मुस्लिम कट्टरपंथी बनने के 5 सरल तरीके!
कहीं भी आतंकी हमला होता है. वहां इल्जाम इस्लाम पर लगता है, जबकि हमलों का गुनाहगार कोई और होता है. कोई मजहब नहीं.
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हर साल इंडिया से एक लाख मुसलमान हज करने मक्का जाते हैं. और काबा का तवाफ़ करते हैं.
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ये लेख मोहम्मद हुसैन रहमानी ने लिखा है. मूल लेख अंग्रेजी में है.जिसका आपके लिए हिंदी में अनुवाद किया गया है.
आतंकवाद. आतंकवाद. इस्लामी आतंकवाद. न जाने कितने संगठन बन गए जो इस्लाम की बदनामी की वजह हैं. मुसलमान भी जाने-अनजाने में उनमें अपना रहबर तलाशने लगे. इस्लाम अमन का दीन है फिर भी उसके फॉलोवर्स की पहचान दुनियाभर में हिंसा फैलाने वालों की बनती जा रही है. ओर्लान्डो में गोलीबारी से लेकर ढाका में आतंकी हमला, और सऊदी अरब में मस्जिदे नबवी के पास सुसाइड अटैक इस्लाम को नुकसान पहुंचाता है. ये हमले रमजान के पाक महीने में हुए. ये ही वजह है कोई भी अटैक हो वो इस्लाम से जुड़ जाता है. अगर मुसलमान इन पांच सिद्धांतों को ठीक से फॉलो करें, तो न तो वो कट्टरपंथी बनेगा और न ही उसे इस्लामिक होने के लिए जाकिर नाईक जैसों की जरूरत पड़ेगी. ISIS का फन भी कुचल जाएगा और दुनिया भी खूबसूरत बनेगी. सभी मुसलमान भी मानते हैं कि इस्लाम के ये पांच पिलर हैं. तो फिर किसी संगठन या आतंकी लीडर की आपको क्या जरूरत है. फॉलो कीजिए खुद भी खुश रहिए और दूसरों को भी मस्त रहने दो. 1. शहादा (कलमा) : ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह यानि अल्लाह एक है और मुहम्मद उनके पैगम्बर हैं. जब अल्लाह एक है और सभी मुसलमानों का उसमें यकीन है तो फिर दिक्कत क्या है मानिए अल्लाह और उसके पैगम्बर को. पक्का कह रहा हूं दुनिया को आपके इस यकीन से कोई दिक्कत नहीं होगी. 2.सलात (नमाज) : हर मुसलमान पर दिन में पांच बार पढ़नी वाजिब है. फज्र (तड़के), जुहर (दोपहर), अस्र (दोपहर के बाद), मगरिब (सूरज छिपने के बाद) और ईशा (रात). ये वो वक्त हैं जब नमाज पढ़ी जाती है. इसके अलावा भी नमाजें हैं जो अलग-अलग दिन और अलग-अलग मौकों पर पढ़ी जाती हैं. 3. जकात (चैरिटी) : जो मुसलमान अपनी कमाई की बचत कर सकते हैं. ये उनके लिए है. आमदनी से पूरे साल में जो बचत है उसका 2.5 पर्सेंट जरूरतमंदों को दिया जाना चाहिए. आज कितने मुसलमान हैं जो इसको फॉलो कर रहे हैं. जरा सी बात पर तो भड़क जाते हैं, लेकिन अपने अल्लाह की इस बात को क्यों पूरा नहीं कर रहे, जिससे जरूरतमंदों की परेशानी दूर हो सके. 4. रोजा : रमजान के महीने में रोजे रखना सभी मुसलमान पर फर्ज हैं. सिर्फ उस वक्त छूट मिली है जब या तो सफर में हो या फिर बीमार हो. रमजान इबादत का महीना है. ये मुसलमानों के लिए एक मौका है, जब वो अपने गुनाहों को माफ़ करा सकता है, लेकिन दुनिया के कामों में मसरूफ रहते हैं. बाद में उन्हें दीन याद आता है. 5. हज (मक्का की तीर्थयात्रा) : जो मुसलमान इतना पैसा रखते हैं कि वो सऊदी अरब में मक्का जा सकते हैं उनके लिए जिंदगी में एक बार हज पर जाना जरूरी है. ये यात्रा जिलहिज के महीने में होती है. इंडिया में इस महीने को बकरीद के महीने के नाम से जानते हैं. अगर मुसलमान इन पांच बुनियादी बातों को पूरा करें तो पक्का वो उन खतरनाक लोगों के जाल में फंसने से बच जाएंगे. जो आतंक मचाने पर तुले हैं. अल्लाह से लौ लगाने के लिए उन्हें किसी फर्जी लीडर की जरूरत नहीं पड़ेगी.
