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फैज़ की नज़्म पर IIT कानपुर में बवाल करनेवाले, उसकी हकीकत जान लेंगे तो शर्म से गड़ जाएंगे

'बुत उठवाने' और 'अल्लाह का नाम रहने' पर विद्वानों ने कमिटी बिठा दी है.

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2 जनवरी 2020 (अपडेटेड: 2 जनवरी 2020, 06:38 PM IST)
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बायीं ओर इकबाल बानो, बीच की तस्वीर ज़िया-उल-हक़ की जो पाकिस्तान के कट्टर तानाशाह रहे, और दायीं ओर फैज़ अहमद फैज़. (तस्वीर: विकिमीडिया)
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CAA यानी सिटीजनशिप एमेंडमेंट एक्ट के विरोध में IIT कानपुर में रैली निकली. नाम था, इन सोलिडैरिटी विद जामिया. इसमें एक कविता पढ़ी गई. नज़्म का नाम - 'हम देखेंगे'. इसके बाद फैकल्टी के सदस्यों ने कथित रूप से आरोप लगाया कि ये नज़्म 'हिन्दू विरोधी' है. जहां वो नज़्म पढ़ी गई, उसका वीडियो ये रहा: IIT कानपुर में टेम्पररी फैकल्टी डॉक्टर वाशी शर्मा ने ये वीडियो रिकॉर्ड किया, और इसके बिनाह पर शिकायत की गई. इसमें ये चीज़ें शामिल थीं:
# स्टूडेंट्स ने मार्च निकालकर उस वक़्त वहां लगी धारा 144 का उल्लंघन किया.
# जो नज़्म गाई गई, उसकी कुछ पंक्तियां एक ख़ास समुदाय के लोगों की भावनाओं को आहत करने वाली थीं.
# इसके गाए जाने के बाद सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट किए गए जो भड़काने वाले थे.
Iit K इंडिया टुडे पर PTI के हवाले से छपी रिपोर्ट.

इस मामले में IIT कानपुर के डिप्टी डायरेक्टर मणीन्द्र अग्रवाल ने मीडिया को बताया, कि मीडिया में चल रही एंटी-हिन्दू वाली बात भ्रमित करने वाली है. सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट्स की शिकायत की गई थी. कमिटी इस बात की जांच करेगी कि इन शिकायतों का सच क्या है. कौन थे फैज़ अहमद फैज़?
फैज़ अहमद फैज़ मशहूर इंकलाबी शायर थे.  विभाजन-पूर्व भारत के पंजाब में पैदा हुए थे. विभाजन के बाद पाकिस्तान में रह गए. उनकी लिखी हुई नज़्म 'मुझसे पहली सी मुहब्बत मिरे महबूब ना मांग' भी लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है.
Faiz फैज़ मार्क्सिस्ट थे. यानी कार्ल मार्क्स के दिए हुए सिद्धांतों को मानने वाले. समाज में बराबरी की बात करने वाले. उन्हें साहित्य के नोबल प्राइज के लिए नॉमिनेट भी किया गया था. (तस्वीर: विकिमीडिया)

किन पंक्तियों पर हुआ विवाद?
रिपोर्ट्स के अनुसार जिन पंक्तियों पर विवाद हुआ वो थीं:
'जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जाएंगे, हम अहल-ए-वफा मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएंगे. सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख़्त गिराए जाएंगे. बस नाम रहेगा अल्लाह का. हम देखेंगे.'
इसका मतलब क्या है? शाब्दिक अर्थ इसका है- जब धरती के काबे यानी पवित्र जगह से सभी बुत उठवा लिए जाएंगे, तब हम सुच्चे लोग, जिन्हें पवित्र स्थानों से निकाल बाहर किया गया है, मसनद पर बिठाए जाएंगे. शासन पलट जाएगा. केवल अल्लाह का नाम ही बाकी रहेगा.
यहां बुत उठवाने और सिर्फ अल्लाह का नाम रहने की बात पर विवाद है. कि ये हिंदू धर्म के विश्वास के खिलाफ जाता है. क्योंकि हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा होती है. और अल्लाह को माना नहीं जाता. अगर आप इस पंक्ति तक रुक जाते हैं, तो यह इस्लामी प्रतीकों वाली नज़्म लग सकती है. लेकिन इन पंक्तियों के बाद ही एक पंक्ति और भी आती है. जो इस पूरी नज़्म का सार है. जिसमें फैज़ लिखते हैं:

उठेगा अनल हक़ का नारा.

अनल-हक़ यानी मैं ही ख़ुदा हूं, मैं ही सत्य हूं. यहां आकर ये नज़्म इस्लाम विरोधी हो जाती है. क्योंकि इस्लाम आपको इजाज़त नहीं देता कि आप खुद को खुदा कह सकें. ये सूफी परंपरा से जुड़ा हुआ नारा है. इसे इस्तेमाल करने की वजह से ही फारस के सूफी संत मंसूर अल हल्लाज को जान से मार डाला गया था.
यानी तात्पर्य ये कि धरती पर मौजूद जो भी तानाशाह बैठे हैं, उन सभी के बुत उठवा दिए जाएंगे. जनता की क्रांति आएगी, और सिर्फ एक सच्ची ताकत बचेगी. जो अल्लाह के नाम पर कुछ भी हो सकती है. खुद आवाम भी. फैज़ नास्तिक थे. प्रतीकों के बहाने आम आदमी की बात करते थे.
ये तो हुआ नज़्म का एक हिस्सा. लेकिन इस नज़्म के टेक्स्ट के पीछे का कॉन्टेक्स्ट समझे बिना मुश्किल है इसकी गहराई मापना.
जब पाकिस्तान बना, तब वादा किया गया था कि ये एक ऐसा मुल्क होगा जहां सबको बराबरी का दर्जा मिलेगा. क्योंकि इस्लाम की नज़र में सभी बराबर हैं, कोई ऊंचा-नीचा नहीं. इसी वादे के साथ बने मुल्क में फैज़ अहमद फैज़ ने रहने का निर्णय लिया. लेकिन आज़ादी के बाद कभी भी उस देश में जम्हूरियत (डेमोक्रेसी) लम्बे समय तक देखने को नहीं मिल पाई उनके जीते-जी. 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को सत्ता से हटाकर पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ जनरल ज़िया-उल-हक़ ने कब्ज़ा जमा लिया.देश में मार्शल लॉ लागू कर दिया. फैज़ भी जेल में डाल दिए गए.
Zia Ul Haq Quora जिया उल हक़ को फैज़ से चिढ़ तो थी ही, उन्हें ये भी लगता था कि चूंकि फैज़ ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के करीबी रहे , इसलिए कहीं उनके लिए ख़तरा न बन जाएं. (तस्वीर: विकिमीडिया)

ज़िया-उल-हक़ वो तानाशाह था जिसने पाकिस्तान को वापस कट्टरता की तरफ धकेल दिया. इन्हीं हालात में फैज़ अहमद फैज़ ने अपना विरोध जताते हुए ये नज़्म लिखी. उस समय ये नज़्म सेंसर भी कर दी गई थी. और इसका एक हिस्सा तो कभी प्रकाशित ही नहीं हो पाया. लब्बोलुआब ये है कि ये नज़्म किसी धार्मिक एंगल के साथ लिखी ही नहीं गई थी. ये आम जनता की नज़्म थी. सत्ता में बैठी क्रूरता के खिलाफ.
इस मुद्दे पर आज तक के साथ जावेद अख्तर ने भी बातचीत की. जावेद अख्तर ने कहा कि अगर फैज की कविता हिंदू विरोधी होती तो ज़िया-उल-हक इसे नेशनल एंथम बनवा देता. जावेद अख्तर ने कहा कि फैज़ कातिल था तो मैं सुन लूंगा, लेकिन उसकी कविता को एंटी हिंदू कहना, इस पर क्या कहूं. फैज़ ने पाकिस्तान के हुक्मरानों और मुल्लाओं से तो पत्थर खाएं हैं, जेल गए हैं. फिर कैसे उनकी कविता एंटी हिंदू हो सकती है.
पूरी बातचीत यहां देख लीजिए:

लौट कर आते हैं नज़्म पर. इसे गाकर अमर किया था इकबाल बानो ने. पाकिस्तानी गायिका थीं. इस नज़्म के ऐतिहासिक रिसाइटल के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है.
13 फरवरी, 1986
मौक़ा: फैज़ अहमद फैज़ का जन्मदिन.
फैज़ तो 84 में गुज़र गए. उनकी याद में ये प्रोग्राम रखा गया था. नाम था फैज़ मेला. तानाशाह ज़िया उल हक़ की नाक के ठीक नीचे लाहौर के अल-हमरा आर्ट काउंसिल में इतिहास रचा जा रहा था.
Iqbal Yt कई जगहों पर ये पढ़ने को मिलता है कि ये नज़्म स्टेडियम में 50 हजार लोगों के सामने गाई गई थी. लेकिन फैज़ के पोते अली मदीह हाशमी बताते हैं कि ये 1986 का वाकया है. इसी की रिकॉर्डिंग आज हर जगह सुनने को मिलती है, इकबाल बानो की आवाज़ में (तस्वीर: यूट्यूब स्क्रीनग्रैब)

स्टेज पर इकबाल बानो काली साड़ी में आईं. उसके आते ही ऑडियंस में सन्नाटा छा गया. जनरल ज़िया-उल-हक ने साड़ी बैन कर रखी थी पाकिस्तान में. क्यों? क्योंकि उनके मुताबिक़ हिन्दू औरतें साड़ी पहनती थीं. मुस्लिम औरतें साड़ी कैसे पहनेंगी. इकबाल बानो ने गाना शुरू किया, और पूरा हॉल गूंज गया. वो रिकॉर्डिंग आप यहां सुन सकते हैं:

इस नज़्म को गाती इकबाल बानो की परफॉरमेंस उस रात चुपके-चुपके रिकॉर्ड की गई, झटपट एडिट की गई. इंटरनेट का ज़माना नहीं था. कुछ हफ़्तों में दिल्ली पहुंची. एक वो दिन है, और एक आज का दिन. फैज़ की ये नज़्म, और इसकी पंक्ति हम देखेंगे, कई विरोधों की जान बनी. पूरी नज़्म आप यहां पढ़ सकते हैं:

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिस का वादा है

जो लौह-ए-अज़ल में लिखा है

(लौह-ए-अज़ल: वो दस्तावेज़ जिसमें क़यामत तक का हिसाब है)

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिरां

रूई की तरह उड़ जाएंगे

हम महकूमों के पांव-तले

जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

(ज़ुल्म-ओ-सितम: दमन, अत्याचार, कोह-ए-गिरां: बड़े पर्वत, महकूमों: प्रजा)

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएंगे

(अहल-ए-हकम: राजा/शासक, अर्ज़-ए-ख़ुदा: धरती)

हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएंगे

सब ताज उछाले जाएंगे

सब तख़्त गिराए जाएंगे

(अहल-ए-सफ़ा: पवित्र लोग, मरदूद-ए-हरम: वे लोग जिन्हें पवित्र स्थानों से बाहर कर दिया गया है)

बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो गायब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उठेगा अनल-हक़ का नारा

 (हाज़िर: मौजूद, मंज़र: दृश्य, नाज़िर: देखने वाला, अनल-हक़: मैं ही सत्य/खुदा हूं)

जो मैं भी हूं और तुम भी हो

और राज करेगी ख़ल्क़-ऐ-ख़ुदा

जो मैं भी हूं और तुम भी हो

( ख़ल्क़ –ए-ख़ुदा: खुदा की बनाई हुई सभी चीज़ें, उनकी रचना)




वीडियो: सद्गुरु वाले ईशा फाउंडेशन ने भी चलाया था CAA पोल, लोगों ने स्क्रीन शॉट ले लिए, अब छीछालेदर

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