश्मनों में से एक को ख़त्म किया. साथ-साथ, ईरान के साथ रिश्ते सुधारने की बाइडन की कोशिशों को भी झटका लगाया.
जाते-जाते एक किस्सा पढ़ते जाइए
इज़रायल वैसे भी अपने टारगेट्स को ठिकाने लगाने और बदला लेने के लिए कुख़्यात रहा है. इससे जुड़ा एक मशहूर प्रसंग है म्यूनिख़ अटैक का. ये 5 सितंबर, 1972 की बात है. जर्मनी के म्यूनिख़ में ओलिंपिक गेम्स हो रहे थे. उस रोज़ ब्लैक सेप्टेम्बर नाम के एक फिलिस्तीनी आतंकी संगठन ने ओलिंपिक विलेज़ पर हमला कर दिया. उन्होंने 11 इज़रायली ऐथलीट्स को अगवा कर लिया. बंधकों की रिहाई के लिए जर्मनी ने एक रेस्क्यू ऑपरेशन किया. मगर इसका नतीजा ये हुआ कि सभी इज़रायली हॉस्टेज मार डाले गए.
इज़रायल की पूर्व प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर (एएफपी)
उस वक़्त इज़रायल की प्रधानमंत्री थीं गोल्डा मेयर. उन्होंने म्यूनिख़ हमले का बदला लेने के लिए तैयार करवाया एक ख़ास ऑपरेशन. इसका नाम था- रॉथ ऑफ़ गॉड. पता है, ये ऑपरेशन कितने सालों तक चला? पूरे 20 सालों तक. हर वो आदमी, जो किसी-न-किसी तरह म्यूनिख़ अटैक से जुड़ा था, इसका जिम्मेदार था, उन्हें खोज-खोजकर ठिकाने लगाया गया. फिर चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने में छिपे बैठे हों. भले उन्होंने आतंकवाद से किनारा क्यों न कर लिया हो. मगर इज़रायल ने चुन-चुनकर सबको मारा. इस प्रकरण पर स्टीवन स्पीलबर्ग की एक बढ़िया फिल्म भी है- म्यूनिख़. मन करे, तो फ़िल्म देख लीजिएगा.
थ्रिलर फिल्मों में देखा होगा आपने. ख़ास कॉम्बिनेशन वाली अलमारियां होती हैं, जिन्हें खोलना बहुत मुश्किल होता है. इन चोरों को पहले वेअरहाउस में लगे अलार्म डिसेबल करने थे. फिर वहां के दो दरवाज़े तोड़ने थे. फिर अंदर दाखिल होकर वहां रखीं 32 अलमारियां तोड़नी थीं. वो भी सुबह 5 बजे तक. क्योंकि मॉर्निंग शिफ़्ट वाले गार्ड्स 7 बजे ड्यूटी पर पहुंच जाते. गार्ड्स के पहुंचने तक इन चोरों को काम निपटाकर बॉर्डर लांघ जाना था.
चोर अपने साथ लाए थे लेज़र टॉर्च . इन टॉर्चों से पैदा हुई करीब साढ़े तीन हज़ार डिग्री की गर्मी. इसने दरवाज़ों को गला दिया. अलमारियों का गेट पिघला दिया. ठीक छह घंटे और 29 मिनट के भीतर इन चोरों ने उन 32 अलमारियों में रखा आधा टन सामान इकट्ठा किया और 5 बजे तक वेअरहाउस से निकल गए.
कौन थे ये लोग? क्या चुराया था इन्होंने?
इस सवाल का जवाब मिला 30 अप्रैल, 2018 को. कहां? तेहरान से करीब 1,900 किलोमीटर दूर टेल अविव में. इस रोज़ इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू टीवी कैमरों के आगे आए. उन्होंने कहा कि इज़रायली खुफ़िया एजेंसी मोसाद के एजेंट्स ईरान में घुसकर उसकी जान से प्यारी एक चीज उड़ा लाए हैं. क्या चुराया था मोसाद ने? उन्होंने चुराए थे 5,000 टॉप सीक्रेट डॉक्यूमेंट्स. 183 डिस्क्स, जिनमें विडियोज़ और गुप्त नक्शे थे. ये सारे दस्तावेज़ जुड़े थे- प्रॉजेक्ट अमाद से.
इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू. (एपी)
क्या था ये अमाद? यूं तो 'अमाद' पैगंबर मुहम्मद के कई नामों में से एक है, मगर ईरान ने ये नाम दिया था अपने सीक्रेट न्यूक्लियर प्लान को. उस रोज़ नेतन्याहू ने कैमरों के आगे एक लंबा-चौड़ा भाषण दिया. इस भाषण की 81वीं लाइन में नेतन्याहू ने लिया एक नाम- डॉक्टर मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह. ईरान के 'प्रॉजेक्ट अमाद' के चीफ. ये नाम लेने के बाद अगली पंक्ति में नेतन्याहू ने कहा था-
रिमेम्बर दैट नेम, फ़ख़रीज़ादेह.
हमको नेतन्याहू की कही ये बात क्यों याद आई?
क्योंकि पिछले तीन रोज़ से दुनिया यही नाम ले रही है- फ़ख़रीज़ादेह. इसलिए कि 28 नवंबर को फ़ख़रीज़ादेह की हत्या कर दी गई. ये हत्या बिल्कुल फ़िल्मी स्टाइल में हुई. हुआ ये कि 28 नवंबर को फ़ख़रीज़ादेह अपनी पत्नी के साथ तेहरान से अपनी ससुराल जा रहे थे. उनकी ससुराल अबसार्ड शहर में है. फ़ख़रीज़ादेह की कार के आगे और पीछे सिक्यॉरिटी का काफ़िला था. रास्ते में एक गोलंबर आया. फ़ख़रीज़ादेह के आगे चल रही कार गोलंबर पर मुड़ी. इससे पहले कि फ़ख़रीज़ादेह की कार टर्न लेती, वहां पास में सड़क किनारे खड़ी एक खाली कार में ज़ोर का धमाका हुआ. ब्लास्ट के कारण फ़ख़रीज़ादेह की कार ने इमरजेंसी ब्रेक लिया और सड़क पर रुक गई.
ठीक इसी वक़्त न जाने कहां से एक कार और चार बाइक्स प्रकट हुईं. इनपर करीब 12 हथियारबंद हमलावर थे. इन्होंने फ़ख़रीज़ादेह और उनके पीछे आ रही प्रॉटेक्शन टीम की कार पर फायरिंग शुरू कर दी. फिर हमलावरों ने फ़ख़रीज़ादेह को उनकी कार से निकालकर गोली मारी. इसके बाद वो सभी 12 हमलावर जिस तरह अचानक से प्रकट हुए थे, वैसे ही गायब भी हो गए.
ये हमला सुनियोजित था. हमलावरों को फ़ख़रीज़ादेह का पूरा रूट मालूम था. वो घात लगाकर अपने शिकार का इंतज़ार कर रहे थे. हमला करने से ऐन पहले उस पूरे इलाके की बिजली उड़ा दी गई थी. सड़क किनारे लगे कैमरे ऑफ़ कर दिए गए थे. जब तक एक रेस्क्यू हेलिकॉप्टर फ़ख़रीज़ादेह को अस्पताल ले जाने के लिए वहां पहुंचता, वो मर चुके थे.
वो जगह जहां फ़ख़रीज़ादेह पर हमला किया गया. (एएफपी)
कैसे किया गया ये हमला?
हमले के स्टाइल से जुड़ी कुछ और भी कहानियां तैर रही हैं. मसलन, ईरान की एक न्यूज़ एजेंसी है फार्स. इसका कहना है ये पूरा ऑपरेशन रिमोट कंट्रोल से हुआ. वो भी बस तीन मिनट के भीतर. इस रिपोर्ट के मुताबिक, फ़ख़रीज़ादेह के आगे चल रही सिक्यॉरिटी कार इन्सपेक्शन के लिए थोड़ा आगे बढ़ गई थी. इतने में फ़ख़रीज़ादेह की कार पर गोलियां चलने लगीं.
ये गोलियां कोई इंसान नहीं चला रहा था. ये चल रही थीं, करीब 500 फीट दूर खड़ी एक कार से. जिसके ऊपर रिमोट कंट्रोल से चलने वाली एक मशीन फिट थी. गोलियों की आवाज़ सुनकर फ़ख़रीज़ादेह कन्फ़्यूज़ हो गए. उन्हें कोई गोली चलाता हुआ दिखा नहीं, सो उन्होंने सोचा कि शायद उनकी कार में कुछ ख़राबी आई है. वो कार से बाहर निकले. इसी वक़्त उस रिमोट कंट्रोल्ड मशीनगन ने उन्हें तीन गोलियां मारीं. इसके बाद उस अटैकिंग कार में एक विस्फ़ोट हुआ और उसके चीथड़े उड़ गए. ये कार जिसके नाम पर रजिस्टर्ड थी, वो आदमी 29 अक्टूबर को ही ईरान छोड़कर जा चुका था.
हत्या के स्टाइल, इसकी मोडस ऑपरेंडी के कई संस्करण शेयर हो रहे हैं. ईरान की कुछ लोकल एजेंसिज़ के मुताबिक, 62 लोगों के एक हिट स्क्वैड ने इस हत्या को अंज़ाम दिया. इनमें से 50 लॉजिस्टिकल सपोर्ट दे रहे थे, जबकि ग्राउंड पर इस असेसिनेशन को अंजाम दिया 12 लोगों की एक टीम ने.
अब सवाल है कि फ़ख़रीज़ादेह को मारा क्यों गया?
क्या करते थे वो कि उन्हें इस तरह टारगेट किया गया? फ़ख़रीज़ादेह प्रफ़ेसर थे. वो तेहरान की 'इमाम हुसैन यूनिवर्सिटी' में प्रफ़ेसर थे. इस यूनिवर्सिटी को समझिए, ईरान की न्यूक्लियर महत्वाकांक्षाओं का सेंटर. इसी मिशन न्यूक्लियर वेपन का सबसे अहम किरदार थे फ़ख़रीज़ादेह.
ईरान का आधिकारिक दावा है कि उसने न्यूक्लियर हथियार कभी चाहा ही नहीं. ईरान के मुताबिक, न्यूक्लिर वेपन्स जैसे सामूहिक तबाही के हथियार अनैतिक हैं, उसके आदर्शों के खिलाफ हैं. ईरान का दावा है कि वो केवल न्यूक्लियर एनर्जी का पॉज़िटिव इस्तेमाल करना चाहता है. मगर ईरान के इन दावों पर न तो पश्चिमी देशों को एतबार था, न ही ईरान के कट्टर दुश्मन सऊदी और इज़रायल को. सऊदी और इज़रायल का दावा था कि ईरान सीक्रेटली न्यूक्लियर वेपन्स विकसित करने में लगा है. इसी सीक्रेट वेपन प्रोग्राम का नाम है, अमाद. जिसके बारे में हमने आपको एपिसोड की शुरुआत में बताया था. इसी प्रॉजेक्ट अमाद के चीफ थे फ़ख़रीज़ादेह.
सऊदी अरबिया के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान. (एपी)
न्यूक्लियर एनर्जी से जुड़ी एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है- IAEA. पूरा नाम- इंटरनैशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी. इसका काम है, न्यूक्लियर एनर्जी के मिलिटरी इस्तेमाल पर रोक लगाना. IAEA के मुताबिक, 2003 के आसपास आकर ईरान ने प्रॉजेक्ट अमाद को बंद कर दिया. मगर 2018 में मोसाद द्वारा चुराए गए सीक्रेट डॉक्यूमेंट्स से पता चला कि ईरान अब भी इस प्रोग्राम को डिवेलप करने में लगा है. इस काम को अंजाम दे रहा है SPND नाम का एक संगठन. ये SPND ईरान के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला एक ऑर्गनाइज़ेशन है. और इस SPND के भी चीफ थे फ़ख़रीज़ादेह.
इंटरनैशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी का काम न्यूक्लियर एनर्जी के मिलिटरी इस्तेमाल पर रोक लगाना है.
फ़ख़रीज़ादेह की मौत का क्या असर होगा ईरान पर?
ये समझिए कि वो ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम का दिल थे. उन्हें किसी भी और इंसान से ज़्यादा जानकारी थी इसकी. उनकी हत्या ईरान के लिए वैसी ही है, जैसी कुद्स फोर्स के चीफ मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या. इन नुकसानों की भरपाई नहीं हो सकती.
अब सवाल है कि ये न्यूक्लियर प्रोग्राम ईरान के लिए इतना मायने क्यों रखता है? इसका जवाब है- हेगेम्नी. यानी, नायकत्व. सबसे ज़्यादा मज़बूत और ताकतवर होने की इच्छा. मिडिल-ईस्ट को कंट्रोल करने की चाहत. ये ख़्वाहिश रखने वाला मिडिल-ईस्ट का अकेला देश नहीं है ईरान. सऊदी और इज़रायल भी यही चाहते हैं. इसीलिए ईरान जितनी शिद्दत से न्यूक्लियर वेपन बनाना चाहता है, उसी शिद्दत से इज़रायल और सऊदी उसके इस न्यूक्लियर प्रोग्राम को ख़त्म करना चाहते हैं. इन कोशिशों में सबसे आगे है इज़रायल. ईरान का यही ख़तरा है, जिसकी वजह से इज़रायल और सऊदी अपनी दुश्मनी भी भुलाने को तैयार हैं.
फ़ख़रीज़ादेह पहले न्यूक्लियर साइंटिस्ट्स नहीं हैं, जिनकी हत्या हुई हो. पहले भी कई ईरानी वैज्ञानिक मारे गए हैं. हत्याओं की ये श्रृंखला शुरू हुई 2010 में. इस साल पार्टिकल फ़िजिक्स के ईरानी एक्सपर्ट मसूद अली मुहम्मदी की हत्या हुई. इसी बरस माजिद शहरियार नाम के न्यूक्लियर साइंटिस्ट का भी मर्डर हुआ. जिस रोज़ शहरियार का मर्डर हुआ, उसी दिन ईरानी अटॉमिक चीफ अब्बासी दवानी पर भी जानलेवा हमला हुआ. शहरियार और अब्बासी, दोनों ही फ़ख़रीज़ादेह के सहयोगी थे.
फिर 2011 में साइंटिस्ट दरियॉश रेज़ाइनेजाद की हत्या हुई. 2012 में ईरान के नतांज़ यूरेनियम एनरिचमेंट प्रतिष्ठान के डेप्युटी हेड मुस्तफ़ा अहमदी रोशन को भी मार डाला गया. इनके अलावा और भी कई साइंटिस्ट्स मारे गए. कइयों को अगवा भी किया गया.
ईरान के नतांज़ यूरेनियम एनरिचमेंट प्रतिष्ठान के पूर्व डेप्युटी हेड मुस्तफ़ा अहमदी रोशन (एएफपी)
कौन है इन घटनाओं के पीछे?
देखिए, जब भी ऐसी कोई घटना होती है, तब सबसे पहले उंगली उठती है इज़रायल पर. फ़ख़रीज़ादेह की हत्या पर भी ईरान ने इज़रायल का नाम लिया. सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह ख़ामेनेई बोले कि ईरानी अधिकारियों को इस हत्या का बदला लेने की कसम खानी चाहिए. राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा कि समय आने पर ईरान इस हत्या का जवाब देगा. विदेश मंत्री मुहम्मद जवाद ज़रीफ ने इसे 'स्टेट स्पॉन्सर्ड टेररिज़म' बताया.
ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी (एपी)
ईरान के इन आरोपों पर इज़रायल हमेशा की तरह चुप है. उसने न इनकार किया है, न स्वीकार किया है. उसने एहतियातन अपने सभी दूतावासों की सुरक्षा बढ़ा दी है. जर्मनी ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है. उसने जो बाइडन के आमद की याद दिलाकर ईरान को शांत कराने की कोशिश की. मगर जानकारों का कहना है कि शायद बाइडन को ही ध्यान में रखकर फ़ख़रीज़ादेह की हत्या की गई है.
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह ख़ामेनेई (एपी)
कैसे? देखिए, बराक ओबामा के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति थे बाइडन. ओबामा प्रेज़िडेंसी का सबसे बड़ा हासिल थी, 2015 में हुई ईरान न्यूक्लियर डील. ट्रंप ने इस डील से अमेरिका को अलग कर दिया. अब ट्रंप की विदाई हो रही है. अगले राष्ट्रपति होंगे बाइडन. वो ईरान न्यूक्लियर डील को फिर ज़िंदा करना चाहते हैं. संभावना है कि अगर ईरान 2015 की डील में तय हुई शर्तें मानने को राज़ी हो, तो बाइडन उसपर लगे आर्थिक प्रतिबंध भी हटा दें.
अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और नए चुने गए राष्ट्रपति जो बाइडन. (एपी)
इज़रायल जानबूझकर ईरान को उकसा रहा है?
जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय देश भी यही चाहते हैं. जबकि इज़रायल और सऊदी इसके सख़्त विरोधी हैं. बाइडन की जीत के बाद नेतन्याहू ने कहा भी था. कि ईरान न्यूक्लियर डील फिर से ज़िंदा नहीं होना चाहिए. फिर पिछले दिनों ख़बर आई कि नेतन्याहू ने सऊदी जाकर क्राउन प्रिंस MBS से सीक्रेट मीटिंग की. इस मीटिंग में क्या डिस्कस हुआ, ये तो नहीं पता. मगर इसके बाद ही फ़ख़रीज़ादेह को मारा गया है.
तो ऐंगल ये निकल रहा है कि इज़रायल जानबूझकर ईरान को उकसा रहा है. टेंशन बढ़ा रहा है. ताकि ईरान गुस्से में कोई कदम उठाए और बाइडन के लिए तेहरान के साथ डिप्लोमैसी रिवाइव करना मुश्किल हो जाए. 2020 में ईरान पर कई हमले हुए हैं.
साल शुरू हुआ ईरानी मिलिटरी इंटेलिजेंस के चीफ क़ासिम सुलेमानी की हत्या से. फिर ईरान के कई अहम ठिकानों पर मिस्टीरियस हमले हुए. इनकी वजह से ईरानी जनता में बहुत नाराज़गी है. अगर ईरानी लीडरशिप ने कोई जवाबी कदम न उठाया, तो जनता की नज़रों में कमज़ोर दिखने का ख़तरा है. अगर इतने हमलों के बाद भी ईरानी नेतृत्व बाइडन अडमिनिस्ट्रेशन से बात करता है, उनकी शर्तें मानता है, तब भी ईरानी जनता के बीच उनकी न झुकने वाली छवि को नुकसान पहुंचेगा.
ईरान के पूर्व मिलिटरी इंटेलिजेंस के चीफ क़ासिम सुलेमानी (एएफपी)
कुल मिलाकर अगर सच में ही इज़रायल ने फ़ख़रीज़ादेह को मारा है, तो उसने एक तीर से दो वार किए हैं. एक तरफ उसने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को कमज़ोर किया. अपनी सबसे बड़ी असुरक्षा, सबसे बड़े दुश्मनों में से एक को ख़त्म किया. साथ-साथ, ईरान के साथ रिश्ते सुधारने की बाइडन की कोशिशों को भी झटका लगाया.
जाते-जाते एक किस्सा पढ़ते जाइए
इज़रायल वैसे भी अपने टारगेट्स को ठिकाने लगाने और बदला लेने के लिए कुख़्यात रहा है. इससे जुड़ा एक मशहूर प्रसंग है म्यूनिख़ अटैक का. ये 5 सितंबर, 1972 की बात है. जर्मनी के म्यूनिख़ में ओलिंपिक गेम्स हो रहे थे. उस रोज़ ब्लैक सेप्टेम्बर नाम के एक फिलिस्तीनी आतंकी संगठन ने ओलिंपिक विलेज़ पर हमला कर दिया. उन्होंने 11 इज़रायली ऐथलीट्स को अगवा कर लिया. बंधकों की रिहाई के लिए जर्मनी ने एक रेस्क्यू ऑपरेशन किया. मगर इसका नतीजा ये हुआ कि सभी इज़रायली हॉस्टेज मार डाले गए.
इज़रायल की पूर्व प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर (एएफपी)
उस वक़्त इज़रायल की प्रधानमंत्री थीं गोल्डा मेयर. उन्होंने म्यूनिख़ हमले का बदला लेने के लिए तैयार करवाया एक ख़ास ऑपरेशन. इसका नाम था- रॉथ ऑफ़ गॉड. पता है, ये ऑपरेशन कितने सालों तक चला? पूरे 20 सालों तक. हर वो आदमी, जो किसी-न-किसी तरह म्यूनिख़ अटैक से जुड़ा था, इसका जिम्मेदार था, उन्हें खोज-खोजकर ठिकाने लगाया गया. फिर चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने में छिपे बैठे हों. भले उन्होंने आतंकवाद से किनारा क्यों न कर लिया हो. मगर इज़रायल ने चुन-चुनकर सबको मारा. इस प्रकरण पर स्टीवन स्पीलबर्ग की एक बढ़िया फिल्म भी है- म्यूनिख़. मन करे, तो फ़िल्म देख लीजिएगा.

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