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रीलबाजों की 'अंधेरगर्दी' खत्म! सरकार का नया एथिक्स कोड, अब गलत रील बनाना महंगा पड़ेगा

New Influencer Ethics Code: सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के लिए सरकार ने नए सख्त नियम जारी किए हैं. अब पेड प्रमोशन छुपाना और गलत जानकारी देना भारी पड़ेगा. साथ ही AI और डीप फेक के जरिए बनाए जाने वाले रील्स पर भी सरकार की सख्त नजर है. जानिए क्या है नया एथिक्स कोड.

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13 मई 2026 (अपडेटेड: 13 मई 2026, 02:16 PM IST)
Influencer Ethics Code
रील बनाने वालों पर सरकार की टेढ़ी नज़र
Quick AI Highlights
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क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सुबह आंख खुलते ही फोन उठाते हैं और रील स्क्रॉल करना शुरू कर देते हैं. या फिर आप खुद एक क्रिएटर हैं जो हर दिन इस जुगत में रहते हैं कि अगला वीडियो क्या बनाया जाए जिससे 'व्यूज' की बाढ़ आ जाए.

अगर हां, तो ये खबर आपके लिए बहुत जरूरी है. भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने अब सोशल मीडिया की उस 'अंधेरगर्दी' पर नकेल कसने की तैयारी कर ली है, जहां कोई भी कुछ भी बोलकर निकल जाता था. इसे 'इन्फ्लुएंसर एथिक्स कोड' कहा जा रहा है और इसका सीधा मतलब ये है कि अब आपकी रील की मर्यादा सरकार तय करेगी.

दरअसल, हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां एक रील बनाने वाला शख्स किसी बड़े डॉक्टर या एक्सपर्ट से ज्यादा असर रखता है. आपने देखा होगा कि कोई इन्फ्लुएंसर अचानक आकर कहता है कि 'ये पाउडर खा लो, वजन घट जाएगा' या 'इस ऐप में पैसा लगाओ, रातों-रात अमीर बन जाओगे'. लोग उनकी बातों पर भरोसा भी कर लेते हैं क्योंकि वो उन्हें अपने जैसा लगता है.

लेकिन जब वो सलाह गलत निकलती है, तो नुकसान उस आम आदमी का होता है जिसने उस रील पर भरोसा किया था. इसी खतरे को देखते हुए सरकार ने अब गाइडलाइंस को इतना सख्त कर दिया है कि अगर आपने 'पेड प्रमोशन' (पैसा लेकर किया गया प्रचार) को छुपाया या 'मिसलीडिंग कंटेंट' (भ्रामक जानकारी) फैलाया, तो लेने के देने पड़ सकते हैं.

डिजिटल मीडिया की दुनिया में इसे एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है. एक तरफ वो लोग हैं जो इसे 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' यानी अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ वो लोग हैं जो कहते हैं कि डिजिटल स्पेस में रेगुलेशन की सख्त जरूरत थी.

आखिर ये कोड क्यों आया, इसमें क्या खास है और क्या अब वाकई क्रिएटिविटी पर ताला लग जाएगा. आज के इस मेगा एक्सप्लेनर में हम इसी डिजिटल महाभारत की एक-एक परत खोलेंगे.

आखिर इस एथिक्स कोड की जरूरत क्यों पड़ी

बात बहुत सीधी है. पहले टीवी और अखबारों के लिए नियम होते थे. 'एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया' (ASCI) नजर रखती थी कि कोई गलत विज्ञापन न चले. लेकिन सोशल मीडिया एक ऐसा खुला मैदान बन गया जहां कोई नियम-कायदा नहीं था. लोग 'फाइनेंशियल एडवाइस' देने लगे बिना ये जाने कि मार्केट कैसे काम करता है. लोग दवाओं के नुस्खे बताने लगे बिना मेडिकल डिग्री के. इसे 'इनफोडेमिक' कहा गया यानी सूचनाओं की एक ऐसी महामारी, जिसमें सच कम और झूठ ज्यादा था.

सरकार के पास पिछले कुछ सालों में ऐसी शिकायतों का अंबार लग गया था जहां लोगों ने इन्फ्लुएंसर्स के कहने पर गलत निवेश किया या गलत दवाइयां लीं. हाल ही में एक मशहूर हेल्थ इन्फ्लुएंसर पर एक बड़े बॉर्नविटा जैसे ब्रांड के खिलाफ वीडियो बनाने और फिर कानूनी पचड़े में फंसने का मामला भी सामने आया था.

इसके अलावा, कई इन्फ्लुएंसर्स गुपचुप तरीके से ब्रांड्स से पैसे लेते हैं और अपनी रील में उसे 'पर्सनल चॉइस' बताकर पेश करते हैं. ये सीधे तौर पर उपभोक्ता के अधिकारों का हनन है. जब आप पैसा लेकर कुछ बता रहे हैं, तो देखने वाले को पता होना चाहिए कि ये विज्ञापन है, सलाह नहीं.

ये कोड कहां से आया और इसका इतिहास क्या है

ये कोई रातों-रात लिया गया फैसला नहीं है. इसकी पटकथा काफी समय से लिखी जा रही थी. 'इन्फ्लुएंसर एथिक्स कोड' की जड़ें उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय (Ministry of Consumer Affairs) की उन गाइडलाइंस में हैं, जो जनवरी 2023 में जारी की गई थीं. तब सरकार ने साफ किया था कि इन्फ्लुएंसर्स को अपने पेड पार्टनरशिप को 'डिस्क्लोज' करना होगा. लेकिन जब देखा गया कि लोग सिर्फ छोटे से कोने में 'AD' लिखकर खानापूर्ति कर रहे हैं, तो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इसमें दखल दिया.

प्रस्ताव की बात करें तो इसे डिजिटल मीडिया को रेगुलेट करने के व्यापक प्लान के तहत लाया गया है. सरकार का तर्क है कि जब ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स के लिए नियम हो सकते हैं, तो उन इन्फ्लुएंसर्स के लिए क्यों नहीं जिनके पास करोड़ों की फॉलोवरशिप है. कई दौर की बैठकों के बाद, जिसमें डिजिटल एक्सपर्ट्स और पॉलिसी मेकर्स शामिल थे, इस एथिक्स कोड का ढांचा तैयार किया गया. इसमें खास तौर पर हेल्थ, फाइनेंस और लीगल सलाह देने वाले क्रिएटर्स को रडार पर रखा गया है.

AI जनरेटेड कंटेंट और डिस्क्लोजर की अनिवार्यता

नए गाइडलाइंस का सबसे बड़ा जोर पारदर्शिता (Transparency) पर है. सरकार का मानना है कि एआई तकनीक इतनी एडवांस हो गई है कि अब असली और नकली के बीच का अंतर करना मुश्किल है. इसलिए, अब किसी भी इन्फ्लुएंसर के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि अगर उसने अपने कंटेंट में एआई का उपयोग किया है, तो वह उसे स्पष्ट रूप से लेबल करे. चाहे वह एआई से बनाया गया कोई चेहरा हो, बैकग्राउंड हो या फिर किसी की आवाज की नकल, यूजर को यह पता होना चाहिए कि वह जो देख रहा है वह शत-प्रतिशत वास्तविक नहीं है.

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इंफ्लूएंसर्स पर लगाम लगाने की तैयारी (फोटो- AI)

इसका मतलब यह है कि अगर आप एआई अवतार का उपयोग करके किसी ब्रांड का प्रमोशन कर रहे हैं, तो वीडियो के ऊपर 'AI-Generated' या 'Synthetic Media' का टैग लगाना होगा. यह नियम इसलिए लाया गया है ताकि क्रिएटर्स तकनीक का फायदा उठाकर लोगों को भ्रमित न कर सकें. अगर कोई इन्फ्लुएंसर ऐसा नहीं करता है, तो उसे 'मिसलीडिंग कंटेंट' की श्रेणी में रखा जाएगा और उन पर भारी जुर्माना लग सकता है.

डीपफेक: अभिव्यक्ति की आजादी बनाम क्रिमिनल ऑफेंस

डीपफेक को लेकर सरकार का रुख सबसे ज्यादा सख्त है. हाल के महीनों में कई फिल्मी सितारों और राजनेताओं के डीपफेक वीडियो सामने आए हैं, जिसका इस्तेमाल गलत नैरेटिव सेट करने या ठगी करने के लिए किया गया. एथिक्स कोड के तहत, किसी भी व्यक्ति की सहमति के बिना उसके चेहरे या आवाज का डीपफेक बनाना और उसे सोशल मीडिया पर फैलाना एक गंभीर अपराध माना जाएगा.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि डीपफेक सिर्फ एथिक्स का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह आईटी एक्ट की धाराओं के तहत दंडनीय है. अगर कोई इन्फ्लुएंसर किसी दूसरे क्रिएटर या सेलिब्रिटी का डीपफेक बनाकर कोई मजाकिया रील भी बनाता है और उससे उस व्यक्ति की छवि खराब होती है, तो पीड़ित व्यक्ति इसकी शिकायत कर सकता है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी निर्देश दिया गया है कि ऐसी शिकायतों पर 24 घंटे के भीतर एक्शन लिया जाए और उस कंटेंट को हटाया जाए.

डेटा और एआई की क्रेडिबिलिटी पर नजर

एक डिजिटल स्ट्रैटेजी प्रोफेशनल के तौर पर आपको यह समझना होगा कि अब 'डेटा' की शुद्धता पर बहुत जोर है. अक्सर एआई टूल्स (जैसे ChatGPT या अन्य मॉडल्स) कई बार 'हैलुसिनेशन' का शिकार होते हैं, यानी वे गलत जानकारी को बहुत आत्मविश्वास के साथ पेश करते हैं. सरकार के नए कोड के अनुसार, अगर कोई इन्फ्लुएंसर एआई द्वारा दिए गए गलत डेटा या आंकड़ों को अपनी रील में बिना वेरीफाई किए इस्तेमाल करता है, तो दोष एआई टूल का नहीं बल्कि उस इन्फ्लुएंसर का माना जाएगा.

खासकर हेल्थ और फाइनेंस के मामलों में, जहां डब्ल्यूएचओ (WHO) या आरबीआई (RBI) के आंकड़ों की जरूरत होती है, वहां एआई जनरेटेड सूचनाओं पर आंख मूंदकर भरोसा करना महंगा पड़ सकता है. सरकार का कहना है कि इन्फ्लुएंसर एक 'पब्लिशर' की तरह है, और पब्लिशर की जिम्मेदारी होती है कि वह जो भी जानकारी साझा करे, वह पूरी तरह से सटीक और प्रामाणिक हो.

बचाव के कानूनी रास्ते और क्रिएटर्स की जिम्मेदारी

अगर आप एक क्रिएटर हैं और कोई आपके नाम या चेहरे का गलत इस्तेमाल (Deepfake) करके कुछ पोस्ट करता है, तो आपके पास अब मजबूत कानूनी विकल्प हैं. आप 'नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल' पर इसकी तुरंत शिकायत कर सकते हैं. इसके अलावा, नए नियमों के तहत आप उस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लीगल नोटिस भेजकर उस कंटेंट को हटवा सकते हैं.

इन्फ्लुएंसर्स को सलाह दी गई है कि वे अपनी डिजिटल पहचान (Digital Identity) को सुरक्षित रखने के लिए वॉटरमार्किंग और अन्य तकनीकी टूल्स का इस्तेमाल करें. आने वाले समय में, एआई और डीपफेक को लेकर सरकार एक अलग से 'एआई रेगुलेशन बिल' भी ला सकती है, जो इन नियमों को और भी ज्यादा संवैधानिक मजबूती प्रदान करेगा. डिजिटल मीडिया की इस रेस में वही टिकेगा जो तकनीक का इस्तेमाल समझदारी और ईमानदारी के साथ करेगा.

अभी इस कोड का स्टेटस क्या है और नियम क्या कहते हैं

फिलहाल, ये कोड लागू होने की प्रक्रिया में है और इसके तहत सख्त दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं. नए नियमों के मुताबिक, अगर कोई इन्फ्लुएंसर किसी भी तरह का आर्थिक लाभ (पैसा, फ्री गिफ्ट, होटल स्टे, डिस्काउंट कूपन) लेकर किसी प्रोडक्ट का रिव्यू करता है, तो उसे स्पष्ट रूप से 'AD', 'Sponsored', 'Collaboration' या 'Paid Promotion' का लेबल लगाना होगा. ये लेबल रील या वीडियो के ऊपर साफ दिखना चाहिए, न कि कमेंट सेक्शन या डिस्क्रिप्शन में कहीं छुपा हुआ.

सबसे ज्यादा सख्ती हेल्थ और फाइनेंस सेक्टर में है. अब आप 'डॉक्टर' बने बिना किसी बीमारी का इलाज नहीं बता सकते. अगर आप ऐसा करते हैं, तो आपको अपनी क्वालिफिकेशन बतानी होगी और ये डिस्क्लेमर देना होगा कि ये कोई प्रोफेशनल सलाह नहीं है. इसी तरह, 'फिनफ्लुएंसर्स' (फाइनेंस इन्फ्लुएंसर्स) को अब सेबी (SEBI) के नियमों का पालन करना होगा. अगर कोई इन नियमों को तोड़ता है, तो उस पर 10 लाख रुपये से लेकर 50 लाख रुपये तक का जुर्माना लग सकता है और उसके सोशल मीडिया अकाउंट को बैन करने की सिफारिश भी की जा सकती है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स? इस पर किसका क्या सोचना है

इस मुद्दे पर डिजिटल जगत दो गुटों में बंटा हुआ है. मशहूर साइबर लॉ एक्सपर्ट पवन दुग्गल ने लल्लनटॉप से बात करते हुए कहा कि,

डिजिटल स्पेस में जवाबदेही तय करना समय की मांग है. जब एक इन्फ्लुएंसर के पास लाखों लोगों की राय बदलने की ताकत होती है, तो उसके साथ जिम्मेदारी भी आती है. ये नियम सेंसरशिप नहीं, बल्कि यूजर की सुरक्षा के लिए हैं.

वहीं दूसरी तरफ, कुछ क्रिएटर्स का मानना है कि ये नियम बहुत ज्यादा 'कठोर' हैं. एक पॉपुलर यूट्यूबर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि

सरकार जिस तरह से क्रिएटिव कंटेंट को रेगुलेट करने की कोशिश कर रही है, उससे छोटे क्रिएटर्स डर जाएंगे. ब्रांड्स अब कोलाबोरेशन करने से कतराएंगे क्योंकि हर जगह 'AD' का टैग लगाने से व्यूअरशिप कम हो जाती है.

अधिकतर जानकारों का मानना है कि लंबे समय में ये इंडस्ट्री की सफाई के लिए जरूरी है.

रीलबाजों की 'अंधेरगर्दी' और समाज पर उसका मनोवैज्ञानिक असर

सोशल मीडिया पर आजकल 'फेक इट टिल यू मेक इट' का कल्चर है. यानी जब तक सफल न हो जाओ, तब तक सफलता का नाटक करो. इस चक्कर में इन्फ्लुएंसर्स अक्सर ऐसी लाइफस्टाइल प्रमोट करते हैं जो असल में होती ही नहीं. महंगी गाड़ियां किराए पर लेकर वीडियो बनाना या नकली नोटों की गड्डियां दिखाना अब आम हो गया है. इसका असर सबसे ज्यादा मिडिल क्लास और युवाओं पर पड़ रहा है.

WHO की रिपोर्ट के मुताबिक मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब लोग इन रीलबाजों की चमक-धमक वाली जिंदगी देखते हैं, तो उनमें 'FOMO' (छूट जाने का डर) और हीन भावना पैदा होती है. लोग कर्ज लेकर वो चीजें खरीदने लगते हैं जो उनके पसंदीदा क्रिएटर ने प्रमोट की होती हैं. इसके अलावा, गलत स्वास्थ्य सलाहों के कारण कई बार लोग अस्पताल तक पहुंच जाते हैं. ये एथिक्स कोड इसी मानसिक और शारीरिक नुकसान को रोकने की एक कोशिश है.

डेटा क्या कहता है? क्यों जरूरी है ये नकेल

अगर हम डेटा पर नजर डालें, तो भारत में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मार्केट 2025 तक करीब 2,800 करोड़ रुपये का होने वाला है. फिक्की (FICCI) और अर्न्स्ट एंड यंग (EY) की एक रिपोर्ट बताती है कि डिजिटल एडवरटाइजिंग में इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है. लेकिन चिंता की बात ये है कि लगभग 70 प्रतिशत इन्फ्लुएंसर्स अभी भी पेड प्रमोशन का खुलासा नहीं करते हैं.

सेबी (SEBI) की एक जांच में पाया गया कि कई 'फिनफ्लुएंसर्स' ने स्टॉक मार्केट में पेनी स्टॉक्स को प्रमोट करने के लिए करोड़ों रुपये लिए, जिससे छोटे निवेशकों का भारी नुकसान हुआ. आरबीआई (RBI) भी लगातार चेतावनी देता रहा है कि सोशल मीडिया पर मिलने वाली वित्तीय सलाहों से सावधान रहें. जब पैसा इतना बड़ा हो और दांव पर आम आदमी की गाढ़ी कमाई लगी हो, तो रेगुलेशन अनिवार्य हो जाता है.

साइबर क्राइम एक्सपर्ट पवन दुग्गल के मुताबिक जरूरत सिर्फ इथिक्स कोड से कहीं आगे बढ़कर सख्त कानून बनाने की है. उनका मानना है,

कोड और इथिक्स की बातें इंफ्लूएंसर्स मानने को तैयार नहीं हैं. लिहाजा कुछ भी रील बना देते हैं. फिर चाहे उससे अंधविश्वास बढ़ता हो या फिर गलत दवा का प्रचार होता हो. जानकारी के अभाव में बहुत सारे लोग उनकी बातों को सच मान लेते हैं. ऐसे में कानून का डंडा चले बिना और कड़ी सजा के डर के बिना बात नहीं बनेगी. 

फ्रीडम ऑफ स्पीच बनाम रेगुलेशन: बारीक लकीर

ये सबसे विवादित हिस्सा है. क्या सरकार के ये नियम 'बोलने की आजादी' को छीन रहे हैं. संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) हमें बोलने की आजादी देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) उस पर 'उचित प्रतिबंध' लगाने की शक्ति भी सरकार को देता है. डिजिटल मीडिया स्ट्रैटेजी के नजरिए से देखें तो रेगुलेशन का मतलब ये नहीं कि आप अपनी राय नहीं दे सकते. इसका मतलब सिर्फ ये है कि आपकी राय 'बिकी हुई' नहीं होनी चाहिए अगर आप उसे 'स्वतंत्र' बता रहे हैं.

चुनौती ये है कि 'मिसलीडिंग' या भ्रामक की परिभाषा क्या होगी. क्या सरकार इसे अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करेगी. अगर कोई क्रिएटर सरकार की किसी पॉलिसी की आलोचना करता है, तो क्या उसे 'भ्रामक' करार देकर दबाया जा सकता है. यहीं पर वो 'बारीक लकीर' आती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि नियमों में पारदर्शिता होनी चाहिए ताकि ये किसी एक विचारधारा को टारगेट करने का जरिया न बन जाएं.

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रील बनाकर कुछ भी बेचना अब मुमकिन नहीं (फोटो- Instagram)

क्या बदलेगा और क्या नहीं

आने वाले समय में हम सोशल मीडिया पर एक बड़ा बदलाव देखेंगे. अब 'क्वालिटी ओवर क्वांटिटी' का दौर आएगा. जो क्रिएटर ईमानदारी से कंटेंट बनाएंगे, उनकी वैल्यू बढ़ेगी. ब्रांड्स भी अब उन इन्फ्लुएंसर्स के साथ काम करना पसंद करेंगे जिनकी क्रेडिबिलिटी (साख) अच्छी है. छोटे और मझोले क्रिएटर्स के लिए शुरुआत में मुश्किल हो सकती है, लेकिन उन्हें भी जल्द ही इन नियमों की आदत डालनी होगी.

तकनीकी रूप से, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स खुद ऐसे टूल्स विकसित कर रहे हैं जो एआई (AI) की मदद से ये पहचान लेंगे कि वीडियो में कोई प्रोडक्ट प्रमोट किया जा रहा है या नहीं. अगर आपने खुद 'पेड पार्टनरशिप' का टैग नहीं लगाया, तो प्लेटफॉर्म खुद उसे फ्लैग कर देगा. यानी भागने का रास्ता अब बंद हो रहा है.

आम आदमी के लिए सलाह: आप क्या करें

एक जागरूक यूजर के तौर पर आपकी जिम्मेदारी भी बड़ी है. किसी भी रील को देखकर तुरंत फैसला न लें.

1. अगर कोई हेल्थ टिप दे रहा है, तो पहले उसकी डिग्री चेक करें.

2. अगर कोई रातों-रात अमीर बनाने की स्कीम बता रहा है, तो समझ लीजिए कि दाल में कुछ काला है.

3. 'पेड प्रमोशन' के टैग को हमेशा देखें.

4. अगर आपको लगे कि कोई क्रिएटर जानबूझकर झूठ फैला रहा है, तो प्लेटफॉर्म पर उसे रिपोर्ट करें.

5. याद रखिए, रील की दुनिया अक्सर 'फिल्टर' लगी होती है, असल जिंदगी उससे बहुत अलग है.

ये भी पढ़ें- डिजिटल वसीयत: आपके जाने के बाद आपके फेसबुक, इंस्टाग्राम और क्रिप्टो का क्या होगा

सजा या सफाई अभियान?

'इन्फ्लुएंसर एथिक्स कोड' कोई सजा नहीं है, बल्कि डिजिटल दुनिया को बेहतर बनाने का एक 'सफाई अभियान' है. जिस तरह सड़क पर चलने के नियम होते हैं ताकि एक्सीडेंट न हों, उसी तरह डिजिटल हाईवे पर भी नियमों की जरूरत है.

क्रिएटिविटी तब तक ही अच्छी है जब तक वो किसी का नुकसान न करे. अगर सरकार इन नियमों को निष्पक्ष तरीके से लागू करती है, तो इससे न केवल उपभोक्ताओं का भला होगा, बल्कि उन ईमानदार क्रिएटर्स को भी पहचान मिलेगी जो वाकई में अच्छा काम कर रहे हैं. आखिर में बात वही है-पावर के साथ रिस्पॉन्सिबिलिटी भी आती है. और अब वो वक्त आ गया है जब रीलबाजों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी.

वीडियो: रील बनाने स्कॉर्पियो से निकला नाबालिग, शख्स को मारी टक्कर, मां ने घटना के बारे में सब बताया

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