हर हिन्दुस्तानी फैमिली का एक रूल होता है. बच्चा जब कुछ समझने-बूझने लगता है, तोउसे चीज़ें सिखाई जाती हैं. हालांकि सिखाई तो हर जगह जाती हैं लेकिन यहां एकपर्टिकुलर चीज की बात हो रही है. भगवान में विश्वास. जैसे हम सभी पैदा होते हैं तोवेजिटेरियन होते हैं. फिर हम अपनी परवरिश, आस-पास के माहौल के हिसाब से वेजिटेरियनया नॉन-वेजिटेरियन बन जाते हैं. कहने का मतलब ये है कि इन सभी बातों में हमारेपरिवार का माहौल सबसे ज़्यादा इन्फ्लुएंस करता है. ऐसा ही कुछ हाल भगवान में विश्वासकरने का है. बच्चों को भगवान के बारे में बताया जाता है. हमें भी बताया गया था.बच्चों को भगवान की पूजा करने की सीख दी जाती है. एक ऐसी शक्ति के बारे में बतायाजाता है, जिसकी इजाज़त के बिना दुनिया में कुछ भी नहीं पैदा हो सकता. सार ये कि हमसभी आस्तिक पैदा होते हैं. और फिर हम स्कूल जाना शुरू करते हैं. बिना अपने मां-बापकी अंगुली पकड़े सड़क पार करने लगते हैं. स्कूल में साइंस पढ़ते हैं. फ़िल्में देखतेहैं. किताबें पढ़ते हैं. बाहर की दुनिया देखते हैं. और एक बहुत ज़रूरी काम करते हैं.सवाल करते हैं. खुद से. और इसी क्रम में हम नास्तिक हो जाते हैं. नास्तिक बनने केलिए सवाल करना ज़रूरी होता है. आप नास्तिक तभी बनते हैं, जब आप खुद से सवाल करनाशुरू करते हैं. जब आप आस्था में लॉजिक ढूंढना शुरू करते हैं. उस लॉजिक को नदारदपाते हैं तो नास्तिक बन जाते हैं. हर नास्तिक इसी तरीके से नास्तिक बनता है.नास्तिक बनने के लिए आपको किसी से भी प्रभावित होने की ज़रूरत नहीं होती है. वो धर्ममें होता है. किसी का नास्तिक होना उसकी अपनी समझ और अपने आप से सवाल पूछने कीक्षमता को ही दिखाता है. मैं एक नास्तिक हूं. मैं बचपन में स्कूल जाने से पहलेभगवान के पैर छूता था. अच्छे नम्बर आते थे तो थैंक यू भगवान कहता था. लेकिन येज़्यादा दिनों तक नहीं चला. मैंने भगवान से ब्रेकअप कर लिया. और ये समझ लिया कि मेरेसाथ होने वाली हर अच्छी और बुरी चीज़ मेरे किये कामों का ही फल है. और ये फलअध्यात्म वाला फल नहीं है. ये साइंस वाला फल है. यानी रिऐक्शन. मेरे ऐक्शन्स सेमुझे एक रिऐक्शन मिलता है. मेरे साथ होने वाली अच्छी या बुरी चीज़ें मेरे कियेऐक्शन्स का रिऐक्शन हैं. बस. कोई भगवान नहीं है. और हां, ये मेरा मानना है. आपआस्तिक हों तो मुझे आपसे कोई द्वेष नहीं. आप अपना कार्यक्रम चालू रखिये. बस मुझेज्ञान मत दीजियेगा. मेरी मां ने भी मुझे ज्ञान नहीं दिया. और ये सबसे अच्छी बात है.दूसरी क्लास में था तो मां ने हर सुबह सूर्य को जल चढ़ाने की बात कही. मैंने मान ली.अच्छे नंबर चाहिए थे. रोज़ सुबह नहाकर सूरज को देखते हुए बरामदे में एक लोटा जल गिरादेता था. लेकिन फिर एक दिन जब मां से रोज़ एक लोटा पानी बर्बाद होने की बात कही तोउन्होंने कह दिया, "तो मत करो." बस. मेरी मां ने, एक नम्बर की धार्मिक मां होने केबावजूद, मुझसे एक बार भी वैसा दोबारा करने को नहीं कहा. और यही आगे भी होता रहा. जबमैंने रूद्राक्ष की माला पहननी बंद कर दी. तब भी. और जब मैंने नॉन-वेज खाना शुरू करदिया, तब भी. मेरी मां आज भी बिना नागा पूजा करती है. मुझसे अब नहीं कहती. मैं उनसेकुछ नहीं कहता.--------------------------------------------------------------------------------मुझे उनके धार्मिक होने से कोई परहेज़ नहीं है. और उसकी वजह है उनका किसी भी इंसानको किसी भी तरह की चोट न पहुंचाने का एहतियात बरतने की आदत.--------------------------------------------------------------------------------मुझे अगरबत्ती, धूपबत्ती यहां तक कि मॉर्टीन के धुंए में दस मिनट भी रहने से ज़ुकामहो जाता है. मैं अगर पूजा वाले कमरे में मौजूद होता हूं तो वो वहां अगरबत्ती याधूपबत्ती नहीं जलती. क्यूंकि उनका भगवान अगरबत्ती में नहीं रहता. आपका भगवान कहांरहता है, मुझे नहीं मालूम. किसी का किताबों में रहता है, किसी का कर्मकांडों में,किसी का नारियल में, किसी का दाढ़ी में, किसी का बुर्के में. मगर नास्तिक होना सिर्फ़एक बात मांगता है. आप भगवान को नहीं मानते हैं. ये सबसे सरल परिभाषा है नास्तिकताकी. इसमें भी अब कई प्रकार होने लगे हैं. आप भगवान में किन प्रकारों से विश्वासनहीं करते हैं, सब उस पर डिपेंड करता है. हाल ही में एक सम्मेलन प्रस्तावित हुआ.नास्तिकों का सम्मेलन. मथुरा में. जहां कृष्ण पैदा हुए. पर्सनली, मुझे इससे काफ़ीतकलीफ़ हुई. मुझे नास्तिकता भी एक धर्म सा बनता दिखाई दिया. सबसे पहली बात, जबनास्तिकों का सम्मेलन करना था तो एक ऐसी जगह पर क्यूं किया, जहां आस्तिकों की इतनीश्रद्धा है. ये वही बात हो गयी कि मैं ज़बरदस्ती अपने ही घर में नवरात्रि के दिनोंमें हांडी चिकन खाऊं, तब जबकि मेरे घर में किसी ने व्रत रक्खा हुआ है. इसे उकसानानहीं तो क्या कहेंगे? और हां, मुझे देश के संविधान ने नवरात्रि में चिकन खाने काउतना ही अधिकार दिया हुआ है, जितना मेरे घरवालों को व्रत रखने का. ये कौन सीनास्तिकता है जिसने आस्तिकों को उंगली करने का अधिकार दे दिया? वहीं आस्तिकों काविरोध कुछ हद तक (सिर्फ़ कुछ ही हद तक) जायज़ दिखा, मगर उनका अग्रेशन और मार-पिटाईउतना ही बेवकूफ़ाना, जितना एक आतंकी का किसी बाजार में अपनी छाती से कुछ किलोआरडीएक्स चिपकाकर फट जाना. हम सभी ने धर्म के नाम पर आतंकवाद को होते हुए देखा है.आधी से ज़्यादा दुनिया इससे जूझ रही है. पूरी दुनिया इस वक़्त सबसे ज़्यादा प्रभावितइसी एक चीज़ से है. मगर मैं किसी भी ऐसे वैज्ञानिक के बारे में नहीं जानता जिसनेकिसी बिल्डिंग में इसलिए प्लेन घुसा दिया क्यूंकि लोग ग्रेविटेशनल वेव्स केकॉन्सेप्ट पर विश्वास नहीं कर रहे थे. हम नास्तिकों का ये है कि हमें बचाव नहींकरना होता. हम प्रूव करते हैं. मगर इस बार नास्तिकों को उस सम्मेलन का बचाव करनापड़ा. न जाने क्यूं. कहने लगे कि ऐसा सम्मेलन नास्तिकता को कोई धर्म नहीं बना देगा.मुझे उल्टा लगता है. मुझे यकीन है कि धर्म की शुरुआत भी ऐसे ही की गयी होगी. शुरुआतबस एक सम्मेलन से होती है. एक ग्रुप से. एकजुट हुई भीड़ से. लोग मिलते हैं. एक दूसरेसे प्रभावित होते हैं. और यही प्रभाव, यही जुटी भीड़, किसी पंथ, किसी धर्म की पहलीसीढ़ी होती है. लोगों को जोड़ने की आड़ में कब एक विचारधारा फैल जाती है, मालूम नहींचलता. नियम बन जाते हैं. कायदे-कानून बन जाते हैं. फिर एक इंसान को इसलिए रख लियाजाता है जिससे वो ये देखता रहे कि इन नियमों की अनदेखी न हो रही हो. और फिर ऐसे हीएक अंदरूनी सरकार बनती है. कतई नॉन-डेमोक्रेटिक सरकार. धर्म में इससे अलग क्या होताहै? वेटिकन सिटी में इससे अलग क्या हो रहा है? तमाम मंदिरों के ट्रस्ट्स में इससेअलग क्या हो रहा है? आप कहां अलग हैं, सरकार? सम्मेलनों का हमेशा एक नेता होता है.जिसने सारी व्यवस्था की होती है. लोग मिलते हैं, नेता की अगुवाई में. उसकी चिरौरीकी जाती है. सम्मेलन हुआ हो या न हुआ हो, उसकी बाइट जाती है. वो सब कुछ बन जाता है.धर्मगुरु. नास्तिकता का धर्मगुरु. वही जो कभी नेता बना था. एक बात बताइए, किस बातका नेता? आप नास्तिक हैं. आप भगवान को नहीं मानते. वो नेता भी नास्तिक है. वो भगवानको नहीं मानता. किस हिसाब से वो आपसे ऊपर हो गया? मतलब ये शायद पहली दफ़ा हो रहाहोगा, जब किसी चीज में विश्वास न रखने वाले दो लोगों में एक बड़ा और एक छोटा हो रहाहो. अविश्वास तो एक समान ही होता है न? ऐसा नहीं होता कि आपकी अमुक चीज में विश्वासन रखने की फ्रीक्वेंसी नेता जी के विश्वास न रखने की फ्रीक्वेंसी से कम है.नास्तिकता की पहली शर्त सवाल करना होती है. और फिर लगातार सवाल करते ही रहना.दूसरी, किसी से भी प्रभावित न होना. नास्तिक जितना ज़्यादा ऑर्गनाइज़्ड होकर इकट्ठेहोंगे, उनके लिए घातक होगा. वो एक साथ, एक पंथ बनाकर खड़े हो जायेंगे. किसी भी पंथकी क्या दशा होती है, हमें मालूम है. बौद्ध धर्म एक बड़ा उदाहरण है. नास्तिकों कीसबसे बड़ी ताकत अलग रहने में है. और हां, नास्तिकों का नेता अगर कोई है तो वो या तोअव्वल दर्जे का खलिहर है, या कोई इन्ट्रेस्ट छुपा हुआ है. वरना एक नास्तिक के पासऔर भी गम हैं ज़माने में सम्मेलन के सिवा.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ो: ईश्वर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता, जब वह कोई पाप कर रहा हो?दुनिया में कहां से आया धर्म? 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