हमारे समाज में लड़कियां 'माल' और लड़के 'कुत्ते-कमीने' क्यों बन जाते हैं?
महिला दिवस पर पढ़िए, लड़के-लड़कियों की बराबरी के रास्ते में कौन आ रहा है.
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सांकेतिक इमेज, रांझणा फिल्म के ट्रेलर से स्क्रीनग्रैब
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हिमांशु सिंह दी लल्लनटॉप के दोस्त हैं. वीमेंस डे पर हमारे लिए कुछ लिखा है. मर्द-औरत के बीच समझ की खाई क्यों बढ़ जाती है, इस पर. हमारे लिए लिखा है इसका मतलब आपके लिए लिखा है. तो अब आपके सुपुर्द है.
लड़कपन में खूब फिल्में देखता था. फिल्मों में जब विलेन किसी लड़की का बलात्कार करने में सफल हो जाता था तो अगले सीन में पीड़ित लड़की या तो आत्महत्या कर लेती थी, या आत्महत्या की कोशिश करती थी. मैसेज ये कन्वे किया जाता था कि शादी से पहले कौमार्य भंग हो जाने पर लड़की की जिंदगी बेकार हो जाती है. लंबे समय तक मैं भी ये 'दिव्य' ज्ञान सिर पर लादे रहा. कक्षा 10 की बायोलॉजी किताब का 'वो' वाला चैप्टर भी कई-कई बार पढ़ा. लेकिन इस बॉलीवुड मार्का ज्ञान की पुष्टि कहीं नहीं हुई. हां ये जरूर पता चल गया कि लड़कियों का कौमार्य भंग या वर्जिनिटी लूज़ होना उनके जीवन की एक सामान्य घटना है. पर असल में बात उतनी सीधी है नहीं जितनी लग रही है. भारतीय परिवारों पर एक बड़ा दबाव येन-केन-प्रकारेण परिवार की बच्चियों को शादी तक किसी के द्वारा 'अशुद्ध' होने से बचाने का रहता है. चाहे इसके लिये उनकी पढ़ाई रुकवानी पड़े या कम उम्र में शादी करनी पड़े या ऑनर किलिंग ही क्यों न करनी पड़े. खूब विचार करने पर ये निष्कर्ष निकाल पाया हूं कि ये सारा खटराग दरअसल जातीय/नस्लीय शुध्दता बनाये रखने की व्यवस्था है जिस पर लगभग पूरे समाज में मूक सहमति है. यही वजह है कि आज भी कुछ समाजों में शादी के बाद वर्जिनिटी टेस्ट की वाहियात प्रथाएं हैं. लड़कियों के 'अशुद्ध' हो जाने के इस अनजाने भय की परिणति प्रायः बच्चियों की आधी-अधूरी शिक्षा, कम उम्र में शादी, खराब सेहत, खराब करियर और नगण्य व्यावहारिकता के रूप में होती है. परिणामस्वरूप कम पढ़ी-लिखी और कमजोर स्त्री के माध्यम से मूर्खता का संचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में होता है. और फिर से वही वर्जिनिटी बचाये रखने की कवायद शुरू. ऐसे में महिलाओं के लिए सहज और सुरक्षित समाज के निर्माण की एक आवश्यक शर्त दूर की कौड़ी बन कर रह जाती है. मैं यहां विद्यालय स्तर पर लड़के-लड़कियों की सह-शिक्षा यानि को-एजूकेशन की बात कर रहा हूं. किसी विकासशील, मैत्रीपूर्ण और आधुनिक समाज के निर्माण की मूलभूत शर्त बच्चों को बिना लैंगिक भेदभाव के एक साथ पढ़ाना है. जिससे जीवन के शुरूआती चरणों में ही, उनके मन में विपरीत लिंगियों के लिये एलियन वाले भाव न आने पाएं. मैं खुद सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ता था जहां क्लास में 'बहनें' और 'भैया' अलग-अलग पंक्तियों में बिठाये जाते थे और रक्षाबंधन के दिन सभी लड़कियां लड़कों को राखी बांधती थीं. आज सोचता हूं तो समझ आता है कि ये सब भी दरअसल इसी सामाजिक मान्यता के चलते ही रहा होगा. सरकार की नीतियां भी सामाजिक मान्यताओं को मद्देनजर रख कर ही बनती हैं, तो GIC और GGIC सरीखे एकल विद्यालय चलाये जाते हैं. यानी लड़के-लड़कियों के अलग-अलग स्कूल. जहां पढ़ने के दौरान विकास प्रक्रिया की संवेदनशील उम्र में लड़के-लड़कियां एक दूसरे को समझने से महरूम रह जाते हैं. परिणामस्वरूप 12 वीं पास करते-करते लड़कियां 'माल' और लड़के 'कुत्ते.... कमीने....हरामजादे' बन चुके होते हैं. दुखद बात ये है कि, एक दूसरे को न समझ पाने की ये अयोग्यता अशिकांश लोगों में आजीवन बनी रहती है. कहना ये चाहता हूं कि जिन मान्यताओं के लिए आप अपनी बेटियों को दरवाजों और परदों में कैद रखना चाह रहे हैं न, वो मान्यताएं अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं. और विश्वास कीजिए, आने वाले वक़्त में जब दुनियाभर की लडकियां अपने पंख फैला कर आसमान से दुनिया नाप रही होंगी, और आपकी अपनी बेटियां मुश्किल से बस चल पा रही होंगी, उस वक़्त वो आपको दुवाएं नहीं देंगी .

