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संचार क्रांति के दौर में आपका डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक डेटा कितना सुरक्षित है?

अगर सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हैं तो इस खबर को आखिर तक पढ़िएगा.

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18 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 18 जनवरी 2021, 02:05 PM IST)
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निजता को लेकर चिंतित हैं तो इन बातों को भी जान लीजिए. फोटो- PTI
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हाल ही में वॉट्सऐप ने अपनी प्राईवेसी पॉलिसी में बदलाव किया. इसके बाद ही सवाल उठने लगे कि आपका डेटा कितना सुरक्षित है? आपके पर्सनल चैट, ईमेल, कॉल रिकॉर्डिंग कौन सुन और पढ़ सकता है? क्या पुलिस ऐसा कर सकती है? क्या इस डेटा को पब्लिक में जारी किया जा सकता है? क्या कोर्ट में इनको सबूत माना जाता है? आपके तमाम सवालों के जवाब हम इस खबर में देने की कोशिश करेंगे. कॉल डिटेल के रिकॉर्ड दो लोगों के बीच कब-कब और कितनी देर तक बातें हुईं, इसके रिकॉर्ड को CDR यानि कॉल डिटेल रिकॉर्ड कहा जाता है. इसमें टाइम होता है, ड्यूरेशन होती है और साथ में लोकेशन भी होती है. इसमें कॉल रिकॉर्डिंग नहीं होती है. यानी आप अपने मोबाइल से जो बातचीत करते हैं उसको टेलीकॉम कंपनियां सेव नहीं करती हैं. एक दूरसंचार कंपनी से जुड़े कर्मचारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि कंपनियां पुलिस को केवल CDR ही उपलब्ध करा सकती हैं लेकिन दो व्यक्तियों के बीच की बातचीत को कहीं किसी तरह रिकॉर्ड नहीं किया जाता है. क्या पुलिस बातचीत रिकॉर्ड कर सकती है? इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 के सेक्शन 5(2) के मुताबिक केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के पास फोन टैपिंग का अधिकार है. देश के सुरक्षा, अखंडता, आदि के लिए सरकारें चाहें तो किसी का फोन टैप करा सकती हैं. इसके लिए लिखित दस्तावेज जारी किए जाते हैं जिनके आधार पर पुलिस के सक्षम अधिकारी दूरसंचार कंपनियों से बात करके रिकॉर्डिंग कर सकते हैं. भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम 1885 की धारा 25 और 26 के तहत अवैध रिकॉर्डिंग/इंटरसेप्शन पूरी तरह गैरकानूनी है. ऐसा करने पर तीन साल की जेल और जुर्माना दोनों हो सकता है. वहीं दूरसंचार सेवा कंपनियों का भी ये उत्तरदायित्व है कि उनके नेटवर्क में कोई सेंधमारी ना कर सके. कहीं किसी तरह अवैध इंटरसेप्शन ना हो सके ये जिम्मेदारी टेलीकॉम कंपनियों की है. दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता पुष्पेंद्र सिंह तोमर कहते हैं,
"निजता का अधिकार संविधान के द्वारा दिया गया अधिकार है. संविधान के अनुच्छेद 21 में इसके बारे में विस्तार से बताया गया है. अगर बिना इजाजत आपका फोन टैप किया गया है तो आप कोर्ट में केस दायर कर सकते हैं."
सोशल मीडिया, चैटिंग एप और ईमेल कितने सुरक्षित हैं? एडवोकेट आलोक शर्मा के मुताबिक, 'जो जानकारी आप पब्लिक करते हैं उसकी जिम्मेदारी पूरी तरह आपकी है. आप अपनी फोटो शेयर करते हैं तो वह आपकी ही जिम्मेदारी है. पुलिस के जांच अधिकारी सुबूत जुटाने के लिए लैपटॉप, मोबाइल आदि को जब्त कर सकते हैं.' यूपी पुलिस के सब इंस्पेक्टर कर्मवीर साइबर एक्सपर्ट के रूप में पहचान रखते हैं. उन्होंने बताया कि वॉट्सऐप आपसे जितना भी डेटा मांगता है, जिन चीजों को भी आप अकाउंट बनाने के लिए मुहैया कराते हैं, वह सभी सूचनाएं लीगल एजेंसी के साथ साझा की जा सकती हैं. उन्होंने बताया,
"जितनी सूचनाएं अकाउंट बनाने के लिए आपसे मांगी जाती हैं. जितनी तरह की परमिशन मांगी जाती हैं, वह सभी लीगल एजेंसी के साथ साझा की जा सकती हैं. आज की तारीख में तकनीक की दुनिया में कोई कार्य असंभव नहीं है. वॉट्सऐप अभी तक पर्सनल स्टोरेज पर चल रहा था. डेटा गूगल ड्राइव पर सेव होता था, वो सेंट्रलाइज़ नहीं था. अगर आपका वॉट्सऐप, वन ड्राइव या गूगल ड्राइव से अकाउंट जुड़ा हुआ नहीं है तो एक लोकल बैकअप भी बनता है. कोई कंपनी तब तक आपके डेटा में झांक नहीं सकती जब तक कि वो सेंट्रलाइज ना हो."
उन्होंने बताया कि अगर डेटा क्लाउड पर है तो उसका एक्सेस संबंधित कंपनी के पास है. उसको कंपनी देख सकती है, संरक्षित कर सकती है. क्या कोई आपकी निजी चैट पढ़ सकता है? इसके जवाब में कर्मवीर कहते हैं कि आज आईटी का युग चल रहा है. सॉफ्टवेयर के माध्यम से सब कुछ संभव है लेकिन वो महंगे सॉफ्टवेयर हैं, आम आदमी की पहुंच से बहुत दूर हैं. हालांकि वो कहते हैं कि लोगों को लगता है कि उनके फोन सुने जा सकते हैं या चैट पढ़ी जा सकती है लेकिन ये इतना आसान नहीं है. वो हंस कर कहते हैं कि मैं चाहूं भी तो ऐसा नहीं कर सकता. क्या पुलिस जांच के दौरान मिले डेटा को सार्वजनिक कर सकती है? हमने सीनियर साइबर एक्सपर्ट अनुज अग्रवाल से बात की और उनसे समझना चाहा कि निजता का अधिकार कहां तक काम करता है. साथ ही हमने उनसे वॉट्सऐप पर डेटा सुरक्षा को लेकर भी सवाल किए. उन्होंने बताया,
"कोई चीज अगर जांच के दौरान पता चलती है तो उसे पब्लिक डोमेन में नहीं डाला जा सकता है. ये प्रोटेक्टेड भी है सेक्शन 72 साइबर एक्ट में. अगर जांच के दौरान पुलिस को कोई जानकारी मिलती है, इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन के रूप में. तो इसको वो डिस्क्लोज नहीं कर सकते. जहां तक सवाल प्राईवेसी का है, वॉट्सऐप के संदर्भ में तो समझिए कि वह एक कमर्शियल प्लेटफॉर्म है और जो ऐसे प्लेटफॉर्म होते हैं वो विज्ञापन आदि पर आधारित होते हैं. आपकी पर्सनल जानकारी ही सोशल और चैटिंग एप की कमाई का माध्यम है."
क्या पुलिस लैपटॉप, मोबाइल आदि जब जब्त करती है तो इसके लिए कोर्ट के आदेश की जरूरत होती है? इस पर अनुज अग्रवाल कहते हैं,
"इसमें कोर्ट के आदेश की जरूरत नहीं हैं. CRPC और IT एक्ट दोनों में पुलिस को ये अधिकार है कि किसी केस की जांच के दौरान वो इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज जमा करें. वो हर हद तक जानकारी में घुस सकती है और उसकी पड़ताल कर सकती है. जो लिमिटेशन है वो शेयरिंग पर है. जिस जांच के लिए इन चीजों को लिया गया है उसी जांच को ही किया जा सकता है, ऐसे में कुछ पर्सनल चीजें उन्हें दिखेंगी लेकिन वह उसे इग्नोर करके जांच को ही आगे बढ़ाएंगे. उन चीजों को देखने के बाद पब्लिक को बयान देना, मीडिया में चीजें उपलब्ध कराना निजता का हनन माना जाएगा."
अनुज बताते हैं कि पुलिस के पास ऐसी तमाम तरकीबें हैं जिनके जरिए वो हर तरह के डेटा को एक्सेस कर सकती है. डिलीट हो चुके डेटा को भी रिकवर किया जा सकता है. UPSC पाठशाला के एजुकेटर अतुल जैन कहते हैं,
"संविधान का आर्टिकल 20(3) कहता है कि आपको आपके डिफेंस का अधिकार है. आपको खुद के खिलाफ गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. आपसे ऐसा डेटा नहीं मांगा जा सकता जिससे आप खुद फंस जाएं. आपको अपने खिलाफ सुबूत या गवाही के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. जांच के दौरान पुलिस इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को जमा कर सकती है लेकिन चैट आदि को पब्लिक नहीं किया जा सकता है."
अतुल जैन कहते हैं कि अगर आप कानून के खिलाफ कोई काम कर रहे हैं तो निजता का अधिकार आपको नहीं दिया जा सकता है. किसी भी मूल अधिकार की सीमाएं होती हैं. भारत में अस्पृश्यता के खिलाफ अधिकार को छोड़ कर कोई अधिकार पूर्ण नहीं है. आर्टिकल 17. उसका कोई अपवाद नहीं है. लेकिन बाकी अधिकारों पर अपवाद हैं. क्या वॉट्सऐप चैट को सबूत के तौर पर कोर्ट में पेश किया जा सकता है? एविडेंस ऐक्ट, 1872 की धारा- 65B के तहत वॉट्सऐप चैट (इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड) को सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है. लेकिन इसको एक हलफ़नामे के साथ पेश करना ज़रूरी है. इस हलफनामे में इस बात का ज़िक्र करना जरूरी है कि सबूत के साथ किसी भी तरह से छेड़छाड़ नहीं की गई है. जो वॉट्सऐप चैट कोर्ट में पेश किया जाता है, वह केस से संबंधित होना ज़रूरी है. सबूत के साथ हलफनामा लगाना अनिवार्य है. बिना हलफनामे के कोर्ट में कोई भी सबूत मान्य नहीं किया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के वकील राकेश मुद्गल कहते हैं,
"बिल्कुल वॉट्सऐप चैट को सुबूत माना जा सकता है. चेन ऑफ एविडेंस में इसकी गिनती हो सकती है. ईमेल का आदान प्रदान, फेसबुक या अन्य किसी माध्यम पर हुई चैट को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है. इस तरह की बातचीत को सबूत के रूप में स्वीकार किया जाता है लेकिन ये मेन एविडेंस नहीं होते, सपोर्टिव एविडेंस होते हैं."
निजता का अधिकार संविधान के भाग-3 के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद-19 (अभिव्यक्ति की आज़ादी) और अनुच्छेद-21 (जीवन जीने का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत यह अधिकार नागरिकों को मिला है. इन तीनों में अनुच्छेद-21 राइट टू प्राइवेसी के सबसे करीब है. ये अधिकार नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी जैसे उनका नाम, फोन नंबर, पता, उनका बायोमेट्रिक डिटेल आदि की सुरक्षा सुनिश्चित करता है. निजता के अधिकार का हनन संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन माना जाता है. इसके तहत किसी की निजी जानकारी को सार्वजनिक करना गैर-कानूनी है. इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट (IT Act), 2000 की धारा-72 के मुताबिक, किसी व्यक्ति या कंपनी को किसी के इलेक्ट्रॉनिक डेटा को रखने की शक्ति दी जा सकती है. जिस व्यक्ति का डेटा है, बिना उसकी सहमति के उसकी निजी जानकारी किसी और को नहीं दी जा सकती है. लेकिन जांच एजेंसियों को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 के तहत जांच के लिए किसी की निजी जानकारी हासिल करने का अधिकार है.

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