मैं दूसरी क्लास में था. दूरदर्शन पर एक शो आता था. जब भी मौका मिलता था, देख लियाकरता था. गांव में लाइट की बहुत समस्या रहती थी इसलिए हमेशा नहीं देख सकता था. मैंऔर पापा ज़रूर ही देखते थे. ये शो उस वक़्त दूरदर्शन के मेट्रो चैनल पर आया करता था.शो का नाम था 'सुपरस्टार्स'. शो का डायरेक्शन केन घोष किया करते थे. शो के होस्टचंकी पांडे होते थे. ये टैलेंट हंट था. तीन केटेगरी में - ऐक्टिंग, सिंगिंग औरडांसिंग. ऐक्टिंग का एक लड़का उसमें जीता. फिर न जाने कहां गायब हो गया.लेकिन उसकी एक बात हमेशा याद रही, इसलिए नहीं कि उसने जो कहा था बहुत गजब की बातथी, बल्कि इसलिए क्यूंकि उसने जो कहा था, डंके की चोट पे कहा था. एक एपिसोड मेंउससे केन घोष ने पूछा था कि कामयाब होने के लिए टैलेंट, लक या मेहनत, इनमें सेज़्यादा ज़रूरी क्या है? उसने जो जवाब दिया - "तीनों का जो संगम होगा, तो वो निश्चितहै प्रयाग इलाहाबाद का बनेगा. और सक्सेस तभी मिलती है. किसी एक चीज़ से आप ये सोचोकि जग जीत लोगे, तो ये संभव नहीं है. हर चीज़ जब आपके पास होगी, चाहे वो थोड़ी-थोड़ीक्यूं न हो, निश्चित तौर पर डंके की चोट पर आप सफ़ल हो जाओगे." मुझे उस ऐक्टर का नामनहीं याद रहा. वो दिन, उसकी कही वो बात याद रही.सालों बाद, इतने सालों बाद कि मैं नौकरी करते-करते 2 साल गुज़ार चुका हूं, ऐक्टरविनीत सिंह से फ़ोन पर बात हुई. वो विनीत सिंह जो पुलिसवाले की छाती पर पिस्तौललगाकर उससे पूछता है, "बूझे?" वो अब विनीत सिंह नहीं बल्कि श्रवण सिंह उर्फ़मुक्काबाज़ बन चुका है. ये वही विनीत सिंह है जिसने मुझे सालों पहले टीवी पर वो सबकसिखाया था. विनीत सिंह ही सुपरस्टार्स का विजेता था. और ये सारी बातें खुलीं फ़िल्म'मुक्काबाज़' के सिलसिले में विनीत सिंह के इस इंटरव्यू के दौरान:आपके इस पूरे बदलाव के बारे में बहुत बात हो रही है. आप फ़ुल बॉक्सर बन गए. इसकीयात्रा क्या रही?जैसे ही मुझे बोला गया कि मुझे बॉक्सर बनना ही बनना है, मैंने कहा कि मैं येकरूंगा. मैंने अनुराग सर को बोल दिया. अनुराग सर ने तुरंत विजेंद्र सिंह से बात की.विजेंद्र सिंह ने बात की अपने कोच से. मैं अगले दिन पटियाला के लिए निकल लिया.मैंने इस बीच अपने मतलब का सामान बांधा और बाकी सब सामान बेच दिया. मेरे पास पैसेनहीं थे. सामान बेच का कुछ पैसा आया. पटियाला पहुंचा तो दिन के डेढ़-दो बज रहे थे.मुझे कुछ भी मालूम नहीं था कि कैसे क्या करना है. लेकिन रहने के लिए 3 घंटे में घरमिल गया. बस मैंने सामान रखा और ट्रेनिंग की शुरुआत कर दी. मुझे बस तुरंत निकलनाथा. मुझे बॉक्सर बनना था.बॉक्सिंग सिर्फ बॉडी बनाने का काम नहीं होता है. बॉक्सिंग यानी Neuro muscularrefelx का काम होता है. इंडिया में बॉक्सिंग 10-12 साल की उम्र से शुरू होती है.मैं ऐसी उम्र में पहुंचा था जहां लोग रिटायर होने की सोच रहे होते हैं.जहां मैंने ट्रेनिंग करने की सोची वहां सारे बड़े-बड़े बॉक्सर ट्रेनिंग कर रहे थे.हरप्रीत सिंह इंडियन बॉक्सिंग टीम के कोच रहे हैं, उनसे मेरी बात हुई. उन्होंने देशको 35-30 इंटरनेशनल बॉक्सर दिए हैं. उनसे मैंने कहा कि किसी से ये मत बोलिएगा किमैं ऐक्टर हूं. मैं उन सभी बॉक्सर्स के बीच रहना चाहता था. उनके जैसा बन जाना चाहताथा. तभी श्रवण कुमार मिलेगा. अगर मैंने कहा कि मैं एक ऐक्टर हूं तो उनकीओरिजिनालिटी गायब हो जाएगी. मैं ये नहीं चाहता था. मुझे बहुत सरे श्रवण कुमार दिखरहे थे. शुरू में दिक्कत ये होती थी कि वो हंसते थे कि ये आदमी चाहता क्या है.मुझसे कहते थे कि 'दिमाग की झिल्ली-झुल्ली हिल जाएगी. कुछ न कर पाओगे.' ऐसे लोगदिखते थे जिनकी गर्दन में लचक थी. क्यूंकि मुक्का कभी पड़ गया था. ऐसा एक बंदा फ़िल्ममें भी है. लेकिन मुझे ये था कि मुझे बस करना है. वो पागल समझते थे तो समझा करें.फिर धीरे-धीरे वो मुझे एक्सेप्ट करने लगे.कैसा लगता था उस वक़्त चोट खाकर. बॉक्सिंग रिंग में कितनी छीछालेदर हुई?जब मुक्का लगता है न, 10 सेकंड के लिए ब्लैक आउट हो जाता है दिमाग. मुझे याद नहींरहता था कि कब मुझे मुक्का लगा, मैं कब गिरा और कब मुझे उठा के बाहर किया गया. ऐसेलोग होते थे जिनका मैच चल रहा होता था और उन्हें मुक्का पड़ता था तो उन्हें बाहर लेआना पड़ा. वो बाहर चुप चाप बैठे रहे और फिर पूछा "मैच कब शुरू हो रहा है मेरा?" येमैं अपने सामने होते देख रहा था. ऐसा मेरे साथ भी हुआ.लेकिन एक बात हमेशा दिमाग में ये थी कि 14 साल जो मुक्के मैंने झेले हैं वो इसकेसामने कुछ नहीं थे. मैं गणितज्ञ और डॉक्टरों के घर से आता हूं. मैं खुद एक डॉक्टरहूं. मेरे घरवालों से मेरे बारे में, मेरे कारण जो सवाल पूछे जाते हैं, मैं समझतारहता हूं कि वहां क्या चल रहा होगा. वो मुक्के ज़्यादा खतरनाक थे. ये तो बस देह परचोट कर रहे थे.रिंग में जब मैं उतरता था तो सोचता था कि ऐसे मारूंगा, वैसे मारूंगा. लेकिन जब तकसोचता था, 4-6 मुक्के खा चुका होता था. मगर उन मुक्कों से ज़्यादा भारी वो अंदरूनीमुक्के थे, जो मैं सालों से खाता आ रहा था.पापा मैथेमैटिशियन थे. हमेशा 2+2 यानी 4 सिखाया. न 3 न 5. वो कहते थे - हारियों नहिम्मत बिसरियो न हरिनाम. हांलाकि ये उन्होंने फ़िल्म में काम करने के लिए नहीं कहाथा लेकिन मैं उसी में इस्तेमाल कर रहा हूं. मैंने मेहनत करनी नहीं छोड़ी तो नहींछोड़ी.इतना कॉन्फिडेंस कैसे आया कि सारा सामान बेचा, और निकल पड़े. अगर बॉक्सर नहीं बनपाते तो?नहीं बिलकुल भी नहीं. मैं बहुत खुश होकर गया था. बिना किसी शक को पाले. 'अग्ली' काशूट ख़तम होने के बाद थोड़ा बहुत एडिट पर बैठा. लेकिन वो सब कुछ मेरे लिए 2013 केआस-पास ख़तम था. उसके बाद सब ख़तम था. फिर मैंने कुछ काम नहीं किया. बस इधर-उधर चलतारहा. ज़्यादातर बस ऐसी ही फ़िल्में थीं जहां एक जैसा काम मिल रहा था. फ़िल्म अलगथीं लेकिन सब एक जैसा था. यही मैं नहीं चाहता था. मज़ा ही नहीं आ रहा था. लेकिनउन्हें न करता तो खाली बैठता. ये सब होते-होते काफ़ी समय हो गया. और जिस समय ये होरहा था, मुझे यहां आए 13 साल हो रहे थे. खुद से पूछता था कि मैं डॉक्टर था और मैंनेसब कुछ इसलिए नहीं छोड़ा. मुझे बेचैनी होती थी. मुझे सिर्फ़ सर्वाइवल के लिए ही नहींजीना था. ऐक्टिंग मेरा पैशन था. रियल लाइफ़ में ये मुझे पसंद था.मैंने सोचना शुरू किया कि जो मैं अपने अपने लिए सोच रहा हूं, वैसा सभी नहीं सोच रहेथे. मैं खुद को उनपर थोप नहीं सकता. सेकंड थॉट ये आ रहा था कि मैं कोशिश तो रोज़करता हूं, फ़िल्में भी मिली हैं, लोगों ने तारीफ भी की. लेकिन अलग तरह का काम क्यूंनहीं आ रहा है. फ़िल्में तो बहुत अच्छी बन रही हैं लेकिन उनमें मेरे लिए जगह नहींहै. ऑडिशन भी मैं रोज़ दे रहा हूं. कुछ और तरह से कोशिश करते हैं. फिर जब येस्क्रिप्ट तैयार हुई तो मुझे पता था कि इसका कैरेक्टर बॉक्सर ही है. और वो मुझे हीकरना था. इसके लिए स्टैमिना और शरीर वैसा होना बहुत ज़रूरी है. आसान तो नहीं है.लेकिन मुझे तो करना ही था. ऑप्शन ही नहीं था कुछ और. बॉक्सर तो बनना ही था.और फिर इस फ़िल्म का होना कैसे हुआ?'अग्ली' जब हुई थी तो सभी के सामने अनुराग ने कहा था कि मैं तुम्हारे साथ अब और कुछनहीं करूंगा. भागो. तो मैं इस कहानी को लेकर सोच भी नहीं पा रहा था कि अनुराग सर केपास जाऊंगा. अगर मैं जाऊंगा तो लगेगा कि ये तो गले पड़ गया. वो भी एक सिचुएशन थी. इसफ़िल्म की कहानी मेरी सिस्टर और मेरे दोस्त ने ड्राफ्ट की. पिचिंग शुरू की. मैंनेसोच रखा था कि फ़िल्म का हीरो तो मैं ही होऊंगा. इसलिए साथ में ही ट्रेनिंग शुरू करली. स्टेमिना के बिना बॉक्सिंग रिंग में नहीं खड़े हो सकते. 4-6 जगह गया.लोगों को स्क्रिप्ट पसंद आती थी तो लीड नहीं मिलता था. कोई और रोल करने को कहते थेलोग. मगर ये मेरी शर्त थी. मुझे ही लीड करना था. मुझे ये भी कहते थे कि तुम राइटरका क्रेडिट ले लो. खूब पैसे ऑफर किये. लेकिन मैं राइटर बनने नहीं निकला था. वोऑप्शन ही नहीं था. मैं नाम नहीं बताऊंगा ये सभी लोग कौन थे. उस समय तक मुझे 14-15साल हो चुके थे. बहुत जगह गए हम.और मैं ये भी समझ सकता था कि ऐसा क्यूं हो रहा था. मैं कभी भी उसे बुरे नज़रिए सेनहीं देख रहा था. आखिर मुझे इतना देखा ही नहीं है किसी ने तो मेरे भरोसे कोई कैसेफ़िल्म बना देगा. लेकिन मैं बाहर निकल रहा था तो खुद से कहता था कि सही डायरेक्शनमें जा रहा था. यूं ही नहीं कोई पैसे देने को राज़ी था. इसका मतलब साफ़ था किस्क्रिप्ट तगड़ी है. बस यही सोचे जा रहा था कि कहीं न कहीं दरवाज़ा खुलेगा.3 साल बीत गए. अनुराग सर के पास जाने की सोची. सर ने ये कहा था कि मेरे साथ और कामनहीं करेंगे. लेकिन ये थोड़ी कहा था कि सलाह भी नहीं देंगे. सोचा कि एक बार सर सेफीडबैक ले लेता हूं. इतना तो कर ही देता हूं. वो ग्रेट राइटर हैं. उनकी सलाह मेरेलिए अच्छी ही रहेगी. और बेहतर हो जाएगा. उनके फीडबैक के बाद इसे फैंटम में दूंगाफिर. ये नीयत थी.कश्यप के साथ विनीत सिंह. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर, अग्ली और बॉम्बे टॉकीज़.क्या बोला फिर अनुराग कश्यप ने?मुझे स्क्रिप्ट देने के कुछ ही दिन बाद फ़ोन आया. मेरे जीवन का सबसे ज़रूरी कॉल आया.अनुराग सर बोले, "विनीत, सुनो-सुनो. मैंने पढ़ा. मैं डायरेक्ट कर रहा हूं. मैं तुमकोलेकर इसे बना रहा हूं." मैं बस एक कदम बढ़ाना चाहता था. मैं इसी के इंतजार में था.ये सुनके मुझे लगा कि मैं पता नहीं क्या सुन रहा हूं. वो बोले कि 'तुम सब छोड़ो. सबकुछ. और मेरी 2 कंडीशन हैं. तुम्हें बॉक्सिंग करनी होगी. प्रॉपर बॉक्सिंग. और मैंस्क्रिप्ट में अपने हिसाब से चेंज करूंगा.'वहां कोच के साथ, बाकी लोगों के साथ कैसा अनुभव रहा?खून आए दिन निकलता था. बेचैनी इस बात की होती थी कि पहला मुक्का दिखता था लेकिन फिरआंख बंद हो जाती थी. ये मुझे सही करना था. खुली आंख से मुक्का खाना था. उस लड़ाई कोजीतना था. मैं सोचता था कि ये साला दिखाई क्यूं नहीं दे रहा है. फिर दिखता थामुक्का आता हुआ. फिर भी अपन वहीं खड़े रहते थे. मुक्के पड़ते थे. बार-बार आंखें लालहो जाती थीं. लेकिन बॉडी उन मुक्कों पर रीऐक्ट नहीं कर पा रही थी.एक दिन अजूबा हुआ. कोच ने मुक्का मारा और मैं हिला. मैंने वो मुक्का मिस करवा दिया.कोच ने हल्के से स्माइल दी. वो स्माइल मुझे बहुत अच्छे से याद है. रिदम आनी शुरू होगयी थी. फिर सब असली खेल शुरू हुआ.हार्ड ट्रेनिंग. लोग 5-6 घंटे ट्रेनिंग करते हैं. मैं 3-4 घंटे के कई स्लॉट्स मेंकरता था. शुरू में लोगों को लगता था कि यार ये बहुत ज़्यादा है लेकिन बाद में मेरेसाथ लोग हो लिए. लोग जॉइन करने लगे. इन लोगों ने मुझे बनाया बॉक्सर. हाथ पकड़ केसिखाया. दस साल के बच्चे ने भी. वेट कब शिफ्ट करना है सब कुछ. रिदम वगैरह. बॉडीसपोर्ट कर रही थी. शुरू के विडियो हैं जिसमें मैं ब्लड में बैठा रहता था, वो डिलीटकर दिए. मेरे पास सभी चीज़ों के विडियो रहते थे. मैं जब शाम को घर पहुंचता था तो दिनमें क्या हुआ, इसके विडियो मुंबई भेजता था. उस वक़्त दिन भर मुक्के खा-खा कर मैं होशमें नहीं रहता था. डर लगता था कि कहीं वो विडियो मैंने भेज दिए तो वो लोग मुझे बुलालेंगे.इतना सब कुछ हो रहा था, कहीं भी, किसी भी मौके पर ऐसा नहीं लगा कि अब बस बहुत हुआ?मैं ऐक्टिंग करना चाहता हूं इसीलिए इतना सब कुछ कर पाया. एक समय था जब अपने पास घरनहीं था ठीक से. छत नहीं थी. रोटियां गिन गिन के खा रहा था. लेकिन कर रहा था. कईबार ऐसा हुआ कि मैं एक शूट पर हूं और सुबह 4-5 बजे पैकअप हुआ. अब मैं रिक्शा औरटैक्सी अफ़ोर्ड नहीं कर सकता था. इसलिए बाकी का टाइम मैं वहीं सेट पर निकालता था.सभी लोग चले जाते थे लेकिन मैं वहीं रहता था. सुबह होती थी, पहली बस जब आती थी तोमैं घर आता था.कभी पता चला कि मुझे दोस्त बुला रहे हैं. हॉस्पिटल का उदघाटन करवाने के लिए. वोअच्छा कर रहे थे. मुझे क्लियर था कि मैं यहां क्यूं आया हूं. सेकंड थॉट नहीं आयालेकिन कभी. मुझे नहीं मालूम था कि क्या होगा. बस मैं अपना सब कुछ देने वाला था, येपक्का था. सामान पैक किया. सब बेच दिया. और जब सब कुछ बिक रहा था, मैं खुश था. मुझेमालूम था कि मैं कुछ सही करके रहूंगा. मैंने कई बार ऐसा किया था कि 15 दिन खुद कोलॉक कर लोगों के हिसाब से स्क्रिप्ट लिखने की कोशिश की थी. लेकिन अभी अनुराग सर नेज़िम्मेदारी ले ली. उन्होंने बस कहा कि जस्ट गो एंड डू इट. मैं भाग गया.आपका काम करने का स्टाइल क्या है?मेरा कोई स्टाइल नहीं है. और ये बात मैं बनावटी तौर पर नहीं कह रहा हूं. मैं एकबच्चे के जैसा हूं. मुझे जैसा सिखाओ, मैं वैसा सीख जाऊंगा. अगली फ़िल्म में मैं फिरसे वही बच्चा बन जाऊंगा. बच्चे ही कुछ नया सीख पाते हैं. मैं वही बने रहना चाहताहूं. जो सीखता हूं, अगली फ़िल्म से पहले भूल जाता हूं. संभावनाएं अनंत हैं. और संभवसब-कुछ तभी होगा जब आप ये सोचकर उतरें कि आप को कुछ नहीं आता है. जिस दिन कुछ आनेका दंभ आ गया, सब चौपट हो जाएगा.इस फ़िल्म में जातीय समीकरण, खेल में पॉलिटिक्स वो भी इतने छोटे लेवल पर, ये सब कहांसे आया?मैंने एक कहानी लिखी थी जिसे अनुराग सर ने देखा. उन्होंने कहा कि मैं इसमें कुछबदलाव करूंगा. मैं इस दुनिया का सबसे बड़ा बेवकूफ़ कहलाऊंगा अगर कह देता कि इसे ऐसाही रहने दो, कुछ मत बदलो. राइटर और डायरेक्टर के तौर पर उनके बारे में तो आपकोमालूम ही है. मैं उनसे सवाल नहीं करता हूं. उनके सामने मैं बच्चे जैसा हो जाता हूं.वो जो कह दें, मैं वो कर देता हूं. मेरे उनके बीच उस बाप-बेटे जैसा रिश्ता है जोबाप अपने छोटे से बेटे को हवा में उछाल रहा होता है. जब वो उछालता है तो बच्चा हवामें होता है लेकिन जब वो नीचे आता है तो हंस रहा होता है और उसकी हंसी में दोबाराउछाले जाने की रिक्वेस्ट छिपी होती है.अनुराग कश्यप के साथ अब आगे कुछ...?मैं कुछ भी प्लान नहीं करता. मैं पंच- वर्षीय योजना के तहत नहीं चल सकता. बस सब कुछअनलर्न (unlearn) करते चलना है. कोई चीज़ आए तो उसे अच्छे से कर सकूं. कहीं से मिले,अच्छा काम मिले. ये ज़रूरी नहीं है न कि बस अनुराग कश्यप ही मुझे अच्छा काम दे सकताहै. जब कहीं से कुछ नहीं मिलता था तो मैं भोजपुरी फ़िल्में कर रहा था. (वो नाम बतातेहैं लेकिन फिर कहते हैं कि नाम मत लिखियेगा वरना सब ससुरे उसकी क्लिप ढूंढ-ढूंढशेयर करेंगे.) सर्वाइव करता था. दूरदर्शन के सीरियल में काम किया. खुद डॉक्टर थालेकिन सीरियल में वार्डबॉय का काम किया. 500 रुपये मिले. बस ये सोचता था कि एक सीनसे ही तो फ़िल्म मिलती है. इसी धुन में बस किये जा रहा था. तो अब आगे अच्छे की चाहहै.आने वाले प्रोजेक्ट्स?अक्षय कुमार के साथ मैं 'गोल्ड' फ़िल्म में आ रहा हूं. रीमा कागती डायरेक्टर हैं.बढ़िया फ़िल्म है. मेरा रोल भी मुझे बहुत पसंद है. ज़्यादा कुछ अभी नहीं कहूंगा.***************************विनीत सिंह की फ़िल्म 'मुक्काबाज़' 12 जनवरी को रिलीज़ हो चुकी है. फ़िल्म को बनाया हैअनुराग कश्यप ने. फ़िल्म में विनीत के साथ ज़ोया हुसैन, जिमी शेरगिल और रवि किशन नेभी काम किया है.फ़िल्म का रिव्यू यहां क्लिक कर पढ़ें.'मुक्काबाज़' का विडियो रिव्यू:अनुराग कश्यप समेत मुक्काबाज़ की टीम का इंटरव्यू