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जानिए, अमेरिकी ठिकानों पर हुआ ईरान का हमला जंग टलने की गुड न्यूज़ कैसे लाया?

8 जनवरी को US से बदला लेने के लिए ईरान ने दो इराकी ठिकानों पर करीब 30 बलिस्टिक मिसाइलें दागी थीं.

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8 जनवरी 2020 (अपडेटेड: 9 जनवरी 2020, 06:48 AM IST)
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ये 8 जनवरी को सुबह 7.52 पर ली गई सैटेलाइट इमेज़ है. तस्वीर में नज़र आ रहा है इराक का अल-असद एयरबेस. ईरान ने अल-असद और इरबिल एयरबेस पर मिसाइलें दागी थीं. इस हमले में टूटी एयरबेस की एक इमारत तस्वीर में दिख रही है. फोटो मुहैया कराई है मिडिलबरी इंस्टिट्यूट ऑफ इंटरनैशनल स्टडीज़ ऐंड प्लेनेट लैब्स ने (फोटो: AP)
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8 जनवरी को रात तकरीबन 1.20 बजे ईरान की सरहद से मिसाइलें दागी गईं. निशाना- इराक के दो मिलिटरी बेस. जहां अमेरिकी फ़ौज तैनात है. आशंका तो ये थी कि ईरान की इस कार्रवाई के बाद जंग छिड़ सकती है. मगर हुआ उल्टा. ईरान की कार्रवाई गुड न्यूज़ लेकर आई. उसके हमले ने फिलहाल अमेरिका के साथ उसकी सीधी जंग की आशंकाओं को टाल दिया है. हालांकि अप्रत्यक्ष युद्ध, प्रॉक्सी वॉर की आशंकाएं अब भी हैं. ऐसा इसलिए कि ईरान ने बाक़ायदा वॉर्निंग देकर हमला किया. उसने अटैक करने से पहले ही बता दिया कि वो हमला करने जा रहा है. 8 जनवरी को इराक के प्रधानमंत्री अदेल अब्दुल मेहदी का बयान आया. उन्होंने बताया कि ईरानी अधिकारियों ने उन्हें पहले ही इस हमले की जानकारी दे दी थी. इसके बाद इराकी PM ने अमेरिकी और इराकी फ़ौज को आगाह कर दिया. साफ था कि ईरान ने सांकेतिक हमला किया. चेतावनी देने के लिए. और शायद अपनी जनता के सामने ख़ुद को साबित करने के लिए. उसका इरादा जंग का नहीं था. इसी वजह से हमले के बाद अमेरिका की ओर से भी संयत प्रतिक्रिया आई. राष्ट्र के नाम अपने संदेश में क्या कुछ कहा ट्रंप ने? अपने इस भाषण में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान के मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी को मारे जाने के अपने फैसले का बचाव किया. उन्होंने ईरान पर आतंकवाद को प्रश्रय देने का इल्ज़ाम लगाया. ईरान की ओर से हो रही कथित ज़्यादतियों की भी बात की. उस पर नए आर्थिक प्रतिबंध भी लादे. मगर साथ-साथ बातचीत की संभावनाएं भी खोलीं. शांति और अमन की भी बात की. साझा प्राथमिकताओं पर मिलकर काम करने का प्रस्ताव भी दिया. कुल मिलाकर उनके तेवर नरम थे. उन्होंने फिलहाल किसी तरह की सीधी सैन्य कार्रवाई से भी अपने पांव पीछे खींचे. ट्रंप ने अपने भाषण में कहा-
जब तक मैं अमेरिका का राष्ट्रपति हूं, ईरान को न्यूक्लियर हथियार हासिल करने की इजाज़त नहीं मिलेगी. मुझे आप सबको ये बताते हुए खुशी हो रही है कि पिछली रात ईरानी सरकार द्वारा किए गए हमले में किसी अमेरिकी नागरिक को कोई नुकसान नहीं हुआ. हमारे पक्ष के किसी इंसान की जान नहीं गई. हमारे सभी सैनिक सुरक्षित हैं. निशाना बनाए गए हमारे सैन्य ठिकानों को भी बहुत कम नुकसान पहुंचा है. हमारी महान फ़ौज किसी भी स्थिति के लिए तैयार है. मगर ऐसा लगता है कि ईरान ने अपने पांव पीछे खींचे हैं. इस मामले से जुड़े सभी पक्षों के लिए ये अच्छी ख़बर है. दुनिया के लिए भी ये बहुत अच्छा है. जो कोई भी अमन चाहता है, उनके साथ मिलकर संयुक्त राज्य अमेरिका भी शांति की राह चलने को तैयार है.  हम सबको मिलकर ईरान के साथ एक ऐसी डील बनाने पर काम करना चाहिए, जो दुनिया को ज़्यादा सुरक्षित, ज़्यादा अमन-शांति वाली जगह बनाए. हमें ऐसी डील भी करनी चाहिए, जो ईरान को आगे बढ़ने और तरक्की करने का मौका दे. और वो अपनी अब तक इस्तेमाल न की गई क्षमताओं का फ़ायदा पा सके. ईरान एक महान देश हो सकता है.  हमने ISIS के सरगना अल-बगदादी को मार डाला. वो हज़ारों लोगों की हत्याओं का जिम्मेदार था. उसने ईसाईयों, मुस्लिमों और अपनी राह में आने वाले लोगों के सिर काटे. वो एक दरिंदा था. शैतान था. अल-बगदादी फिर से ISIS ख़िलाफ़त को खड़ा करने की कोशिश कर रहा था. मगर वो नाकाम रहा. मेरे कार्यकाल के दौरान सैकड़ों ISIS लड़ाके मारे और पकड़े गए. ISIS ईरान का स्वाभाविक दुश्मन है. ISIS का ख़ात्मा, उसकी बर्बादी ईरान के लिए अच्छी चीज है. हमें इस मामले पर और बाकी साझा प्राथमिकताओं पर मिलकर काम करना चाहिए. आख़िर में मैं ईरान की जनता और वहां की लीडरशिप से कहना चाहता हूं. हम आपका बहुत अच्छा भविष्य चाहते हैं. ऐसा भविष्य, जिसके आप हक़दार हैं. जो कोई भी अमन चाहता है, उनके साथ शांति की राह चलने को तैयार है अमेरिका. 
ईरान का सांकेतिक हमला करना. और, लगातार धमकियां दे रहे ट्रंप का शांत होना. 8 जनवरी के हमले के बाद ईरान और ट्रंप, दोनों ही मौजूदा विवाद पर शांति से हल निकालने के इच्छुक दिखे. 27 दिसंबर से लगातार बढ़ रहे ईरान-अमेरिका तनाव में ये यकीनन एक अच्छी ख़बर है. अब 8 जनवरी को ईरान द्वारा किए गए हमले से जुड़ी ज़रूरी चीजें जान लीजिए. हमले की टाइमिंग हमला शुरू होनेके समय को लेकर अलग-अलग अकाउंट आए. इराक द्वारा जारी किए बयान में हमले का समय 8 जनवरी को सुबह के पौने दो से पौने तीन का बताया गया. लेकिन ईरान के मुताबिक, हमले का वक़्त 8 जनवरी की सुबह 1.20 के आसपास का था. ये वही समय है, जब 3 जनवरी को अमेरिका ने रॉकेट हमले से मेजर जनरल सुलेमानी को मारा था. अभी तो शुरुआत है: ईरान ईरान की रेवॉल्यूशनरी गार्ड्स की मुख्य न्यूज़ वेबसाइट 'मसरिग़' के मुताबिक, पश्चिमी इराक के अनबर प्रांत स्थित अल-असद मिलिटरी बेस पर 30 से भी ज़्यादा बलिस्टिक मिसाइलें दागी गई हैं. इस बेस पर अमेरिकी ट्रूप्स तैनात हैं. ईरान की इस्लामिक रेवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कहा कि ये तो बस बदला लेने की शुरुआत हुई है. अटैक के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह अली ख़ामेनेई का एक भाषण ईरानी टेलिविज़न पर चलाया गया. ख़ामेनेई ने कहा कि 8 जनवरी का अटैक अमेरिका के मुंह पर तमाचा है. ख़ामेनेई और IRGC के बयान से ज़्यादा संयत स्टेटमेंट आया ईरान के विदेश मंत्री मुहम्मद जावद ज़रीफ की ओर से. उन्होंने कहा-
ईरान ने नपे-तुले तरीके से अपनी आत्मरक्षा में कदम उठाया. हम तनाव बढ़ाना नहीं चाहते हैं. न ही हम युद्ध चाहते हैं. लेकिन अगर हमारी ओर कोई आक्रामकता दिखाई गई, तो हम अपनी हिफ़ाजत करेंगे.
पेंटागन ने क्या कहा? अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय 'पेंटागन' के प्रवक्ता जोनाथन हॉफमैन ने 8 जनवरी को हुए ईरानी हमले के बारे में बताते हुए कहा- ये साफ है कि ये मिसाइलें ईरान की ओर से दागी गईं. इनके निशाने पर इराक स्थित दो मिलिटरी बेस थे- अल असद और इरबिल. इस हमले पर डॉनल्ड ट्रंप की शुरुआती प्रतिक्रिया ट्विटर पर आई. उन्होंने लिखा-
ऑल इज़ वेल! इराक के दो सैन्य ठिकानों पर ईरान ने मिसाइल दागे. कितना और क्या नुकसान हुआ, हम इसका जायज़ा ले रहे हैं. अब तक तो सब ठीक है. हमारे पास दुनिया की सबसे ताकतवर, सबसे ज़्यादा संसाधनों से लैस सेना है. मैं कल सुबह एक बयान जारी करूंगा.
तनाव इतना कैसे बढ़ा? 27 दिसंबर से ही ईरान और अमेरिका के बीच स्थितियां लगातार बिगड़ती गईं. इस रोज़ एक इराकी मिलिटरी बेस पर रॉकेट दागे गए. इसमें एक अमेरिकी कॉन्ट्रैक्टर मारा गया. इसके पीछे ईरान से सपोर्ट पाने वाली इराकी शिया मिलिशिया 'कताइब हेजबुल्लाह' का हाथ बताया गया. 29 दिसंबर को अमेरिका ने 'कताइब हेजबुल्लाह' के पांच ठिकानों पर हवाई हमला किया. इसमें 31 के करीब लोग मारे गए. जवाब में 31 दिसंबर को ईरान समर्थक शिया मिलिशिया के लोग बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास के कंपाउंड में घुस गए. 24 घंटे से ज़्यादा वक़्त तक अमेरिकी डिप्लोमैट्स अंदर बंद रहे. लड़ाई की असली स्थितियां बनीं 2020 के तीसरे दिन. 3 जनवरी को करीब 1.20 बजे सुबह ईरानी कुद्स फोर्स के चीफ मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी को अमेरिका ने मार डाला. ईरान ने इसे 'ऐक्ट ऑफ वॉर' माना. ईरान ने कहा, हम बदला लेंगे. सुलेमानी की मौत पर ईरान की लीडरशिप ने क्या कहा? मेजर जनरल सुलेमानी के जनाज़े में उनके ताबूत के आगे खड़े होकर ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह अली ख़ोमेनई रोये. ये 6 जनवरी की बात है. ये दृश्य बताता है कि सुलेमानी का ओहदा क्या था ईरान में. सुप्रीम लीडर ने कहा, सुलेमानी की मौत का बदला लेगा. यही बात राष्ट्रपति हसन रूहानी ने भी कही. रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूहानी गए थे सुलेमानी के घर. वहां सुलेमानी की बेटी ने उनसे पूछा- मेरे पिता के ख़ून का बदला कौन लेगा? इसके जवाब में रूहानी ने कहा- हर एक ईरानी लेगा बदला. इस्लामिक रेवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के लीडर होसेन सलामी का भी बयान आया. उन्होंने कहा-
IRGC ने कसम खाई है. हम उन जगहों को जला देंगे जहां अमेरिकी और उसके साथी रहते हैं. हम बदला लेंगे.
कुद्स फोर्स में मेजरल जनरल सुलेमानी के डेप्युटी रहे इस्माइल ग़ानी. इन्हें कुद्स फोर्स का नया चीफ नियुक्त किया गया. उन्होंने भी बदले की बात कही. 6 जनवरी को 'डेथ टू अमेरिका' के नारे लगाती लाखों की भीड़ के आगे खड़े होकर उन्होंने कहा-
अल्लाह ने उनका (सुलेमानी) का बदला लेने का वायदा किया है. अल्लाह ही है, जो बदला लेता है.
इस हत्या पर ईरानी जनता ने कैसी प्रतिक्रिया दी? पिछले कुछ हफ़्तों से ईरान में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हो रहे थे. मुद्दा था- भ्रष्टाचार और कुशासन. मगर मेजर जनरल सुलेमानी की हत्या ने ईरान को एक कर दिया. अस्तित्व का डर, राष्ट्रवाद, अमेरिका से नफ़रत और दुश्मनी का अतीत, इन सबने लोगों को जोड़ दिया. हाथों में सुलेमानी की तस्वीरें लिए लाखों की भीड़ बाहर निकली. इनसे जुड़ी ड्रोन फुटेज में इंसान ऐसे दिखते हैं मानो अथाह समंदर. भीड़ ने 'डेथ टू अमेरिका' के नारे लगाए. लोग रो रहे थे सुलेमानी की मौत पर. लोग कह रहे हैं कि 1989 में अयातुल्लाह खौमैनी के जनाजे के बाद ईरान में इतना बड़ा जनाजा किसी का नहीं निकला. भीड़ युद्ध के नारे लगा रही थी. जनाज़े में भगदड़ मेजर जनरल सुलेमानी का ताबूत दफ़नाये जाने से पहले, जनाज़े के दौरान भगदड़ हुई. करीब 50 लोग मारे गए. इराकी PM ने सुलेमानी की हत्या पर क्या कहा? इराक के कार्यकारी प्रधानमंत्री हैं अदेल अब्दुल-मेहदी. उन्होंने इराकी संसद से कहा कि मेजर जनरल सुलेमानी जिस दिन मारे गए, उस दिन वो उनसे ही मिलने आ रहे थे. मेहदी के मुताबिक, सऊदी की ओर से भेजे गए एक संदेश पर ईरान का जवाब ला रहे थे सुलेमानी. इस जवाब के कारण मुमकिन है कि मिडिलईस्ट में तनाव कम हो जाता. इराकी PM ने अमेरिकी राजदूत मैथ्यू ट्यूलर को बुलाकर उनके आगे भी अपना विरोध रखा. कहा, अमेरिका ने हमारी सीमा में जो हमला किया वो इराकी संप्रभुता का उल्लंघन है. PM मेहदी ने कहा कि ISIS से लड़ने के लिए जो अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बना था, उसमें तय हुई चीजों का उल्लंघन किया है अमेरिका ने. इस मामले में इराक के विदेश मंत्री ने UN के सेक्रेटरी जनरल और सिक्यॉरिटी काउंसिल के पास आधिकारिक तौर पर शिकायत भी दर्ज़ करवाई. इराकी संसद ने क्या किया? 5 जनवरी को इराकी संसद में अमेरिकी सेनाओं को इराक से हटाने के प्रस्ताव पर वोटिंग हुई. यहां सांसदों ने एक प्रस्ताव पारित करके अपनी सरकार से कहा कि वो वॉशिंगटन के साथ हुआ अमेरिकी सैनिकों को इराक में रखने का करार ख़त्म करें. ये 2014 का समझौता है. इसके बाद ही अमेरिका ने ISIS से लड़ने के लिए अपने सैनिकों को इराक भेजा था. इराक के कार्यकारी PM ने कहा कि अधिकारी एक मेमो तैयार कर रहे हैं. ताकि संसद द्वारा पारित प्रस्ताव पर अमल किया जा सके. PM ने ये भी कहा कि अगर इससे जुड़ी प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद भी अमेरिकी फौज इराक में बनी रहती है, तो उसे 'ऑक्यूपाइंग फोर्स' समझा जाएगा. अमेरिकी फौज को इराक से वापस भेजने की बात 1 जनवरी को भी आई थी. जब शिया मिलिशिया के लोगों ने बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास का घेराव ख़त्म किया था. उस वक़्त मिलिशिया के लीडरान ने कहा कि उन्हें इराकी प्रधानमंत्री अदिल अब्दुल-मेहदी ने आश्वासन दिया है. कहा है कि जल्द ही क़ानूनी तरीके से अमेरिकी फौज को इराक से वापस भेज दिया जाएगा. इराकी संसद के फैसले पर अमेरिका ने क्या कहा? US स्टेट डिपार्टमेंट ने संयत बयान दिया. कहा, वो इराकी नेताओं से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने की अपील करते हैं. विभाग ने इराक को याद दिलाया कि ISIS की मौजूदगी अब भी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई. और, ISIS के साथ लड़ने में दोनों देशों का साझा हित है. राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इतने संयत नहीं रहे मगर. उन्होंने धमकाते हुए कहा कि अगर इराक ने ऐसा किया, तो वो उसके ऊपर प्रतिबंध लाद देंगे. अब सबसे ज़रूरी पॉइंट- 1980 से 1988. आठ साल तक ईरान और इराक के बीच युद्ध चला. ये युद्ध एक संघर्षविराम पर ख़त्म हुआ. समय, संसाधन, हज़ारों जानें, ईरान ने बहुत कुछ गंवाया. लेकिन आने वाले सालों के लिए ईरान ने कई सबक सीखे इस जंग से. एक ज़रूरी सबक ये था कि सीधी लड़ाई में बहुत नुकसान है. ऐसे में ईरान ने फोकस किया असिमेट्रिकल वॉर पर. ये एक अप्रत्यक्ष युद्ध है. अपने मुकाबले बेहद बड़े और ताकतवर देश से सीधे न टकराने की रणनीति. इसमें छोटा देश अपने छोटे-छोटे समूहों को इन्वॉल्व करता है. सप्राइज़ अटैक करता है. ईरान ने भी ऐसा ही किया. अपनी लड़ाई को वो अपनी सरहद से बाहर ले गया. लेबनन में. सीरिया में. इराक में. यमन में. मगर मेजर जनरल सुलेमानी की मौत के बाद ईरान का ये स्टैंड बदलता दिखा. कम-से-कम इस पूरे मामले को लेकर. सुप्रीम लीडर ख़ामेनई ने कहा कि सुलेमानी की मौत का बदला लेने के लिए ईरान जो भी करे, वो सीधी कार्रवाई हो. और, इस कार्रवाई को सीधे-सीधे ईरानी फोर्सेज़ अंजाम दें. ये ईरान के पारंपरिक तौर-तरीकों से अलग हटकर था. ईरान के हमले का तरीका क्या हो सकता है? 8 जनवरी को किए अटैक से ईरान ने एक रोज़ पहले भी IRGC के एक जनरल ने कहा था-
हम अमेरिका से घनघोर इंतकाम लेने को तैयार हैं. फारस की खाड़ी, इराक और सीरिया में मौजूद अमेरिकी सेनाएं हमारी पहुंच में हैं.
ईरान की धमकियों और 8 जनवरी को किए गए उसके 'सांकेतिक' हमले के बाद एक बड़ा सवाल उठा. कि अगर तनाव औ बढ़ा, तो अमेरिका किन जगहों पर टारगेट हो सकता है. मिडिलईस्ट और सेंट्रल एशिया की कई जगहों पर अमेरिकी सेना मौजूद है. ये लोकेशन्स हैं- 1. अफ़गानिस्तान- फिलहाल यहां तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या 14 हज़ार के करीब है. 2. तुर्की- यहां दो से ढाई हज़ार के करीब अमेरिकी सैनिक हैं. ज़्यादातर यहां के इनसरलिक एयरबेस पर पोस्टेड हैं. 3. सीरिया- यहां 800 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. इनमें से ज़्यादातर दक्षिणी सीरिया के एक आउटपोस्ट पर मौजूद हैं. ये जगह जॉर्डन की सीमा के पास बताई जाती है. 4. इराक- करीब 6,000 अमेरिकी सैनिक हैं यहां. 31 दिसंबर को इराकी मिलिशिया ग्रुप्स के लोग जब बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास के कंपाउंड में घुसे, उसके बाद उन्हें हटाने के लिए कुछ कमांडोज़ को वहां भेजा गया था. 5. जॉर्डन- यहां करीब 3,000 अमेरिकी सैनिक हैं. 6. कुवैत- यहां 13 हज़ार के करीब अमेरिकी सैनिक हैं. 7. बहरीन- बहरीन में US नेवी की फिफ्थ फ्लीट का मुख्यालय है. यहां लगभग 7,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. 8. क़तर- यहां है 'अल उदेइद बेस,' इस पूरे इलाके में होने वाली अमेरिकी वायुसेना की गतिविधियों का मुख्यालय. यहां करीब 13 हज़ार अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. 9. संयुक्त अरब अमीरात- यहां लगभग 5,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. 10. ओमान- 'वॉशिंगटन पोस्ट' के मुताबिक, यहां लगभग 606 अमेरिकी सैनिक हैं. 11. सऊदी अरब- यहां 3,000 के लगभग अमेरिकी सैनिक हैं. 3 जनवरी को मेजर जनरल सुलेमानी की हत्या के बाद बढ़े तनाव के बीच इन सभी जगहों पर हाई अलर्ट पर रखा गया. इसी दिन पेंटागन ने इस इलाके में 3,500 अतिरिक्त सैनिक भेजे जाने का भी ऐलान किया. इटली में मौजूद सैनिकों को भी तैयार रहने का निर्देश दिया गया. दूतावास भी निशाने पर आ सकते हैं इन जगहों के अलावा अमेरिकी दूतावास भी निशाने पर हो सकते हैं. 31 दिसंबर को बगदाद के दूतावास में हुई वारदात से पहले दो बार अमेरिकी दूतावास निशाना बनाए जा चुके हैं. एक, 1979 में. दूसरा, सितंबर 2012 में लीबिया के बेनग़ाजी स्थित दूतावास पर हुआ हमला. जिसमें तत्कालीन अमेरिकी राजदूत क्रिस्टोफर स्टीवन्स समेत चार अमेरिकी मारे गए थे. इनके अलावा माना ये भी जाता है कि 1992 में ब्यूनस आयर्स स्थित इज़रायली दूतावास पर जो बॉम्बिंग हुई थी, उसके पीछे हेजबुल्लाह के बहाने ईरान का ही हाथ था. इस वारदात में 29 लोग मारे गए थे. 1994 में ब्यूनस आयर्स के ही भीतर एक ज्यूइश सेंटर पर हुए हमले में भी ईरान का हाथ बताया जाता है. इसमें 85 लोग मारे गए थे.
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