IPO में पैसा लगाने वाले ये पढ़कर हैप्पी न्यू ईयर कहे बिना नहीं रह पाएंगे!
IPO को लेकर SEBI के नए नियमों में आम निवेशकों के लिए बहुत कुछ है.
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शेयर मार्केट रेग्युलेटर सेबी और इनवेस्टर की सांकेतिक तस्वीर (साभार: आजतक)
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"One man's loss is another man's gain"
शेयर मार्केट इसी कहावत पर चलता है. यहां एक का नुकसान ही दूसरे का फायदा होता है. ठीक एक साल पहले जब बर्गर किंग का IPO (Initial Public Offering) आया तो उसके एक शेयर की 60 रुपये कीमत को बाजार ने हाथोंहाथ लिया. नतीजतन कंपनी शेयर मार्केट में करीब दोगुने भाव 115 रुपये पर लिस्ट हुई. जो लोग IPO में पैसा लगाने से चूक गए थे, उन्होंने हाथ मलने के बजाय हाथ खोलने शुरू किए. देखते ही देखते एक शेयर की कीमत जा पहुंची 200 रुपये के पार. लेकिन जैसे ही 30 दिन बीते, यानी इसमें पहले से पूंजी लगाए बैठे बड़े निवेशकों के निकलने की न्यूनतम समय सीमा खत्म हुई, शेयरों की जमकर बिकवाली शुरू हो गई. अगले कुछ दिनों में ही बर्गर किंग का स्टॉक 40 फीसदी तक टूट चुका था. आज भी वह इसी भाव पर अटका है.ऐसा ही कुछ हाल ऑनलाइन फूड एग्रीगेटर जोमैटो के IPO के साथ भी हुआ. एक महीने का लॉक-इन पीरियड खत्म और बड़े निवेशकों का निकलना शुरू. इसी तरह अब तक के सबसे बड़े IPO पेटीएम ने तो दोहरा झटका दिया. एक तो 2080-2150 रुपये के प्राइस बैंड को लिस्टिंग के दिन ही 27 फीसदी झटका लगा. फिर गिरावट का जो दौर चला वह जल्द ही इसे 1271 रुपये तक ले आया.
इन तीनों ही मामलों में ज्यादातर आम निवेशकों ने खुद को ठगा हुआ महसूस किया. अब मार्केट रेग्युलेटर सेबी यानी Securities and Exchange Board of India (SEBI) को भी लगा कि खिलाड़ियों ने नए-नए दांव सीख लिए हैं, तो उसने खेल के नियम बदलने का फैसला ले लिया. यह इसलिए भी जरूरी हो गया था कि बीते एक साल में ही कुल 63 कंपनियों ने पब्लिक ऑफरिंग से करीब 1.18 लाख करोड़ रुपये बना लिए. यह आंकड़ा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि इसके पिछले साल आए कुल 15 IPO से 26 हजार 613 करोड़ रुपये ही जुटाए गए थे. इस साल के IPO बूम में जहां कई कंपनियों ने पहले ही दिन खूब मुनाफा दिया, वहीं कुछ ढेर भी हो गईं. जो IPO हिट हुए वहां छोटे निवेशकों को शेयर ही नहीं आवंटित हुए थे और जो धड़ाम हुए वहां बड़ी चपत इन खुदरा निवेशकों को ही लगी.
मंगलवार 28 दिसंबर को SEBI ने IPO के नए नियमों का ऐलान किया. इसके मुताबिक कोई भी एंकर इन्वेस्टर यानी बड़ा निवेशक 90 दिन के बाद ही अपने सभी शेयर बेच पाएगा. शेयरों के आवंटन में छोटे निवेशकों को न्याय दिलाने की भी पहल की गई है. स्टॉक के प्राइस बैंड यानी न्यूनतम और अधिकतम कीमतों की भी सीमा तय कर दी गई है. इसके साथ ही कई ऐसे इंतजाम किए गए हैं, जिससे मार्केट में उतरने वाली कंपनियां पब्लिक के पैसे का दुरुपयोग न कर सकें. यहां हम आसान भाषा में बता रहे हैं कि 3 महीने बाद यानी 1 अप्रैल 2022 से लागू होने वाले ये नए नियम आम निवेशकों के लिहाज से कितने फायदेमंद हैं.

आईपीओ की सांकेतिक तस्वीर
90 दिन का लॉक-इन पीरियड SEBI ने किसी भी IPO के 'एंकर इन्वेस्टर्स' या कह लें कि 10 करोड़ से ज्यादा निवेश करने वाले बड़े निवेशकों के शेयर बेचने पर 90 दिन की बंदिश लगा दी है. पहले 30 दिन का लॉक-इन पीरियड था. अब ये निवेशक 30 दिन के भीतर अपना 50 फीसदी शेयर तो बेच सकेंगे, लेकिन बाकी शेयर कम से कम तीन महीने तक होल्ड करना होगा.
आम निवेशक पर असर: लिस्टिंग के बाद मुनाफा काटकर निकल लेने की बड़े निवेशकों की कोशिश थमेगी. शेयरों में बेवजह बड़ी गिरावट नहीं आएगी. तीन महीने में आम निवेशकों को भी कंपनी या बाजार भाव को समझने और आगे खरीद-बिक्री का फैसला करने का पर्याप्त समय मिल पाएगा. यह भी जान लें कि एंकर इनवेस्टर वो संस्थागत निवेशक होते हैं, जिन्हें IPO खुलने के एक दिन पहले ही तयशुदा रेट पर शेयर आवंटित हो जाते हैं. यह कोई भी हो सकता है. एक व्यक्ति, परिवार, कंपनी, ट्रस्ट, म्युचुअल फंड, बैंक या विदेशी संस्थागत निवेशक. हालांकि इन्हें शेयरों का आवंटन घोषित प्राइस बैंड के भीतर ही होता है, लेकिन आम तौर पर उन्हें फ्लोर रेट यानी सबसे सस्ती कीमत ही दी जाती है. मकसद उनके नाम से अन्य निवेशकों को भी खींचना होता है.
ये बड़े निवेशक IPO वाली कंपनी को आपसे बेहतर जानते हैं. कंपनी में बने रहना है या निकलना है, इसका सटीक आकलन और अनुमान भी उनके पास होता है. थोड़ी सी ऊंची लिस्टिंग पर ही उनकी कोशिश प्रॉफिट बुक कर निकल जाने की भी हो सकती है. ऐसे में 90 दिन का लॉक-इन पीरियड आम निवेशक को शेयर प्राइस में भारी उतार-चढ़ाव से बचाएगा. छोटे निवेशकों का कोटा बढ़ा किसी भी IPO में शेयरों के आवंटन का भी एक कोटा सिस्टम है. अभी तक IPO के 35 फीसदी शेयर खुदरा निवेशकों (Retail Individual Investors-RII) के लिए होते थे. वहीं 15 फीसदी शेयर 2 लाख से ज्यादा निवेश करने वाले अमीर निवेशकों (High Networth Individuals-HNI) के लिए होते थे. बाकी 50 फीसदी शेयर संस्थागत निवेशकों या एंकर इनवेस्टर्स के लिए होते हैं, जैसे बैंक, ब्रोकरेज हाउसेज, म्युचुअल फंड, विदेशी संस्थागत निवेशक आदि. SEBI ने यहां HNI वाले कोटे में बड़ा फेरबदल कर दिया है. कहने को 2 लाख से ऊपर वाले हाई नेटवर्थ माने जाते थे, लेकिन उनके कोटे का असली फायदा करोड़ों रुपये निवेश करने वाले उठा ले जाते थे. अब 10 लाख रुपये तक निवेश करने वाले गैर-संस्थागत निवेशकों (Individuals) के लिए कुल IPO का 33 पर्सेंट रिजर्व कर दिया गया है.
आम निवेशकों पर असर: हालांकि बहुत छोटे निवेशकों के लिहाज से इसे तर्कसंगत नहीं बताया जा रहा. लेकिन हाई नेटवर्थ कोटे में मारे-मारे फिरने वाले छोटे अमीरों या अपर मिडल क्लास इनवेस्टर्स के लिए आवंटन का दायरा बढ़ गया है. चूंकि अमीरों के कोटे में 2 लाख रुपये से ऊपर की कोई सीमा तय नहीं थी, ऐसे में बड़ी कंपनियां और मालदार लोग इसमें अच्छा-खासा हिस्सा हथिया लेते थे. पिछले कुछ समय से ये शिकायतें बढ़ रहीं थी कि बंपर सब्सक्रिप्शन में आवंटन पाने से चूक गए खुदरा निवेशक अगर अगले किसी IPO में 2 लाख से ज्यादा निवेश करना भी चाहें तो एचएनआई कैटेगरी में उन्हें करोड़पति निवेशक धकिया देते थे. अब एक तरह से HNI कोटे में भी दो कोटे हो गए हैं. 10 लाख रुपये तक निवेश की क्षमता रखने वाले मिडल या अपर मिडल क्लास के लोगों के लिए अब ज्यादा शेयर लॉट उपलब्ध होंगे. ऑफर फॉर सेल पर नकेल SEBI ने ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए अपना शेयर बेचकर निकल जाने वाले प्रमोटर्स पर भी लगाम कस दी है. नए नियमों के मुताबिक कंपनी में 20 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी रखने वाले निवेशक ऑफर फॉर सेल के जरिए अपना 50 फीसदी से ज्यादा शेयर नहीं बेच पाएंगे. इसी तरह 20 फीसदी से कम हिस्सेदारी रखने वाले इस रूट से 10 फीसदी से ज्यादा शेयर नहीं बेच सकते. OFS को मोटे तौर पर लिस्टिंग के बाद लाया जाने वाला एक तरह का IPO ही समझिए. लेकिन इसमें कंपनी के बजाय सिर्फ उस प्रमोटर या इनवेस्टर के हिस्से का शेयर ही बेचा जाता है.
आम निवेशक पर असर: करीब आठ साल पहले ऑफर फॉर सेल रूट की शुरुआत SEBI की पहल पर ही की गई थी। मकसद था, बड़ी कंपनियों के प्रमोटर्स को अपनी हिस्सेदारी घटाने का मौका देना. लेकिन इसका भी गलत इस्तेमाल शुरू हो गया. कई कंपनियां अब IPO लाती ही इस मकसद से हैं कि लिस्टिंग के बाद इस रूट का इस्तेमाल करते हुए सभी बड़े इनवेस्टर जैसे पीई फंड, एक-एक करके ऊंचे दाम लेकर निकल जाएं. ऐसा होते ही शेयरों के मू्ल्य में जबर्दस्त गिरावट आती है और छोटे निवेशक ठगे रह जाते हैं. अब SEBI ने साफ कर दिया है कि IPO लाने का मकसद यह हो कि आप पूंजी जुटाकर बिजनेस को आगे बढ़ाएंगे, न कि पब्लिक से पैसे वसूलकर निकल जाएंगे. इससे जेनुइन कंपनियां ही IPO लाएंगी और कीमतों में स्थिरता आएगी.

मूल्य आकलन की सांकेतिक तस्वीर
शेयर के प्राइस बैंड पर सख्ती अभी तक IPO लाने वाली कंपनियां शेयर के मनमाने प्राइस बैंड तय करती थीं. आम तौर पर लोवर या फ्लोर प्राइस और अपर प्राइस के बीच कोई खास अंतर नहीं होता था. कई बार यह अंतर एक दो रुपये का ही रहता था. अब SEBI ने नियम जारी किया है कि शेयर का अपर प्राइस उसके लोवर प्राइस का कम से कम 105 पर्सेंट होगा. SEBI के मुताबिक इससे कंपनियां ज्यादा रियलिस्टिक प्राइस बैंड तय करेंगी.
आम निवेशक पर असर: लोअर और अपर प्राइस में ज्यादा अंतर नहीं होने का मतलब यह था कि IPO ला रही कंपनी और उसके संस्थागत निवेशक पहले ही एक रेट तय कर बैठे हैं. गैर-संस्थागत या रिटेल निवेशकों के लिए इसमें बोली लगाने जैसी गुंजाइश नहीं रह गई थी. मसलन 380-385 के प्राइस बैंड में डिमांड बढ़ते ही सभी निवेशक अपर प्राइस बैंड पर ही बोली लगाएंगे. पैसे का सही इस्तेमाल अब तक IPO के जरिए पब्लिक से जुटाए गए फंड की निगरानी का कोई मकैनिज्म नहीं था. कंपनी पर यह बताने की भी कोई जवाबदेही नहीं थी कि वह IPO से प्राप्त पूंजी का कितना इस्तेमाल कारोबार के विस्तार या अधिग्रहण में करेगी. नए नियमों के तहत अगर किसी कंपनी ने IPO ऐप्लिकेशन में साफ तौर पर नहीं बताया कि वह आने वाले पैसे से किस कंपनी को खरीदना या कहां निवेश करना चाहती है, तो वह आगे किसी भी अधिग्रहण या जनरल कॉरपोरेट परपस (GCP) के लिए 35 फीसदी से ज्यादा रकम खर्च नहीं कर पाएगी. केवल अधिग्रहण पर तो वह कुल फंड का 25 फीसदी से ज्यादा खर्च नहीं कर सकेगी. पहली बार व्यवस्था की गई है कि IPO से जुटाई गई पूरी राशि के इस्तेमाल की निगरानी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां करेंगी. वे इस बारे में SEBI को रिपोर्ट देंगी कि कंपनी ने पैसे का इस्तेमाल उसी जगह किया है, जिसका जिक्र उसने अपने IPO फॉर्म में किया था.
आम निवेशक पर असर: कई कंपनियां आनन-फानन में केवल इसलिए IPO लेकर आ जाती हैं कि मार्केट सेंटिमेंट हाई होता है और लोग IPO में पैसे लगा रहे होते हैं. इससे वे फंडिंग जुटाने में तो कामयाब हो जाती हैं, लेकिन बिजनेस बढ़ने की उम्मीद में पैसा लगाने वाले निवेशक बुरी तरह निराश होते हैं. अब नए प्रावधानों से केवल गंभीर और ग्रोथ की मानसिकता वाली कंपनियां ही IPO लाने में दिलचस्पी दिखाएंगी. अब आम निवेशक यह भरोसा कर सकता है कि जिस कंपनी में वह पैसा लगा रहा है, उसने पहले ही सरकार को लिखकर दे दिया है कि इस पैसे का कब और कहां इस्तेमाल होगा. इससे मार्केट में पारदर्शिता आएगी. आम आदमी को वैल्यू फॉर मनी भी मिलेगी.

