एक इंटरनेशनल फेम का बॉडी-बिल्डर हमारे मुंबई जैसे प्रमुख शहर में टॉयलेट की तलाशमें तकरीबन आधा घंटा भटकता है. उसके साथ साथ एक हुजूम इस तलाश में भटक रहा है. येदृश्य मज़ाक का विषय नहीं बल्कि शर्म का बायस है. देश की नाक इस तरह की घटनाओं से भीतो कटती है! स्वच्छ भारत. सुंदर भारत. स्वस्थ भारत. जबसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीने स्वच्छ-भारत अभियान छेड़ा है तबसे एक सवाल बार-बार उठता रहा है. क्या हम इतनीजनसुविधाएं मुहैया कराने में सक्षम हैं जिससे लोग इस उपक्रम में अपनी हिस्सेदारीसुनिश्चित कर सकें? बाहर से भारत घूमने आएं पर्यटकों के आगे हम क्या छवि पेश कर रहेहैं? इंटरनेशनल बॉडी-बिल्डर मार्टिन फोर्ड एक इवेंट के सिलसले में मुंबई में थे.इवेंट धारावी के लिटल स्टार्स जूनियर हाईस्कूल में था. इवेंट ख़त्म होने पर जब फोर्डस्कूल से बाहर निकले तब उन्होंने अपने साथ मौजूद आर्गेनाइजर्स से पब्लिक टॉयलेट केबारे में पूछा. आस-पास एक भी नहीं था. फोर्ड उसकी तलाश में सड़क पर निकल पड़ें. जबकाफी कोशिशों के बाद एक पब्लिक टॉयलेट मिला भी तो वो बंद था. बाकायदा ताला लगा हुआथा. जब कहीं कोई जुगाड़ ना मिला तो फोर्ड ने लोकल बाशिंदों से पूछना शुरू किया. अबतक ये तलाश एक जुलूस की शक्ल ले चुकी थी. फोर्ड, उनके साथी बॉडी-बिल्डर्स, पीआरटीम, इवेंट आर्गेनाइजर्स और ढेर सारे बच्चे. धारावी की सड़क पर मजमा सा लग गया.आख़िरकार लगभग आधे घंटे की जद्दोजहद के बाद एक सुलभ-शौचालय मिल पाया और फोर्ड हलकेहो सके. ये तमाम माजरा देश में जनसुविधाओं की ज़रूरत को और भी रेखांकित करता है. बड़ेशहरों में ये एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है. स्वच्छ भारत मिशन के दिशा-निर्देशोंके अनुसार हर 30 लोगों के लिए एक टॉयलेट होना ज़रूरी है. इस पैमाने पर देखा जाए तोअकेले मुंबई शहर में 60,000 शौचालयों की ज़रूरत है. हमारी सरकार ये तो चाहती है किसड़कों को साफ़ रखा जाए लेकिन वो ज़रूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर देने में अक्षम है. हरछोटे-बड़े शहर की ये समस्या है. कुछ तो हमारे मुल्क का चरित्र ही ऐसा है. हम इस बातको ख़ातिर में ही नहीं लाते कि सड़कों पर हल्का होना ठीक बात नहीं. कहीं भी कार्यक्रमशुरू कर देना हमारी फितरत में शामिल हो चुका है. विदेशों में इस बात को लेकर हमारीख़ूब फजीहत हो चुकी है. महिलाओं के लिए तो और भी आफत है. ऐसी किसी दिक्कत में फंसीमहिला के मानसिक संताप की कल्पना ही की जा सकती है बस. इस समस्या के समाधान के लिएसरकारों को थोडा सीरियस तो होना ही होगा. उम्मीद करते हैं कि वो दिन भी आएगा कभी जबहमारे यहां पर्याप्त पब्लिक टॉयलेट्स उपलब्ध होंगे और दीवारों पर चित्रकारी करतेहुए लोगों का असभ्य नज़ारा हमें देखना नहीं पड़ेगा.