जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में बोलते हुए RSS के सीनियर मेंबर मनमोहन वैद्य ने कहा हैकि जातिगत आरक्षण खत्म होना चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर सभी को समान अवसर चाहिए तोशिक्षण संस्थाओं और नौकरियों से आरक्षण खत्म होना चाहिए.अभी उत्तर प्रदेश में चुनाव है. इससे पहले बिहार चुनाव के दौरान भी RSS चीफ मोहनभागवत ने लगभग यही बात कही थी. इसके बाद बिहार में भाजपा को बड़ा घाटा उठाना पड़ाथा. मनमोहन ने फिर से वही तान छेड़ दी है.क्या आरक्षण वाकई में ऐसी चीज है कि हर चुनाव के पहले इसकी बात हो? अभी यूपी मेंअखिलेश ने कुछ जातियों को एससी, एसटी घोषित कर दिया था. हालांकि केंद्र से वोअप्रूव नहीं हुआ है.पर संविधान आरक्षण के बारे में क्या कहता है?आर्टिकल 15(4) और 16(4): केंद्र और राज्य सरकारें पब्लिक सर्विस में SC और STसमुदाय के लिए नौकरियां आरक्षित कर सकती हैं.आर्टिकल 16(4A) के मुताबिक प्रमोशन में भी आरक्षण दिया जा सकता है.आर्टिकल 16(4B) के मुताबिक SC और ST समुदाय की बची हुई वैकेंसी को नई वैकेंसी केसाथ क्लब कर के निकला जा सकता है. इससे 50% रिजर्वेशन का कानून नहीं टूटेगा.आर्टिकल 330 और 332: पार्लियामेंट और राज्यों की विधानसभाओं में कुछ सीटें सुरक्षितरखी जायेंगी.आर्टिकल 330 और 335 के मुताबिक केंद्र और राज्य सरकारों की नौकरियों, पब्लिक सेक्टरकी नौकरी में भी आरक्षण दिया जायेगा.इस आरक्षण की वजह क्या है?इसकी वजह दी गई कि भारतीय समाज में जातिगत भेद-भाव के चलते बहुत सारी जातियों केलोगों की समाज के पावर स्ट्रक्चर में पर्याप्त भागीदारी नहीं है. शुरू में ये SC औरST समुदाय के लिए ही था. क्योंकि ये समुदाय ऐतिहासिक रूप से समाज में बड़ा ही नीचेरहा था. मतलब आरक्षण नौकरियों के लिए नहीं दिया गया था, बल्कि समाज में समुदायों कीबराबरी के लिए दिया गया था.There is equality only among equals. To equate unequals is to perpetuateinequality. - मंडल कमीशन बाद में कालेलकर और मंडल कमीशन बैठाये गए. इसके हिसाब से'पिछड़ी जातियों' की परिभाषा दी गई. 7 अगस्त 1990 को 'सवर्ण' वी पी सिंह की सरकार नेइस समुदाय को भी आरक्षण दे दिया. बड़ा बवाल हुआ. फिर आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट ने इसपर 50% की सीलिंग लगा दी. मतलब कहीं पर भी आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं हो सकता.वी पी सिंहयहां से आरक्षण का मामला बदल गया. इसकी शुरुआत हुई थी सामाजिक बराबरी के लिए. पर अबआर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी सामने आने लगीं. जिसके लिएसरकार तैयार नहीं थी. आरक्षण का विरोधबदलते भारत में आरक्षण की कैसे बनी रही जगह?1990 के बाद भारत की ही स्थिति बदल गई. उसके पहले समाज में शीर्ष पर रहने के लिएतीन चीजें जरूरी थीं: जमीन, सरकारी नौकरी और संसद में नेता. पर 1990 के बाद एक नईचीज आई: प्राइवेट सेक्टर. नए बिजनेस. जिनमें ज्यादा पैसा था, साथ ही नेताओं औरअफसरों से मिलना-जुलना होता रहता था.1991 रिफॉर्म के वीर मनमोहन सिंह और नरसिम्हा रावउस समय की रिपोर्ट्स के मुताबिक ज्यादातर सरकारी नौकरियों में 'सवर्ण' जातियों केलोग थे. क्योंकि अपनी मजबूत सामाजिक स्थिति के चलते उनके लिए नौकरी पाना संभवतःआसान था. वहीं 'पिछड़ी और अतिपिछड़ी' जातियों के लोगों के लिए ये बेहद मुश्किल था.उनके लिए प्राइवेट सेक्टर में बिजनेस करना या नौकरी पाना और भी मुश्किल था. क्योंकिये नए तरह की स्किल मांगती थीं. इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट पढ़ना महंगा भी था औरइंग्लिश में होने के चलते मुश्किल भी.क्या नौकरियों का फर्क मेरिट की वजह से था?तो उस वक़्त तक अगर 'पिछड़ी और अतिपिछड़ी' जाति को नौकरियां मिल भी रही थीं, तो'सवर्ण' जातियों की तुलना में उनका सशक्तिकरण बहुत ही कम हो रहा था. नेताओं की बातकरें तो संसद और विधानसभा में SC और ST समुदाय बहुत ही कमजोर था. पर तब तक OBCसमुदाय पकड़ बना चुका था. उत्तर प्रदेश और बिहार में OBC 'यादव' मुख्यमंत्री रह चुकेथे.मुलायम सिंह यादवतो धीरे-धीरे 'ऊपरी' और 'पिछड़ी और अतिपिछड़ी' जातियों में फर्क कई स्तर पर आ गया.ध्यान रहे कि ये फर्क मेरिट को लेकर नहीं है. ये फर्क है जाति के चलते पूरे नजरिये,आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और व्यक्तित्व में. अगर डेनियल गोलमैन की किताब 'इमोशनलइंटेलिजेंस' पढ़ें तो जीवन में सफल होने के लिए ये सारे मनोवैज्ञानिक गुण होनेचाहिए. 'पिछड़ी और अतिपिछड़ी' जातियों को पहले ही ये फर्क महसूस करा दिए जाते हैं.उत्तर प्रदेश में एक स्टडी की गई. उसमें बहुत सारे बच्चों को एक साथ खेलाया गया.किसी को किसी की जाति नहीं बताई गई. तो 'पिछड़ी और अतिपिछड़ी' जातियों के बच्चे भीमस्त होकर खेल रहे थे. पर जब जाति बताकर खेलाया गया, तो वो बच्चे मद्धिम पड़ गए.उनका आत्मविश्वास गिर गया.काम करते बच्चेआबादी बढ़ती गई, नौकरियां घटती गईं. और समाज टूटता गया.फिर आबादी तो जाति देखकर बढ़ती नहीं. हिंदुस्तान की आबादी बढ़ती गई. नौकरियां उसहिसाब से नहीं निकल पाईं. धीरे-धीरे सरकारी नौकरियां भी कम होती गईं. इससे 'सवर्ण'जाति के लोगों को लगने लगा कि आरक्षण के चलते उनको नौकरियां नहीं मिल रही हैं. साथही ये चीज भी बाहर आने लगी कि सवर्ण होने से पेट नहीं भरता है. बहुत सारे सवर्णबेहद गरीब हैं. अब उनको आरक्षण अपना दुश्मन लगने लगा.वहीं बहुत सारी जातियों ने खुद के लिए आरक्षण की मांग शुरू कर दी. गुज्जर और जाटसमुदाय ने तो बाकायदा विरोध-प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. कई राज्य सरकारें दबाव मेंआ गईं, आरक्षण दे दिया. पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे कई मामलों को निरस्त कर दिया.हालिया उदाहरण गुजरात के पटेलों का है. पर सरकार नौकरियों की इस जरूरत को पूरा नहींकर पाई. क्योंकि देश में उतनी तेजी से इंडस्ट्रीज नहीं आ पाई हैं. इससे समाज मेंटूटन की जो नई लाइनें बनीं, उनको पाटने का प्रयास नहीं हो पाया. बल्कि उन्हींदरारों पर चढ़कर वोट बटोरने की कोशिश की जाने लगी. सब जाति के आधार पर वोट मांगते,पर किसी के पास उपाय नहीं था कि कैसे लोगों की जरूरतें पूरी की जाएं.जाट आरक्षण आन्दोलनजाति के अलावा अब क्लास भी आ गयाइसके अलावा, स्वतंत्रता के पहले से ही देश में जाति के अलावा एक और विभाजन शुरू होगया था. क्लास का. अपर क्लास और लोअर क्लास. ये चीज जाति के परे है. एक ही जाति मेंये दोनों क्लास हैं. इससे पिछड़े हुए लोगों को निराशा होती है. इसका ठीकरा जाति औरआरक्षण पर फूटता है. बात अगर यहीं ख़त्म हो जाती तो और बात थी. इसके साथ ही धर्म केआधार पर भी समाज में भयानक विभाजन है. मुस्लिम समुदाय के लोगों की समाज के पावरस्ट्रक्चर में सहभागिता बहुत ही कम है. तो कहीं-कहीं पर इस समुदाय के लोग बिजनेसमें बहुत ज्यादा हैं. तो बाकी समुदायों के लोगों को लगता है कि नौकरी तो गई, बिजनेसभी गया. जब भी दंगे होते हैं, उसके मूल में यही वजहें होती हैं.मीट दुकान: cnn.comतो ऐसे में नेताओं का आर्थिक आधार पर 'सवर्ण' जातियों को आरक्षण देने की बात करनाबेमानी है. क्योंकि ये किसी के हक़ में नहीं है. क्योंकि जरूरत है प्राइवेट सेक्टरमें नई नौकरियों की. बची-खुची सरकारी नौकरियों के लिए सबका लड़ना बेवकूफी ही होगी.जबकि अभी भी बहुत सारे लोग ड्राई लैट्रिन साफ़ कर रहे हैं और मरी गाय का चमड़ा उताररहे हैं. इसके लिए उनको जान भी देनी पड़ रही है.