एक नई हीरोइन आई हैं. हीरोइन कौन होती है? जो फिल्म में लीड रोल करे. उस हिसाब से.और बढ़िया करे तो उसे एक्ट्रेस भी कह सकते हैं. अर्थात हर हीरोइन एक्ट्रेस नहींहोती. ये समूह ग की भर्ती से शुरू होने वाले रीजनिंग के सवाल की तरह हो सकता है. हरकुर्सी मेज है, कुछ मेज डोरमेट हैं. सभी डोरमेट कुर्सी नहीं हैं जैसा. येकन्फ्यूजिंग हो गया है. साफ-पारदर्शी सरल नहीं है. मगर है. सरल. एक्टिंग. जोया की.जो हमारी हीरोइन हैं. और एक्ट्रेस भी. जिन्होंने डेब्यू किया है अनुराग कश्यप कीफिल्म मुक्काबाज से. हालांकि ये डेब्यू नहीं है. क्योंकि जोया इससे पहले तीनफिल्में और कर चुकी हैं. जिनके बारे में आपको नहीं पता. क्योंकि किसी ने पता करनेकी जहमत नहीं उठाई. क्योंकि फिल्म मतलब फीचर फिल्म जो सिनेमा हॉल में रिलीज हो, ऐसीसमझ बना और जमा दी गई है. इस इंटरव्यू में जोया को ये फिल्म कैसे मिली, इसकी तैयारीकैसे की, जैसे रेगुलर सवाल हैं. पर जवाब असली हैं. ये भी है कि जोया और अनुराग मेंलड़ाई क्यों होती है. और ये भी कि दिल्ली की एक लड़की, जब मुंबई जाती है तो क्याहोता है. कैसे होता है. खैर, जोया से हमने बात की. तसल्ली से. मजा आया. हम दोनोंको. आप भी इससे होकर गुजरें.--------------------------------------------------------------------------------सवाल- पर्सनल लाइफ से शुरू करते हैं. बल्कि लाइफ से. उसकी शुरुआत से. पैदाइश से. जोया- दिल्ली में पली बढ़ी हूं. कई जगह रही. पंचशील पार्क, मालवीय नगर. दरअसल एक घरजैसा कुछ सैनिक फॉर्म में था. तब वहां फॉर्म हाउस नहीं खेत होते थे. फिर आखिर मेंफैमिली गुड़गांव सेटल हो गई है आठ साल से. सवाल- पढ़ाई लिखाई कहां की? जोया-घर-परिवार के लोग दून और वैलहम में पढ़े हैं. पापा भी. जब वो 14 साल के थे तोदादाजी का इंतकाल हो गया. पापा को आज तक अफसोस है. बोर्डिंग के चक्कर में वो अपनेवालिद के साथ वक्त नहीं गुजार सके. और इसलिए पापा ने तय किया कि मैं अपने बच्चों कोअपने पास रखकर पढ़ाऊंगा. इसके चलते मैं और मेरी बहन दिल्ली में ही पढ़े. पापा केदून स्कूल के एक टीचर थे. वो वसंत वैली स्कूल में प्रिंसिपल बनकर आए थे. तब येनया-नया स्कूल था. क्लास में 20-25 बच्चे ही होते थे. यहां पढ़ाई से ज्यादाएक्स्ट्रा कैरिकुलर एक्टिविटीज पर जोर था. यहीं हमारा एडमिशन करवा दिया गया. सवाल-तो एक्टिंग का कीड़ा कहां काटा? जोया- स्कूल में थिएटर करती थी. उसके बाद मन थाएलएसआर (लेडी श्रीराम कॉलेज) से जर्नलिज्म करने का. वहां एडमिशन नहीं मिला. तो डीयूके साउथ कैंपस के वेंकटेश्वर कॉलेज में बीए प्रोग्राम में चली गई. उस टाइम पर'यात्रिक थिएटर ग्रुप' ज्वाइन किया. इसमें सुनीत टंडन जैसे कई लोग थे. हम इंग्लिशमें प्ले करते थे. मैं ग्रुप की सबसे छोटी मेंबर थी. सवाल- घरवालों ने लोड नहींलिया? जोया- हमारी फैमिली में क्रिएटिव लोग हैं. नाना आर्किटेक्ट थे और नानी पेंटर.मां चाइल्ड साइकॉलजिस्ट. पापा टूरिज्म के बिजनेस में हैं, मगर ट्रेंड सिंगर भी हैं.तो किसी ने ये नहीं कहा कि ये कहां थिएटर करने लग गई. हां, पापा को एक डर था किथिएटर घर नहीं चला सकता. उनका कहना था कि इंडिपेंडेट होना चाहिए. फाइनेंसियली. कोईप्रफेशनल डिग्री हो, सीए या लॉयर टाइप की. बैकअप के लिए. जब ग्रेजुएशन के बादबॉम्बे आने का सोचा तब पापा को दूसरा डर हुआ. इंडस्ट्री में किसी को नहीं जानती.कैसे क्या होगा. पर मैं आ गई. मेरी एक कजिन यहां काम करती थी. उसके पास. फाइटमारने. अब तो मेरी छोटी बहन भी यहीं है. वो एक ऑनलाइन एजेंसी में राइटिंग करती है.सवाल- डीयू में थिएटर के बाद ज्यादातर लोग एनएसडी का ख्वाब पालते हैं... जोया- मैंभी एनएसडी जाना चाहती थी. वहां अप्लाई करने के लिए कम से कम 10 प्रफेशनल प्ले होनेचाहिए. मेरे सिर्फ आठ थे. तो आई मूव्ड टु बॉम्बे. 2012 में आई. दिल्ली में थिएटर केदम पर खर्चा नहीं चल सकता. मगर मुंबई में ऐसा नहीं था. तो वही काम यहां करना शुरूकिया. सवाल- मुंबई थिएटर का कोई खास वाकया. जैसे आपकी फिल्म मुक्काबाज की कंपोज़ररचिता यहां मकरंद देशपांडे से मिलीं. मकरंद ने काम देखने के बाद अनुराग से रचिता काजिक्र किया... जोया- मकरंद देशपांडे से मैं भी मिली थी. बहुत अच्छे हैं. उन्होंनेबोला, ये किताबें पढ़ो. अगर आपके पास ऑफिस हो, तो रोज का रुटीन हो जाता है. ऑफिस भीनहीं हो. आपका रुटीन क्या होना चाहिए. दो साल लोगों से मिलने की कोशिश की. दिल्लीमें सेविंग्स थीं. पापा पैसे भेजते थे. प्ले देखो. बॉम्बे में लोग अप्रोचेबल हैं.कास्टिंग डायरेक्टर हैं. कास्टिंग एजेंसी से मिली थीं. पोर्टफोलियो कभी बनाया नहीं.सवाल- ओके.तो मुक्काबाज आपकी पहली फिल्म है. जोया- नहीं मुक्काबाज मेरी चौथी फिल्महै. जोया - पहली फिल्म- तीन और आधा. केरल के फिल्म फेस्ट में प्रीमियर हुआ हैइसका. मेरा पार्ट हिंदी में है. बाकी इंग्लिश और मराठी. बनाया है यूक्रेनियनडायरेक्टर ने. मेरी एक दोस्त हैं उनके थ्रू डायरेक्टर ने एप्रोच किया. डायरेक्टर कानाम- डारिया गाई. वो एक्ट्रेस खोज रही थीं, जो थिएटर वाली हो. इनफैक्ट इस फिल्म मेंसभी थिएटर के हैं . अंजुम राजाबली, सुहासिनी मुले. केके रैना. तो सबसे पूछ-पूछडारिया मुझ तक पहुंची. मैंने उनके लिए रीडिंग की. उन्हें मैं अच्छी लगी. वो मुझे.स्क्रिप्ट पसंद आई. फिल्म वन टेक शूट वाली थी. इसलिए थिएटर वाली चाहती थीं वो. येएक एक कमरे की कहानी है. तीन पार्ट में. पहली, लड़के और उसके दादा की. दूसरी, सेक्सवर्कर और क्लाइंट. तीसरा एल्डरली कपल. मैं दूसरे पार्ट में सेक्स वर्कर बनी हूं.इसकी कहानी बहुत स्वीट है. वो लड़की इस जगह (यानी कमरा) में पहली बार आई है. और उसआदमी की भी पहली रात है. वो सोशली ऑकवर्ड है. दोनों को पता नहीं. स्ट्रेंज लगता है.दोनों को वहां होना नहीं है. इसी में सिचुएशन बनती है (सवाल- आपको रिस्क नहीं लगा.पर्दे पर पहला रोल सेक्स वर्कर का. जोया- नहीं, कहानी बहुत अच्छी है. कहने मेंकंट्रोवर्सियल लगता है. रोल है नहीं वैसा.) दूसरी फिल्म- इंग्लिश में है. द कलर ऑफलॉस और (or)ब्लू. एक लड़की है, लाइफ में फ्लोट कर रही है. फ्री स्पिरट. वो फ्लोट कोलेकर डिनाइल में है. कुछ भी शॉर्टेड नहीं है. वो जज करना शुरू करती है. तीसरीफिल्म- नामदेव भाऊ- इन द सर्च फॉर सायलेंस. ये भी डारिया गाई की है. भाऊ मुंबई केएक टैक्सी ड्राइवर हैं. पक गए हैं. फिर उन्हें रोड पर एक आर्टिकल मिलता है. दसमोस्ट क्वाइट जगहें ऑन दिस प्लेनेट. एक छोड़ सब विदेशी. जो एक छोड़ी, वह है स्पीतिवैली. ये जगह इंडिया में है. उन्हें शांति चाहिए. वो बैग पैक कर निकलते हैं .रोडट्रिप है. उन्हें एक लड़का मिलता है. जो गुम गया है. वो आकर भाऊ संग चिपक जाता है.बोलता है उनसे कि मैं भी यहीं जा रहा हूं.मेरा कैरेक्टर एक लड़की का है. वो लद्दाखमें मिलती है. बहुत इरिटेटिंग है. उसे अकेले सोने में डर लग रहा है. टूरिस्ट है.वहीं पर रह रही है. अब तक अकेली है. मगर ये दोनों मिल गए तो उनको इरिटेट करने लगतीहै. सवाल- और इन तीन के बाद मिली सुनैना (मुक्काबाज में जोया के किरदार का नाम)जोया- हां. मैं अनुराग को जानती थी. अवनी के थ्रू. अवनी मेरी स्कूल फ्रेंड है. उसनेअपने पापा रघु राय (मशहूर फोटोग्राफर) पर एक डॉक्युमेंट्री बनाई. ये अनुराग नेप्रॉड्यूस की थी. तब से अनुराग से मिलना हो रहा है. फिर मैंने उन्हें अपनी लिखी एकशॉर्ट स्टोरी दिखाई. मैं चाहती थी कि अनुराग इसमें एक रोल करें. मगर वो बोले, येस्टोरी नहीं प्ले है. इस दौरान वह तीन और आधा प्रॉड्यूस कर रहे थे. जब उन्होंने येफिल्म देखी तो पूछा, तू क्या क्या करती है. उन्हें लगता था कि मैं बस लिखती हूं. उसदौरान उन्होंने कहा था. तुम्हारे साथ काम करूंगा. मुझे लगा, मुंबई में सब ऐसे हीबोल देते हैं. इसने भी बोल दिया. फिर एक रोज उसने मुक्काबाज की स्क्रिप्ट भेजी.मैंने दो तीन दिन तक रिप्लाई नहीं किया. मुझे लगा कि फीडबैक लेने के लिए भेजी है.फिर उसका कॉल आया. अवनी का भी. तब समझ आया कि मुझे सुनैना का रोल ऑफर हुआ. है.सवाल- कैसे की गूंगेपन की तैयारी? जोया- अनुराग का साफ कहना था. साइन लैंग्वेजसीखनी होगी. इसके लिए छह-आठ महीने का टाइम था. उन्होंने दो ऑप्शन दिए थे. दिल्ली यामुंबई में सीखो. दिल्ली का घर होने की वजह से सोचा होगा. मगर मैं मुंबई रुकी. औरयहीं पर संगीता गाला से मिली. मेरी ट्रेनर. उन्होंने ब्लैक, बर्फी, शमिताभ के लिएएक्टर्स को ट्रेन किया है. मगर कोई पब्लिसिटी नहीं मिली. सवाल- तो आप उन तक कैसेपहुंचीं? जोया- मेरा एक दोस्त डायरेक्शन में है. एक छोटी सी प्यारी सी फिल्म बनीथी. साइलेंट नेशनल एंथम. उसमें वो एडी था. उसके लिए संगीता गाला ने ही सबको ट्रेनकिया था. मैंने अपने दोस्त से बोला. साइन लैंग्वेज का कोच नहीं मिल रहा. उसने मुझेसंगीता जी तक पहुंचा दिया. वो खुद डेफ़ हैं. मगर उनकी पर्सनैलिटी सुनैना जैसी है. तोहमारी खूब बनी. संगीता डेफ़ बच्चों के साथ और वकीलों के साथ बहुत काम करती हैं.उन्हें देखकर भी बहुत कुछ सीखने को मिला. रोड पर कैसे चलना है. मुंह कैसे मूव करनाहै. ये सब. मैनरिज्म भी. आप ये सब स्कूल में नहीं सीख सकते हो . सवाल- क्याब्रीफिंग थी सुनैना के रोल के लिए अनुराग की तरफ से? जोया- परिवार में उसे सब बहुतकहते हैं, अपशगुनी है. ये बात उसे बहुत चुभती है. फिल्म में मैं सिर्फ नहीं बोलपाती. मगर मैं ठीक हूं. आपसे ज्यादा स्मार्ट हूं. आपसे ज्यादा इंपैथी है. मगर लड़कीहूं. वो भी यूपी के फ्यूडल सेटअप में. तो वो अपने ढंग से रिएक्ट करती है. हरकतेंमारती है. चाचा कहता है कि काला क्यों पहना तो और पहनती है. आंख में बहुत देखती है.सवाल- अनुराग और जोया का झगड़ा क्यों होता है? जोया- हम सीन के लिए ऑर्ग्यू करतेहैं. अनुराग कॉलैबरेट (संगत) करने के लिए बहुत ओपन हैं. उनके हिसाब से कैरेक्टर मेंपर्सनैलिटी एक्टर डालते हैं. जैसे सुनैना च्युइंगम खाती है. जो मैं बहुत खाती हूंताकि नाखून काटने की आदत से बच सकूं. तो इसे पिक्चर में डाल दिया. सवाल- और विनीत,उससे भी झगड़ीं क्या तुम? जोया- नहीं, विनीत तो पागल हो रखा था अपने रोल की तैयारीमें. पता नहीं उसके ब्रेन में एंजाइम्स को क्या हुआ. पर सच में बहुत इंस्पायरिंग हैवो. उसने छोटी-छोटी चीजों में मेरी बहुत हेल्प की. उसी ने सिखाया कि कैमरा लेफ्टमें है तो मेरी राइट आंख में देखो. उसने अनुराग के साथ काम किया है. तीन-तीनफिल्मों में. तो मुझे बताता रहता था कि अभी सर का मूड ऐसा है. अभी वो इस जोन मेंहैं. अभी बात करो. अभी नहीं करो. वैसे मैं विनीत की इस मामले में सुनती नहीं थी.उसके लिए सर थे, मैं दोस्त की तरह ट्रीट करती थी. सवाल- जोया अब फीचर फिल्मों की भीएक्ट्रेस हैं. इस एरिया में उनका कोई फेवरिट? जोया- ऋचा चड्ढा. गैंग्स ऑफ वासेपुरमें उनका रोल देखिए. कितने शेड्स हैं. कितना चेंज है. कैरेक्टर का लाइफ स्पैन कमालका है. बहुत बड़ी फैन हूं मैं उनकी. जब मिलीं फर्स्ट टाइम, तो बताया भी. सवाल-मुक्काबाज के बाद क्या. अनुराग जल्दी पल्दी हीरोइन रिपीट नहीं करते. विनीत को भीअल्टीमेटम दे चुके थे. जोया- मेरे साथ अनुराग काम करेंगे. उन्होंने मुझे प्रॉमिसकिया है. और वो मेरी फिल्म में भी काम करेंगे. (जोया सच कह रही हैं. अनुराग से जबमैंने बात की, तो उन्होंने कहा. हां जोया के साथ एक फिल्म तो ऐसी और करूंगा, जिसमेंउसका किरदार बोले, मुक्काबाज में तो वो गूंगी थी. रही बात जोया की फिल्म में कामकरने की, तो अनुराग को अभी भी लगता है कि वो फिल्म नहीं प्ले है. दोनों अभी भी डिनरटेबल पर इस पर झगड़ा करते हैं. फिर सुस्ताने लगते हैं. किसी और रोज झगड़ा यहीं सेशुरू करने के लिए) सवाल- आप लिखती हैं. तो आपके फेवरिट राइटर कौन हैं? जोया-इटैलियन हैं एक, लुईजी पेरैंदैलो. नाटक लिखते हैं. स्टाइल अबसर्ड है. उनका प्ले हैफ्यू कैरेक्टर्स इन द सर्च ऑफ ऑथर. मैंने मकरंद देशपांडे को बोल दिया था. कि येमेरा फेवरिट प्ले है. उन्होंने इस पर आधा घंटा ग्रिल किया. फिर हंसने लगे. फिरबोले, मेरा भी फेवरेट प्ले है. तो चेक कर रहा था. तुमने पढ़ा भी है कि नहीं. सवाल-हिंदी में भी कुछ पढ़ा है क्या? जोया- यात्रिक में हम इंग्लिश में ही प्ले करते थे.तो ज्यादा तो नहीं पढ़ा. एक प्ले किया था तब, टॉय कार्ट. ये किसी हिंदी, नो-नो,संस्कृत प्ले पर बेस्ड था. मृच्छकटिकम (मृच्छकटिकम अर्थात मिट्टी की गाड़ी. संस्कृतके सबसे पॉपुलर प्ले में से एक. फर्स्ट सेंचुरी बीसी में लिखा गया. राइटर थेशूद्रक. प्ले में खास ये है कि चोर, वेश्या, दासी जैसे कई कैरेक्टर हैं. उनका अहमरोल है. वो मिलकर राजा की सत्ता हिला देते हैं. ये पहली बार हुआ था किसी नाटक में.)इसके अलावा झांसी की रानी का रोल तो सभी करते हैं. (मतलब जोया ने भी किया) और ताजमहल का टेंडर भी. तीसरी कसम (रेणु की कमाल कहानी. नहीं पढ़ी तो पढ़ लो, पाठकों. येरहा लिंक.) भी. सवाल- आप इंग्लिश मीडियम में पढ़ीं. प्ले भी वही किए. और ये फिल्महिंदी की. वो भी बरेली का सेटअप. जबान में लहजे की दिक्कत नहीं आई? जोया- डिक्शन काइशू नहीं हुआ. ज्यादातर बात हम इंग्लिश में ही करते हैं शूट से पहले. जब आप इंगलिशथिएटर करते हो, तो उच्चारण में स्ट्रेस करते हो. वैसी आदत बन जाती है. पर फिल्म केलिए सुधार लिया. मेरा लिस्प (तुतलाना) हुआ करता था. अभी भी है. ज्यादा लोगों को पताभी नहीं चलता है. बट आई डोंट रियली केयर. सवाल- मुक्काबाज के गाने धांसू हैं. तुमकैसे गाने सुनती हो. इंग्लिश-विंग्लिश... जोया- हां. बॉब डिलन और जैनस जॉपलिन कोखूब सुना. मैं मेटल फ्लूट बजाती थी. जैज और ब्लूज (संगीत के दो फॉर्म) में ट्रेनकिया. और पापा सुनते थे पुराने गाने. बेगम अख्तर टाइप्स. तो वो भी सुने. आपको पताहै. मैंने आबिदा परवीन के साथ परफॉर्म किया. तब सेवेंथ में पढ़ती थी. बाद में रेखाभारद्वाज के साथ भी. दोनों जहां-ए-खुसरो में परफॉर्म करने आए थे. सवाल-कैसा रहाजिमी शेरगिल और रवि किशन के साथ काम करना. क्या सिखाया उन्होंने? जोया- रवि किशन केसाथ मेरी सीन नहीं था कोई. मगर वैनिटी वैन के बहुत किस्से हैं. क्या-क्या बतातेसुनाते रहते थे वो हम सबको. और उनकी हिंदी बहुत एंटरटेनिंग है. जिमी शेरगिल बहुतशाई और सॉफ्ट स्पोकन हैं. सीन के दौरान भी ऐसा होता था. हमारे फर्स्ट एडी हैं रणदीपझा. वो बोलते थे, जिमी सर थोड़ा लाउड. ओह, हां. इन दोनों की डबिंग बहुत स्ट्रॉन्गहै.--------------------------------------------------------------------------------और अंत में, जोया लोड नहीं लेतीं. इंडस्ट्री का. एक कास्टिंग डायरेक्टर ने कहा,यहां वहां सर्जरी करवा लो. दूसरे ने कुछ और. जोया सबको ठेंगा दिखा आईं. उनमेंएक्ट्रेस वाली सारी चीजें हैं. हीरोइन वाली एक भी नहीं. ट्विटर अकाउंट है, जहांज्यादा कुछ नहीं है. इंस्टा रामजाने है भी या नहीं. सेल्फी से उन्हें दिक्कत होतीहै. पाउट बनाना आता नहीं. डायरेक्टर की हर बात मानना भी नहीं. बहुत बहस करती हैं.इन सबके बावजूद उन्हें खूब अच्छे प्रोजेक्ट्स मिले हैं. मुक्काबाज के बाद. अच्छेडायरेक्टर्स के साथ. एक कागज होता है. एनडीए कहते हैं उसे. नॉन डिसक्लोजरएग्रीमेंट. एक्टर्स करते हैं, ताकि फिल्म का सस्पेंस खत्म न हो. जोया ने भी कियाहै. हमें पता है. कुछ-कुछ. उन फिल्मों के बारे में. मगर हमें भी उनके एनडीए कासम्मान करना होगा. उम्मीद करता हूं कि तुम ऐसी ही रहो. जोया. जोया, जिसका मतलब होताहै जीवन. जो असल है. कच्चा-पक्का-सच्चा.--------------------------------------------------------------------------------फ़िल्म मुक्काबाज़ के डायरेक्टर अनुराग कश्यप का इंटरव्यू. मुक्काबाज़ के मुक्केबाज़विनीत सिंह का इंटरव्यू. और अंत में पूरी टीम का वीडियो इंटरव्यू, बिस्तर पे बैठके: