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रेलवे की ताकत को गांधी से ज्यादा आजतक कोई नहीं समझ पाया

स्टेशन प्लेटफ़ॉर्म एक समय में राष्ट्रवाद का थिएटर बन गए थे.

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रुचिका
2 अक्तूबर 2020 (अपडेटेड: 1 अक्तूबर 2020, 04:52 AM IST)
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22 जुलाई 1853 के दिन कार्ल मार्क्स का एक आर्टिकल न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून में छपा. जिसमें वो तब हाल ही में बने भारतीय रेलवे की तरफ़ इशारा कर रहे थे. लिखा था, 'आप इतने बड़े देश में तब तक रेलवे पूरी तरह से स्थापित नहीं कर सकते जब तक आप इसके लिए उपयोगी सारी ज़रूरी उद्योग न शुरू कर लें.

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भारत में रेलवे की शुरुआत में यूरोपीय और भारतीय यात्रियों में काफी अंतर किया जाता था. लेकिन इसमें समय के साथ खासे बदलाव आए.
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महात्मा गांधी खुलकर चंदा मांगते थे, उनका कहना था, 'जो भी स्टेशन पर आते हैं, उन्हें अपने साथ पैसे लेकर ही आने हैं. अगर ये जून 20, 1921 तक 1 करोड़ रुपये तक नहीं पहुंचा तो हमें बदनाम किया जाएगा. ऐसे में हमें किसी भी हाल में इस साल स्वराज हासिल नहीं होगा.'
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जब मुखर्जी जगे और उन्हें एहसास हुआ कि हुआ क्या है, तब उन्होंने उस आदमी की जैकेट हवा में फेंक दी. जब अगले दिन वो जगा तो उससे मुखर्जी ने कहा, 'तुम्हारा जैकट मेरी चप्पलें ढूंढने गया है.' वापस 19वीं शताब्दी की बात करें, तब भारत के लोग ब्रिटिश भारतीय रेलवे को किसी विदेशी देवता की तरह देखते थे. यहां तक कि गांव वाले और उनके बच्चे डर के मारे इसके सामने सिर झुकाते, ठीक वैसे ही जैसे वो अपने भगवान और धर्म से डरकर करते हैं. लेकिन कुछ दस्तावेज़ों से ये साबित होता है कि 1920 के करीब भारतीयों ने अंग्रेज़ी भाषा और ब्रिटिश भारतीय रेलवे का इस्तेमाल अपने फ़ायदे के लिए किया.  
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  इनमें से एक दस्तावेज़ ओखिल चंद्र सेन का था. उन्होंने 1909 में साहिबगंज के डिवीज़नल रेलवे कार्यालय को एक पत्र लिखा. कहते हैं इस पत्र के कारण ही भारतीय रेल की दूसरी और तीसरी श्रेणी, जिसमें भारतीय ट्रैवल करते थे, उसमें शौचालय बने.
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1916 में गांधीजी चंपारण के लिए रवाना हुए. 1920 तक उन्होंने तीसरी श्रेणी में सफ़र करके देश घूमा . 1930 के दशक में 'महात्मा गांधी की जय' राष्ट्रवादियों के लिए नारा बन गया, जो चेन खींचने और दूसरे खतरनाक कामों को अंजाम देते.
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महात्मा गांधी ने भारतीय रेलवे को आज का रूप दिया. लेकिन इसमें मुखर्जी और ओखिल बाबू जैसे लोगों का भी उतना ही हाथ था. सर टी माधव राव का कहना था, 'अगर भारत को एक राष्ट्र बनकर उभरना है तो ये बस रेवले और अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से हो सकता है.' लेकिन मुखर्जी, ओखिल बाबू और गांधीजी ने ऐसा होने नहीं दिया. आज भारतीय रेलवे हमारी विभिन्न संस्कृति को जोड़ती एक कड़ी है.

ये आर्टिकल 'DailyO' के लिए अरूप चटर्जी ने लिखा है और इसे रुचिका ने ट्रांन्सलेट किया है.


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