फिल्मों, टीवी सीरियल्स और पॉपुलर कल्चर के छह फुटे, गोरे, ब्यूटी सलून में तराशेगए, बालहीन, मॉडलनुमा ‘actors’ कमर्शियल एंटरटेनमेंट जगत में सबसे बड़ी फैंटेसी बनादिए गए हैं. जबकि ये सबसे बड़ा भ्रम है. लेकिन भारत के लाखों कस्बों-गांवों की उसप्रजा को इसकी जानकारी नहीं और वे ठिठके हुए डिश की छतरियों से सिर्फ सौंदर्य औरव्यक्तित्व के इसी गढ़े हुए सच को देखते जाते हैं. गोरा बनाने वाली क्रीमों कीबिक्री लगातार बढ़ रही है, लंबाई बढ़ाने वाले क्लिनिक अब भी चल रहे हैं. गोरे गालोंऔर दानवाकार मॉलों की ये चमक अंधा कर रही है.लेकिन सिनेमा का सही सच भी एक दिन ताज पर बैठेगा. वो सच है - कहानी और अभिनय. इसकेबीच का सारा मेकअप उतरेगा. तब ज़माना टॉम क्रूज़ से ज्यादा पीटर डिंकलेज का होगा. और,शुरुआत हो चुकी है.पीटर जिन्हें हमने बेहद लोकप्रिय अमेरिकी टीवी सीरीज ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ में देखा है.छह सीज़न आ चुके हैं और इसमें उनके निभाए बौने राजकुमार टिरियन लैनिस्टर के किरदारका दर्शकों को बेसब्री से इंतजार रहता है. सिर्फ 4 फुट 5 इंच के पीटर यहां कोईविदूषक नहीं हैं. वे pure drama हैं. अभिनय में उनकी बारीकियां आप देखें. इस अदायगीके लिए वे बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का गोल्डन ग्लोब जीत चुके हैं. दो एमी अवॉर्ड भीउन्हें मिले है. 2003 में आई कॉमेडी ड्रामा ‘द स्टेशन एजेंट’ में भी उन्होंने एकप्रमुख भूमिका की थी. लेकिन हमारे यहां हिंदी फिल्मों में अब भी किरदारों को लेकरऐसी स्थिति नहीं आई है कि प्रमुख भूमिकाएं गैर मॉडलनुमा लड़के-लड़की को दी जाए.ले – दे कर ‘मैं मेरी पत्नी और वो’ (2003) में राजपाल यादव ने मिथिलेश शुक्ला काप्रमुख रोल किया. उसके अलावा उदाहरण नहीं हैं. हालांकि कद या शारीरिक योग्यताओं सेअभिनय का कोई लेना देना होता नहीं है. नहीं तो क्या आप जानते हैं कि अल पचीनो का कदडेनिस क्वेड से बहुत कम है. अलग-अलग दोनों की फिल्में देखें तो लगेगा कि ‘दगॉडफादर’ वाले पचीनो बहुत लंबे है, जो है नहीं.आमिर खान की हाइट ज्यादा नहीं है लेकिन ‘सरफरोश’ में उनकी पुलिस टीम के मुस्टंडेनाम से कांपते हैं. रानी मुखर्जी की हाइट औसत से कम है लेकिन ‘मर्दानी’ देखें. सातफुट का आदमी गुंडों की भीड़ को छुए बिना वो रौंगटे खड़े नहीं करवा सकता जो औसत से कमकद के पंकज कपूर ‘हल्ला बोल’ के एक सीन में करवाते हैं जहां गुंडों की भीड़ के आगेवो बस एक हाथ लहराते हैं और सब डर जाते हैं. पीटर ने ‘गेम्स ऑफ थ्रोन्स’ में बिलकुलयही साबित किया है. हमारे बीच भी उन्हीं जैसा एक अच्छा अदाकार है जिसे देखते हुएअभिनय के अलावा किसी चीज़ पर ध्यान नहीं जाता. टाटा स्काय की ‘डेली जिंदगी’ वालीविज्ञापन सीरीज देखें जिसमें एक लड़का दुकान पर काम करता है और वहां आने वाली लड़कीकी ओर आकृष्ट है. उससे बोल भी नहीं पाता. लेकिन इसी दुकान पर काम करने वाला दूसरानौकर भी है जो सिर्फ छोटे-छोटे वाक्य बोलकर सबसे ज्यादा याद रह जाता है. उसके पंचबहुत करारे लगते हैं. आप ‘तेरे बिन लादेन-2’ देखिए जिसमें एक छोटे कद का जिहादी है.वह सब छह फुटों पर भारी है. हाल ही में रिलीज हुई ‘कैरी ऑन कुत्तों’ में हिप्पीठाकुर का कसा हुआ रोल उन्होंने किया. अब वे अनुष्का शर्मा के बैनर की ‘फिल्लौरी’में दिखने वाले हैं. इनका नाम है शिवम प्रधान. 30 बरस के होने वाले हैं. लंबे समयसे थियेटर कर रहे हैं. क्लासिक प्ले किए हैं. डबिंग की है. उनसे बात हुई. जिंदादिलहैं. खिलखिलाते रहते हैं. स्पष्ट व्यक्तित्व है. अभिनय जुनून है. धीरे-धीरे गंभीरभूमिकाओं की ओर जाना चाहते हैं. और ऐसी पूरी संभावना नजर आती है कि वे ऐसी यादगारभूमिकाएं कर पाएंगे.शिवम प्रधान.प्रस्तुत है उनसे बातों के अंश:कहां रहते हैं?मैं अभी रहता हूं नोएडा में. वहां घर है. मेरा बेस वहीं है. काम के सिलसिले मेंमुंबई आता-जाता रहता हूं.दिल्ली भी जाते रहते हैं मंडी हाउस की तरफ?शुरुआत की थी तब मंडी हाउस, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के आस-पास काफी थियेटर करताथा. चूंकि उस इलाके में कई ऑडिटोरियम हैं तो प्ले वहीं होते थे. लेकिन अभी काफीसालों से मैं मंडी हाउस की तरफ रिहर्सल नहीं कर रहा हूं. दिल्ली में कई तरह काथियेटर होता है. मेरी शुरुआत वहीं हुई. फिर काफी अलग ग्रुप के साथ काम कियाजिन्होंने मेरा भी दुनिया को देखने का चश्मा खोला. इंग्लिश थियेटर किया.इम्प्रोवाइज किया. मोटा-मोटा मैं सब तरह के ग्रुप्स के साथ काम कर चुका हूं.इनमें कुछेक प्रमुख समूह जो रहे.टी फॉर थियेटर, द टेडपोल रेपरेटरी..टेडपोल जो ‘ओमदरबदर’ में सुनाई देता है..(ठहाका लगाते हैं).. ये नील चौधरी का ग्रुप है. मैंने शुरुआत की थी एम. के. रैना केग्रुप ‘प्रयोग’ से. एक ग्रुप है वीके शर्मा का ‘खिलौना’. हाल ही में मैंनेक्लाउनिंग का भी काफी काम किया है. जर्मनी से एक सज्जन आए थे माइकल मॉरेट उनके साथकाम किया. कई और नाट्य समूह और भी रहे.क्लासिक प्ले जो आपने किए हैं?हेनरिक इब्सन का नाटक है Peer Gynt. इसका हिंदी वर्जन हमने किया. इसमें कम से कमचालीस लोगों की कास्ट थी. पच्चीस गाने थे. ढाई घंटे का नाटक था. रोमन पृष्ठभूमिमें. उसके बाद मैंने Waiting for Godot किया. उसमें चार ही कलाकार हैं. एक क्लासिकप्ले है ‘हिम्मत माई’ वो किया. मैं स्कूल टाइम से ही थियेटर कर रहा हूं और एक बहुतही क्लासिक प्ले है ‘आषाढ़ का एक दिन’, वो मैंने स्कूल में खेला था. सबसे पहले. वोसबसे मुश्किल था. वो 11वीं कक्षा में ही करने को मिल गया था. उस समय एक अलग हीजुनून में थे. कर लिया. उसका भी अलग ही रस था.शिवम. Photo: Nicky Chandamफिल्मों और मुंबई में करियर के अहम पड़ाव कौन कौन से रहे?शुरूआत यूं हुई कि दिल्ली से थियेटर कर रहा था. दो दूनी चार आई थी. उसमें छोटा सारोल किया था. उसमें मैं एक शॉप पर होता हूं और ऋषि कपूर के साथ 30 सेकेंड का सीनथा. चार साल हो गए मुझे, लोग आज भी राह चलते पूछते हैं दो दूनी चार में आप परांठेवाले थे. उस किरदार की रिकॉल वैल्यू आज तक है. शुरुआत वहीं से हुई.उसके बाद प्रज्ञा चैनल था महुआ का. शैक्षणिक. Info-tainment जैसा. इसमें कहानियांहोती थीं. पांच एपिसोड की एक कहानी. वहां करीब 250-300 एपिसोड किए थे. डेढ़ साल केअंदर. कैमरा को लेकर वहां पूरी तरह सहज हो गया. मैं समझता हूं कुछ भी काम कभी ज़ायानहीं जाता.कॉलेज टाइम से शॉर्ट फिल्में बहुत कीं. जामिया (मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली) केबच्चों, आईपी कॉलेज के बच्चों के साथ. शॉर्ट फिल्मों में खेलने को बहुत मिलता है.वो शायद आप बड़ी फिल्मों में नहीं कर पाते.इस दौरान मील का पत्थर थी एक फिल्म ‘द गुडनाइट’. विनोद नागपाल (हम लोग, लव शव तेचिकन खुराना, आजा नचले) और मैं, दो ही कलाकार इसमें थे. 30 मिनट की थी. एक रात कीकहानी थी. इसे बहुत अवॉर्ड मिले थे. उसके बाद मुझे लगता है काफी अंतराल आया जबमैंने कोई प्रमुख काम नहीं किया था.हाल ही के समय में टाटा स्काय का ‘डेली जिंदगी’ एड कैंपेन आया. 13 एड की स्टोरी इनलोगों ने की. 10 मिनट की शॉर्ट फिल्म थी जिसे उन्होंने अलग अलग करके दिखाया. इस एडके चलते बॉम्बे की एक कंपनी ने मुझसे संपर्क किया. उनके स्टार परिवार अवॉर्ड काहिस्सा बना. उनके तीन-चार इवेंट थे. हर किसी में अलग अलग पात्र बनता था. ऑन द स्पॉटकाम करने का ये बहुत अच्छा अनुभव था.फिर ‘तेरे बिन लादेन-2’ आई. काम दो साल पहले किया लेकिन रिलीज इस साल हुई. इनकेनिर्देशक अभिषेक शर्मा के साथ स्कूल में मैंने वर्कशॉप की थी. वे गर्मियों कीछुटिटयों में वर्कशॉप लेने आए थे. बाद में मैं डीपीएस में पढ़ रहा था. वे दोबारा आएएक एनुअल प्रोडक्शन बनाने. तब दोबारा हम संपर्क में आए. हम लोग संपर्क में रहे.उनका फोन आया कि आजकल क्या कर रहे हो? मैंने कहा, वही कर रहा हूं जो पहले करता था.उन्होंने फिर मेरा किरदार लिखा. तेरे बिन लादेन-2 में मेरा पात्र 30 साल का मुजाहिदहै. उसके दाढ़ी नहीं आती है.हाल ही में कैरी ऑन कुत्तों रिलीज हुई है. उसमें पहले बजट खत्म हो गया था. जब आयातो फिर शुरू की. 6 शेड्यूल और 68 दिनों में फिल्म पूरी हो पाई.कैरी ऑन कुत्तों की एक फोटो में.हाल ही में फिल्लौरी खत्म की है अनुष्का (शर्मा) के साथ. उन्हीं के प्रोडक्शन कीहै. दिलजीत (दोसांझ) भी हैं.अब फिर थियेटर करने का मन है. करूंगा. फिल्में लगातार कर लीं. मैं तलाश में रहताहूं कि कुछ नए ग्रुप्स के साथ काम करूं. यंग थियेटर ग्रुप जैसा काम कर रहे हैं.उनकी आर्ट और टेक्स्ट को लेकर जो सोच है, अप्रोच है वो बहुत अलग है. उनमेंरुढ़िवादिता नहीं है. हमें पुराने और नए का समन्वय लेकर चलना चाहिए. मैं 50 सालवालों के साथ उतना अच्छे से ही बैठ सकता हूं जितना 18 साल के अपने कॉलेज जूनियर केसाथ. मुझे बैठा दिया जाए तो मैं दोनों उम्र वर्गों के साथ गप्पें मार लूंगा औरउन्हें बोर नहीं होने दूंगा इतना पक्का है.फिल्मों में सक्रिय हुए चार-पांच साल हो गए?सक्रिय तो नहीं कहूंगा क्योंकि ऑन एंड ऑफ रहा. इस बीच मैंने वॉयस डबिंग भी खूब की.हंगामा, डिज्नी जैसे चैनलों में कार्टून की डबिंग करता था. बहुत लंबे समय तक सिर्फये ही कर रहा था. आमदनी भी हो जाती थी और वो भी एक तरह की वॉयस एक्टिंग है कि टीवीपर जो कैरेक्टर आ रहा है आपकी आवाज हूबहू उसके जैसी लगे. वो भी रोचक काम था. कोशिशकरता था 100 परसेंट दूं. अभी भी आता है तो मजे से करता हूं. खासकर कार्टून्स केलिए. वहां खेलने के लिए बहुत मिलता है. जो काम मजा न दे वो करने का क्या फायदा?क्योंकि ये लाइन आपने अपनी मर्जी से चुनी है और इसको भी अगर करने के लिए करने लगेतो फिर क्या अर्थ रह जाता है. इससे अच्छा तो है कि जाकर फाइलों वाले काम ही करनेलगते.हमारे यहां कार्टून फिल्मों में ऐसा है कि बड़े स्टार को जितनी तवज्जो मिलती है उतनीकार्टून के लिए डबिंग करने वाले को नहीं, लेकिन अगर आप 20 साल बाद पहुंचेंगे सिनेमामें तो स्थिति उलट होगी. जैसे हॉलीवुड में हम देखते हैं तो जितना इमोशन हमारे भीतरसे कार्टून वाली फिल्में निकाल देती हैं उतना इंसानी अभिनय वाली बड़ी से बड़ीब्लॉकबस्टर्स भी नहीं निकाल पाती हैं. जैसे 'इनसाइड आउट' आई थी जिसने इस साल ऑस्कर,बाफ्टा, ग्लोब्स से लेकर सभी प्रमुख अवॉर्ड बेस्ट एनिमेशन फीचर कैटेगरी में जीते.उसमें सिर्फ रेखाएं थीं लेकिन आवाजों और कहानी से जिंदा हो गईं. अभी एक बड़ी वयस्कफिल्म के मुकाबले कार्टून फिल्मों को नीचा देखा जाता है लेकिन एक-दो दशक बाद वो एकही धरातल पर खड़ी मिल सकती हैं? दूसरा, हॉलीवुड और हमारी एनिमेशन फिल्मों में क्याफर्क है?उनकी फिल्मों में एक विजुअल डिलाइट भी होती है. जैसे हाल ही में द जंगल बुक आई थी.इसमें अपने हिंदी एक्टर्स ने डबिंग की थी. नाना पाटेकर, प्रियंका चोपड़ा, इरफान खान.एक-दो की आवाज सटीक थी. अभी एक विवाद भी हो गया था. एक फिल्म आई थी कैप्टन अमेरिका:सिविल वॉर. इसमें पहले आवाज देते रहे हैं मुंबई के पुराने डबिंग आर्टिस्ट संकेतम्हात्रे. इस फिल्म में भी एक हिस्सा उन्होंने डब कर भी दिया था लेकिन फिर स्टूडियोने कुछ सोचा और कहा नहीं हमें नई आवाज चाहिए और उन्हें कैप्टन अमेरिका की आवाज वरुणधवन से डब करवाई. और वरुण धवन की आवाज बिलकुल सही नहीं जा रही थी, वो एकदम फ्लैट जारही थी. आप फिल्म देखेंगे तो पाएंगे कि एकदम सपाट गई. वहीं संकेत अपनी आवाज औरपर्सनैलिटी से अलग चीज़ डबिंग के दौरान रच देते हैं. जैसे हॉलीवुड फिल्म है डेडपूल.वो अंग्रेजी में अलग है लेकिन हिंदी में उसे देखने का अलग ही मजा है क्योंकि उसमेंसंकेत की आवाज का जादू है.एनिमेशन फिल्मों और भारत की बात करें तो वो बन जरूर रही है लेकिन हमें उनमें विजुअलडिलाइट वाले बिंदु की ओर ध्यान देना चाहिए. उसके बाद आवाज़ का पहलू आए. अभी जिस तरहकी स्क्रिप्ट आ रही है, हम लोग अभी वापस कंटेंट की ओर तो लौटने लगे हैं. मस्ती,ग्रैंड मस्ती, हाउसफुल जैसी फिल्में आ रही हैं, चल रही हैं, तो कंटेंट से चलने वालीफिल्में भी आ रही हैं. पत्थर उछाला गया है छेद होगा. मुझे लगता है ये कुछ साल दिशामोड़ने वाले हैं. ये कर रहे हैं, कुछ तो कर रहे हैं.मैं ये समझता हूं कि ये जो फिल्में हैं हाउसफुल वगैरह इनकी भी डिमांड है. क्योंकिदेश में एक तो शिक्षा भी मुद्दा है. दूसरा, दफ्तर वाला आदमी 9 से 5 वाली नौकरी मेंएकदम पिस जाता है. वीकेंड में वो कंटेंट नहीं देखता, वो सोचता है कि भाई कुछ भी करलूं बस हंस लूं, खुश हो जाऊं, टेंशन एक परसेंट भी नहीं चाहिए भाई. टेंशन माने कि जबवो देखता है कि कोई फिल्म में ही संघर्ष कर रहा है तो वो उन्हें लगता है कि यारस्ट्रगल हम भी कर रहे हैं, ये भी कर रहा है, ये ही देखने के लिए थोड़ी आए हैं. मैंइस सोच को गलत नहीं मानता हूं. हम लोगों की खुराक भी कुछ ऐसी दी गई है कि इस वालीदाल की आदत ज्यादा है. और इसमें ज्यादा घी कब्ज़ कर देता है.हां, ये लॉजिक तो फिल्म लेखक भी देते हैं कि एक रिक्शावाला है वो अपनी मेहनत कीकमाई जोड़कर थियेटर आता है तो हाउसफुल की ही जरूरत है. लेकिन ये बात भी है कि वहबेचारा तो बता नहीं सकता कि इस फिल्म में एंटरटेनमेंट में ये सुधार हो सकते थे, याहास्य इस क्वालिटी का निकाला जा सकता था. तो उसको तो जो दे देंगे, उसे खाना पड़ेगा.शिक्षा वाली बात सही हो सकती है कि जब वो शिक्षित हो जाएंगे तो फिल्म बनाने वाले भीहो जाएंगे.ये भी है. एक बात दूसरी भी है कि शिक्षित होने के बाद भी लोग हाउसफुल देखते हैं.कितने लोगों को तो मैं जानता हूं जो ऊंची पढ़ाई कर चुके हैं और जॉब में हैं और वो येफिल्में पसंद करते हैं क्योंकि घर पैसे भेजने है, बच्चों की फीस है, ईएमआई है. उसीमें काम चल नहीं रहा है कि गीज़र खराब हो गया है. तो पिक्चर में वो बुद्धि काइस्तेमाल इतना नहीं करना चाहता है.इस पूरे सीन में आपकी फैमिली कहां है, समर्थन के हिसाब से?मेरे पूरे खानदान में नाना, दादा, कहीं भी, दूर दूर तक खोज लो, कोई भी इस लाइन मेंनहीं है. मेरे घर में वकील बहुत हैं. इंजीनियर बहुत हैं, जॉब वाले बहुत हैं. घर परइतना सपोर्ट मिला है कि क्या कहूं. ऐसा भी नहीं कि कोई जॉब तो कर लो. बैकअप ले लो.एमबीए तो कर लो. इंजीनियरिंग तो कर लो. 11वी में मेरे को क्लियर हो गया था कि ऑफिसमें फिट नहीं हो पाऊंगा. हालांकि मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि क्या करूंगा? फिल्मेंतो बिलकुल नहीं सोची थीं कि शाहरुख खान के साथ काम कर लूंगा. बस ये था कि रंगमंच जोकर रहा हूं स्कूल में उसमें मजा आ रहा है. तब मेरे माता पिता बोल देते कि एक्टिंगसे क्या होता है. ये कोई काम थोड़े ही है. लेकिन नहीं. उन्होंने ऐसा नहीं कहा. मैंनेसोचा कि मैं ग्रेजुएशन नहीं एनएसडी जॉइन करूंगा. पता चला उसके लिए ग्रेजुएशन करनापड़ेगा तो तय किया कि करूंगा लेकिन दूरसंचार से. मैंने चार कॉलेज में ही अप्लाई कियाथा. हंसराज, किरोड़ीमल, रामजस, हिंदु. जानबूझकर. रैगिंग से डर लगता था. लेकिन नसीबअच्छा था. रामजस और किरो़ड़ीमल में मिल रहा था तो रामजस में हुआ. वो मेरे लिए काफीठीक रहा. जिस बात से कतरा रहा था कि कॉलेज नहीं जाऊंगा. वही बात मेरे व्यक्तित्वमें इजाफा करने वाली रही. मेरे कॉलेज की नाट्य संस्था 'शून्य' ने ऐसा किया. उसनेमुझे इतनी आजादी दी. लोगों के बीच खुलने का मौका मिला. मुझे आकार दिया. इसके अंदररहकर बहुत काम किया. आगे बढ़ाया. अब एक दैनिक ने दिल्ली विश्वविद्यालय की नाट्यसंस्थाओं में इसे पहला स्थान दिया है. इस बीच परिवार पूरी तरह साथ रहा और वो आज तकहै.माता-पिता के बारे में बताएं.मेरे पिताजी हैं पीयूष प्रधान. एनटीपीसी, नोएडा में एजीएम हैं. मां अपर्णा प्रधानहाउसवाइफ रही हैं. वो पढ़ाती थीं लेकिन मेरी वजह से उस जीवन को त्यागा. मां कीकलाकारी ही है कि घर को बांधकर रखा.आपके काम को लेकर अब कुछ कहते हैं पिता?बहुत चुटकी लेते हैं. कहते हैं इनका कोई शेड्यूल नहीं है. ये कभी रात को 2 बजेआएंगे, सुबह 4 बजे चले जाएंगे. कभी जाएंगे तो दो दिन आएंगे ही नहीं. या तो ये दिनमें चार घंटे काम करेंगे. या पूरे दिन सोएंगे. या चौबीस घंटे काम करेंगे और चार दिनतक नहीं सोएंगे. उनको लगता है कि हम बहुत ही टफ लाइफ जी रहे हैं. और हमको लगता हैकि ये बहुत ही मजेदार है. मेरे पिताजी को शनिवार-रविवार की छुट्टी मिलती है.सोमवार से शुक्रवार का शेड्यूल है. 9 से 5. शाम को आते हैं तो हम साथ में चाय पीतेहैं. मेरा जन्म रायबरेली का है, पिताजी का फैज़ाबाद का है. लखनऊ में हमारा घर रहाहै. लेकिन लंबे समय से नोएडा में ही निवास है. दिल्ली-एनसीआर ऐसी जगह है जहां सबलोग माइग्रेट होकर आए हैं. बहुत ही कम लोग हैं जो कह सकते हैं कि दिल्ली वाले हैं.मैं आज तक ये नहीं कह पाता हूं कि मैं दिल्ली वाला हूं. क्योंकि एक तो मैं दिल्लीमें रहा भी नहीं हूं. मैं नोएडा वाला हूं. पता नहीं हम लोगों की जड़ें कहां की हो गईहैं? याद है कि बचपन में दूसरी क्लास में छुटिटयों में कभी ननिहाल, कभी कहीं जातेथे. आज तो वो सब चीजें धुंधली हो गई हैं. पर हां, परिवार का सपोर्ट रहता है. एक बहनभी है. वो अभी बंबई में पढ़ाई कर रही है.वो भी एक्टिंग में हैं?नहीं. वो बीएससी फाइनेंस पढ़ रही हैं. बंबई का एक कॉलेज है नरसी मोनजी वहां से. वोपूरी तरह पढ़ाई में है. पिताजी की पढ़ाई से जुड़ी जितनी तमन्नाएं हैं वो वही पूरी कररही है. पर उसकी खुद की रुचि भी उसमें है, कोई दबाव नहीं.तेरे बिन लादेन-2 के दृश्य में.रिश्तदारों की प्रतिक्रिया अब बदली है?हां, उसमें मैंने बदलाव देखा है. पहले दूर के रिश्तेदार कहते थे, क्या करते रहतेहैं ये? नौटंकी करते रहते हैं. अब वही लोग हैं, पिक्चर आ रही है तो कहते हैं, अरे,क्या बात है, वेरी गुड! काफी धारणाएं बदल रही हैं अब. जेनरेशन गैप था वो खुल रहाहै. अब वे खुद ही कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ डॉक्टर या इंजीनियर ही होतेहैं, एक्टर भी होते हैं. मेरे परिवार वाले दस साल पहले ही ये समझ गए थे, नहीं तो आजमैं आपसे बात नहीं कर रहा होता.दुनिया और भारत में आपकी सबसे पसंदीदा जो फिल्में रही है?मैंने वर्ल्ड सिनेमा तो इतना नहीं देखा. मैंने हिंदी सिनेमा ज्यादा देखा. मुझे कथा(1983) बहुत अच्छी लगती है. अमोल पालेकर अभिनीत छोटी सी बात (1975) बहुत पसंद थी.एक अंग्रेजी में फिल्म थी लिटिल मिस सनशाइन (2006) वो भी पसंद है. और भी बहुत सीहैं लेकिन अभी याद कर पाना मुश्किल है.अभिनय में आपका सपना क्या है?मुझे अभी खुद नहीं पता कि क्या कर सकता हूं? मैं चाहता हूं कि जैसे टिपिकल रोल मुझेदेखकर दिए जा रहे हैं, उन्हें न देकर मुझे और भी बहुत आगे एक्सप्लोर किया जा सकताहै. मैं चाहता हूं कि वो हो. जैसे अभी तक जितनी फिल्में मैंने की हैं उनमें कैरी ऑनकुत्तों में हिप्पी ठाकुर का रोल ऐसा है जो ड्रीम रोल रहा है. इसमें मुझे पूरीआज़ादी दी गई. खेलने का पूरा स्कोप दिया गया. मैं आगे और बहुत ही सीरियस काम करनाचाहता हूं. संजीदा. एकदम. लेकिन मेरे साथ नेचुरली एक फैक्टर है कि कटाक्ष, ह्यूमर,कॉमेडी मेरे साथ जुड़ ही जाता है. क्योंकि मैं हूं ही ऐसा. देखने में और बात करनेमें. मैं चाहता हूं कि इसके विपरीत मैं अपने आपको जितनी पुश कर सकता हूं और मुझेकौन कितना धकेलकर ऐसा काम करवा सकता है. जिसमें कोई फूहड़ हास्य न हो. कुछ डार्कह्यूमर जैसा भले ही हो, वो मेरे लिए पैमाना रहेगा. तब लगेगा कि जैसे मैंने बात कीसमन्वय की, एक Versatility की, तो वो समन्वय बना पाऊंगा अपने अंदर क्योंकि जद्दोजहदअपने आप से ही रहती है, किसी और से नहीं.मेरी रेस खुद से ही है.