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"घर में हैं PM मोदी के दुश्मन, दुनिया भारत की तरफ देख रही"- अमेरिकी विश्लेषक का बड़ा बयान

इयान आर्थर ब्रेमर. राजनीतिक विश्लेषक हैं. यूरेशिया ग्रुप के संस्थापक हैं. यूरेशिया ग्रुप पॉलिटिकल रिस्क रिसर्च और कंसल्टेंसी फर्म है. माने जो लोग भी किसी तरह की कंपनी या फर्म चला रहे हैं, और उन्हें भविष्य में संभावित चुनौतियों का पता लगाकर उस हिसाब से अपनी स्ट्रैटज़ी डिसाइड करनी है, उन्हें सलाह देने का काम इयान ब्रेमर की कंपनी करती है.

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इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में इयान ब्रेमर (फोटो- इंडिया टुडे)
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24 मई 2024 (Updated: 24 मई 2024, 20:33 IST)
Updated: 24 मई 2024 20:33 IST
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भारत का लोकसभा चुनाव अपने आखिरी चरणों में है. तमाम देशों के नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों की नजर भारत के चुनावों पर रहती है. वजह, भारत एशिया महाद्वीप की उभरती हुई शक्ति है. लेकिन इसके बावजूद चुनौतियां भी अनगिनत हैं. ऐसे में भारत के चुनावों का परिणाम कैसा होगा, क्या नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार तीसरी बात सत्ता में वापसी करेगी या विपक्ष इस बार कुछ कमाल कर पाएगा? इन सभी सवालों पर बात करने के लिए इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में आए इयान ब्रेमर .

कौन हैं इयान ब्रेमर? इनका पूरा नाम है इयान आर्थर ब्रेमर. राजनीतिक विश्लेषक हैं. यूरेशिया ग्रुप के संस्थापक हैं. यूरेशिया ग्रुप, पॉलिटिकल रिस्क रिसर्च और कंसल्टेंसी फर्म है. माने जो लोग भी किसी तरह की कंपनी या फर्म चला रहे हैं, और उन्हें भविष्य में संभावित चुनौतियों का पता लगाकर उस हिसाब से अपनी स्ट्रैटज़ी डिसाइड करनी है, उन्हें सलाह देने का काम इयान ब्रेमर की कंपनी करती है.

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में इयान ब्रेमर (फोटो- इंडिया टुडे)

इंडिया टुडे टीवी के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल से बातचीत के दौरान इयान ब्रेमर ने भाजपा की राजनीति, पीएम मोदी और भारत को बाहर के देशों में कैसे देखा जा रहा है, इन मुद्दों पर बात की. इयान कहते हैं कि भारत इस वक्त ऐसे स्टेज पर है जहां हर देश उससे नज़दीकियां बढ़ाने पर जोर दे रहा है. भारत की हर देश को लेकर एक स्ट्रैटज़ी है. उसकी पश्चिम को लेकर एक स्ट्रैटज़ी है, साथ ही ग्लोबल साउथ को लेकर भी भारत की एक स्ट्रैटज़ी है. हालांकि, चीन को लेकर अभी भारत के पास कोई ठोस रणनीति नहीं है. ऐसा इयान ब्रेमर का मानना है.

इयान ने कहा कि अक्सर लोगों से ये सुनने को मिलता है कि भारत की स्ट्रैटज़ी क्या होनी चाहिए? जहां तक चीन की बात है, वो एक ऐसा देश है जिसने पिछले 50 सालों में अभूतपूर्व तरक्की की है. लेकिन चीन का एक माइंडसेट है, एक परसेप्शन है कि वैश्विक स्तर पर उसे हमेशा से नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जाती रही है. और अब चीन खुद को दुनिया में नए तरीके से स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. आप देख सकते हैं चाहे ताइवान हो, हांगकांग हो या दक्षिण चीन सागर हो, चीन का रवैया कैसा है. इसके साथ ही चीन राजनीतिक रूप से एक सत्तावादी देश है और आने वाले दिनों में ये सत्तावाद और भी ज्यादा बढ़ता हुआ दिख रहा है.  सत्तावाद में सत्ता में बैठी सरकार के पास अभूतपूर्व ताकत होती है. और ये ताकत किसी और यूनिट के साथ साझा भी नहीं होती.

इसी के साथ इयान ने भारत की तरक्की पर भी अपने विचार रखे. वो कहते हैं कि तुलनात्मक रूप से कई पैमानों पर भारत चीन से बहुत पीछे है. भारत की विचारधारा एंटी-कलोनियल तो बिल्कुल ही नहीं दिखती. नरेंद्र मोदी के दुश्मन तो हैं लेकिन वो घर यानी भारत में ज्यादा हैं. ग्लोबली उनका कोई दुश्मन नहीं है. मोदी भारत को ग्लोबल साउथ के लीडर के तौर पर पेश करते हैं. जो हमने भारत की जी20 की चेयरमैनशिप के दौरान भी देखा. इसमें भी कनाडा एक ऐसा अपवाद है जिसे भारत ने ठीक तरह से हैंडल नहीं किया. 

इयान ने आगे कहा कि भारत खुद को बाकी देशों और पश्चिमी देशों के बीच एक पुल की तरह प्रोजेक्ट कर रहा है. भारत दूसरे देशों मसलन यूरोप, जापान और अमेरिका के साथ पहले से मज़बूत और स्थाई संबंध बना रहा है. इयान कहते हैं कि उनकी नज़र में एक साथ ये सारी चीज़ें होने की एक वैल्यू है. बाकी दुनिया जो भारत की तरफ देख रही है उसे ये नहीं लगता कि भारत एक प्रतिद्वंदी है, उसे ये नहीं लगता कि भारत कोई ऐसा देश है जो दूसरे देशों पर दबाव बनाकर रखना चाहता है, बल्कि एक ऐसा देश है जो भाईचारे के साथ आगे बढ़ना चाहता है. 

इस बीच राहुल कंवल ने इयान ब्रेमर से पूछा,

 "आपने कहा कि इस बार चुनाव को लेकर एक पूर्वानुमान है. विपक्ष ये कहता है कि 4 जून को कौन जीतेगा ये मायने नहीं रखता. इंडिया तब भी उसी तरह आगे बढ़ता रहेगा जैसे बढ़ रहा है, क्योंकि ये इंडिया का टाइम है. दूसरी तरफ के लोग कहते हैं कि भारत इसलिए तरक्की कर रहा है क्योंकि यहां नरेंद्र मोदी जैसे लीडर हैं जो स्थिरता बनाये हुए हैं. भारत के बाहर अंतरराष्ट्रीय रूप से इन स्टेटमेंट्स को आप किस तरह से देखते हैं?"

इयान कहते हैं कि वो खुद को इन दोनों स्टेटमेंट्स के बीच खड़ा पाते हैं. अगर आप अमेरिका और यूरोप को देखें तो वो इन्वेस्टमेंट में एक शिफ्ट चाहते हैं. चीन दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब है. इसके विकल्प के तौर पर भारत इस मामले में सबसे ज़्यादा आकर्षक तो नहीं है लेकिन सबसे आकर्षक देशों में से एक है. अगर भारत को बाकी देशों का झुकाव अपनी ओर शिफ्ट करना है तो उसे और पारदर्शिता लानी होगी. उसे और भी असरदार न्यायिक प्रणाली चाहिए जो मामलों और नियमों का निपटारा कर सके. इनफ्रास्ट्रक्चर और मेट्रो सिस्टम में बेहतरी चाहिए. और ये सबकुछ इस तरीके से करना होगा जिससे वैश्विक स्तर पर कोई उथल-पुथल की स्थिति न आए. 

इयान आगे कहते हैं कि भारत अभी उस स्थिति में नहीं है कि इस तरह पोजीशन पर पहुंच सके. ऐसी पोजीशन पर पहुंच सके, जहां दुनिया के लिए उसे इग्नोर करना मुश्किल हो जाए. बकौल इयान, भारत के दिलचस्प देश है लेकिन सबसे ज्यादा दिलचस्प देश नहीं है. 

इयान कहते हैं कि उनकी नज़र में भारत के सामने जितनी चुनौतियां हैं उतनी अमेरिका के सामने नहीं हैं. अमेरिका के पड़ोसी देश मेक्सिको और कनाडा से से उसे कोई खतरा नहीं है. इसके उलट भारत को एक बहुत बड़ी रकम सिर्फ अपने डिफेन्स पर खर्च करनी पड़ती है. चीन और पाकिस्तान से भारत के रिलेशन वैसे नहीं है जैसे अमेरिका के कनाडा और मेक्सिको के साथ हैं. और भारत की ये चुनौतियां कहीं नहीं जाने वाली चाहे कोई भी सत्ता में आए.

भारत की विदेश नीति

इस इंटरव्यू में इयान ब्रेमर ने भारत की विदेश नीति पर भी बात की. उनसे पूछा गया था कि पिछले 10 सालों में भारत की जो विदेश नीति रही है, उसके बारे में वो क्या सोचते हैं. जवाब में इयान ने जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे का नाम लिया. इयान कहते हैं कि मॉडर्न वर्ल्ड में अब तक शिंजो आबे सबसे मज़बूत जापानी पीएम रहे. और ये वही शिंजो हैं जो एक समय भारत आकर नरेंद्र मोदी से मिलना चाह रहे थे. वो भी तब जब वो प्रधानमंत्री नहीं बल्कि गुजरात के मुख्यमंत्री थे. ये प्रोटोकॉल के खिलाफ था लेकिन ये कितना दिलचस्प भी है.

इयान ने आगे कहा कि जापान ऐसा देश है, वो जो भी बनाता है वो चीज़ महंगी होती है. फिर भी नरेंद्र मोदी ने उनसे रिश्ते डेवलप किये और उस समय बनाये गए रिश्ते का फल उन्हें G20 में मिला. अमेरिका भारत के साथ QUAD में है, लेकिन उसने भारत के रूस से तेल खरीदने पर कोई बहुत कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दी. इसकी एक बहुत बड़ी वजह है कि वो नहीं चाहते कि तेल की कीमतें 120 डॉलर पहुंच जाएं जो किसी वैश्विक मंदी का कारण बने. और इसके बावजूद भारत और अमेरिका नेशनल सिक्योरिटी और डिफेन्स जैसे मुद्दों पर साथ काम कर रहे हैं. भारत और अमेरिका लगातार जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज में हिस्सा ले रहे हैं. 

इयान आगे कहते हैं कि इन सभी चीज़ों से एक बात समझ आती है कि मोदी की लीडरशिप में ऐसे देशों से संबंध मज़बूत करने पर ज़ोर दिया गया है जो औद्योगिक रूप से सक्षम हैं. इसके साथ-साथ मोदी और भारत ने ग्लोबल स्टेज पर खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए अपनी उपलब्धियां और ग्लोबल फेस बनने की अपनी उत्सुकता को पूरे दमखम से पेश किया है. चाहे वो कॉप समिट हो,  जी20 हो या ब्रिक्स समिट हो; भारत ने हर जगह अपनी मौजूदगी मज़बूती से सुनिश्चित की है. भारत ऐसे सभी देशों के लिए एक प्रेरणा है जो उसकी तरह विकासशील हैं. 

अमेरिका बनाम चीन 

दोनों देशों के बीच तुलनात्मक रूप से बात करते हुए इयान कहते हैं कि भारत के लिए यहां दोनों तरह के ऑप्शन हैं. अगर बात करें ग्लोबल ए आई (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) की तो इसमें अमेरिकन्स ज़्यादा आगे हैं. सारी टॉप कम्पनियां वहीं हैं. लेकिन अगर बात करें ऊर्जा क्षेत्र की तो वहां चीन का दबदबा है चाहे वो इलेक्ट्रिक गाड़ियां हों या न्यूक्लियर इनर्जी. चीन अपने लोगों को अमेरिकन चीज़ों का इस्तेमाल नहीं करने देगा. भले ही वो क़ितनी भी किफायती हों. लेकिन इंडिया में ऐसा नहीं है. भारत अपने लोगों के लिए बेस्ट पॉसिबल ए आई लाने के लिए काम करेगा जो कि अमेरिकन हैं.

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