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मुझे समलैंगिक पुरुष बता मेरे नाम से न्यूड तस्वीरें वायरल की गईं

मेरी जिंदगी का ये वो किस्सा है, जिसके बारे में घर पर भी नहीं बताया था.

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3 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 4 जुलाई 2017, 08:00 AM IST)
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फर्जी आईडी पर ये ही तस्वीर प्रोफाइल पिक्चर थी.
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ये मेरी जिंदगी का वो पन्ना है, जिसके बारे में आज तक मेरे घर वालों को भी नहीं पता. शाम के चार बजे थे. अख़बार के दफ्तर में था. एडिटोरिल मीटिंग के लिए दिनभर की ख़बरों की लिस्ट बना रहा था. जब पहला कॉल आया था. 'हैलो! रॉकी अज्जू बोल रहे हो. कितना चार्ज है तुम्हारा? स्पेस है न तुम्हारे पास, दाम बताओ अपना, अकेला ही हूं'
ये वो कॉल थी जिसने परेशान कर दिया था, क्योंकि जो कॉल आई थी, वो मुझे गे (समलैंगिक) समझकर बात कर रहा था. ये पहली कॉल थी. इसके बाद कॉल का सिलसिला शुरू हो गया था. एक के बाद एक फोन कॉल आनी लगीं. वाट्सएप पर मैसेज आए. प्राइवेट फोटो की डिमांड आने लगीं. कोई बाथरूम के दौरान की फोटो मांग रहा था. तो कोई सेक्शुअल अंगों की.
मेरे लिए ये बातें खलबली मचा देने वाली थीं. कि ऐसा क्या हो गया? क्यों लोग मेरी बोली लगा रहे हैं. फिर उन्हीं कॉल्स से मुझे पता चला कि गे कम्युनिटी में मेरी बोली लगाई जा रही है. किसी ने फेसबुक पर मेरा फोटो लगाकर सेक्स का बाज़ार लगा दिया था. पेज को नाम दिया गया था 'रॉकी अज्जू'. जब रॉकी अज्जू को सर्च किया तो मैं दंग रह गया था. मेरी फेसबुक आईडी से फोटो उठाकर उस पेज पर डाले जा रहे थे. मेरा फोन नंबर उसपर डाल दिया गया था. मैं कहां का रहने वाला हूं. किस ऑफिस में काम कर रहा हूं. सबकुछ अपडेट था. स्टेटस अपडेट किए जा रहे थे. जिनमें सौदेबाज़ी की जा रही थी. और फोन या वाट्सएप पर कॉन्टेक्ट करने को बोला जा रहा था. तभी मुझे ये कॉल आ रहे थे. मुझे ध्यान है कि उस पेज के कई हज़ार फ़ॉलोवर्स थे. जिसे मेरठ से चलाया जा रहा था. क्योंकि जितने लोग उससे जुड़े थे, उनमें से ज्यादातर लोग मेरठ के ही थे.
जानकारी जुटाने पर पता चला कि मेरठ में सेक्स का एक बड़ा बाज़ार है. और ये धंधा 'गे' खूब चला रहे हैं. जिसमें कॉलेज में पढ़ने वाले लड़के भी शामिल हैं. ये जानकारी मेरठ के उन लोगों से मिली, जो फेसबुक पर मेरी अपनी आईडी से जुड़े थे.
रॉकी अज्जू के स्टेटस पढ़के मैं हैरान था कि कैसे मेरे फोटो का इस्तेमाल सेक्स की मंडी में हो रहा है. लिखा जा रहा था,
'दोस्तों आज मैं अकेला हूं, कोई मिलेगा क्या?' 'कोई मेरे साथ आज @#$ करेगा.' 'हैं कोई दो लौंडे, 25 से 30 साल के बीच के, जो रात को मेरे कमरे पर आ सकें.'
ऐसे स्टेटस अपडेट होते थे.
ऐसे स्टेटस अपडेट होते थे.

जैसे-जैसे स्टेटस पढ़ता जा रहा था. जिस्म में सनसनाहट दौड़ने लगी थी. मेरे लिए उस वक़्त ये एकदम डर जाने वाली बात थी. मैं इस खौफ में था, लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे? फोन आने से मानिसक तौर पर प्रताड़ित हो रहा था.कि अगर ये कॉल किसी और ने सुन लिए तो मेरी बदनामी हो जाएगी. ये सब ज़हन में कौंध रहा था. मेरे फोटो के अलावा पता नहीं किसकी चेस्ट और लेग्स की फोटो क्रॉप करके अपलोड की जा रही थीं. ताकि लोग आकर्षित हो सकें.
ऐसे स्टेटस पढ़के लोगों के सिर्फ कॉल ही आए, ये मैंने अपने लिए गनीमत समझी. कोई घर नहीं पहुंचा, ये मेरे लिए शुक्र करने वाली बात थी. जिस तरह से मुझे गे कम्युनिटी में फेम दिला दिया गया था. वो मेरे लिए परेशान करने वाला था. ये साइबर क्राइम था. जो किसी ने मुझे बदनाम करने के लिए ये सब किया था. सब पर नज़र दौड़ाई कौन हो सकता है ये. कौन है जो मुझे अपना दुश्मन मान बैठा है. लेकिन मुझे कोई ऐसा नज़र नहीं आया. क्योंकि न मैं अमीर घर से था और न कोई इतनी बड़ी कामयाबी हासिल की थी, जिससे कोई मुझसे जलने लगे.
फोन स्विच ऑफ करके रखना पड़ रहा था. इतनी कॉल आ रही थीं. बताना पड़ रहा था कि मैं पत्रकार हूं, अगर दोबारा कॉल किया तो बुरे फंसोगे. ये सुनकर एक बार कॉल करने वाला दोबारा नहीं करता था. सोच रहा था, जो पत्रकार नहीं होता तो कैसे इन सबसे पीछा छुड़ाता. लेकिन हर बार नई कॉल आ जाती. पुलिस की मदद ली. क्राइम बीट देखने वाले ऑफिस के साथी को इस बारे में बताया. नोएडा में एसपी से शिकायत की. पत्रकार होने के नाते जल्दी सुनवाई हो गई. शिकायत का असर ये हुआ कि वो पेज बंद हो गया. ये तो पता नहीं चला कि कौन था ये सब करने वाला. लेकिन उसकी फैन फ़ॉलोइंग देखकर लग रहा था, वो पेज पहले से बना था.
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भले ही ये साइबर क्राइम था. लेकिन मेरे मन में ये ही चल रहा था. अगर ये सब मेरे गांव के किसी ने देख लिया तो मुश्किल हो जाएगी. मेरे से ज्यादा मेरी फैमिली के लिए. क्योंकि मुझे तो सच मालूम था, क्या है. लेकिन उन लोगों का क्या जो उस पेज को ही सच मानेंगे, क्योंकि गांव या रिश्तेदारों में ऐसे लोगों की कमी नहीं होती, जो मौके की तलाश में रहते हैं. मन में चल रहा था गांव वालों को पता चला तो कहेंगे कि कुछ तो होगा. ऐसे कोई उसका पेज क्यों बनाने लगा है. बाप मजदूरी करता है. ये खुद दिल्ली में रह रहा है. सैलरी क्या होगी इसकी, क्या पता खर्च इन्हीं गंदे कामों से निकालता हो. तब लग रहा था कि गरीबी भी कितने जुर्म की गवाही बना दी जाती है.
गे कम्युनिटी में खुद को देखना इसलिए भी परेशान करने वाला था, क्योंकि जिस माहौल में मेरी परवरिश हुई. वहां समलैंगिक के लिए कोई जगह ही नहीं है. 'इज्ज़त' सिर्फ मर्द और औरत के बीच बंटी है. समलैंगिक होना तो छोड़िए, अगर किसी लड़के की आवाज़ पतली है या फिर उसकी चाल या कुछ हाव भाव लड़कियों के जैसे हैं तो उसे 'मीहला', 'ज़नाना' या फिर 'ढीला' ही कहा जाता है. उनके लिए मर्द होना मतलब, कड़क आवाज़, अक्खड़पन, औरतों से सलाह न करने वाला.
समलैंगिक होना किसी की भी चॉइस हो सकती है. स्ट्रेट होना भी किसी की चॉइस हो सकती है. मसला यहां ये नहीं कि मुझे समलैंगिक बनाकर दिखाया गया. मसला ये था कि मेरा यौन शोषण हुआ. मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया.
पुरुषों का यौन शोषण केवल वर्चुअल ही नहीं, असल जीवन में सड़कों पर भी होता है. ये पिछले साल की ही बात है जब मेरे एक सहकर्मी को ऑफिस के पीछे वाले रास्ते पर फॉलो किया गया. मुड़ने पर मुखमैथुन के लिए कहा गया.
ये सब आज इसलिए सुना रहा हूं, क्योंकि फेसबुक ने ये सुविधा दी है कि अब कोई आपकी फोटो फेसबुक से नहीं चुरा पाएगा. फोटो गार्ड एक्टिव करने के बाद दूसरा कोई भी यूजर आपकी प्रोफाइल पिक्चर को न तो डाउनलोड कर पाएगा, न शेयर और न मैसेज में फॉरवर्ड. ये सुविधा सबसे पहले भारत में ही दी गई है. ये खबर सुनकर मुझे बेहद ख़ुशी मिली थी. ये टूल पहले आया होता तो मुझे उन कॉल्स का तनाव न झेलना पड़ता. 
अब खबर ये भी आई कि इस टूल का इस्तेमाल लड़कियों से ज्यादा लड़के कर रहे हैं. और अपनी तस्वीरों को लॉक कर रहे हैं. न्यूज़रूम में डिस्कशन हुआ कि लड़कों को कौन सा डर है, जो ये टूल इस्तेमाल कर रहे हैं? तब मुझे ये डर न्यूज़रूम में बताना पड़ा. मेरी जिंदगी का ये किस्सा सबको हैरान करने वाला था. तस्वीरों के गलत इस्तेमाल की ये सच्चाई सुनने के बाद सहकर्मियों का रिएक्शन था कि अपने देश में ये सब कितना खतरनाक है. किसी से बदला लेने के लिए उसे बदनाम कर दो. शायद तभी सबसे पहले ये टूल भारत में लॉन्च किया गया.
मगर इसी बहाने जरा हम अपने अंदर झांक लें, कि सबसे पहले इस टूल की जरूरत इंडिया में ही क्यों पड़ी? ये कैसा समाज बनाया है हमने?


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