कुछ लोगों का होता है कि बस करने बैठते हैं और होता जाता है. मानो कोई जादू हो. ऐसाही कहते हैं पियूष मिश्रा अपने बारे में "मैंने पहली बार हारमोनियम छुआ और वो सालाबज गया." और तबसे उनका हारमोनियम बजता जा रहा है. कभी दुनिया को ठुकराता है तो कभीदूर देस के टावर में एरोप्लेन घुसवाता है. पियूष मिश्रा उन लोगों की जमात में शामिलहोते हैं जो अपने शब्दों की गहराइयों में खींचकर किसी को डुबो सकते हैं. और फिर जोआदमी उभर कर निकलता है वो कोई और ही हुआ फिरता है. यही पियूष मिश्रा होंगे हमारेबीच साहित्य आज तक में. 12 नवंबर को. पियूष मिश्रा से फ़ोन पर हुई कुछ 10 मिनट कीबातचीत. पेश है. आपका साहित्य से पहला एनकाउंटर कब हुआ? बचपन से मेरा साहित्य कासाथ रहा. बचपन से ही हिंदी साहित्य पढ़ने का बहुत शौक था. मेरे पिता जी की बदौलत.बचपन से नन्दन, पराग और ऐसी तमाम किताबें पढ़ता था. जैसे चंदा मामा. इन्हीं किताबोंने मेरा साहित्य से परिचय करवाया था. इन्हीं किताबों से मैं साहित्य से जुड़ा. फिर नजाने कब मैंने पहली पोएट्री लिख दी. उस वक़्त मैं आठवीं क्लास में था. वो आज पढ़ताहूं तो लगता है अच्छी लिखी थी. वो पोएट्री याद है? ज़िन्दा हो हां तुम कोई शक नहींसांस लेते हुए देखा मैंने भी है हाथ और पैरों और जिस्म को हरकतें खूब देते हुए देखामैंने भी है. अब भले ही ये करते हुए होंठ तुम दर्द सहते हुए सख्त सी लेते हो अब हैइतना भी कम क्या तुम्हारे लिए खूब अपनी समझ में तो जी लेते हो. इसे मैंने अपनेसाथियों को पढ़ाया. मुझसे बड़े थे वो उम्र में. उनकी अपनी समझ थी. उन्होंने कहा किहां अच्छा है अच्छा है. लेकिन आज की तारीख में इतनी मान्यता मिलती है इस पोएम को तोअब मुझे लगता है कि वाकई अच्छा लिखा था. जिस तरह से लिटरेचर इवॉल्व कर रहा है, अभीफिल्मों में कितना साहित्य मिलता है? कहीं नहीं चल रहा है. सब बकवास है.साहित्यकहीं नहीं है. फिल्मों से सब गायब हो चुका है? अरे कहीं नहीं है. सब गायब. था पहलेवो जब उर्दू शायरी ज़िन्दा थी उस वक़्त था. ये तमाम बेहतर से बेहतर किताबों परफिल्में बंटी थीं. रे साहब ने क्या कमाल फिल्में बनाई थीं. बेहतरीन स्क्रिप्टसाहित्य के ज़रिये आई थीं. बंदिनी वगैरह ये सब थीं. इस वक़्त तो बिलकुल ही गायब होगया है. आज कल तो साहित्य से प्रेरित कोई सिनेमा नहीं बन रहा है. ये जो बायोपिक्सआज कल बन रही हैं, इन्हें थोड़ी न तुम साहित्य से जुड़ी फ़िल्में कहोगे. सिनेमा अपनेआप में बहुत बड़ा साहित्य है यार. सिनेमा कोस साहित्य से मत जोड़ो. सिनेमा में अपनेआप बहुत बड़ा साहित्य है. राजू हीरानी की सारी फिल्में जो हैं वो मास्टरपीसेज़ हैं.विशाल भाई ने जो ये तीनों पिक्चरें बनाई हैं मक़बूल, हैदर और ओमकारा. ये तीनोंमास्टरपीसेज़ हैं. ये अपने आप में साहित्य बन गया है. हिंदी साहित्य से प्रेरितफिल्में नहीं हैं. लेकिन वहां जो लिखा जा रहा है वो अपने आप में साहित्य है. येसिनेमा साहित्य है. राजू हीरानी की सारी पिक्चरें लगे रहो मुन्नाभाई, मुन्नाभाईएमबीबीएस और थ्री इडियट्स ये सभी सिनेमा की मास्टरपीसेज हैं. ये स्क्रिप्ट्स अगरलोगों को पढ़ाई जायेंगी तो फिर कितना भला हो जायेगा दुनिया का. ये अपने आप में एकसाहित्य है. खोसला का घोसला अपने आप में एक साहित्य है. ब्लैक फ्राइडे अपने आप मेंएक खांचा है. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर अपने आप में एक साहित्य है. तो ये सिनेमा का अपनाअलग ही मज़ा है. सिनेमा को स्टोरी से और माहौल से जोड़कर नहीं देखना चाहिए. क्यूंकिवो स्टोरी सिनेमा में तब्दील होते होते बहुत सारे पायदान क्रॉस कर जाती है. तीसरीकसम की बात लो. डेढ़ पन्ने की स्टोरी है मारे गए गुलफ़ाम. वो पिक्चर में कितनी बढ़ियातरह से ट्रांसफॉर्म हुई है. आप हमेशा से लिखते रहे हैं. मगर आपके लिए अब चीज़ें बदलगयी हैं. इस बदलाव के बाद आपके पढ़ने और लिखने पर कितना फ़र्क पढ़ा है? यार अब पहले केमुकाबले बहुत कम पढ़ता हूं. आज कल तो पढ़ाई बहुत कम हो गयी है. इसका मुझे अफ़सोस है.लिख लेता हूं मैं. लेकिन जबसे मैं संतुलित हुआ हूं तबसे मेरी हर चीज में थोड़ी सीकमी आई है. जब मैं बिल्कुल ही पागल था तब बहुत करता था. जबकि ये उल्टा होना चाहिएथा. जब आप संतुलित होते हैं तो ज़्यादा चीज़ें करनी चाहिए. लेकिन हम आर्टिस्ट्स का येदुर्भाग्य है कि ज़िन्दगी असंतुलित थी, जब ज़िन्दगी संभाले नहीं संभल रही थी, उस वक़्तमैंने बहुत बहुत लिखा, क्या ऐक्टिंग करी. बहुत ज़्यादा किया. आज कल थोड़ा कम होता हैसंतुलन की वजह से. जिसको मैं ग़लत मानता हूं. आज कल जो है मतलब, लिखने से, आर्ट सेबेहतर चीज़ें आ गयी हैं. आज कल किसी अल्कॉहॉलिक की मदद कर देता हूं. अगर कोईअल्कॉहॉलिक मेरी वजह से सुधर जाए तो मैं उसे अपने सारे आर्ट से बड़ा अचीवमेंट मानताहूं. आज कल प्रायोरिटी बदल गयी हैं. एक चीज़ जिसने साहित्य में सबसे ज़्यादा इंस्पायरकिया. ऐसा नहीं हो सकता. मैं किसी एक चीज़ से इंस्पायर नहीं हो सकता. ऐसा नहीं होसकता. बल्कि मैं तो ये कहता हूं कि बेसिकली कोई कसी से इंस्पायर्ड नहीं होता. ये सबबकवास बातें हैं. कि मैं इससे इंस्पायर्ड हूं उससे इंस्पायर्ड हूं. इंस्पिरेशन आपकेअन्दर से आती है. जब आपको लगता है कि क्रियेट करना, लिखना ऐक्टिंग करना आपकी ज़रुरतहै, आप उसके बिना रह नहीं सकते वरना आपकी सांस घुट जायेगी. तब आप अपने आप उगल देतेहैं. ये इंस्पिरेशन वगैरह सब बकवास है. सब अच्छे लगे मुझे. सब अच्छे थे. प्रेमचंदसे लेकर टैगोर से लेकर शेक्सपियर से लेकर सब जितने आपके मॉडर्न शायर हैं. इकबालसाहब ने बहुत इंस्पायर किया. साहिर साहब बहुत अच्छा लिखते थे. मजरूह साहब ने तोबहुत इंस्पायर किया. लेकिन मैं ये नहीं कह सकता कि इनसे इंस्पिरेशन लेकर मेरीपोएट्री बनी. बॉब डिलन को मैंने तब सुना था जब मैं बहुत सारा लिख चुका था. मुझेअंग्रेजी गाने समझ नहीं आया करते थे. तो मैंने उसको तब सुना जब मैं बहुत लिख चुकाथा ऑलरेडी. जब मैंने देखा उसको तो लोगों ने बतलाया कि तुम तो काफी इंस्पायर्ड होउससे. मतलब आपका कंटेंट काफी मिलता है. लेकिन मैंने बतलाया कि इसलिए मैं डिलन कानाम लेता नहीं हूं. मैंने बहुत लेट पढ़ा मैंने उसे. सुना मैंने उसे. ये इत्तेफ़ाक थाकि दो मानसिकताएं मिल गयी थीं. इत्तेफ़ाक से मैं भी उसी तर्ज पर गाने लगा था औरलिखने लगा था. एक शायद ये थे कि वो भी लिखते थे, मैं भी लिखता था. वो भी कम्पोज़करते थे, मैं भी करता था. वो भी गाते थे, मैं भी गाता था. तो शायद ये भी था. शायदये मिल गयी हो. वरना मैं कभी किसी से नहीं इंस्पायर हुआ. कोई लड़की वड़की नहीं. कुछनहीं. कोई नहीं. सब बकवास बातें हैं. लड़की वड़की कोई नहीं. मैं तो नशे के दौर मेंलिख रहा था. बुरी तरीके थे. पागल था मैं उस वक़्त.--------------------------------------------------------------------------------पियूष मिश्रा और उनकी उस हारमोनियम से मिलें: 12 नवंबर स्टेज-2 3.30 से 4 बजेसाहित्य आज तक इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स, जनपथ, नई दिल्ली-------------------------------------------------------------------------------- लल्लनटॉप कहानी लिखो और 1 लाख रुपए जीतोफ्री टिकट पाने के लिए यहां क्लिक करके रजिस्टर करें