पुतिन के कारण भारत का बड़ा नुकसान हो रहा है!
यूक्रेन-रूस युद्ध के चलते IMF ने जताई 2023 में बड़ी वैश्विक आर्थिक मंदी की चिंता

एक व्यक्ति की जिद किस हद तक जा सकती है, किस हद तक अपने आस-पास के लोगों को नुकसान पहुंचा सकती है? अगर कोई सामान्य व्यक्ति हो, हो सकता है अपने परिवार को प्रभावित करते, पड़ोसियों का प्रभावित करे. कोई मोहल्ले का ताकतवर व्यक्ति हो तो हो सकता है पूरे इलाके को. लेकिन क्या किसी एक व्यक्ति की जिद पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकती है? क्या समूचे विश्व के लिए परेशानी का सबब बन सकती है? जी बन सकती है. अगर उस व्यक्ति का नाम ब्लादिमिर पुतिन हो.
आज बात होगी रूस-यूक्रेन युद्ध की. उस युद्ध से उठी पीड़ा की और बात भारत समेत बाकी मुल्कों की अर्थव्यवस्था में पड़ रहे प्रभाव की. IMF यानी इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड ने आशंका जताई है कि 2023 के साल में दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती हैं. इसके पीछे की बड़ी वजहों में से एक रूस-यूक्रेन युद्ध को भी माना गया. 11 अक्टूबर यानी आज की शाम IMF ने दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के लिए फिर से अपना अनुमान जारी किया. IMF ने 2023 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को 6.8% से घटाकर 6.1% कर दिया.
अनुमान लगाया है कि दुनिया की 4 बड़ी इकॉनमिक ताकत अमेरिका, चीन और यूरोपिय देशों की अर्थव्यवस्था आगे भी गिरती रहेगी. वैश्विक महंगाई दर भी 9.5% तक पहुंचने का अनुमान है. IMF की तरफ से जारी किए गए इस चार्ट को देखेंगे तो यही समझ आता है कि भारत अब भी बड़े देशों में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है. भारत की अर्थव्यवस्था 6.1% के दर से बढ़ेगी. तो चीन की 4.4%, जबकि अमेरिका की 1%.
नंबर गेम में भारत इन देशों से आगे नजर आता है. मगर फिर बात अर्थव्यवस्था के आकार पर आती है. अमेरिका की जीडीपी 20 ट्रिलयन के करीब है, चीन की 13 ट्रिलियन, जबकि भारत अब भी 3 ट्रिलियन के आस-पास स्ट्रगल कर रहा है. भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने 2024 में भारत की अर्थव्यवस्था को 2024 तक 5 ट्रिलियन पहुंचाने का लक्ष्य रखा था. जो मौजूदा परिस्थिति में मुश्किल नजर आता है. क्योंकि भारत के सामने संकट दोहरा है. एक तो पुतिन की मनमानी, दूसरा बेमौसम पानी. दोनों ही अर्थव्यवस्था के लिए खतरे हैं.
24 फ़रवरी 2022 को जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ तो पुतिन सोचा यही होगा कि हफ्ते भर के अंदर मामला निपटा देंगे. जैसे 2008 में जॉर्जिया के साथ किया, 2015 में क्रिमिया के साथ किया, वैसे ही यूक्रेन पर हमला कर उसे अपने में मिला लेंगे. लेकिन तारीख गवाह है, पुतिन का हर दांव उल्टा पड़ गया. दुनिया के नक्शे नजर डालेंगे तो क्षेत्रफल के हिसाब से जो सबसे बड़ा मुल्क नजर आएगा. वो रूस है. उसकी ठीक बाईं तरफ यूरोप से सटा एक छोटा सा देश है यूक्रेन.
हम उन कारणों पर नहीं जाएंगे कि युद्ध क्यों शुरू किया, किसने शुरू किया और इसका अंत क्या होगा? हम नक्शे और ताकत पर जाते हैं. किसी भी सामान्य इंसान को देखकर लग सकता है कि इतने बड़े देश के सामने, एक अदना सा देश टिक नहीं पाएगा. यही पुतिन को भी लगा था.
लेकिन यूक्रेन के लोगों की जीजीविषा और पश्चिमी देशों से मिले समर्थन की वजह से यूक्रेन ने घुटने नहीं टेके. युद्ध अंगारों पर चढ़े उस पतीले की तरह हो गया, जिसमें धीरे-धीरे कुछ पक रहा हो. अचानक से 8 अक्टूबर की तारीख अंगारों से उबाल आ जाता है. रूस और क्रीमिया को जोड़ने वाले इकलौते पुल पर ज़ोरदार धमाका हुआ, पुल क्षतिग्रस्त. किसी ने कहा आतंकी हमला था, किसी ने कहा यूक्रेन ने मारा. फिर पुतिन की बारी आई. अब तक सीमाओं पर चल रहे युद्ध को पुतिन यूक्रेन की राजधानी कीव के अंदर लेकर चले गए. 10 अक्टूबर की सुबह रूस ने यूक्रेन की राजधानी कीव समेत कई अहम शहरों पर बमबारी की. छोटे आकार की मिसाइलें गिराई. और जब आसमान से आग बरसी तो उसने ये नहीं देखा कि यहां बच्चों के खेलने का पार्क है, आम लोगों का रिहाइसी इलाका है. शॉपिंग मॉल हो या फिर सामान्य सी दुकान. रूस की बमबारी से कुछ नहीं बचा.
युद्ध में आई इसी तेजी के बाद से पूरी दुनिया आशंकित है. युद्ध लंबा चला तो यूरोप के कई देशों में गैस और एनर्जी का संकट हो सकता है, क्योंकि वो प्राकृतिक गैस के लिए बड़े पैमाने पर रूस पर निर्भर हैं. जानकार बताते हैं कि ये सर्दियां वैश्विक परिदृश्य के लिहाज से काफी अहम है. यूरोप के कई देश फ्रांस, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन एनर्जी की बड़ी सप्लाई रूस से लेते हैं. रूस पाइप लाइन के जरिए प्राकृतिक गैस की सप्लाई करता है, जिसका इस्तेमाल यूरोप के देश इंडस्ट्री और घरेलू इस्तेमाल के लिए करते हैं. सर्दियों में यूरोप में गैस की खपत बढ़ जाती है. लोग घर को गर्म रखने, हीटर जलाने के लिए बिजली की जगह प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल करते हैं. वैसे भी इतिहास गवाह रहा है सर्दियां हमेशा रूस के लिए मुफीद होती हैं. ऐसे में रूस ने गैस की सप्लाई रोकी तो यूरोप बड़े संकट में आ जाएगा.
रूस-यूक्रेन के युद्ध के बाद यूरोप के देश अब दूसरे विकल्पों पर काम कर रहे हैं.लेकिन उसमें अभी वक्त है. इसके अलावा वो देश जो खाने-पीने के सामान से लेकर फर्टिलाइटर तक, रूस पर निर्भर हैं. उन पर भुखमरी का संकट है. खुद रूस भी तमाम तरह के आर्थिक प्रतिबंधों से गुजर रहा है, लेकिन पुतिन इन सबसे बेफिक्र हैं. मगर दुनिया इसकी बड़ी कीमत चुकाने वाली है.
जानकारों की मानें तो रूस-यूक्रेन युद्ध की कीमत करीब-करीब 3 ट्रिलियन डॉलर है. जो भारत की समूची अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है. लंबे समय से रूस की सत्ता में काबिज पुतिन की पहचान अधिनायकवादी नेता हैं. जानकार मानते हैं कि बीते कुछ दिनों में पुतिन की ताकत रूस में कमजोर हुई. विरोध के स्वर भी उठने लगे तो पुतिन ने अपने विरोधियों को बड़े करीने से निपटा दिया. चुंकि किसी भी ऐसे नेता को अपनी सर्वसत्ता स्थापित करने के लिए जनता को एक बड़ा मकसद दिखाना होता है. पुतिन, सोवियत यूनियन के समय की ताकत को याद दिलाते हैं और एक तरह से अंखड रूस का सपना जनता को दिखाते हैं. सपने को पूरा करने के लिए चाहिए होता है एक दुश्मन, जिसके खिलाफ राष्ट्रवाद की एक लहर जगाई जा सके. तो फिलवक्त टार्गेट है यूक्रेन. 23 से 27 सितंबर के बीच यूक्रेन के चार प्रांतों में रूस की तरफ जनमत-संग्रह कराया गया.
रूस ने दावा किया. कि चारों प्रांतों ने बहुमत से रूस में शामिल होने का विकल्प चुना है. कुछ जानकार इसे बंदूक के दम पर लिया गया फैसला बता रहे हैं. क्योंकि जनमत संग्रह के वक्त दूसरे देशों या फिर UN का कोई भी प्रतिनिधि वहां शामिल नहीं था. यूक्रेन इसको अवैध बताता है. युद्ध और तीखा हो जाता है. चूंकि पारंपरिक तौर पर रूस का दोस्त रहा है, लेकिन युद्ध के दौरान भारत ने यूक्रेन से भी कोई बैर नहीं दिखाया. एक तरह से तटस्थ रहा लेकिन रूस की तरफ झुकाव भी साफ नजर आया. इस दौरान भारत ने रूस से अपने संबंधों को मजबूत भी किया. डॉलर के अधिपत्य को छोटी सही मगर चुनौती दी गई. रुपया-रुबल में व्यापार किया जाने लगा.
और चिंता की बात यही है. जब तक यूरोप गैस के लिए रूस पर निर्भर है. तब तक प्रतिबंधों में ढील रहेगी. लेकिन जैसे ही यूरोप के देश गैस के लिए आत्मनिर्भर हुए, संकट बढ़ जाएगा. क्योंकि तब अमेरिका, रूस पर और कड़े प्रतिबंध लगाने लगेगा. जिसका असर भारत के व्यापार पर पड़ेगा. भारत कोविड काल के पहले से ही आर्थिक चुनौतियों से गुजर रहा है.अर्थव्यवस्था 2016 के आस-पास थोड़ी सी कमजोर हुई, सरकार ने उसी वक्त नोटबंदी का ऐलान कर दिया. नतीजे ठीक नहीं रहे. GDP ग्रोथ रेट गिर गई. 2017 में GST लागू की गई. अचानक आई जीएसटी को व्यापारियों को उस वक्त उतना भाया नहीं. नतीजा ये हुआ कि अर्थव्यवस्था और डामाडोल हुई. 2020 में आई कोविड महामारी ने चलते पहिए पर ब्रेक लगा दिया. गाड़ी के तेल से लेकर खाने के सबकुछ महंगा हो गया. स्थिति सुधरती उससे पहले रूस-यूक्रेन युद्ध हो गया. जो खिंचता ही चला जा रहा है. इसका असर भारत के आम लोगों पर कैसे सीधे पड़ रहा है? ये आप ध्येय IAS की फैकल्टी कन्हैया पाण्डेय से समझिए
जानकार मानते हैं कि रुपए का कमजोर होना देश के लिए काफी नुकसान दायक साबित हो रहा है. इसकी वाजिब वजह है. भारत एक नेट इंपोर्टर देश है. मतलब दूसरे देशों से ज्यादा सामान खरीदते हैं. हमारा एक्सपोर्ट कम है. दिनों दिन और कम होता जा रहा है. सितंबर महीने में भारत ने 33.81 अरब डॉलर का सामाना एक्सपोर्ट किया. जबकि ये अक्टूबर में ये घटकर 32.62 अरब डॉलर पर आ गया. इस कमी को आप ऐसे तौलिए कि मार्च में भारत 40 अरब डॉलर का सामान बेच रहा था. मात्र 4 महीने ये बड़ी गिरावट दर्ज हुई है. जिसका नतीजा है कि डॉलर या कह लें विदेशी मुद्रा भंडार भी कम हो गया है. तमाम आर्थिक उठापटक के बीच भारत में कृषि, एक ऐसा सेक्टर होता है जो हमेशा देश की रीढ़ की तरह काम करता है. हमने आपको पहले ही बताया रूस फर्टिलाइजर का बड़ा उत्पादक देश है तो युद्ध ने भारत के कृषि सेक्टर को भी प्रभावित कर दिया है.
रूस-यूक्रेन युद्ध के अलावा भारतीय कृषि के लिए दूसरी चिंता की बात बेमौसम बरसात है. देश के कई हिस्सों में बेमौसम बारिश से फसलों को काफी नुकसान पहुंचा है. इसमें धान, सोयाबीन, कपास और दलहन शामिल है. खड़ी फसलें लोट गईं. कई इलाकों में धान की फसल पूरी तरह चौपट भी हुईं. किसानों को अब मौसम के सामान्य होने का इंतजार है ताकि वे खेतों को साफ करके आलू की फसल लगा सकें. मटर की बुआई भी अब तक कई इलाकों में शुरू नहीं हो पाई है.
जिसकी वजह से आने वाले दिनों में आने वाले दिनों में खाने-पीने की चीजों के दाम और बढ़ने की आशंका है. महंगाई दर पहले ही RBI के तय मानक 6% से ऊपर चल रही है. और महंगाई को रोकने के लिए RBI फिर से रेपो रेट बढ़ाने पर विचार कर सकती है. जबकि मई से लेकर अब तक RBI चार बार रेपो रेट में बढ़ोतरी कर चुका है. आपकी EMI या तो बढ़ चुकी है या फिर EMI जमा करने का टेन्योर बढ़ चुका है. हर स्थिति में आम इंसान की जेब पर ही चोट है.

