सिर्फ 1 रुपए के चलते साहिर और लता के बीच सालों तक ठनी रही!
साहिर लुधियानवी (8 मार्च, 1921 – 25 अक्टूबर, 1980). पढ़िए उनकी ज़िंदगी के कुछ मज़ेदार किस्से.

शामिख फ़राज़शामिख फ़राज़ उन खुशनसीब लोगों में से हैं जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में दो सदियों का संगम देखा. बचपन बीसवीं सदी में बीता और जवान इक्कीसवीं सदी में हुए. कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री और प्रोफेशन भी उसी से जुड़ा लेकिन शौक के चलते हिंदी और बहुत से विदेशी लेखकों को पढ़ा. फिर ब्लॉग, अख़बार में कॉलम लिखे. आइए आज साहिर की बरसी के अवसर पर इनका लिखा एक लेख आपको पढ़वाते हैं.
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?
साहिर लुधियानवी. एक ऐसा गीतकार, जो लता के लिए गीत लिखता था तो अपना मेहनताना लता के मेहनताने से 1 रुपया ज्यादा मांगता था.
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साहिर लुधियानवी. एक ऐसा गीतकार, जिसने संगीतकारों को पहले से लिखे गीतों को लय देने के लिए मजबूर कर दिया.
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साहिर लुधियानवी. एक ऐसा शायर जिसकी शायरी पर हुकूमत को बैन लगाना पड़ा.
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साहिर लुधियानवी की पैदाइश 8 मार्च, 1921 को पंजाब के लुधियाना शहर में हुई. इसी लुधियाना को उन्होंने अपने 'तखल्लुस' साहिर के साथ इस्तेमाल किया और बन गए साहिर लुधियानवी. साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हई था. उन के उपनाम 'साहिर' और असली नाम 'अब्दुल हई' दोनों के पीछे ही दिलचस्प कहानियां हैं.
पहले बात करते हैं उनके असली नाम की. वैसे तो अब्दुल हई एक आम नाम है, लेकिन उनका यह नाम यूं ही नहीं रखा गया. दरअसल उनके पड़ोस में एक बहुत बड़ा राजनीतिक आदमी रहता था जिसका नाम भी अब्दुल हई था, जिससे उनके पिता की बिल्कुल भी नहीं बनती थी. उस आदमी के खिलाफ अपना गुस्सा निकालने के लिए उनके पिता ने अपने बेटे का नाम अब्दुल हई रखा. अपने बेटे के बहाने वह उस आदमी को भला बुरा कह कर अपना दिल हल्का कर लेते थे. उनके पिता ने कभी भी अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारियों को नहीं समझा. उन्होंने 12 औरतों से निकाह किया. साहिर 11वीं पत्नी के बेटे थे. उनके पिता का व्यवहार ठीक न होने की वजह से उनकी मां ने अपने पति फज़ल मोहम्मद से तलाक ले लिया और अपने भाई के पास आकर रहने लगीं. साहिर का बचपन भी दूसरे बच्चों से कुछ अलग ही रहा. बचपन में जब उन्हें दूध दिया जाते तो कहते कि इसमें पानी मिलाओ और जब पानी मिलाया जाता तो कहते कि अब इसको अलग करो. उनकी मां उन्हें सर्जन या जज बनाना चाहती थीं, लेकिन किस्मत अब्दुल हई को कुछ और ही बनाना चाहती थी.
साहिर को अपना नाम इकबाल की एक नज़्म से मिला जो उन्होंने अपने उस्ताद दाग देहलवी की शान में लिखी थी. इसमें उन्हें साहिर नाम बहुत पसंद आया जिसका मतलब होता है जादूगर. यहीं से उन्होंने नए नाम को अपना लिया और इसके साथ जोड़ दिया शहर ए पैदाइश 'लुधियानवी'.
चल बसा दाग, अहा! मय्यत उसकी जेब-ए-दोष है आखिरी शायर जहानाबाद का खामोश है इस चमन में होंगे पैदा बुलबुल-ए-शीरीज भी सैकडों साहिर भी होगें, सहीने इजाज भी हूबहू खींचेगा लेकिन इश्क की तस्वीर कौनसाहिर की निजी जिंदगी में उन्हें उनका प्यार कभी न मिल सका. शोहरत की दुनिया में होने के बावजूद भी उनका कोई साथी न हुआ. अपने कॉलेज के दिनों में वो अमृता प्रीतम के प्यार में गिरफ्तार हुए. यह महज एक तरफा प्यार नहीं था बल्कि अमृता प्रीतम ने भी इकरार किया. लेकिन उनके बीच आ गई गरीबी और मजहब की दीवार. साहिर गरीब होने के साथ-साथ मुस्लिम थे, जबकि अमृता प्रीतम सिख थी.
साहिर अपनी शायरी में बहुत लोकप्रियता तक पहुंचे. उनकी शायरी के 25 एडिशन सिर्फ और सिर्फ दिल्ली से निकले. इनका रूसी, अंग्रेजी और कई भाषाओं में अनुवाद किया गया. पाकिस्तान में तो आज भी यह आलम है कि कोई जब प्रकाशन शुरू करता है तो पहली प्रति तल्ख़ियां की ही निकलता है .
मशहूर शायर कैफी आजमी ने तल्खियां की तारीफ में कहा था -
मैं अक्सर यह सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि मैं साहिर को उनकी शायरी के जरिये जानता हूं या फिर उनकी शायरी को खुद उनके जरिये से? मैं यह कबूल करता हूं कि इस बारे में मैं अभी तक किसी नतीजे पर नही पहुंचा हूं. ऐसा महसूस होता है कि, साहिर ने अपनी शख्सियत का जादू अपनी शायरी में उतार दिया है और उनकी शायरी के जादू का अक्स उनकी शख्सियत में हूबहु उतर आया है. तल्खियां पढते वक़्त ऐसा महसूस होता है कि शायर की रुह अपनी बुलंद तथा साफ आवाज में बात कर रही है.साहिर को जब पंजाब में दंगों की खबर मिली तो वह बहुत परेशान हुए उन्होंने लिखा-
ये जलते हुए घर किसके हैं, ये कटे हुए तन किसके हैं तकरीम के अंधे तूफां में, लुटते हुए गुलाब किसके हैं ऐ सहबर मुल्क ओ कौम बता, ये किसका लहू है और कौन मरापंजाब दंगों के दौरान उनका एक दोस्त उनकी मां को अपने साथ लाहौर ले गया. साहिर भी लाहौर चले गए. और कुछ वक्त तक वही रुके. वहां पर सवेरा मैगजीन में संपादक के रूप में काम करने लगे. अपनी आवाज ए आदम नज़्म के सहारे उन्होंने सरकार की तीखी आलोचना की. सरकार को यह बात पसंद नहीं आई और उनके खिलाफ वारंट जारी कर दिया गया. इसके बाद साहिर ने लाहौर छोड़ दिया और दिल्ली आकर बस गए. संघर्ष का एक ऐसा दौर भी गुज़रा कि गुजारा करने के लिए उनको अपनी मां की चूड़ियां भी बेचनी पड़ीं. साहिर ने शायरी में काफी नाम कमाया, लेकिन उनकी निजी जिंदगी काफी जद्दोजहद भरी रही उन्हें खुद का पेट भरने के लिए इधर उधर नौकरियां करने पड़ती.
उन्होंने बहुत से छोटी मोटी नौकरियां कीं और 40 रुपए महीने में अपना घर चलाया. फिर साहिर मुंबई चले गए लेकिन फिल्मों में गीत लिखने का अवसर नहीं मिला लेकिन वह निराश नहीं हुए और मुंबई के बारे में कहते हैं -
यार ये मुम्बई शहर है. बाहर से आये लोगों से दो साल जद्दोज़हद मांगता है और इसके बाद बड़े प्यार से गले लगाता है.उनका सपना फिल्मों में गीत लिखने का था जो 1945 में पूरा हुआ उन्होंने पहली बार, आजादी की राह पर फिल्म के लिए गीत लिखे. यहीं पर उनकी मुलाकात मजरूह सुलतानपुरी, कैफी आज़मी, मजाज़ लखनवी जैसी हस्तियों से हुई.
साहिर की शोहरत का आलम यह था कि जब बी आर चोपड़ा के छोटे भाई यश चोपड़ा मुंबई आए तो उन्होंने किसी हीरो हीरोइन से नहीं बल्कि साहिर से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की थी. साहिर लता से ₹1 ज्यादा लेते थे. इस बात से लता साहिर के गीत नहीं गातीं थीं, लेकिन बी आर चोपड़ा के समझाने पर लता मंगेशकर वापस साहिर के गीत गाने लगीं.
साहिर के बारे में यह तक कहा गया कि किसी शहर के रंग में रंग जाना बहुत आसान है मगर साहिर ने तो मुंबई को ही अपने रंग में रंग लिया. 25 अक्टूबर, 1980 के दिन साहिर ने इस फ़ानी जहान को अलविदा कह दिया. साहिर की शायरी के अलग अलग पहलू हैं.
# एक तरफ मोहब्बत नजर आती है -
तआरुफ़ रोग बन जाए तो उसको भूलना बेहतर तआलुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
# तो दूसरी तरफ ताजमहल पर खफा हो रहे हैं -
ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा ये महल ये मुनक़्क़श दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़ इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़ मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से!
# किसी नज़्म में अच्छी सुबह की उम्मीद लगाए बैठे हैं -
वो सुबह कभी तो आएगी, वो सुबह कभी तो आएगी इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा जब अम्बर झूम के नाचेगी, जब धरती नग़मे गाएगी वो सुबह कभी तो आएगी ...
# तो किसी में समाज को गलत करार दे रहे हैं -
ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया ये इनसां के दुश्मन समाजों की दुनिया ये दौलत के भूखे रिवाज़ों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
# कभी रूमानी -
अभी ना जाओ छोड़ के, कि दिल अभी भरा नहीं
# तो कभी दार्शनिक कवि -
मैं पल दो पल का शायर हूं पल दो पल मेरी कहानी है
# एक खिन्न कवि -
कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है
# एक समर्पित कवि -
मेरे दिल में आज क्या है तू कहे तो मैं बता दूं
# एक जीवन से संतुष्ट कवि -
मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया संसार!
# एक प्रेमिका से समझौता करने वाला कवि -
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों
# एक उदास कवि -
जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला
# एक निश्चित कवि -
मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया
# एक असांसारिक कवि -
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
# एक देशप्रेमी कवि -
ये देश है वीर जवानों का
# एक विद्रोही कवि -
जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां है
# एक निराशावादी कवि -
तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-जिंदगी से हम
# एक मानवतावादी कवि -
अल्ला तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम
# एक धर्मनिरपेक्ष कवि -
तू हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा
# एक छेड़छाड़ करनेवाला कवि -
ए मेरी ज़ोहरा जबीं तुझे मालूम नहीं
# एक याद ताज़ा करनेवाला कवि -
जिंदगी भर नही भूलेगी वो बरसात की रात
वीडियो देखें:
अलिया भट्ट का बड़ा डर महेश भट्ट ने जैसे दूर किया वो प्रेरणा देता है -

