क्या बिहार में नीतीश और तेजस्वी मिलकर बीजेपी के साथ खेला करने वाले हैं?
आरसीपी सिंह के द्वारा JDU से इस्तीफा देने के बाद बिहार में राजनीतिक अस्थिरता की खबरें और तेज हो गई हैं.

''राजनैतिक अस्थिरता'', ''पॉलिटिकल ड्रामा'', ''बहुमत परीक्षण'', ''विधायकों की परेड'' ये सारे शब्द अब जल्द घिसने वाले हैं. घिसें भी क्यों न, हर थोड़े अंतराल में इनकी ज़रूरत जो पड़ने लगी है. जुम्मा जुम्मा चार दिन हुए थे महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन हुए. कैबिनेट अभी तक बन नहीं पाई है. और बिहार से उसी तरह की खबरें आने लगी हैं. कयास लगाए जा रहे हैं कि अंतरआत्मा की आवाज़ सुनने के लिए चर्चा में रहने वाली बिहार की राजनीति में, सत्ता शरीर बदलने वाली है. बयान पर बयान आ रहे हैं पार्टियां अपने विधायकों को समेटने में लग गई हैं. पटना और दिल्ली में घनघना रहे फोन चुप होने का नाम नहीं ले रहे. कोई साज़िश की बात करता है तो कोई चिराग मॉडल के दोहराव की. और जनता लगा रही है हिसाब, कि अब और कितने दिन पटना के नेताओं की प्राथमिकता सरकार चलाने की जगह सरकार बचाने और सरकार में बने रहने की होगी.
घड़ी सबके घर में होती है. जिस चाल से घड़ी चलती है उसे क्लॉक वाइज कहते हैं. मगर कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीति में नीतीश कुमार के पास ऐसी घड़ी है जो क्लॉक वाइज और एंटी क्लॉक वाइज - दोनों तरफ घूमती है. रह-रह कर उनकी अंतरआत्मा उनसे जोर-जोर से बातें करती है. पराजित तो नहीं होता मगर सत्य अचानक से परेशान जरूर होने लगता है. कई समर्थक कहते हैं उनके दोनों में हाथ में लड्डू होता है, उनके दोनों ही करवट पर सत्ता है और बिहार का समीकरण ऐसा कि उनके बिना फिलवक्त सत्ता किसी को मिलती नहीं. आलोचक कहते हैं वो कब किधर पलटी मार जाएं, पता नहीं चलता है. अब एक बार फिर से बिहार में सत्ता परिवर्तन की सुगबुगुहाट है. हम डिस्क्लेमर के तौर पर पहले ही क्लीयर कर देते हैं, ऐसी सुगबुगुहाट है. जो हालिया घटनाक्रमों से उपजी है. बयानों के बाउंसर तापमान को और बढ़ा रहे हैं. हम ये भी जानते हैं कि बड़ी-बड़ी घटनाएं पहले सुगबुगुहाट के तौर पर ही आती हैं और फिर वक्त के साथ मूर्त रूप ले लेती हैं. तो अब बिहार में क्या होगा, उसे समझने से पहले ये समझ लेते हैं कि जो होगा, जिसकी चर्चा है. वो क्यों होगा. पहले वजहों को जान लेते हैं फिर अंजाम पर आते हैं.
इस पूरी कहानी के सबसे अहम किरदार हैं आरसीपी सिंह. बिहार में इन्हें हर कोई जानता है, बिहार के बाहर के लोगों के लिए इनका परिचय लंबा है. पुराने लोग इन्हें नौकरशाह, माने अधिकारी के तौर जानते हैं. एक वक्त पहचान नीतीश कुमार के सबसे खास करीबी की हुई. पार्टी के अध्यक्ष हुए, JDU के खाते से मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री बने. और वहीं से गाड़ी पटरी से उतर गई. नाम राम चंद्र प्रसाद सिंह, प्रचलित तौर पर RCP सिंह के नाम से जानते हैं. RCP सिंह कुछ वक्त पहले तक नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी के तौर पर देखे जाते थे. मगर धीरे-धीरे चीजें बदलती गई, दिल्ली आने के बाद RCP सिंह गुजरात मॉडल के कसीदे पढ़ने लगे तो बिहार मॉडल को दिक्कत होने लगी.
चीजें इतनी बिगड़ गईं कि नीतीश कुमार ने दोबारा राज्यसभा तक नहीं भेजा. कैबिनेट मंत्री की कुर्सी चली गई. फिर कई जगह पर घर और जमीन होने के आरोप लगे. हमले बढ़े. शनिवार को कथित तौर पर जमीन घोटाले का आरोप उछालकर जेडीयू के नेताओं ने जवाब मांगा. कई दिनों से खार खाए बैठे, सारा गुबार कैमरे के सामने निकाला और JDU से इस्तीफा दे दिया. ABP न्यूज से बात करते हुए सीएम नीतीश कुमार को खूब खरी खोटी सुनाई. यहां तक कह दिया कि वो सात जन्म में भी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे. उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाया, लंच, डिनर, ब्रेकफास्ट की कहानी सुनाई. और पूछ लिया कि देश में कौन सा मुख्यमंत्री है जो तीन-तीन घंटे भूंजा पार्टी करता है. भूंजा पार्टी मतलब लइया-चना चबाना और उसके साथ लोगों से बतियाना.
अब तक सीएम नीतीश कुमार पर पर्याप्त हमले हो चुके थे. पार्टी कहां चुप रहने वाली थी. मौजूदा अध्यक्ष ललन सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. RCP सिंह पर खूब तीखी प्रतिक्रिया दी. मगर दिलचस्प ये था कि RCP सिंह के बहाने बीजेपी निशाने पर थी.
ललन सिंह ने बार-बार चिराग मॉडल का जिक्र किया. चिराग मॉडल वन और चिराग मॉडल टू. आपको याद होगा तो बिहार चुनाव 2020 के बाद नीतीश कुमार ने एक बयान दिया था. उन्होंने कहा था कि ये पहला चुनाव था जिसमें उन्हें पता नहीं लगा कि कौन उनके साथ था, कौन उनके खिलाफ. दरअसल JDU कैंप का शुरू से ही आरोप रहा है कि जानबूझ कर चिराग पासवान को बीजेपी ने उनके खिलाफ खड़ा किया. जहां-जहां जेडीयू चुनाव लड़ी है, वहां-वहां चिराग ने अपना उम्मीदवार उतारकर जेडीयू को कमजोर किया, हराने का काम किया. जब चिराग की पार्टी को चाचा पशुपति पारस ले उड़े तो चिराग ने भी झोंक में कह दिया कि उनका इस्तेमाल किया गया.
ये सारी कड़ियां बीजेपी की तरफ जा मिली. कई उम्मीदवार तो बीजेपी के नेता थे जिन्हें नीतीश से गठबंधन की कीमत अपनी सीट की कुर्बानी देकर चुकानी पड़ी थी. रिजल्ट आया तो जेडीयू तीन नंबर की पार्टी बन गई. आरोप लगे कि बीजेपी ने जानबूझकर चिराग को जेडीयू के पीछे लगा दिया था. आरोपों में इसे ही चिराग मॉडल वन कहा गया, चिराग मॉडल टू RCP सिंह के लिए इस्तेमाल किया गया. JDU खेमे का आरोप है कि RCP सिंह ने जेडीयू को कमजोर करने का काम किया. आरोपों में कहा जाता है RCP सिंह के अंदर बीजेपी की आत्मा आ गई थी. वो पार्टी को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे, आरोप है कि बीजेपी उन्हें बिहार का एकनाथ शिंदे बनाना चाहती थी, आरोप कई विधायकों के खरीद-फरोख्त का भी लगा. RCP का इस्तीफा हो गया है तो जेडीयू अब नए रास्ते की तलाश में है. और सब जानते हैं नया रास्ता कहां से होकर गुजरता है.
पटना में कुछ बड़ा होने वाला है इसके संकेत इस बात से भी मिलते हैं कि, कल यानी 9 जुलाई को JDU, RJD, कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों ने अपने विधायकों की बैठक बुलाई है. इसी के बाद पटना से दिल्ली तक ये खबर उड़ी हुई है कि नीतीश कुमार बीजेपी का साथ छोड़कर तेजस्वी से हाथ मिला सकते हैं. वैसे जब जब नीतीश की नाराजगी की खबर सामने आती है उनके पाला बदलने की चर्चा होने लगती है. चूंकि आरसीपी सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर केंद्र में मंत्री रह चुके हैं इसलिए डर इस बात का है कि कहीं उनके साथ कुछ विधायक तो नहीं हैं? इस शक की पुख्ता वजह भी है. बिहार की राजनीति में य़े माना जाता रहा है कि जेडीयू में टिकट बंटवारे का काम आरसीपी सिंह ही किया करते थे. इसलिए जीते हुए नेताओं में से कुछ की हमदर्दी आरसीपी के साथ हो सकती है. केंद्र में जेडीयू अपने कोटे से दो मंत्री चाहती थी. इसकी डिलिंग आरसीपी सिंह ही कर रहे थे और एक ही दमदार मंत्रालय पर मान गए. जो उन्होंने खुद लिया था. आरसीपी सिंह जब नीतीश की मर्जी के खिलाफ जाकर केंद्र में मंत्री बने थे, तब दर्जन भर जेडीयू के सांसद नेतृत्व के अदृश्य आदेश की अनदेखी कर उन्हें बधाई देने घर गये थे. तब इसको लेकर काफी चर्चा हुई थी कि कौन किसके साथ है.
नीतीश कुमार ने अब इन्हीं सवालों का जवाब जानने के लिए मंगलवार को विधायक दल की बैठक बुलाई है. खबर है कि सांसदों को भी इसमें बुलाया गया है. वैसे इस मीटिंग को कुछ लोग इस तरह से भी देख रहे हैं कि नीतीश पाला बदलने के लिये विधायकों का मूड समझना चाहते हैं. अब लाख टके का सवाल ये रह जाता है कि क्या वाकई नीतीश ने पाला बदलने का मन बना लिया है. क्या बीजेपी से दूरिया इतनी बढ़ गई है कि उसे पाटा नहीं जा सकता है? जवाब तो नीतीश कुमार ही जानें. मगर संकेत तो दूरियों के ही हैं. उदाहरण से समझिए
-लाउडस्पीकर और हनुमान चालीसा विवाद पर बीजेपी के खिलाफ नीतीश का रुख रहा
- पटना दौरे पर गये अमित शाह से नीतीश कुमार ने शिष्टाचार मुलाकात नहीं की
- NDA का साझेदार होने के बावजूद राष्ट्रपति के नामांकन से लेकर शपथ समारोह तक नीतीश कुमार कहीं भी नहीं दिखे
- राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के विदाई भोज में शामिल नहीं हुए
- नीति आयोग की महत्वपूर्ण बैठक, जिसमें कांग्रेस और तमाम विपक्षी दलों के मुख्यमंत्री शामिल हुए. उसमें KCR के अलावा नीतीश कुमार ही थे, जो नहीं गए.
पिछले दिनों चिराग पासवान को एनडीए की बैठक में बुलाना भी नीतीश कुमार की पार्टी के नेताओं को पसंद नहीं आया था. कहा ये जाता है कि नीतीश कुमार बिहार के मौजूदा बीजेपी नेतृत्व से असहज हैं. वो शुरू से ही चाहते थे कि डिप्टी सीएम सुशील मोदी बने. क्योंकि वो लंबे समय तक नीतीश के मातहत कम कर चुके थे और नीतीश को ये खूब भाता था कि वो ओवरपास नहीं करते थे. अब खबर है कि कई मंत्रियों के साथ उन्हें काम करने में दिक्कत हो रही है. मंत्री रामसूरत राय का तबादला एपिसोड इसका उदाहरण है.
बीते दिनों स्पीकर विजय सिन्हा के साथ भी गर्मागर्मी हो चुकी है, सबने देखा था. सूत्रों की माने तो नीतीश कुमार की बीजेपी के पूर्व बिहार प्रभारी भूपेंद्र यादव से भी नहीं जमी थी. क्योंकि बिहार में बीजेपी की हमेशा से अपना सीएम बनाने की तमन्ना रही है. नित्यानंद राय को आला नेतृत्व की तरफ से प्रमोट भी खूब किया गया. नीतीश की नाराजगी को देखते हुए ही पिछले दिनों धर्मेंद्र प्रधान से उनकी गुपचुप और लंबी मुलाकात हुई थी. जिसके बाद तय हुआ था कि धर्मेंद्र प्रधान के जरिये ही फैसले लिये जाएंगे. खबर है नीतीश चाहतें है कि फिर से सुशील मोदी को बिहार लाया जाए, मगर बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं है. तो बीजेपी के सीएम के सवाल पर नीतीश कभी तैयार नहीं होते हैं. उन्हें पार्टी के भविष्य की चिंता हो जाती है और ये सवाल तो हमेशा बना रहता है कि नीतीश के बाद JDU का क्या होगा?
जहां तक बात आरजेडी के साथ नजदीकियों की है तो नीतीश और लालू एक साथ सालों तक राजनीति कर चुके हैं. 1994 में नीतीश, लालू से पहली बार अलग हुए थे. फिर 2013 तक बीजेपी के साथ रहे. जब बीजेपी से अलग हुए तो लालू के साथ हो लिये. 2015 में लालू और नीतीश ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, सरकार भी बनाई. मगर 2017 में करप्शन के सवाल पर लालू-नीतीश की राहें जुदा हो गई. तब आरोप लगा था कि धीरे से लालू ने पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया था. नीतीश कुमार का इस्तीफा हुआ और फिर बीजेपी के साथ चले गए. लेकिन अब एक बार फिर से आरजेडी से ही नजदीकियों की चर्चा है.
सूत्र बताते हैं कि RJD कैंप में कुछ दिन पहले ये तय किया गया कि पार्टी प्रवक्ता जेडीयू पर हमले नहीं करेंगे. जो भी हमला होगा वो बीजेपी पर किया जाएगा. और ये बात आप ट्विटर से लेकर बयानों तक के अक्स में देख सकते हैं. इस पूरे मसले पर RJD की प्रतिक्रिया सुनिए। JDU की भी। खेल खुद समझ जाएंगे
बीजेपी भले ही सबकुछ ठीक होने की बात कर रही है. मगर उसके लिए चिंता की बाता है. चिंता की बात इसलिए क्योंकि पलटूराम और पलटू चाचा जैसी उपमाएं भी बीते कई दिनों से RJD नेतृत्व की तरफ से नहीं दी जा रही है. जहां तक आरजेडी से नजीदिकियों का सवाल है तो इस साल रमजान के दौरान इफ्तार पार्टी से इसकी शुरुआत हुई. जातिय जनगणना के मुद्दे ने तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार को सेम पेज पर खड़ा कर दिया है. बाद में जनसंख्या नियंत्रण कानून की चर्चा और अग्निपथ योजना पर दोनों दल बीजेपी से अलग एक पिच पर दिखे. सूत्र बताते हैं कि लालू यादव को जब नीतीश कुमार पटना के पारस अस्पताल में देखने गए थे, साथ में सरकार बनाने की पहली पहल वहीं हुई.
तारीख थी 6 जुलाई. तेज प्रताप यादव ने चाचा की एंट्री वाला सिग्नल भी सोशल मीडिया पर दिया था. नीतीश कुमार अगर तेजस्वी के साथ जाते हैं तो सरकार आसानी से बन जाएगी. कांग्रेस और बाकी दलों के साथ महागठबंधन बनाया तो सरकार के पक्ष में नंबर का गेम 160 से ऊपर जाएगा. समीकरण क्या कहता है? वो आंकड़े आपके सामने हैं
कैसे बन सकती है JDU-RJD सरकार?
JDU- 45
RJD-79
CONG- 19
LEFT-16
HUM- 04
कुल- 163
बीजेपी 77 विधायकों के साथ अकेले रह जाएगी. अगर सरकार बनाने की कोशिश हुई तो उसे कम से कम 45 विधायकों को तोड़ना होगा, जो संख्या बहुत बड़ी है. स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी की माने तो कल ही तस्वीर साफ हो जाएगी. मगर इस बार होगा ये कि नीतीश कुमार पिछली बार की तरह इस्तीफा नहीं देंगे, बल्कि बीजेपी के मंत्रियों को बर्खास्त कर सकते हैं. इस्तीफा देने का मतबल होगा कि गेंद राज्यपाल के पाले में चली जाएगी. तो ऐसे में बीजेपी के मंत्रियों को हटाना ही नीतीश कुमार के लिए सुरक्षित विकल्प होगा. अब इस पूरे खेल में दिलचस्प ये देखना होगा कि बीजेपी क्या करेगी? बीजेपी क्या सबकुछ चुपचाप होते देख लेगी या वक्त का इंतजार करेगी या फिर नीतीश पर RJD की तरह नए सिरे से पलटूराम का लेब चिपकाएगी? अगले चुनाव की तैयारी करेगी या क्या केंद्रीय एजेंसियों वक्त रहते एक्टिव हो जाएंगी? सत्ता का खेल, यहां इतनी आसानी से सबकुछ नहीं होता.
वीडियो: क्या बिहार में नीतीश और तेजस्वी मिलकर बीजेपी को झटका देने वाले हैं?

