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एक कविता रोज़: 'औरतों ने बदला नहीं, बदलाव चुना'

एक कविता रोज़ में आज पढ़िए कविता, 'औरतें'

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1 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 1 अगस्त 2022, 07:41 PM IST)
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औरतें खुद में एक कविता हैं
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दी लल्लनटॉप का कविताओं से जुड़ा कार्यक्रम जिसका नाम है 'एक कविता रोज़'. इसी सिलसिले में आज पढ़िए कविता: ‘औरतें’. ये कविता मीराबाई चानू सरीखी सशक्त भारतीय महिलाओं से प्रेरित होकर लिखी गई है. चानू ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 (CWG2022) में भारत को पहला गोल्ड मेडल दिलाया. ये मेडल उन्हें वेटलिफ्टिंग के 49 किग्रा कैटेगरी में मिला. 'औरतें' कविता उन सभी महिलाओं को समर्पित है; जिनके कंधों, मन और बदन पर तमाम तरह के नैतिक एवं भौतिक भार हैं. पढ़िए कविता ‘औरतें’

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जिन औरतों ने सिर पर
बरसीम और पुआल के गट्ठर उठाए
जो सिर पर मटका रखकर
रेगिस्तान की रेत में ऊंट बन चलीं
जिन्होंने एक हाथ में बच्चे को थामकर 
दूसरे में गोबर की टोकरी थामी
जो शराबी पतियों की मार के भार को 
कंधों पर उठाए घूमती रहीं
सनकी प्रेमी जिनके दोनों स्तनों पर 
पैर रखकर खड़े हो गए
जिनके सिर पर जंगल से लाई लकड़ी का ही नहीं
घर की रोटी का भी भार रहा
जिन्होंने अपने शरीर पर हर प्रकार की 
आंख का भार वहन किया

वो चाहतीं तो उन आंखों को 
अपने बालों की नोक से फोड़ सकती थीं
हर भार उठाने से इनकार कर सकती थीं
पर उन्होंने भार उठाया
कभी पिता के डर से
कभी मार की डर से
कभी भतार के डर से 
वो चाहतीं तो चढ़ बैठती समाज की छाती पर
उन्होंने भार उठाना चुना

वे किसी दिन सिर पर धरा मटका फोड़ देतीं
अहाते में पड़ा गोबर यूं ही छोड़ देतीं
शराबी पतियों के हाथ पकड़कर मोड़ देतीं
पर औरतों ने बदला नहीं, बदलाव चुना
उन्होंने तिरंगे का भार उठाना चुना
वे चाहतीं तो भारोत्तोलन की रॉड बीच में छोड़ देतीं
पर औरतों ने मेडल लाना चुना 
देश का भार उठाना चुना

पुरुषों के कंधे इतने मजबूत नहीं 
कि इस भार को वहन कर सकें 
समाज उठा सकें
प्रेम उठा सकें 
विद्रोह उठा सकें
मेडल लाने वाली ये वही औरते हैं
जिन्होंने किताबें कम 
कर्कशता और क्रूरता ज़्यादा ढोई
वे पुरुष की बर्बरता अपना सकती थीं
मरने की हद तक मार सकती थीं
पर उन्होंने बर्बरता नहीं
बराबरी चुनी

[अनुभव]

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वीडियो: एक कविता रोज़ में सुनिए मनोज कुमार झा की कविता

 

एक कविता रोज़ में सुनिए मनोज कुमार झा की कविता - सभ्यता

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