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भारतीय क्रिकेट की तस्वीर बदलने वाले किस्से

आज रामचंद्र गुहा का जन्मदिन है. इन्हें भारत में होने वाले क्रिकेट के बारे में सब कुछ मालूम है. इतना तक कि पहली बार नाली में गेंद किसने मारी थी.

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केतन बुकरैत
29 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 19 मार्च 2017, 07:02 AM IST)
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इंडिया में क्रिकेट आज का गेम नहीं है. अंग्रेजों ने इस खेल का ईजाद किया और गुलामी के साथ-साथ इसे भी तोहफ़े में हमें सौंपा. जेंटलमेंसगेम. ये शुरू से ही ऐसा जेंटलमेंस गेम नहीं था. इसे दक्षिणी इंग्लैंड के गांवों में खेला जाता था. 19वीं सदी में जाके ये शहरों का हिस्सा बना. ये सब मुझे मालूम कैसे चला? सवाल बड़ा है. सही भी है. कहां से इतिहास में घुस पड़े? वो ऐसे कि एक किताब हाथ लग गयी. 'विदेशी खेल अपने मैदान पर'. लिखी है रामचंद्र गुहा ने. किताब में भारतीय क्रिकेट का सामाजिक इतिहास समझाया गया है. शायद अपने आप में ये पहली किताब है जिसमें पालवंकर बालू, सीके नायडू और सचिन तेंदुलकर एक साथ जगह पाते हैं. साथ ही उतनी ही जगह महात्मा गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना पाते हैं. जब भारतवर्ष की धरती पर पहली बार किसी ने बल्ले से ठक ठक की आवाज़ की होगी और ठीक उसी वक़्त कोई एक गोल गेंद को फेंकने के लिए रनअप ले रहा होगा तबसे लेकर आईपीएल के शुरू होने तक के हर एक किस्से के बारे में लिखा गया है. साथ ही क्रिकेट के आस पास चलने वाली हर चीज पर पड़ने वाले उसके असर के बारे में बताया गया है. रामचंद्र गुहा का आज जन्मदिन है. गुहा एक इतिहासकार और लेखक हैं. सामाजिक, राजनीतिक और क्रिकेट के इतिहास पर इनकी अच्छी पकड़ है. देश के प्रतिष्ठित अखबारों में इनके कॉलम एक आम बात हैं. गांधी बिफ़ोर इंडिया और इंडिया आफ्टर गांधी इनकी सबसे ज़्यादा चर्चित किताबों में से एक हैं.
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'विदेशी खेल अपने मैदान पर' किताब देश के सामाजिक और राजनितिक इतिहास पर खेल कैसे असर डाल सकते हैं, बखूबी समझाती है. भारत को कैसे क्रिकेट से जुदा नहीं किया जा सकता है, ऐसा रामचंद्र गुहा अपने ही अंदाज़ में समझाते हैं. पढ़ते हैं उनके बताये कुछ बेहद रोचक किस्से: पालवंकर बालू. 1875 में पैदा हुए. उत्तरी गोवा के कोंकण तट पर पाया जाने वाला पालवन गांव. मछली और अल्फ़ान्सो आम के लिए मशहूर. साथ ही पालवंकर बालू का जन्म स्थान. ये 'चमार' जाति के थे. देश में अंग्रेजों के आ जाने के बाद से एक बात जो अच्छी हुई वो ये थी कि अछूत समझे जाने वाले 'चमार' और अन्य 'नीची जाति' के लोग जाति के आधार पर पहले से ही दिए गए कामों को छोड़कर और काम करने का जुगाड़ बन गया था. पूना में ही पालवंकर भाइयों यानी बालू और छोटे भाई शिवराम ने अंग्रेजों की ख़राब समझकर छोड़ दी गयी किट से क्रिकेट खेलना सीखा. बालू की एक क्रिकेट क्लब में नौकरी भी मिल गयी. ये क्लब पारसी चलाते थे. इसमें कभी कभी बालू को प्रैक्टिस कर रहे खिलाड़ियों के लिए  बॉल फेंकने का भी मौका मिल जाता था. वहां क्लब में काम करने का उन्हें तीन रूपये प्रति माह मिलता था. 1892 के आस पास बालू पूना के यूरोपीय क्रिकेट क्लब पहुंचे. वहां वेतन बढ़कर 4 रूपए महीना हो गया. पिच की मरम्मत, नेट लगाना और ज़रुरत के हिसाब से टेनिस कोर्ट पे निशान लगाना उनके काम में शामिल हो गया. साथ ही प्रमोशन के तौर पे खिलाड़ियों को बॉलिंग करने को भी मिल जाता था. वहां मिस्टर ट्रॉस हुआ करते थे. उन्होंने बालू को पहचान लिया. उन्हीं से गेंद फिंकवाते. उन्हीं की गेंद पर प्रैक्टिस करते. पूना के अंग्रेज क्रिकेट कैप्टन जे जे ग्रेग अब प्रैक्टिस में बालू की गेंदें खेलते. कभी अगर बालू उन्हें आउट कर लेता तो उसे आठ आने मिलते. इस लिहाज़ से अगर वो एक हफ़्ते में एक बार उन्हें आउट कर लेता तो उसकी तनख्वाह दोगुनी हो जाती थी. ऐसे में प्रैक्टिस करते करते बालू की लाइन और लेंथ दुरुस्त होती चली गयी. अब हुआ ये कि उनकी बातें इधर-उधर होने लगीं. गेंद में उछाल और धारदार स्पिन वाला बॉलर. इस नाम से जाने जाने लगे बालू.
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पूना में ही एक हिंदू क्लब था. बालू जाति से 'चमार' थे. हिंदू क्लब उन्हें शामिल करना चाहता था. लेकिन क्लब के लोग इस बात पर दो गुटों में बंट गए. कुछ उन्हें शामिल करना चाहते थे, कुछ नहीं. वजह - उनकी 'नीची जाति'. इस लड़ाई में कप्तान ग्रेग कूद पड़े. उन्होंने कहा कि हिंदू क्लब अगर बालू को शामिल नहीं करेगा तो अपनी मूर्खता का परिचय देगा. ग्रेग दरअसल बालू को उठाना नहीं, खुद को उसके खिलाफ़ टेस्ट करना चाहते थे. अंत में बालू हिंदू  ग्रुप में शामिल हुए. अब मैच के दौरान होता ये था कि बालू की छुई हुई गेंद को पूना हिंदूज़ के 'ऊंची जाति' के लोग छूते तो थे मगर लंच ब्रेक या नाश्ते के दौरान बालू को पत्तल में खाना या कुल्हड़ में चाय मिलती. बाकी सभी को चीनी-मिट्टी के बर्तनों में परोसा जाता. लेकिन मैदान पर आते ही बालू सबके ऊपर पहुंच जाते थे. उनके विकेट सभी से ज़्यादा थे.
अयोध्या में 1992 में एक मस्जिद को हिन्दू कट्टरपंथियों की एक भीड़ ने ढहा दिया. 1996 विश्व कप की तैयारियां शुरू हुईं. ड्रा ने सुनिश्चित किया कि इंडिया और पाकिस्तान एक ही ग्रुप में नहीं होंगी. और ये भी तय हुआ कि दोनों देश अपने अपने मैच अपने अपने देश में खेलें. दरअसल 1996 का वर्ल्ड कप इंडिया, पाकिस्तान और श्री लंका में होना था. ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज़ ने अपने-अपने श्रीलंका में खेले जाने वाले मैच कैंसिल करवा दिए. कहा श्रीलंका में लिट्टे से डर लगता है. इस डर को हटाने के लिए एक सद्भावना मैच खेला गया. श्रीलंका में. पाकिस्तान और इंडिया की टीमें मिलजुल के खेलने वाली थीं. अजहरुद्दीन और इंतखाब आलम ने अपनी अपनी टीमों की मैनेजरी की. इस मैच के बाद श्रीलंकाई क्रिकेट प्रेमियों ने इंडियन और पाकिस्तानी खिलाडियों की जय-जयकार की. बड़े बड़े बैनर लगाए गए. उन बैनरों पर लिखा था 'हम आपकी एकता के महान जज्बे को सलाम करते हैं. श्रीलंका भारत और पाकिस्तान के स्वर्ण पुत्रों का स्वागत करता है, दक्षिण एशियाई गरिमा को सहेजने के लिए श्रीलंका आने वाले भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ियों का शुक्रिया.'
1998 में तेंदुलकर अपने चरम पे थे. इंडिया में ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध दो टेस्ट सेंचुरी लगा चुके थे. और उसके बाद शारजाह में धांसू पारियां खेलीं. टेस्ट और वन-डे सीरीज़ जीती.
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18 महीने बाद तेंदुलकर ने ऑस्ट्रेलिया के टूर पे कप्तानी की. जैसा सोचा जा रहा था उसके विरुद्ध, टीम इंडिया बुरी तरह हारी. ऐसे में उस वक़्त कुछ चुटकुले प्रसिद्द हुए. प्रश्न: हैट्रिक का भारतीय संस्करण क्या है? उत्तर: तीन गेंदों में तीन रन. प्रश्न: दौरे से पूर्व लगाये जाने वाले टीकों की भारतीय खिलाडियों को ज़रुरत क्यूं नहीं है? उत्तर: क्योंकि वो कभी कुछ नहीं पकड़ते. प्रश्न: एलबीडब्ल्यू का इंडियन वर्जन क्या है? उत्तर: Lost, beaten, wallop. (हार, पिटना और कोड़े खाना) प्रश्न: 100 रन के स्कोर वाले भारतीय को क्या कहेंगे? उत्तर: गेंदबाज प्रश्न: नशेड़ियों और भारतीय बल्लेबाजों में क्या समानता है? उत्तर: दोनों ही ज़्यादातर समय अपने अगले शॉट की तलाश में घूम रहे होते हैं. प्रश्न: टूर करने वाली इंडियन टीम में क्रीज़ पर सबसे ज़्यादा समय कौन बिताता है? उत्तर: वह औरत जो इंडियन टीम के कपड़े प्रेस करती है.
1998 की गर्मियों में भारत ने एक के बाद एक परमाणु परीक्षण किए. फ़ौरन ही पाकिस्तान ने भी ऐसा ही किया. 1999 की शुरुआत में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम इंडिया आने वाली थी. बाल ठाकरे ने इस सीरीज का कड़ा विरोध किया. बाल ठाकरे वो जो खुद कभी शिवाजी पार्क जिमखाना में क्रिकेट देखने जाते थे. अक्सर ब्रेबोर्न स्टेडियम जाते थे. भारत सरकार ने पाकिस्तानी प्लेयर्स को सुरक्षा का भरोसा दिया. लेकिन कहा ये भी जाता है कि उस वक्त जितना पाकिस्तानी प्लेयर्स डरे हुए थे उतना ही इंडियन प्लेयर्स भी. टीम के एक बहुत बड़े हिस्से में पाकिस्तान से हारने का डर समाया था. क्रिकेट बोर्ड ने इस डर को खारिज कर दिया. कुछ उग्र शिवसैनिकों ने 6 जनवरी को दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला स्टेडियम में पिच खोद डाली. साथ ही अगले दिन बयान दिया कि अगर सीरीज़ हुई तो भीड़ में जिंदा सांप छोड़ दिए जायेंगे. क्रिकेट बोर्ड के दफ़्तर पर हमला हुआ. शीशे, ट्रॉफियां तोड़ दी गयीं. पहला टेस्ट मद्रास में खेला गया. सचिन तेंदुलकर ने सेंचुरी मारी. दूसरी इनिंग्स में. लेकिन उनका साथ किसी ने नहीं दिया. अगर साथ मिलता तो उस दिन जीत तय थी. इंडिया मैच 12 रनों से हार गया. पाकिस्तानी टीम बेहद थकी हुई थी. उसे भी मैच जीतने में नाकों चने चबाने पड़े थे. और भीड़! भीड़ के लिए सलाम निकलता है. भीड़ खड़ी होके तालियां पीट रही थी. पाकिस्तानी टीम के लिए. इंडियन भीड़. आज भी जब वो क्लिप दिखती है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. पाकिस्तानी टीम ने उस दिन मद्रास के मैदान में दौड़ते हुए चक्कर लगाया. भीड़ उन्हें सलामी दे रही थी. https://www.youtube.com/watch?v=J3j7h0nxo28
 

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