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जब 'शोले' ने तोड़ा आनंद बख्शी का सिंगर बनने का सपना

आनंद बख्शी साब की ज़िन्दगी से तीन कहानियां.

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21 जुलाई 2010 (अपडेटेड: 21 जुलाई 2020, 02:06 PM IST)
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आनंद बख्शी. गीतकार, जिसके गानों ने कपूर खानदान के फ्लॉप हीरो को सबका चहेता 'शशि कपूर' बनाया. जिसके गीतों ने टेलेंट प्रतियोगिता में जीतकर आए एक आउटसाइडर को हिन्दी सिनेमा का पहला सुपरस्टार 'राजेश खन्ना' बनाया. 4000 से ज़्यादा गीत लिखे, लेकिन एक भी डेडलाइन से लेट नहीं हुआ. आज पढ़ें, उसी सुपरहिट गीतकार की ज़िन्दगी के तीन अनसुने किस्से:

माचिस की तीली ने बनाया राजेश खन्ना का सबसे सुपरहिट गीत

आनंद बख्शी के पिता रावलपिंडी में बैंक मैनेजरी करते थे. अपनी जवानी में आनंद टेलीफोन अॉपरेटर बनकर सेना में शामिल हो गए. लेकिन बम्बई और सिनेमा अभी बहुत दूर था. लेकिन चाह थी. सिनेमा की दुनिया में घुसने का प्रयास 'बदला' फिल्म के साथ हुआ, लेकिन चला नहीं. फिर उन्होंने नेवी जॉइन कर ली. बंटवारा हुआ तो बक्शी परिवार शरणार्थी बनकर हिन्दुस्तान आ गया. जब मायानगरी में कुछ ना हुआ तो आनंद बक्षी ने फिर से सेना जॉइन कर ली और पचास के दशक की दहाई तक वहीं काम करते रहे.

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https://youtu.be/kpM0jPd6-7w फिर बारी आई राजेश खन्ना की. पंजाबी लड़का, जो टेलेंट प्रतियोगिता जीतकर सिनेमा की दुनिया में घुस आया था. आनंद बक्शी के करियर का शुरुआती माइलस्टोन बनी 'आराधना', 'अमर प्रेम' और 'कटी पतंग' जैसी फिल्में, जिनके कांधे चढ़कर राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार बने. खन्ना के लिए ही लिखे फिल्म 'अमर प्रेम' के गीत 'चिंगारी कोई भड़के' को बक्शी अन्त तक अपने सर्वश्रेष्ठ गीतों में गिनते रहे. इस गीत को लिखने का ख्याल उन्हें बारिश में अचानक पानी गिरने से जलती माचिस के बुझने का सीन देखकर आया था.

जब 'शोले' ने तोड़ा आनंद बक्शी का सिंगर बनने का सपना

लिरिक्स राइटर आनंद बख्शी की सबसे प्रसिद्ध फिल्मों में से एक है 'शोले', हिन्दी सिनेमा का सबसे बड़ा शाहकार. लेकिन ये बात कम ही लोग जानते हैं कि 'शोले' सिंगर आनंद बक्शी की भी claim to fame फिल्म होनी थी. असल में 'शोले' की अोरिजिनल स्क्रिप्ट में एक कव्वाली भी थी. और लेखक जावेद अख्तर ने तय किया कि इसे भोपाल की 'चार भांड' स्टाइल में फिल्माया जाएगा, जिसमें कव्वालों के चार ग्रुप एक-दूसरे का मुकाबला करते हैं. ये कव्वाली फिल्म में सूरमा भोपाली वाले ट्रैक का हिस्सा थी. गाने के लिरिक्स कुछ यूं थे,

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और इस गीत को गाने के लिए जिन चार सिंगर्स को चुना गया था वो थे - किशोर कुमार, मन्ना डे, भुपिन्दर और खुद आनंद बक्शी. प्लान के मुताबिक भोपाल से 'चार भांड' गानेवाले कव्वाल बुलाए गए. पंचम ने धुन रची और कव्वाली रिकॉर्ड हुई. लेकिन कभी शूट नहीं हुई. वजह, फिल्म पहले ही निर्धारित तीन घंटे से लम्बी हो चुकी थी. गाने पर कैंची चल गई. सबसे ज़्यादा दुखी खुद आनंद बख्शी थे, "अगर वो गाना शोले में होता, तो क्या पता मेरा एज़ ए सिंगर करियर चल निकलता".

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जब नए निर्देशक ने बख्शी का लिखा गाना बदला

नब्बे के दशक की शुरुआत थी. यश चोपड़ा के बड़े लड़के, आदित्य चोपड़ा अपनी पहली फिल्म बनाने निकले थे. फिल्म के गीतकार चुने गए आनंद बक्शी. लिरिक्स राइटिंग की दुनिया के दिग्गज. फिल्म का पहला प्रेम गीत रचा जाना था. आनंद बख्शी ने खूब अच्छे प्रतीकों से भरे, शेरोशायरी वाले बोल लिखे गाने के लिए. लेकिन आदित्य चोपड़ा के इरादे कुछ और ही थे. वो कुछ नया करने निकले थे. "जब मेरे किरदार इस शेरो शायरी वाली ज़बान में बात नहीं करते हैं, तो वो गाना इतनी भारी ज़बान में क्यों गायेंगे?" उनका सवाल था.

उन्होंने खुद अपनी समझ से गाने की दो शुरुआती लाइन लिखकर आनंद बक्शी को दीं, और कहा कि इसे ही गीत में आगे बढ़ाया जाए. वो लाइनें थीं

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फिल्म थी 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे', जो गज़ब की सुपरहिट हो गई. आदित्य चोपड़ा छोटे थे, नौसिखिये थे. लेकिन निर्देशक थे. आखिर उनकी ही बात मानी गई.

इसी गीत के लिए बाद में आनंद बख्शी को उनका तीसरा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला.

https://youtu.be/r7NVIwO8_pI

ये आर्टिकल मियां मिहिर ने लिखा था.


विडियो- शॉर्ट फिल्म रिव्यू: पंडित उस्मान

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