जाति देखकर मृतक के परिवार को मुआवजा देती है योगी सरकार; इस आरोप में कितना दम है?
विवेक तिवारी, मनीष गुप्ता के मामले में मुआवजा 40 लाख, तो अरुण वाल्मीकि को 10 लाख क्यों?
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पुलिस कस्टडी में अरुण वाल्मिकि की मौत के मामले में 10 लाख मुआवजा देने को लेकर कुछ लोगों ने योगी सरकार पर जाति के आधार पर मुआवजा देने में भेदभाव का आरोप लगाया है.
आगरा के अरुण वाल्मीकि की पुलिस कस्टडी में मौत होने पर बवाल मचा हुआ है. आरोपी पुलिस वालों पर केस दर्ज हो चुका है. कुछ को सस्पेंड किया गया है. वहीं योगी आदित्यनाथ सरकार ने अरुण वाल्मीकि के परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा किया है. साथ ही 10 लाख रुपये बतौर मुआवजा देने की घोषणा भी की है. लेकिन इस मुआवजे को लेकर बहस छिड़ गई है. इस आरोप को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा गर्म है कि योगी सरकार हत्या के पीड़ितों के परिवारों को मुआवजा देने में जातिगत भेदभाव कर रही है. कुछ लोगों के ट्वीट देखिए, फिर आगे की बात करते हैं.
प्रोफेसर दिलीप मंडल दलित-आदिवासी समाज के मुद्दे उठाने के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल से लिखा है,
पुलिस की गलती से हुई दो मौतें. विवेक तिवारी की मौत की क़ीमत 40 लाख रुपए और वाल्मीकि की मौत की क़ीमत 10 लाख रुपए. उत्तर प्रदेश सरकार की मुआवज़ा नीति है या मनुस्मृति? हर ज़िंदगी की क़ीमत अलग-अलग क्यों? यूपी सरकार ने पुलिस की गलती से हुई मौत में भी जातिवाद कर दिया.
लेखक अशोक पांडेय ने ट्वीट किया,यूपी सरकार ने पुलिस की गलती से हुई मौत में भी जातिवाद कर दिया। लाश की क़ीमत भी अलग अलग लगाई जा रही है। शर्म करो और डूब मरो @myogiadityanath#JusticeforArunValmikipic.twitter.com/DBV4bIKtMD
— Dilip Mandal (@Profdilipmandal) October 20, 2021
ख़ून में इतना भी व्यापार ठीक नहीं कि जान की क़ीमत भी अलग-अलग लगाई जाए. एक दलित को बाक़ियों से कम मुआवज़ा क्यों दे रही है सरकार? धिक्कार है.
आयुष नाम के यूजर ने अरुण वाल्मीकि के लिए न्याय मांगते हुए ये ट्वीट किया,ख़ून में इतना भी व्यापार ठीक नहीं कि जान की क़ीमत भी अलग-अलग लगाई जाए।
एक दलित को बाक़ियों से कम मुआवज़ा क्यों दे रही है सरकार? धिक्कार है pic.twitter.com/OpCd86vuRo — Ashok Kumar Pandey अशोक اشوک (@Ashok_Kashmir) October 21, 2021
इस तरह के कई सारे ट्वीट आपको देखने को मिल जाएंगे जिनमें विवेक तिवारी मर्डर केस, मनीष गुप्ता मर्डर केस और अरुण वाल्मीकि हत्या मामले में सरकार की तरफ से दिए गए मुआवजे को जाति के एंगल से देखा जा रहा है. आगे बढ़ने से पहले इन तीनों मामलों पर जल्दी से नजर डाल लेते हैं. विवेक तिवारी मर्डर केस लखनऊ के विवेक तिवारी एपल कंपनी के एरिया मैनेजर थे. 28 सितंबर 2018 की रात वो अपनी सहकर्मी को छोड़ने अपनी एसयूवी से जा रहे थे. रात के करीब डेढ़ बजे बाइक सवार दो पुलिसकर्मियों ने उन्हें रोकने का इशारा किया. जब वे नहीं रुके तो सिपाही प्रशांत चौधरी ने विवेक को निशाना बनाकर गोली चला दी. विवेक की मौत हो गई. आरोपी पुलिसवालों पर केस दर्ज हुआ. यूपी सरकार ने मुआवजे की घोषणा की. खुद सीएम योगी ने विवेक तिवारी के परिवार को 40 लाख का चेक दिया. सरकार की ओर से विवेक तिवारी की पत्नी को सरकारी नौकरी दी गई. मनीष गुप्ता हत्याकांड इसी साल 27 सितंबर की देर रात गोरखपुर के कृष्णा होटल में कानपुर के कारोबारी मनीष गुप्ता की हत्या कर दी गई थी. मनीष अपने दो दोस्तों के साथ होटल में ठहरे थे. रात साढ़े 12 बजे के आसपास पुलिस कमरे में घुसी और पूछताछ करने लगी. इस दौरान मनीष की उनसे बहस हो गई. इस पर पुलिसवालों ने कथित तौर पर मारपीट की जिससे मनीष की मौत हो गई. मीडिया में हंगामा हुआ तब जाकर आरोपी पुलिस वालों पर केस हुआ. बाद में उनकी गिरफ्तारी हुई. वहीं सरकार ने परिवार को 40 लाख रुपये का मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की बात कही. अरुण वाल्मीकि मामला इसी हफ्ते आई मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक आगरा के जगदीशपुर थाने के मालखाने से 25 लाख रुपए चोरी हो गए. चोरी के आरोप में अरुण वाल्मीकि नाम के सफाई कर्मचारी को पुलिस ने 19 अक्टूबर को अरेस्ट किया. लेकिन उसी रात पुलिस कस्टडी में अरुण की मौत हो गई. परिजनों ने आरोप लगाया कि अरुण की मौत पुलिस की पिटाई से हुई. विवाद बढ़ा तो सरकार ने आरोपी पुलिसवालों पर एक्शन लिया. परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी का वादा किया. साथ ही मुआवजे के रूप में 10 लाख रुपये देने की घोषणा की. सारी चर्चा इसी बात को लेकर है कि अगड़ी जाति के विवेक तिवारी और मनीष गुप्ता के परिवारों को योगी सरकार 40-40 लाख रुपये का मुआवजा देती है, लेकिन दलित समाज से आने वाले अरुण के परिवार वो 10 लाख रुपये दिए जाते हैं, 'ये भेदभाव नहीं है तो और क्या है?' किस आधार पर मुआवजा मिलता है? इंडिया टुडे के आशीष मिश्रा की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी नौकरी में रहते हुए मृत्यु होने पर मिलने वाली मदद के लिए स्पष्ट रूप से प्रावधान हैं. ‘उत्तर प्रदेश मृतक आश्रित सेवानियमावली’ के मुताबिक सरकारी नौकरी में रहते हुए अधिकारी या कर्मचारी की मृत्यु होने पर ग्रेच्युटी, बीमा, नकदीकरण, भविष्यनिधि के अलावा परिवार के किसी एक सदस्य को उसकी शैक्षिक योग्यता के मुताबिक मृतक की सेवा के बराबर या उससे नीचे के स्तर की नौकरी मिलेगी. ड्यूटी करते हुए शहीद होने वाले सरकारी कर्मचारियों के परिवारों के लिए इस नियमावली में विशेष प्रावधान हैं. ऐसे परिवार को शहीद की पूरी तनख्वाह हर महीने असाधारण पेंशन के रूप में मृतक की रिटायरमेंट डेट तक दी जाएगी. इसके अलावा शहीद कर्मचारी के परिवार को 10 लाख रुपए की विशेष अनुग्रह राशि भी मिलेगी. इंडिया टुडे ने सेवा संबंधी मामलों पर नजर रखने वाले वकील शैलेंद्र सिंह से बात की. उन्होंने बताया कि शहीद होने वाला, चाहे कर्मचारी हो या फिर अधिकारी, सभी को एक ही प्रकार की विशेष मदद देने का प्रावधान मृतक आश्रित सेवानियमावली में किया गया है. इसके अलावा अगर सरकार अतिरिक्त मदद करना चाहती है तो उसके लिए ‘उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष नियमावली (1958)’ है. इसके तहत यदि किसी ऐसे गरीब की जघन्य हत्या होती है जिसकी उम्र 18 साल या इससे अधिक है और वो अपने परिवार का इकलौता कमाऊ सदस्य है तो स्थानीय जिला प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर उसके परिवार को अधिकतम पांच लाख रुपए दिए जाएंगे. इसके अलावा विशेष परिस्थितियों में मुख्यमंत्री अपने विवेक से किसी को भी विवेकाधीन कोष की निर्धारित सीमा से अधिक की आर्थिक मदद दे सकता है. हालांकि प्रदेश BJP के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी का कहना है,यूपी में पुलिस कस्टडी में मरने वाले को समान राशि और नौकरी की जगह जाति देख कर नौकरी और मुआवजा दिया जा रहा है।
अरुण वाल्मीकि के साथ देश मे असमानता साफ दिखाई देता है।#JusticeforArunValmiki — Ayush (@AyushBandhe) October 21, 2021
मुआवजा कोई स्टेट पॉलिसी नहीं होती है कि वो सबके लिए बराबर होगी. मुआवजा देश काल और परिस्थितियों के अनुसार प्रशासनिक निर्णय होता है और उसे स्थानीय स्तर पर ही लिया जाता है. डीएम की रिपोर्ट के आधार पर लिया जाता है. कोई स्टेट पॉलिसी नहीं है कि किसी के मरने पर कितना रुपया दिया जाए.मुआवजा देने में जाति के आधार पर सरकार भेदभाव कर रही है? इस सवाल पर बीजेपी के प्रवक्ता ने कहा,
मुआवजा देने में जाति का कोई एंगल नहीं है. घटना किस प्रकार की है, उस घटना में भूमिका किस प्रकार की है, व्यक्ति की जीवन प्रत्याशा किस प्रकार की रही, इन सारी बातों के आधार पर मुआवजा दिया जाता है. जैसे किसी व्यक्ति के मरने पर उसके आश्रित को जो नौकरी मिलती है, वो उसकी योग्यता के आधार पर दी जाती है. ऐसा नहीं है कि क्लास-1 अफसर के मरने पर चपरासी की नौकरी मिल जाएगी और चपरासी के मरने पर उसके आश्रितों को क्लास-1 की नौकरी दे दी जाएगी. मृतक आश्रित की योग्यता क्या है और जिसकी मृत्यु हुई है वो किस पद पर था, इन सारी बातों के आंकलन के आधार पर कंपनसेट किया जाता है.जितना बड़ा हंगामा, उतना बड़ा मुआवजा? वैसे देखने को मिला है कि चर्चित मौतों के मामलों में मुआवजा देने को लेकर योगी सरकार कुछ ज्यादा ही सक्रिय नजर आई है. 5 बड़ी घटनाओं में उसने 24 से 48 घंटे के अंदर ही मुआवजा दे दिया. दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट बताती है कि घटना के बाद बवाल जितना बड़ा होता है, मुआवजे की राशि भी उतनी ही बड़ी होती है. लखीमपुर हिंसा मामले में मारे गए किसानों के परिवार के लिए योगी सरकार ने 45-45 लाख रुपए और सरकारी नौकरी की घोषणा की थी. मनीष गुप्ता के कथित रूप से पुलिस के हाथों मारे जाने के मामले में सरकार ने 40 लाख मुआवजा दिया. 2019 में हुए कमलेश तिवारी मर्डर केस में सरकार ने पीड़ित परिवार को 15 लाख रुपए और घर देने की घोषणा की थी. 2019 में सोनभद्र जिले के उम्भा गांव में 11 आदिवासियों को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया था. तब मृतकों के परिवारों को साढ़े 18 लाख रुपए देने की घोषणा सरकार ने की थी. और उससे पहले 29 सितंबर 2018 को विवेक तिवारी मर्डर केस में 40 लाख मुआवजा और सरकारी नौकरी दिए गए थे.

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