UP चुनाव से पहले निषाद आरक्षण पर बात नहीं बनी तो क्या BJP को नुकसान होगा?
मार्गदर्शन के लिए राज्य सरकार ने केंद्र को लेटर लिखा है.
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17 दिसंबर को लखनऊ में बीजेपी और निषाद की संयुक्त रैली हुई थी. (फोटो-PTI)
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण का मुद्दा उछल गया है. यूपी सरकार ने सोमवार, 20 दिसंबर को रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया और जनगणना आयुक्त को लेटर लिखा. कहा कि अनुसूचित जाति कैटेगरी के तहत निषाद समुदाय को आरक्षण देने को लेकर मार्गदर्शन करें. इसे लेकर राज्य सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा,
लेटर लिखने की जरूरत क्यों पड़ी?
दरअसल शुक्रवार, 17 दिसंबर को लखनऊ के रमाबाई मैदान में भारतीय जनता पार्टी ने निषाद पार्टी के साथ संयुक्त रैली की. इस रैली को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी के कई नेताओं ने संबोधित किया. अमित शाह ने रैली में आश्वासन दिया की बीजेपी की सरकार दोबारा बनने पर निषाद समुदाय के एजेंडे को पूरा किया जाएगा. लेकिन शाह ने निषाद समुदाय को एसटी में शामिल किए जाने की मांग पर कुछ नहीं कहा. इसकी वजह से इस रैली में आए निषाद समुदाय के लोग निराश हुए. सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ वीडियो में कुछ लोगों का गुस्सा दिखा.
रैली में आरक्षण की मांग को लेकर कोई ऐलान नहीं होने पर निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद ने कहा था,
लेकिन लेटर लिखने भर से क्या होगा? क्या यूपी चुनाव से पहले निषाद समुदाय की मांग पूरी हो सकती है? अगर ऐसा हुआ तो चुनाव नतीजों पर क्या फर्क पड़ेगा? अगर नहीं हुआ तो बीजेपी और संजय निषाद की राजनीति पर क्या असर होगा? पेच कहां फंसा है? लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रविकांत कहते हैं कि निषाद समुदाय को अनुसूचित जाति की लिस्ट में शामिल करने की मांग पुरानी है. योगी सरकार से पहले जब अखिलेश सत्ता में थे तो, उन्होंने भी 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के प्रयास किए थे. उन्होंने बताया कि उन 17 जातियों में से 4 जातियों कुम्हार, प्रजापति, भर और राजभर को छोड़कर 13 मल्लाह की ही उपजातियां मानी जाती हैं. मायावती ने भी इस तरह की बात की थी. लेकिन मायावती ने कहा था कि इन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किया जाए, लेकिन आरक्षण की सीमा को बढ़ाया जाए. क्योंकि उत्तर प्रदेश में एससी का रिजर्वेशन जनसंख्या के आधार पर है.
प्रोफेसर रविकांत का कहना है कि पेच यहीं पर फंस गया है. अगर आप इन जातियों को एससी में शामिल करते हैं तो फिर एससी का रिजर्वेशन भी आपको बढ़ाना होगा. क्योंकि विपक्ष और इस मुद्दे से जुड़े एक्टिविस्ट इस मांग को उठाते रहे हैं और उठाएंगे. संजय निषाद क्या मांग कर रहे हैं? प्रोफेसर रविकांत का कहना है कि संजय निषाद लंबे समय से कह रहे हैं कि एससी में हमारी पहले से ही दो जातियां शामिल हैं और वो ये मांग कर रहे हैं कि केवल इतना प्रावधान करना है कि तुरहा और मझवार का जो भी पर्यायवाची शब्द है- कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, उसको उसको पर्याय मान लिया जाए और जब पर्याय मान लिया जाएगा तो उन्हें एससी में ही आरक्षण मिल जाएगा.
OBC से SC में क्यों शामिल होना चाहते हैं निषाद?
इस सवाल पर प्रोफेसर रविकांत का कहना है कि निषाद समुदाय की आरक्षण की मांग न्यायसंगत लगती है. इसके पीछे वो तर्क देते हैं,
लखनऊ में हुई रैली.
किसी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने और हटाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा आदेश जारी किए जाते हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1950 से 1978 के बीच विशिष्ट जाति समूहों को अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता देते हुए छह राष्ट्रपति आदेश जारी किए गए थे.
'अनुसूचित जाति' नाम इस तथ्य से निकला है कि इसे संविधान की अनुसूची के रूप में संलग्न किया गया है. संविधान का अनुच्छेद 341(1) जातियों को "अनुसूचित जाति" मानने की प्रक्रिया निर्धारित करता है. अनुच्छेद 341 (2) के तहत राज्य सरकारें किसी जाति को अनुसूचित जाति में जोड़ने या किसी जाति को निकालने के लिए प्रस्ताव करती हैं. राष्ट्रपति के आदेश के बाद इन जातियों को अनुसूची में जोड़ा या हटाया जा सकता है. इसके लिए महापंजीयक और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग दोनों ही सहमत प्रस्तावों को संसद में एक विधेयक के रूप में पेश करते हैं. चुनाव से पहले कितनी बात बनती दिख रही है? ये बहुत मुश्किल है. प्रोफेसर रविकांत ने बताया, क्योंकि ये प्रोसेस लंबा है. हालांकि संजय निषाद इस पर कुछ और ही कहते रहे हैं. उनका कहना है कि एक उदाहरण हमारे लोग देते हैं कि संविधान में सवर्ण का आरक्षण नहीं लिखा था, उसे 72 घंटे के अंदर लिखकर के 10 प्रतिशत दे दिया. जो मेरा लिखा हुआ है, उसे लागू कराने में किया दिक्कत आ रही है. अगर कोई दिक्कत आ रही है तो बताएं, उसे मिलकर के हम सॉल्व करते हैं. निषाद समुदाय का कितना प्रभाव अब यूपी में निषाद समुदाय के सियासी प्रभाव की बात कर लेते हैं. द हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में संजय निषाद दावा करते हैं कि यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से 160 सीटें निषाद डोमिनेटेड हैं. वहीं कई मीडिया रिपोर्टों में दावे किए जाते रहे हैं कि सभी विधानसभा सीटों पर निषाद या निषाद समाज की अन्य उपजातियों के 15 से 20 हजार वोट हैं. 70 सीटों पर निषाद जीत-हार तय करते हैं. वहीं कई मीडिया रिपोर्ट में निषाद समाज को 5 फीसदी के करीब बताया गया है. ये जातियां मल्लाह, मांझी, निषाद, धीवर, बिंद, कहार, कश्यप के नाम से जानी जाती हैं. इनका गोरखपुर, मऊ, गाजीपुर, बलिया, संतकबीर नगर, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद, जौनपुर, फतेहपुर, सहारनपुर और हमीरपुर जैसे जिलों में बतौर वोटर काफी प्रभाव है. बात नहीं बनी तो क्या होगा? प्रोफेसर रविकांत का कहना है कि संजय निषाद की पूरी राजनाति आरक्षण के इर्द-गिर्द घूमती है. उन्होंने गांव-गांव में जाकर लोगों को जोड़ा. लोगों से वादा किया कि वो आरक्षण दिलवाएंगे. संजय निषाद ने लोगों से चंदा वसूल किया. प्रोफेसर कहते हैं,
यूपी सरकार के विशेष सचिव रजनीश चंद्र ने रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया और जनगणना आयुक्त को लेटर भेजा है. उन्होंने दोनों अधिकारियों का ध्यान मझवार जाति की ओर आकर्षित किया है, जो उत्तर प्रदेश सरकार की अनुसूचित जाति की सूची में 53वें नंबर पर है. निषाद पार्टी प्रमुख का ज्ञापन भी उस पत्र के साथ संलग्न किया गया है, जिसमें संजय निषाद ने कहा है कि राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में मझवार जाति के लोग मांझी, मझवार, केवट, मल्लाह और निषाद सरनेम का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन अलग-अलग सरनेम के कारण उन्हें SC प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाता, जबकि अन्य SC लोग जो अलग-अलग सरनेम का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें SC को मिलने वाला लाभ मिल रहा है.प्रवक्ता ने बताया कि डॉ संजय निषाद ने मांग की है कि मझवार जाति के उपनाम वाले सभी लोगों को भी अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र दिया जाना चाहिए.
लेटर लिखने की जरूरत क्यों पड़ी?
दरअसल शुक्रवार, 17 दिसंबर को लखनऊ के रमाबाई मैदान में भारतीय जनता पार्टी ने निषाद पार्टी के साथ संयुक्त रैली की. इस रैली को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी के कई नेताओं ने संबोधित किया. अमित शाह ने रैली में आश्वासन दिया की बीजेपी की सरकार दोबारा बनने पर निषाद समुदाय के एजेंडे को पूरा किया जाएगा. लेकिन शाह ने निषाद समुदाय को एसटी में शामिल किए जाने की मांग पर कुछ नहीं कहा. इसकी वजह से इस रैली में आए निषाद समुदाय के लोग निराश हुए. सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ वीडियो में कुछ लोगों का गुस्सा दिखा.रैली में आरक्षण की मांग को लेकर कोई ऐलान नहीं होने पर निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद ने कहा था,
रैली में लोग बड़ी उम्मीद के साथ आए थे. पिछली सरकारों ने गोलमाल करके उनके सरनेम को पिछड़े (वर्ग) में डाल दिया. निषाद को एससी में शामिल करने की वकालत योगी आदित्यनाथ खुद करते रहे हैं, उनके ढेर सारे वीडियो है. वकील खुद जज बन जाए और हम जज को मंच पर बुलाएं और जजमेंट सुनने के लिए जब सभी आतुर थे...(तो) लोग बड़ा मायूस हुए और उस पर विरोध प्रदर्शन भी लोगों ने किया.संजय निषाद ने आगे कहा,
आरक्षण नहीं तो वोट नहीं, आरक्षण नहीं तो गठबंधन तोड़ दो.इसके बाद संजय निषाद की सीएम योगी और बीजेपी के अन्य नेताओं से बात हुई. और अंत में राज्य सरकार ने केंद्र को लेटर लिख मार्गदर्शन मांगा.
लेकिन लेटर लिखने भर से क्या होगा? क्या यूपी चुनाव से पहले निषाद समुदाय की मांग पूरी हो सकती है? अगर ऐसा हुआ तो चुनाव नतीजों पर क्या फर्क पड़ेगा? अगर नहीं हुआ तो बीजेपी और संजय निषाद की राजनीति पर क्या असर होगा? पेच कहां फंसा है? लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रविकांत कहते हैं कि निषाद समुदाय को अनुसूचित जाति की लिस्ट में शामिल करने की मांग पुरानी है. योगी सरकार से पहले जब अखिलेश सत्ता में थे तो, उन्होंने भी 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के प्रयास किए थे. उन्होंने बताया कि उन 17 जातियों में से 4 जातियों कुम्हार, प्रजापति, भर और राजभर को छोड़कर 13 मल्लाह की ही उपजातियां मानी जाती हैं. मायावती ने भी इस तरह की बात की थी. लेकिन मायावती ने कहा था कि इन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किया जाए, लेकिन आरक्षण की सीमा को बढ़ाया जाए. क्योंकि उत्तर प्रदेश में एससी का रिजर्वेशन जनसंख्या के आधार पर है.
प्रोफेसर रविकांत का कहना है कि पेच यहीं पर फंस गया है. अगर आप इन जातियों को एससी में शामिल करते हैं तो फिर एससी का रिजर्वेशन भी आपको बढ़ाना होगा. क्योंकि विपक्ष और इस मुद्दे से जुड़े एक्टिविस्ट इस मांग को उठाते रहे हैं और उठाएंगे. संजय निषाद क्या मांग कर रहे हैं? प्रोफेसर रविकांत का कहना है कि संजय निषाद लंबे समय से कह रहे हैं कि एससी में हमारी पहले से ही दो जातियां शामिल हैं और वो ये मांग कर रहे हैं कि केवल इतना प्रावधान करना है कि तुरहा और मझवार का जो भी पर्यायवाची शब्द है- कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, उसको उसको पर्याय मान लिया जाए और जब पर्याय मान लिया जाएगा तो उन्हें एससी में ही आरक्षण मिल जाएगा.
OBC से SC में क्यों शामिल होना चाहते हैं निषाद?
इस सवाल पर प्रोफेसर रविकांत का कहना है कि निषाद समुदाय की आरक्षण की मांग न्यायसंगत लगती है. इसके पीछे वो तर्क देते हैं,
राघवेंद्र कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि सरकारी नौकरियों में OBC में शामिल निषाद कम्युनिटी को सबसे कम लाभ मिला है. जबकि ओबीसी में बनिया जाति को सबसे ज्यादा लाभ मिला है. दूसरे नंबर पर कुर्मी और तीसरे नंबर पर यादव हैं. राघवेंद्र कमेटी ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को तीन भाग में बांटने की सिफारिश की थी और मल्लाह, केवट, निषाद जैसी 95 जाातियों के लिए 9 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी.प्रोफेसर के मुताबिक अगर राघवेंद्र कमेटी की सिफारिश को लागू कर दिया जाए तो OBC के अंदर ही इन जातियों को आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है. उन्हें एससी में शामिल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
लखनऊ में हुई रैली.किसी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने और हटाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा आदेश जारी किए जाते हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1950 से 1978 के बीच विशिष्ट जाति समूहों को अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता देते हुए छह राष्ट्रपति आदेश जारी किए गए थे.
'अनुसूचित जाति' नाम इस तथ्य से निकला है कि इसे संविधान की अनुसूची के रूप में संलग्न किया गया है. संविधान का अनुच्छेद 341(1) जातियों को "अनुसूचित जाति" मानने की प्रक्रिया निर्धारित करता है. अनुच्छेद 341 (2) के तहत राज्य सरकारें किसी जाति को अनुसूचित जाति में जोड़ने या किसी जाति को निकालने के लिए प्रस्ताव करती हैं. राष्ट्रपति के आदेश के बाद इन जातियों को अनुसूची में जोड़ा या हटाया जा सकता है. इसके लिए महापंजीयक और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग दोनों ही सहमत प्रस्तावों को संसद में एक विधेयक के रूप में पेश करते हैं. चुनाव से पहले कितनी बात बनती दिख रही है? ये बहुत मुश्किल है. प्रोफेसर रविकांत ने बताया, क्योंकि ये प्रोसेस लंबा है. हालांकि संजय निषाद इस पर कुछ और ही कहते रहे हैं. उनका कहना है कि एक उदाहरण हमारे लोग देते हैं कि संविधान में सवर्ण का आरक्षण नहीं लिखा था, उसे 72 घंटे के अंदर लिखकर के 10 प्रतिशत दे दिया. जो मेरा लिखा हुआ है, उसे लागू कराने में किया दिक्कत आ रही है. अगर कोई दिक्कत आ रही है तो बताएं, उसे मिलकर के हम सॉल्व करते हैं. निषाद समुदाय का कितना प्रभाव अब यूपी में निषाद समुदाय के सियासी प्रभाव की बात कर लेते हैं. द हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में संजय निषाद दावा करते हैं कि यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से 160 सीटें निषाद डोमिनेटेड हैं. वहीं कई मीडिया रिपोर्टों में दावे किए जाते रहे हैं कि सभी विधानसभा सीटों पर निषाद या निषाद समाज की अन्य उपजातियों के 15 से 20 हजार वोट हैं. 70 सीटों पर निषाद जीत-हार तय करते हैं. वहीं कई मीडिया रिपोर्ट में निषाद समाज को 5 फीसदी के करीब बताया गया है. ये जातियां मल्लाह, मांझी, निषाद, धीवर, बिंद, कहार, कश्यप के नाम से जानी जाती हैं. इनका गोरखपुर, मऊ, गाजीपुर, बलिया, संतकबीर नगर, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद, जौनपुर, फतेहपुर, सहारनपुर और हमीरपुर जैसे जिलों में बतौर वोटर काफी प्रभाव है. बात नहीं बनी तो क्या होगा? प्रोफेसर रविकांत का कहना है कि संजय निषाद की पूरी राजनाति आरक्षण के इर्द-गिर्द घूमती है. उन्होंने गांव-गांव में जाकर लोगों को जोड़ा. लोगों से वादा किया कि वो आरक्षण दिलवाएंगे. संजय निषाद ने लोगों से चंदा वसूल किया. प्रोफेसर कहते हैं,
जब आप इस तरह से लोगों को वादा करके जोड़ते हैं कि हम आरक्षण दिलवाएंगे और अगर ये नहीं होता है तो लोगों का भरोसा खत्म होने लगता है. इससे संजय निषाद की नेतागिरी भी प्रभावित होगी. रैली से निकले कुछ लोगों को कहते सुना गया कि संजय निषाद अकेले चले गए हैं. हम नहीं गए हैं... अगर निषाद बीजेपी से छिटके तो बीजेपी को बड़ा डेंट लगेगा.हालांकि प्रोफेसर रविकांत का ये भी कहना है कि बीजेपी ने इसकी काट निकाल ली है. बीजेपी ने प्रयागराज के पास निषाद राज की मूर्ति लगाई, उसे धार्मिक स्थल घोषित किया. वहीं जयप्रकाश निषाद को बीजेपी ने राज्यसभा भेजा. इसके अलावा बीजेपी ने इस समुदाय के तमाम लोगों को ब्लॉक प्रमुख, जिलाअध्यक्ष जैसे पदों पर बैठाया. तो कहीं ना कहीं बीजेपी दूसरे माध्यम से निषाद समाज के लोगों को एडजस्ट कर रही है. प्रोफेसर का मानना है कि बीजेपी प्रतीकात्मक राजनीति अच्छे से कर रही है. लेकिन सबसे बड़ा मसला आरक्षण का है. अगर वो मांग पूरी नहीं हुई तो निषाद समाज बीजेपी से छिटककर विपक्ष के पाले में जा सकता है. हालांकि होगा कि इस मौके को भुनाने के लिए अखिलेश कितना तैयार हैं.

