पाकिस्तान पर भारत हमला क्यों नहीं करता, वजह ये है
जिन्हें भारत की विदेश नीति कमजोर लगती है, वो ये पढ़ लें.
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फोटो - thelallantop
भारत की विदेश नीति को लेकर भारत की जनता हमेशा बातें करती हैं. कभी संशय में रहती है, कभी उत्साह में. कभी इतिहास को कोसती है, कभी वर्तमान को. पर बहुत सारे लोगों को हमेशा ये लगता है कि भारत कभी भी कड़े ढंग से अपनी बात नहीं रखता दूसरे देशों के सामने. खास तौर से पाकिस्तान और चीन के सामने. जनता के मन में मलाल रहता है कि 1962 के चीन-युद्ध का बदला नहीं लिया गया. और चार बार लड़ने के बाद भी पाकिस्तान को बर्दाश्त किया जा रहा है. यहां तक कि मुंबई हमले और सैनिकों की हत्याओं के बाद भी भारत ने कोई बहुत बड़ा कदम नहीं उठाया है. यही वजह है कि सितंबर के महीने में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जनता में काफी उत्साह का माहौल था. लोगों को लग रहा था कि कुछ बड़ा डिसीजन लिया गया है. पर इस उत्साह में ये चीज दरकिनार हो गई कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद लगभग 25-30 जवान मारे जा चुके हैं. पाकिस्तानी सेना के साथ छिटपुट लड़ाई चल रही है. पर खुल के कभी नहीं हुआ वो, जिसका भारतीय जनता इंतजार करती है.इस विषय पर भारत के पूर्व फॉरेन सेक्रेटरी और पूर्व नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर शिवशंकर मेनन ने किताब लिखी है. Choices- Inside the Making Of India's foreign Policy. मेनन भारत के कई महत्त्वपूर्ण फैसलों में शामिल रहे हैं. इस किताब में बहुत सारी ऐसी चीजें हैं, जिनके हिसाब से अनुमान लगाया जा सकता है कि भारत अपने फैसले ऐसे क्यों लेता है. क्यों जनता के इमोशन को खयाल कर फैसले नहीं होते हैं. क्या भारत एक कमजोर देश है. क्या भारत किसी के सामने झुका है. क्या भारत के नेताओं ने भारत को नीचा दिखाया है. ऐसा कुछ भी नहीं है. हमें ये जानकर खुशी होगी कि भारत अपनी तरह का सुपर पॉवर है. इंदिरा गांधी ने एक बार कहा था कि इंडिया वर्ल्ड पॉवर बनेगा, पर अपनी तरह का. ऐसा ही हुआ है. हमारा कोई भी डिसीजन कमजोरी या अनिर्णय को नहीं दिखाता. ये दिखाता है कि किस तरह दिक्कतों के बीच सर्वाइव किया जाये और वक्त आने पर अपनी बात ऐसे रखी जाए कि सब मान लें. याद रहे कि भारत कभी भी किसी देश में आग लगाने की बात नहीं करता. विश्व शांति का सबसे बड़ा पक्षधर रहा है भारत.
चीन के साथ बॉर्डर मुद्दा
चीन के साथ बॉर्डर ब्रिटिश फंसा के गये. उन्होंने जो बॉर्डर तय किया, उसे चीन ने नहीं माना. नतीजन 1962 में लड़ाई हुई. इसके बाद अक्साई चिन का एरिया चीन के कब्जे में चला गया. पर चीन रुका नहीं. इसके अलावा भी वो अरुणाचल प्रदेश में अपना दावा ठोंकते रहता है. अक्सर उसके सैनिक आते रहते हैं. पर ध्यान देने वाली बात ये है कि इतना होने के बावजूद भारत और चीन के बॉर्डर पर एक भी गोली नहीं चली है लड़ाई के बाद.1989 में चीन में डेमोक्रेसी को लेकर आंदोलन हुआ था. तिएनमैन स्क्वायर पर गोली चली थी. स्टूडेंट मरे थे. चीन इस बात से सहमा जरूर था. क्योंकि दुनिया में इमेज खराब हुई थी. उसी तरह खाड़ी देशों में लड़ाई हो रही थी. दुनिया में आर्थिक मंदी छा रही थी. सोवियत संघ टूट गया 1991 में. कम्युनिस्ट चीन को इस बात से भी डर लगा था. भारत से बॉर्डर को लेकर कई तरह की बातें चल रही थीं. चीन अपना ड्रामा कर रहा था. पर भारत से बात करने के लिये भी आतुर था. पर भारत में विरोध की लहर चल रही थी. कि चीन से जमीन का एक-एक टुकड़ा वापस लिया जाये. ये भी संभव नहीं था. भारत एक साथ दो मोर्चों पाकिस्तान और चीन पर लगातार लड़ नहीं सकता था. जून 1993 में प्रधानमंत्री नरसिंहा राव चीन गये और वहां एक बॉर्डर पैक्ट साइन कर लिया. कि बॉर्डर पर जो स्थिति है, वही रहेगी. इसके लिये राव को देश के नेशनलिस्ट नेताओं को बड़ा समझाना पड़ा था. पर इसका फायदा हुआ है भारत को. वहां कभी लड़ाई नहीं करनी पड़ी किसी तरह का डर नहीं है. और अब भारत के पास इतने हथियार हैं कि चीन आगे नहीं बढ़ेगा.
इंडिया के चाणक्य, चीन के सुन जू और इटली के मैकियावेली सबने कहा है कि युद्ध से बचना और लगातार अपनी ताकत बढ़ाते रहना दुनिया की सबसे चतुर स्ट्रैटजी है.
अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील
भारत ने 1974 में एटम बम का परीक्षण किया था. इसके बाद अमेरिका इंडिया से खफा हो गया था. इंडिया ने NPT यानी एटम बम को ना फैलाने की संधि पर भी साइन नहीं किया. 1998 में फिर परीक्षण भी कर लिया था. उधर पाकिस्तान समेत कई देशों ने भी एटम बम बना लिया. अब समस्या हो गई थी कि पूरी दुनिया में सबके पास एटम बम होने की संभावना हो गई. अब सारे देश तो उतने जिम्मेदार नहीं हैं. तो एटमी लड़ाई होने की संभावना होने लगी. अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये.हथियार तो बन गये. पर समस्या हो गई बिजली को लेकर. भारत को विदेशों से मटीरियल और टेक्नॉल्जी नहीं मिल रही थी. कि एटॉमिक एनर्जी प्रोड्यूस की जाये. हथियार बनाने का सामान इंडिया में है पर एनर्जी वाला नहीं है. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने अमेरिका से बातचीत शुरू की थी. जसवंत सिंह विदेश मंत्री थे. उनकी अमेरिका में बड़ी इज्जत थी. उस वक्त रिश्ते सुधरे. बाद में मनमोहन सिंह की सरकार और जॉर्ज बुश ने इस रिश्ते को आगे बढ़ाया.
इंडिया दुनिया में ऐसा पहला देश बना जिसने NPT पर साइन किये बिना एनर्जी प्रोड्यूस करने के लिये अमेरिका से समझौता कर लिया. इसके लिये अमेरिका ने अपने देश के नियमों को तोड़ते हुए समर्थन किया. वहां पर देश के नियमों को तोड़ किसी और देश से समझौता नहीं होता है. इधर मनमोहन सिंह की सरकार को इस डील के लिये विश्वास मत झेलना पड़ा. सरकार गिरने वाली थी. सब कह रहे थे कि भारत खुद को अमेरिका के हाथों बेच रहा है. पर ऐसा नहीं था. अमेरिका के साथ इस डील ने साबित किया कि भारत की क्या पोजीशन है दुनिया में. अपने सारे हथियार बचाते हुए अपने फायदे की डील कर लेना. ओबामा भारत के खिलाफ थे. चुनाव होने वाले थे. जॉर्ज बुश जाने वाले थे. उनके जाने तक सारी डील फाइनल कर ली गई.
मुंबई हमलों के बाद भारत ने हमला क्यों नहीं किया पाकिस्तान पर?
भारत पाकिस्तान के आतंकवाद से निराश है. पार्लियामेंट पर हमला, मुंबई ब्लास्ट और मुंबई में फिर हमला और ऐसी ही कई घटनाएं हुई हैं. पर भारत ने कभी पाकिस्तान पर हमला नहीं किया. पाकिस्तान हमेशा एटम बम की धौंस भी दिखाता है. भारत के पास भी है. पर भारत ने कभी नहीं दिखाया.बात ये है कि अगर भारत हमला करे तो ये तय है कि पाकिस्तान संभल नहीं पायेगा. पर भारत को क्या फायदा होगा? भारत की भी बहुत बर्बादी होगी. सैनिक मरेंगे, जनता मरेगी. इकॉनमी प्रभावित होगी. दुनिया में नाम खराब होगा. अपने देश की समस्याओं को सुलझाता हुआ देश लड़ाई में फंस जायेगा.
मुंबई हमलों के बाद अजमल कसाब को भारत ने पकड़ लिया था. इसके बाद पाकिस्तान को हर जगह फंसना पड़ा. भारत के हमले ना करने की सबसे बड़ी वजह श्रीलंका और लिट्टे का मुद्दा है. इससे भारत ने सीखा है.
श्रीलंका और लिट्टे की खूनी लड़ाई
तमिलनाडु से बहुत सारे तमिल श्रीलंका जा के रहने लगे थे बहुत पहले से. वहां पर वो रिच समुदाय थे. सरकारी पदों और बिजनेस में उनका प्रभाव था. अंग्रेजों का शासन था. फिर भारत से थोड़ा पहले श्रीलंका आजाद हो गया. उसके बाद नेटिव सिंहली समुदाय ने तमिलों के खिलाफ पॉलिटिकल जंग छेड़ दी. जब सरकार बनी तो तमिलों को उससे बाहर रखा गया. इसके जवाब में तमिलों ने अपनी पार्टी बनाई. पर कोई फायदा नहीं हुआ.बाद में प्रभाकरन के नेतृत्व में तमिलों ने लिट्टे बना ली. जो कि गुरिल्ला लड़ाई में सिद्धहस्त थे. ये श्रीलंका की सरकार को नहीं मानते थे. और हर चीज लड़ के लेना चाहते थे. इन्होंने श्रीलंका में सुसाइ़ड हमले शुरू किये. दुनिया का ये पहला संगठन था जिसने सुसाइड हमले को सबसे पहले अपना प्रमुख हथियार बना लिया था. एक बार तो इन्होंने 600 पुलिस वालों को सरेंडर के बाद मार दिया था. श्रीलंका में आतंक फैल गया था. कहीं पर भी ब्लास्ट हो जाते. गोलियां चल जातीं. श्रीलंका के क्रिकेटर कुमार संगाकारा ने इस बात का बड़ी तफ्सील से जिक्र किया था अपनी एक स्पीच में. श्रीलंका की इकॉनमी टूटने लगी थी.
भारत में अलग माहौल था. तमिलनाडु की पूरी सहानुभूति लिट्टे के लोगों के साथ थी. इस चक्कर में भारत की राजनीति फंसी हुई थी. कहा जा रहा था कि रॉ लिट्टे के सैनिकों को ट्रेन कर रहा था. फिर राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत ने अपनी राजनीति बदली. क्योंकि श्रीलंका सिर्फ एक द्वीप नहीं है. बल्कि हिंद महासागर में भारत का एक ठिकाना भी है. तो भारतीय सैनिक वहां उतरे. लिट्टे से लड़ने के लिये. पर ये चीज उलटी पड़ गई. भारतीय सैनिकों को जाफना के जंगलों को कोई अभ्यास नहीं था. तो ये पूरी पॉलिसी बिगड़ गई. श्रीलंका के लोगों को भारतीय सैनिकों का आना भी नहीं भा रहा था. किसी स्वतंत्र देश में किसी दूसरे देश के सैनिकों का आना दुखद ही होता है.
इसके बाद लिट्टे भारत के खिलाफ हो गया. राजीव की जान गई. फिर श्रीलंका के एक पूर्व राष्ट्रपति की भी हत्या कर दी गई. सबमें लिट्टे ही था. श्रीलंका की राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगे कड़े इरादों की नेता थीं. उन्होंने कोशिश की कि लिट्टे से बातचीत की जाए. पर एक हमले में उन्हें अपनी आंख गंवानी पड़ गई. बाद में नये नेता आये महिन्द्रा राजापाकसे. इनके साथ इनके दो भाई भी आये. वो दोनों डिफेंस और कैबिनेट थे. महिन्द्रा हार्डलाइनर थे. आतंकवाद को सख्ती से निपटाना चाहते थे. किसी भी कीमत पर. भाइयों के चलते फैसले लेना भी आसान हो गया.
2007 में श्रीलंका की सेना ने लिट्टे के खिलाफ अभियान शुरू किया. ढाई साल तक अभियान चला. लिट्टे के सारे लोगों को मार दिया गया. मतलब सारे लोगों को. पर सेना ने बेहद क्रूरता से इस ऑपरेशन को अंजाम दिया. प्रभाकरन मारा गया. उसके बाद एक फोटो आई. उसमें प्रभाकरन का छोटा बच्चा सेना के साथ था. बिस्कुट खा रहा था. कुछ देर बाद सेना ने उसे भी गोली मार दी थी. औरतों का रेप हुआ और निर्दोष लोग मारे गये.
तीन दशक तक चली लड़ाई में कुल मरे लोग इस प्रकार थे-लिट्टे 27693सेना 23970इंडिया के सैनिक 1155सिविलियन 50000तो आतंकवाद का पूरा सफाया हो गया. शायद दुनिया के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि ताकत का इस्तेमाल कर के आतंकवाद पर काबू पाया गया. पर इसका मतलब ये नहीं है कि सब कुछ ठीक हो गया. श्रीलंका में तमिल अभी भी बाहरी समझे जा रहे हैं. अभी भी उनको अधिकार नहीं मिले हैं. इसका भविष्य में क्या नतीजा होगा, कोई नहीं जानता. क्योंकि आग तो भड़की नहीं है, राख में चिंगारी है.
पर श्रीलंका के साथ भारत ने अपने फायदे को देखते हुए इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली. 2009 के चुनाव में सरकारों को तमिलनाडु की जरूरत थी. पर तमिल मुद्दे को नहीं उछाला गया. ये भारत की कूटनीति का नया साल था. भारत ने अपने आप पर पूरा कंट्रोल दिखाया.
तो शिवशंकर मेनन के मुताबिक भारत ने फैसले तगड़े लिये हैं. इमोशन में आकर लिये फैसले हमेशा देशों को फंसाते हैं. भारत का पक्ष शांत पर बेहद ही मजबूत रहा है. वर्तमान में ये पीछे हटना हो सकता है, पर लंबे समय के अंतराल में देखें तो भारत की जीत ही हुई है. 1974 में अमेरिकी राजदूत ने इंदिरा गांधी से कहा था कि एटम बम के बाद हम आपका वो हाल करेंगे कि दुनिया में नजीर रहेगी. 1998 में अमेरिका ने भारत के हाथ-पांव बांधने की कोशिश की थी. पर 2008 में अपने ही सारे नियम तोड़, दुनिया के बाकी देशों को भी तैयार कर भारत को अलग से सुविधा दी. ये जीत अपने आप में मायने रखती है. कोई और देश ये नहीं कर पाया है. ज्यादातर ने लड़ने का रास्ता अपनाया और देश को फंसा दिया है.

पेंग्विन पब्लिकेशन से आई है ये किताब

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