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मॉनसून का सीक्रेट आउट: भारत आने से पहले हिंद महासागर में कौन सा खेल रचाती हैं हवाएं?

Monsoon 2026: इस साल मॉनसून सामान्य से कम रहेगी, ये खबर तो आप कहीं ना कहीं देख, सुन या पढ़ ही चुके होंगे. मगर क्या कभी आपने सोचा है कि हम इंडियावालों तक पहुंचने से पहले मॉनसून, समंदर में कहता क्या रहता है?

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3 जून 2026 (पब्लिश्ड: 05:25 PM IST)
Monsoon in India
मॉनसून भारत आने से पहले हिंद महासागर में क्या-क्या करता है?
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जून का महीना आया नहीं कि पूरे हिन्दुस्तान की आंखें आसमान की तरफ टिक जाती है. क्या बच्चा, क्या जवान और क्या बुजुर्ग, हर कोई बरखा रानी को ओपन इनविटेशन भेजने लगता है. किसी की ज़ुबान पर "काले मेघा-काले मेघा, पानी तो बरसाओ..." वाला गाना होता है. तो कोई "बरसों रे मेघा-मेघा" गुनगुना रहा होता है. इन शॉर्ट हर किसी को बारिश का इंतजार होता है. मगर क्या आपने कभी ये सोचा है कि हमारे पास आने से पहले ये मॉनसून हिंद महासागर में कर क्या रहा होता है.

टीवी और अखबार के जरिए हमें ये तो पता चल जाता है कि मॉनसून कब आएगा. बारिश ने कब केरल में दस्तक दी. कब बरसात के चलते मुंबई पानी-पानी हो गई और मेघा रानी ने दिल्ली की सड़कों को वेनिस में तब्दील कर दिया. मगर क्या कभी-कभी ही सही, आपके दिल में ये ख्याल आता कि इस बरसात को समंदर की लहरों के साथ ऐसा भी कौन सा खेला खेलना होता है, जो हर साल हम तक पहुंचने में लेट हो जाती है.

अगर आपके मन में भी मॉनसून को लेकर ऐसे ही सवाल छलांगे मार रहे हैं तो उनका जवाब आपको अगले कुछ पैराग्राफ में मिल जाने वाला है. तो चलिए जानने और समझने की कोशिश करते हैं कि भारत आने से पहले मॉनसून अरब सागर और हिंद महासागर के नीले पानी में क्या-क्या गुल खिला रहा होता है. आखिर कैसे तपता समंदर हम पर पड़ने वाली ठंडी फुहारों की वजह बन जाता है. तो चलिए इस गुत्थी को परत दर परत सुलझाते हैं.

​समुद्र का उबलना और लो प्रेशर का खेला क्या है?

हर कहानी में एक हीरो होता है, एक हीरोइन और एक अदद विलेन. हमारी इस मॉनसूनी कहानी की नायिका तो सागर रानी बोले तो हिंद महासागर और अरब सागर हैं. मगर हीरो और विलेन का डबल रोल सूरज चाचू निभाते हैं. मार्च और अप्रैल के महीने में सूरज की किरणें जब पूरे उत्तर भारत में आग उगल रही होती हैं तो भारत की धरती गर्म तवे की तरह तपने लगती है. ठीक उसी वक्त मौका देखकर भूमध्य रेखा के आसपास का समंदर भी सूरज की गर्मी से उबलने लगता है. उबलने क्या ये कहो कि पूरी तरह खौलने लगता है.

अब यहीं पर हमारी इस बरसाती कहानी में एंट्री होती एक कैरेक्टर आर्टिस्ट यानी कि 'साइंस' की. वो क्या है ना गुरु कि विज्ञान का एक सीधा सा नियम है. जब-जब पानी गर्म होता है, तब-तब वो भाप बनकर ऊपर उठता है. फिर चाहे वो हमारे घर में गैस के चूल्हे पर रखे पतीले का खौलता पानी हो या फिर समंदर का पानी, जिसे सूरज की गर्मी उबाल रही होती है.

समंदर से भाप उठेगा तो ऊपर की हवा को भी गर्म कर देगा. फिर ये गर्म हवा हल्की होकर आसमान की तरफ भागने लगती है. जैसे ही ये गर्म हवा ऊपर जाती है, वैसे ही समुद्र की सतह पर एक खालीपन पैदा हो जाता है. साइंसकारी में इसे 'लो प्रेशर एरिया' बोले तो कम दबाव का क्षेत्र कहते हैं.

​अब इस खाली जगह को भरने के लिए दक्षिणी हिंद महासागर से ठंडी और भारी हवाएं तेजी से दौड़ पड़ती हैं. ये हवाएं समुद्र के ऊपर से गुजरते समय अपने साथ करोड़ों लीटर पानी भी भाप के रूप में समेट लेती हैं. यही हिंद महासागर का बढ़ता तापमान आगे चलकर मॉनसून की असली ताकत बनता है. और उसी के दम पर ये हवाएं हजारों किलोमीटर का सफर तय करती हैं.

​अरब सागर और बंगाल की खाड़ी का रूट कैसे तय होता है?

हां तो अब तक की कहानी में आपने देखा कि कैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए समंदर से उठता है भाप और उसे अपने साथ ले उड़ती हैं तेज हवाएं... तो अब आगे बढ़ते हैं. ​तो जब ये नमी से लबालब लदी हुई हवाएं समुद्र का सीना चीरकर आगे बढ़ती हैं, तो शुरू होता है वो सफर जो इन्हें सर जमीने हिंदुस्तान तक लेकर आती हैं. भूमध्य रेखा को पार करते ही पृथ्वी के घूमने की वजह से इन हवाओं की दिशा अचानक बदल जाती है. (अब धरती के घूमने की बात आप NCERT की किताबों से पढ़ लीजिए, हम मॉनसून की कहानी पर डटे रहेंगे.)

हां तो जब हवाओं की दिशा बदलती है तो वैज्ञानिक लोग उसे नाम देते हैं 'कोरिओलिस फोर्स'. इस बदलाव के चलते ये हवाएं दक्षिण-पश्चिम दिशा से भारत की तरफ बढ़ने लगती हैं, इसीलिए इन्हें साउथ-वेस्ट मॉनसून भी कहा जाता है. अब उसके बाद होता ये है कि ​जैसे ही ये हवाएं भारत के दक्षिणी हिस्से के पास पहुंचती हैं, हमारे देश का भौगोलिक नक्शा इन्हें दो टुकड़ों में बांट देता है. एक टुकड़ा जाता है अरब सागर की तरफ और दूसरा जाता है बंगाल की खाड़ी की तरफ.

​अरब सागर वाली बरसाती हवाओं का झुंड सीधे भारत के पश्चिमी तट यानी केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र से टकराता है. पश्चिमी घाट के ऊंचे पहाड़ इन हवाओं को जबरन रोककर वहां झमाझम बारिश करवाते हैं. दूसरी तरफ, बंगाल की खाड़ी की तरफ जाने वाली हवाएं भारत के पूर्वी हिस्से से होते हुए सीधे नॉर्थ-ईस्ट यानी असम और मेघालय के पहाड़ों की तरफ निकल जाती है. वहां जाकर ये दुनिया की सबसे ज्यादा बारिश कराने वाले इलाकों का निर्माण करती हैं. जैसे कि चेहापूंजी...

इस बीच हमारे दोनों समंदर बोले तो हिंद महासागर और अरब सागर इन हवाओं के लिए पेट्रोल पंप का काम करते हैं, जहां से हवाएं और ज्यादा नमी चुराकर पूरे भारत में बरसने के लिए तैयार हो जाती हैं.

​अंडमान से केरल तक का टाइमटेबल कैसे बनता है?

​अब इस मॉनसूनी खेल से जुड़े कुछ ऐसे सवालों पर बात कर लेते हैं जो अक्सर लोगों के जेहन में घूमते रहते हैं. पहला मुद्दा तो यही है कि मॉनसून सबसे पहले भारत में कहां पहुंचता है? आम तौर पर लोग सोचते हैं कि मॉनसून सबसे पहले केरल में आता है, लेकिन ये आधा सच है गुरु. भारत के नक्शे को ध्यान से देखें तो मॉनसून सबसे पहले मई के मध्य में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर दस्तक देता है. उसके बाद जून की शुरुआत में ये भारत की मुख्य भूमि यानी केरल के तट से टकराता है.

​दूसरा बड़ा मुद्दा ये है कि हिंद महासागर मॉनसून को कैसे प्रभावित करता है? तो भाइयों और बहनों, हिंद महासागर को आप मॉनसून का power bank समझ सकते हैं. अगर हिंद महासागर का तापमान जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए या घट जाए, तो मॉनसून की रफ्तार बदल जाती है. समुद्र के इस तापमान के उतार-चढ़ाव को इंडियन ओशन डिपोल कहा जाता है. जब ये पॉजिटिव होता है तो भारत में बंपर बारिश होती है, और जब ये नेगेटिव होता है तो सूखा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है.

वीडियो: मॉनसून की बारिश का बिहार और यूपी के जिलों में सबसे ज्यादा असर पड़ा है.

सामान्य प्रश्न

मॉनसून सबसे पहले भारत में कहां पहुंचता है?

आम तौर पर लोग सोचते हैं कि मॉनसून सबसे पहले केरल में आता है, लेकिन ये आधा सच है गुरु. भारत के नक्शे को ध्यान से देखें तो मॉनसून सबसे पहले मई के मध्य में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर दस्तक देता है. उसके बाद 1 जून के आसपास ये भारत की मुख्य भूमि यानी केरल के तट से टकराता है.

हिंद महासागर मॉनसून को कैसे प्रभावित करता है?

हिंद महासागर को आप मॉनसून का पावर बैंक समझ सकते हैं. अगर हिंद महासागर का तापमान जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए या घट जाए, तो मॉनसून की रफ्तार बदल जाती है. समुद्र के इस तापमान के उतार-चढ़ाव को 'इंडियन ओशन डिपोल' कहा जाता है. जब ये पॉजिटिव होता है तो भारत में बंपर बारिश होती है, और जब ये नेगेटिव होता है तो सूखा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है.

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