करोड़ों को इंजीनियर बना, प्रोफेसर एच सी वर्मा रिटायर हो रहे हैं
इस प्रोफेसर को धरती पर भगवान ही माना जाता है.
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H C Verma
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2000 के आस-पास हिंदुस्तान में दो ही भगवान हुआ करते थे. एक सचिन तेंदुलकर थे और दूसरे एक प्रोफेसर थे.
इक्कीसवीं शताब्दी के आने से ठीक पहले और आने के बाद दसवीं पास किये हुए बच्चे एक किताब की तरफ बड़े ही सम्मान और प्यार से देखते थे. ये किताब दो भागों में आती थी. एक नीली और एक हरी. दसवीं की किताबों से अलग बड़ी, चौकोर और बेहद खूबसूरत प्रिटिंग. पटना के भारती भवन से छपी ये किताब हर बच्चे के हाथ में नहीं देखी जाती थी. जो इसे अपने हाथ में ले के चलता, उसे कई सवालों के जवाब देने पड़ते थे. साथियों की नफरत का शिकार होना पड़ता था. बुली किया जाता था वो स्टूडेंट.
इस किताब का नाम था कॉन्सेप्ट्स ऑफ फिजिक्स. लिखने वाले का नाम था एच सी वर्मा. इस किताब को एच सी वर्मा के नाम से ही जाना जाता था. फिजिक्स की ये किताब घरों में गीता प्रेस की किताबों को टक्कर देती थी. हर बच्चा इसे पढ़ना चाहता था, इसके सवाल हल करना चाहता था. पर ये आसान नहीं था. बेहद शानदार तरीके से तरीके से लिखी ये किताब कॉन्सेप्ट्स को सुलझाती थी और दिमाग को उलझाती थी. ऐसा कहा जाता था कि जिसने भी इस किताब को दो बार बना लिया, वो आईआईटी एंट्रेंस के फिजिक्स को तो निकाल ही लेगा. तब आईआईटी का एंट्रेस बहुत कठिन होता था. खास तौर से 2001 के आस-पास तो ये स्थिति हो गई थी कि स्टडी होने लगी कि आखिर एंट्रेंस का स्तर इतना ज्यादा कठिन कैसे हो गया. तमाम मिथक गढ़ दिये गये कि दुनिया का सबसे कठिन एग्जाम है. मेरे खुद के मन में हमेशा ये टीस रही कि मैं आईआईटी नहीं निकाल पाया. वहां पढ़ने से ज्यादा इस एंट्रेंस को निकालने का मन था. खास तौर से 2001 का वो पेपर देखने के बाद.
अब वही एच सी वर्मा रिटायर हो गये हैं. ही हैज हंग हिज बूट्स. अब वो आईआईटी कानपुर में नहीं पढ़ायेंगे.
जब हम लोग तैयारी करते थे, तो मन में एक इच्छा रहती थी कि एडमिशन कानपुर में ही लेंगे और एच सी वर्मा की क्लास अटेंड करेंगे. ये तमन्ना तो पूरी नहीं हुई. लेकिन एच सी वर्मा के बारे में हम तमाम कहानियां लेकर बड़े हुए. अब ये सारी कहानियां झूठी ही लगती हैं. पर मजा इनमें बहुत था. कहा जाता था कि वर्मा फिजिक्स में इतने खोये रहते हैं कि लुंगी में ही क्लास लेने चले जाते हैं. पढ़ाते-पढ़ाते सिगरेट पीने लगते हैं. उन्होंने इरोडोव की किताब को तो मजाक बना दिया था. उन्होंने दुनिया की सारी फिजिक्स की किताबें पढ़ डाली हैं. नासा वाले उनको किडनैप करने आये थे, लेकिन ये वहां भी फिजिक्स का दिमाग लगाकर बच गये. खास तौर से न्यूटन्स लॉज वाले चैप्टर में इनका लटकते बंदर का प्रश्न और पहले चैप्टर में उड़ती मक्खी का प्रश्न ये साबित तो करते ही थे कि ये दिमाग लगा सकते थे. हालांकि बाद में पता चला कि ये सवाल बाकी किताबों में भी थे. ये अलग बात है कि ये भी कहा जा सकता है कि ऐसी बातों पर ज्यादा भरोसा करने से ही एंट्रेंस क्लियर नहीं हुआ. ये तो व्याख्या का मसला है.
तो ये वो दौर था जब इंटरनेट नहीं था. किसी के बारे में जानकारी निकालना मुश्किल था. तब हम लोग एच सी वर्मा से प्यार करते थे. भारत एक अद्भुत देश है और वर्मा के प्रति बच्चों की दीवानगी इसमें चार चांद लगाती थी. किताब लिखते समय उन्होंने भी ये उम्मीद नहीं की होगी कि बच्चे उनको इतना प्यार करेंगे. उनके फेसबुक पेज पर जाइए. और आनंद आता है. वहां पता चलता है कि वर्मा अभी भी उतने ही प्यारे हैं. जब उनको फेसबुक पर देखा तो अपार खुशी हुई थी. ऐसा लगा जैसे बचपन के कोई कहानी कहने वाले दादाजी या चाचाजी फेसबुक पर आ गये हैं. मैं आज भी कॉन्सेप्ट्स ऑफ फिजिक्स पढ़ना चाहता हूं. मौका मिलेगा तो उसके सवाल हल भी करूंगा. ये मेरे लिए बचपन की तरफ लौटना होगा. जब भी मैं खुद को फंसा हुआ पाऊंगा, मैं ये किताब पढ़ूूंगा और महसूस करूंगा कि एक फिजिक्स की किताब में भी खोया जा सकता है.
मुझे नहीं मालूम कि वो आगे क्या करेंगे. पर ये जरूर उम्मीद है कि कुछ अच्छा ही करेंगे. मैं उनका कभी क्लास का स्टूडेंट नहीं रहा, पर एकलव्य की तरह उनको गुरु माना है. आज जब वो रिटायर हो रहे हैं, मुझे दुख हो रहा है.
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जब हम लोग तैयारी करते थे, तो मन में एक इच्छा रहती थी कि एडमिशन कानपुर में ही लेंगे और एच सी वर्मा की क्लास अटेंड करेंगे. ये तमन्ना तो पूरी नहीं हुई. लेकिन एच सी वर्मा के बारे में हम तमाम कहानियां लेकर बड़े हुए. अब ये सारी कहानियां झूठी ही लगती हैं. पर मजा इनमें बहुत था. कहा जाता था कि वर्मा फिजिक्स में इतने खोये रहते हैं कि लुंगी में ही क्लास लेने चले जाते हैं. पढ़ाते-पढ़ाते सिगरेट पीने लगते हैं. उन्होंने इरोडोव की किताब को तो मजाक बना दिया था. उन्होंने दुनिया की सारी फिजिक्स की किताबें पढ़ डाली हैं. नासा वाले उनको किडनैप करने आये थे, लेकिन ये वहां भी फिजिक्स का दिमाग लगाकर बच गये. खास तौर से न्यूटन्स लॉज वाले चैप्टर में इनका लटकते बंदर का प्रश्न और पहले चैप्टर में उड़ती मक्खी का प्रश्न ये साबित तो करते ही थे कि ये दिमाग लगा सकते थे. हालांकि बाद में पता चला कि ये सवाल बाकी किताबों में भी थे. ये अलग बात है कि ये भी कहा जा सकता है कि ऐसी बातों पर ज्यादा भरोसा करने से ही एंट्रेंस क्लियर नहीं हुआ. ये तो व्याख्या का मसला है.
तो ये वो दौर था जब इंटरनेट नहीं था. किसी के बारे में जानकारी निकालना मुश्किल था. तब हम लोग एच सी वर्मा से प्यार करते थे. भारत एक अद्भुत देश है और वर्मा के प्रति बच्चों की दीवानगी इसमें चार चांद लगाती थी. किताब लिखते समय उन्होंने भी ये उम्मीद नहीं की होगी कि बच्चे उनको इतना प्यार करेंगे. उनके फेसबुक पेज पर जाइए. और आनंद आता है. वहां पता चलता है कि वर्मा अभी भी उतने ही प्यारे हैं. जब उनको फेसबुक पर देखा तो अपार खुशी हुई थी. ऐसा लगा जैसे बचपन के कोई कहानी कहने वाले दादाजी या चाचाजी फेसबुक पर आ गये हैं. मैं आज भी कॉन्सेप्ट्स ऑफ फिजिक्स पढ़ना चाहता हूं. मौका मिलेगा तो उसके सवाल हल भी करूंगा. ये मेरे लिए बचपन की तरफ लौटना होगा. जब भी मैं खुद को फंसा हुआ पाऊंगा, मैं ये किताब पढ़ूूंगा और महसूस करूंगा कि एक फिजिक्स की किताब में भी खोया जा सकता है.
मुझे नहीं मालूम कि वो आगे क्या करेंगे. पर ये जरूर उम्मीद है कि कुछ अच्छा ही करेंगे. मैं उनका कभी क्लास का स्टूडेंट नहीं रहा, पर एकलव्य की तरह उनको गुरु माना है. आज जब वो रिटायर हो रहे हैं, मुझे दुख हो रहा है.
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